Parivartini Ekadashi Upay: परिवर्तिनी एकादशी पर करें ये खास उपाय, खुलेंगे तरक्की के द्वार
Parivartini Ekadashi Upay: भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी के नाम से जाना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु क्षीरसागर में शयन करते हैं और इस एकादशी पर करवट बदलते हैं। इसी वजह से इसे परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। कई क्षेत्रों में यह दिन जलझूलनी एकादशी और डोल ग्यारस के नाम से भी जाना जाता है। इस अवसर पर भगवान विष्णु के वामन स्वरूप की पूजा करने की परंपरा है। कुछ स्थानों पर भगवान की प्रतिमा को पालकी में विराजमान कर शोभायात्रा भी निकाली जाती है। श्रद्धालु अपनी आस्था के अनुसार व्रत रखते हैं और भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना करते हैं।
धार्मिक परंपराओं में एकादशी के दिन अनाज का सेवन न करने की मान्यता भी बताई गई है। कुछ परंपराओं में गेहूं, उड़द, मूंग, चना, जौ, चावल और मसूर जैसे अनाजों को एकादशी के दिन भोजन से दूर रखने तथा अगले दिन दान करने का विधान बताया जाता है।
परिवर्तिनी एकादशी पर किए जाने वाले पारंपरिक उपाय
शांति के लिए मूंग का दान: धार्मिक मान्यता के अनुसार, पारिवारिक परेशानियों से राहत की कामना रखने वाले लोग भगवान विष्णु की पूजा के दौरान मिट्टी के पात्र पर हल्दी से तिलक लगाकर उसमें मूंग रख सकते हैं। इसे एकादशी के दिन पूजा स्थल पर रखने के बाद अगले दिन किसी जरूरतमंद या पात्र व्यक्ति को दान करने की परंपरा बताई जाती है।
दांपत्य संबंधों में मधुरता के लिए तुलसी पूजा: पति-पत्नी के रिश्ते में प्रेम और सौहार्द की कामना से परिवर्तिनी एकादशी पर तुलसी पूजन किया जा सकता है। परंपरा के अनुसार तुलसी के पौधे को थोड़ा दूध अर्पित कर श्रद्धापूर्वक प्रणाम किया जाता है।
कार्यों में सफलता के लिए केले के पेड़ की पूजा: धार्मिक मान्यता में केले के पौधे को भगवान विष्णु से संबंधित माना जाता है। इसलिए इस दिन केले के पेड़ को प्रणाम कर उसकी जड़ में जल अर्पित करने की परंपरा है।
वैवाहिक सुख के लिए माखन-मिश्री का भोग: भगवान विष्णु को माखन और मिश्री का भोग लगाने के बाद उनके सामने बैठकर 'ॐ नमो भगवते नारायणाय' मंत्र का 108 बार जाप करने की परंपरा बताई जाती है। इसे दांपत्य जीवन में सुख-शांति की कामना से किया जाता है।
संतान के मंगल के लिए हल्दी का तिलक: परिवार और संतान के मंगल की कामना से भगवान हरि का स्मरण करते हुए साबुत हल्दी को पीसकर उसका तिलक लगाने की परंपरा कुछ धार्मिक मान्यताओं में बताई गई है। इसे स्वयं और बच्चे के माथे पर लगाया जाता है।
आर्थिक स्थिति के लिए गौसेवा: आर्थिक समृद्धि की कामना से जौ की रोटी पर मीठा दही रखकर गाय को खिलाने की परंपरा बताई जाती है। यदि जौ उपलब्ध न हो तो गेहूं के आटे की रोटी का उपयोग करने की बात भी कही जाती है। गौसेवा करते समय स्थानीय नियमों और पशु के स्वास्थ्य का ध्यान रखना चाहिए।
एकादशी पर क्या ध्यान रखें?
परिवर्तिनी एकादशी के दिन पूजा-पाठ और व्रत की विधि अलग-अलग क्षेत्रों तथा परिवारों की परंपराओं के अनुसार बदल सकती है। इसलिए व्रत रखने वाले व्यक्ति को अपनी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखना चाहिए। धार्मिक मान्यताओं में बताए गए उपायों को आस्था और परंपरा के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। हरिभूमि.कॉम इसकी पुष्टि नहीं करता है
आज का पंचांग 22 सितंबर 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त, राहुकाल, चौघड़िया, सूर्योदय-सूर्यास्त
आज की तिथि क्या है?: आज भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि है, जो रात 9 बजकर 44 मिनट तक रहेगी। इसके बाद द्वादशी तिथि शुरू हो जाएगी। यहां जानें ज्योतिषाचार्य डॉक्टर मनीष गौतम जी महाराज से आज के दिन का पंचांग, सूर्य, चंद्रमा की स्थिति और शुभ-अशुभ समय।
- वार: मंगलवार
- नक्षत्र: उत्तराषाढ़ा सुबह करीब 7:06 बजे तक, इसके बाद श्रवण
- योग: अतिगण्ड- शाम करीब 4:29 बजे तक, इसके बाद सुकर्मा
- करण: वणिज- सुबह करीब 8:56 बजे तक, इसके बाद विष्टि (भद्रा), फिर बव आदि
शुभ मुहूर्त
- अभिजीत मुहूर्त: 11:32 AM- 12:20 PM
- ब्रह्म मुहूर्त: 4:16 AM- 5:04 AM
- अमृत काल: 9:51 PM- 11:35 PM
- विजय मुहूर्त: 1:56 PM- 2:38 PM
राहुकाल और अशुभ समय
- राहुकाल: 2:58 PM- 4:29 PM
- यमगण्ड: 8:54 AM- 10:25 AM
- गुलिक काल: 11:56 AM- 1:27 PM
- दुर्मुहूर्त: 2:52 PM- 4:28 PM के आसपास
सूर्योदय-सूर्यास्त और चंद्रमा
- सूर्योदय: 5:52 AM
- सूर्यास्त: 6:00 PM
- चंद्रोदय: करीब 3:16-3:21 PM
- चंद्रास्त: करीब 1:37-2:35 AM (23 सितंबर)
आज के व्रत
परिवर्तिनी एकादशी व्रत
आज का पर्व
परिवर्तिनी एकादशी/पार्श्व एकादशी
आज का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यता के अनुसार, चातुर्मास के दौरान भगवान विष्णु के शयन करने और इस अवधि में करवट बदलने से इस एकादशी को परिवर्तिनी एकादशी कहा जाता है। कई क्षेत्रों में इसे जलझूलनी एकादशी या डोल ग्यारस भी कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत और दान-पुण्य को विशेष महत्व दिया जाता है।
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