AI में खूब पैसा लगा रहा चीन, लेकिन इकोनॉमी कमजोर:युवाओं में बेरोजगारी रिकॉर्ड 18.9% पहुंची, कार-घर की बिक्री भी घटी
चीन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) में तेजी से पैसा लगा रहा है। लेकिन दूसरी तरफ देश की अर्थव्यवस्था कमजोर हो रही है। 2026 की पहली छमाही में घरेलू कारों और घरों की बिक्री घट गई। वहीं अगस्त में युवाओं में बेरोजगारी रिकॉर्ड 18.9% रही। ऐसे में कई चीनी अर्थशास्त्रियों को चिंता है कि सरकार AI जैसे सेक्टर में ज्यादा पैसा लगा रही है, जबकि अर्थव्यवस्था को नौकरियां और लोगों की खरीदारी बढ़ाने के लिए ज्यादा मदद की जरूरत है। चीन की अर्थव्यवस्था की हालत समझिए चीन की आर्थिक परेशानी आंकड़ों से साफ दिख रही है। कारों की बिक्री 2026 के पहले 6 महीनों में घरेलू कारों की बिक्री पिछले साल के मुकाबले 20% घट गई। घरों की बिक्री इसी दौरान घरों की बिक्री में 14% की गिरावट आई। अर्थशास्त्री बोले- अर्थव्यवस्था को ज्यादा सहारे की जरूरत जुलाई में चीन के पूर्व केंद्रीय बैंक सलाहकार ली दाओकुई ने कहा कि देश की अर्थव्यवस्था जरूरत से ज्यादा धीमी चल रही है। एक और पूर्व सलाहकार लियू शिजिन ने ग्रामीण लोगों की पेंशन बढ़ाने का सुझाव दिया। उन्होंने पेंशन को करीब 2,800 रुपए से बढ़ाकर 14,000 रुपए महीने करने की बात कही। केंद्रीय बैंक के सलाहकार हुआंग हाइजौ ने कहा कि टेक्नोलॉजी में आगे बढ़ने से पहले देश में थोड़ी महंगाई और कंपनियों की कमाई बढ़ना जरूरी है। सरकार का पूरा फोकस AI पर जुलाई में पोलितब्यूरो की बैठक के बाद चीन के नेताओं ने AI से जुड़ी नई अर्थव्यवस्था को बढ़ाने पर जोर दिया। सरकार ने सीमित आर्थिक मदद जारी रखने का फैसला भी किया। AI में सरकारी निवेश लगातार बढ़ रहा है। स्टैनफोर्ड के अर्थशास्त्री शू चेंगगांग का कहना है कि इससे रोजगार और लोगों की खरीदारी बढ़ाने वाले क्षेत्रों के लिए कम पैसा बच सकता है। उनके मुताबिक, AI कंपनियों को सिर्फ सरकारी मदद नहीं, बल्कि ऐसे ग्राहक और कारोबार भी चाहिए जो उनके उत्पाद खरीदें। चीन की हालत की तुलना सोवियत संघ से क्यों? बीजिंग के प्रमुख समाजशास्त्री सन लिपिंग ने चीन की मौजूदा आर्थिक स्थिति की तुलना सोवियत संघ से की है। उनके मुताबिक, सोवियत संघ के सबसे मजबूत दौर में उसकी अर्थव्यवस्था अमेरिका के आकार की करीब 70% थी। विज्ञान और टेक्नोलॉजी के कुछ क्षेत्रों में वह अमेरिका से आगे भी था। लेकिन मजबूत विज्ञान और तकनीक के बावजूद सोवियत संघ की अर्थव्यवस्था आखिरकार कमजोर पड़ गई। AI और डेटा सेंटरों पर लाखों करोड़ का निवेश स्टैनफोर्ड की AI इंडेक्स रिपोर्ट के मुताबिक, 2000 से 2023 के बीच सरकारी पहल पर बनाए गए निवेश फंडों ने AI कंपनियों में करीब 15 लाख करोड़ रुपए लगाए। अब चीन AI के लिए जरूरी डेटा सेंटर भी तेजी से बना रहा है। ब्लूमबर्ग के मुताबिक, चीन अगले 5 साल में देशभर में डेटा सेंटर बनाने पर करीब 28 लाख करोड़ रुपए खर्च करने की तैयारी कर रहा है। इन डेटा सेंटरों को सरकारी कंपनियां चलाएंगी। इसलिए इसे 'AI ग्रेट लीप फॉरवर्ड' कहा जा रहा चीन के कुछ इंटरनेट यूजर्स सरकार के बड़े AI अभियान को 'AI ग्रेट लीप फॉरवर्ड' कह रहे हैं। इसका नाम चीन के पूर्व नेता माओ जेडोंग के 'ग्रेट लीप फॉरवर्ड' अभियान से लिया गया है। माओ ने 1958 में चीन को तेजी से औद्योगिक और ताकतवर बनाने के लिए बड़े पैमाने पर उद्योग और खेती में बदलाव शुरू किए थे। लेकिन यह अभियान बुरी तरह नाकाम रहा और इसके कारण चीन में भयानक अकाल पड़ा। आज चीन सरकार भी AI को तेजी से आगे बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर पैसा लगा रही है। इसलिए कुछ लोग इसकी तुलना पुराने अभियान से कर रहे हैं। सवाल है कि जब देश की अर्थव्यवस्था सुस्त है, युवाओं को नौकरी नहीं मिल रही, तब सरकार AI पर इतना बड़ा पैसा क्यों लगा रही है। ------------------------- ये खबर भी पढ़ें… AI की गलती से अमेरिका-चीन में जंग हो जाती: चैटबॉट ने चीनी जहाज में परमाणु उपकरण होने की फेक खबर दी अमेरिका आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) चैटबॉट की गलती से चीन से जंग के करीब पहुंच गया था। खबर यहां पढ़ें…
अमेरिका में श्वेत गुट भारतीयों की जासूसी कर रहे:मिडटर्म चुनाव के दौरान हेट क्राइम 30% बढ़ने का खतरा, ट्रम्प भी बना सकते हैं इमिग्रेशन को मुद्दा
अमेरिका में नवंबर में होने वाले मिडटर्म चुनाव में इमिग्रेशन विरोध बड़ा मुद्दा बन रहा है। भारतीयों के खिलाफ हेट क्राइम के मामले 30% तक बढ़ने की आशंका है। न्यूयॉर्क के क्वींस इलाके में 20 साल से रेस्तरां चलाने वाले भारतवंशी मोमिन अली (बदला हुआ नाम) कहते हैं कि ट्रम्प के समर्थक श्वेत गुट भारतीयों के रेस्तरां में जासूसी करते हैं। प्रवासियों के मुद्दे से जुड़े संगठन एपीआई ने एक मॉड्यूल का अध्ययन कर चेताया है कि नवंबर तक भारतीयों के खिलाफ हेट क्राइम के 58 हजार होने का खतरा है। जबकि इस साल जुलाई तक भारतीयों के खिलाफ हेट क्राइम के 44,535 मामले सामने आए थे। अमेरिका में चुनाव अथवा भारतीयों से जुड़ा कोई भी मुद्दा सामने आने पर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी एंटी इमिग्रेशन मुद्दा उठाती है। भारतीयों के खिलाफ जॉब छीनने का आरोप भी लगाया जाता है। आइस एजेंटों को छापेमारी के लिए बुलाते हैं मोमिन अली कहते हैं कि आइस एजेंटों की आए दिन छापेमारी बड़ी आफत बन गई है। ये लोग आइस एजेंटों को अवैध प्रवासियों के काम करने का कॉल करते हैं। आइस एजेंट रेड डालकर वैध भारतीयों को भी पकड़ लेते हैं। छोटे से कस्बे फ्रेंडशिप में ग्रॉसरी स्टोर चलाने वाले धवल कुमार (बदला हुआ नाम) को आइस एजेंट बिना कारण बताए उठा कर ले गए। यहां के लगभग 200 लोगों ने उनके समर्थन में याचिका पर हस्ताक्षर किए तब जाकर 5 दिन बाद धवल को छोड़ा गया। अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में ट्रम्प की हार के 65% चांस अमेरिका में मिडटर्म चुनाव से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की मुश्किलें बढ़ती दिख रही हैं। इप्सॉस-एएपीआई सर्वे के मुताबिक, चुनाव में ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी के हारने की संभावना 65% तक है। मिडटर्म के लिए वोटिंग नवंबर में होनी है। मिडटर्म चुनाव ट्रम्प के चार साल के कार्यकाल के बीच होने वाला बड़ा राजनीतिक इम्तिहान है। इसमें अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस के साथ राज्यों और स्थानीय सरकारों के कई अहम पदों के लिए वोटिंग होगी। रिपब्लिकन और डेमोक्रेटिक पार्टियों के करीब 80% उम्मीदवार पहले ही तय हो चुके हैं। मिडटर्म में रिपब्लिकन पार्टी हारती है तो ट्रम्प राष्ट्रपति बने रहेंगे। लेकिन कांग्रेस में बहुमत खोने पर उनके फैसलों पर रोक-टोक बढ़ सकती है। टैरिफ, वीजा और दूसरे बड़े नीतिगत फैसलों को लागू करने में ट्रम्प को डेमोक्रेट्स के विरोध का सामना करना पड़ सकता है। कार्यकाल के बाकी दो साल में उन्हें कांग्रेस के साथ ज्यादा तालमेल बनाकर चलना होगा। मिडटर्म में ट्रम्प की तीन सबसे बड़ी चुनौती... महंगाई, इमिग्रेशन और ईरान युद्ध 1. महंगाई: ट्रम्प की आर्थिक रेटिंग 32% पर फिसल गई अमेरिकी वोटरों की सबसे बड़ी चिंता महंगाई है। इप्सोस सर्वे में 54% लोगों ने महंगाई और अर्थव्यवस्था को वोट का बड़ा मुद्दा बताया। वहीं, एपी-एनओआरसी सर्वे में सिर्फ 32% लोगों ने माना कि ट्रम्प अर्थव्यवस्था अच्छी तरह संभाल रहे हैं। 69% अमेरिकियों को मौजूदा आर्थिक हालात खराब लगते हैं। इप्सोस सर्वे में 65% लोगों ने कहा कि रोजमर्रा का किराना महंगा पड़ रहा है, जबकि 48% को डर है कि अगले साल आर्थिक हालात और खराब हो सकते हैं। ईरान युद्ध: 20% वोटरों के लिए बड़ा मुद्दा ईरान युद्ध अब सिर्फ विदेश नीति का मामला नहीं है। इसका असर सीधे अमेरिकी लोगों की जेब पर पड़ रहा है। इप्सोस सर्वे में 20% वोटरों ने ईरान युद्ध को वोट का अहम मुद्दा बताया। अगर जंग लंबी खिंची और तेल महंगा हुआ तो पेट्रोल, ट्रांसपोर्ट और रोजमर्रा की चीजें महंगी हो सकती हैं। यानी ट्रम्प के सामने चुनौती है ईरान पर सख्ती भी दिखानी है और अमेरिकी लोगों को महंगाई से राहत का भरोसा भी देना है। इमिग्रेशन: 61% अमेरिकी ट्रम्प की नीति से नाराज 2024 में इमिग्रेशन ट्रम्प की बड़ी ताकत था, लेकिन अब तस्वीर बदलती दिख रही है। हालिया सर्वे में 61% अमेरिकियों ने ट्रम्प की इमिग्रेशन नीति का विरोध किया, जबकि समर्थन सिर्फ 39% रहा। दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में ट्रम्प की इस नीति को 49% लोगों का समर्थन था। रिपब्लिकन वोटरों में भी समर्थन घटकर 80% रह गया है। सख्त डिपोर्टेशन और इमिग्रेशन कार्रवाई के बीच बढ़ती नाराजगी मिडटर्म चुनाव में ट्रम्प के लिए बड़ा नुकसान बन सकती है। -------------------------------- ये खबर भी पढ़ें… ट्रम्प बोले-मिडटर्म चुनाव जीता तो हर वोटर को ₹5 लाख:इस पर ₹128 लाख करोड़ खर्च करने होंगे, यह पाकिस्तान की इकोनॉमी का 3 गुना अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कहा कि नवंबर के मिडटर्म चुनाव में अगर रिपब्लिकन पार्टी प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों में बहुमत बरकरार रखती है, तो हर बालिग अमेरिकी को 5000 डॉलर (करीब 4.76 लाख रुपए) दिए जाएंगे। पूरी खबर पढ़ें…
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