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मौत का इंतजार करती इमारतें और गहरी नींद सोता प्रशासन

दक्षिण-पश्चिम दिल्ली के सत्य निकेतन में जो हृदयविदारक घटना घटित हुई है, वह केवल एक पांच मंजिला इमारत के भरभराकर गिरने की घटना नहीं बल्कि राजधानी की उस व्यवस्था का ढ़हना है, जिसकी नींव नागरिकों की सुरक्षा, कानून के शासन और प्रशासनिक जवाबदेही पर टिकी होनी चाहिए थी। जिस इमारत में कुछ घंटे पहले तक देश के अलग-अलग हिस्सों से आए युवा अपने भविष्य के सपने बुन रहे थे, देखते ही देखते वह ईंट, सीमेंट और लोहे के मलबे में बदल गई। धूल का गुबार तो छंट जाएगा, मलबा भी हट जाएगा, सड़कें फिर सामान्य हो जाएंगी लेकिन उन परिवारों के जीवन में जो शून्य पैदा हुआ है, वह कभी नहीं भर सकेगा। ‘हॉस्टल डेज’ नामक लड़कों के लिए बने पीजी की इस पांच मंजिला इमारत में हादसे के वक्त कई छात्र अपने कमरों में थे, जिनके मलबे में दबे होने की आशंका है। बताया जा रहा है कि इमारत लगभग 40-50 वर्ष पुरानी थी और हादसे के समय बेसमेंट में मरम्मत तथा खुदाई का काम चल रहा था। यही तथ्य इस त्रासदी को और भयावह बना देता है।

सवाल केवल यह नहीं है कि इमारत क्यों गिरी बल्कि असली सवाल यह है कि इतनी पुरानी और संवेदनशील इमारत में बेसमेंट की खुदाई और निर्माण संबंधी गतिविधियां आखिर चल कैसे रही थी? हर बड़े भवन हादसे के बाद एक ही कहानी दोहराई जाती है। प्रशासन कहता है कि जांच होगी, कुछ छोटे अधिकारियों पर कार्रवाई होती है और कुछ दिनों बाद पूरा मामला फाइलों के नीचे दब जाता है। फिर किसी दूसरे इलाके में कोई और इमारत गिरती है, कहीं आग लगती है, कोई बेसमेंट मौत का कुआं बन जाता है और हम फिर वही प्रश्न पूछते रह जाते हैं कि आखिर जिम्मेदार कौन है? सच तो यह है कि भारत के शहरों में कोई बहुमंजिला अवैध निर्माण रातों-रात खड़ा नहीं होता। जमीन का उपयोग बदलता है, नक्शा बनता है, निर्माण शुरू होता है, मंजिलें बढ़ती हैं, बिजली-पानी के कनेक्शन मिलते हैं और अंततः उस इमारत में व्यावसायिक गतिविधियां शुरू हो जाती हैं। इस पूरी प्रक्रिया में अनेक विभागों और अधिकारियों की भूमिका होती है। ऐसे में यह कहना कि प्रशासन को कुछ पता ही नहीं था, जिम्मेदारी से बचने का सबसे आसान बहाना है।

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यदि कोई इमारत नियमों के विरुद्ध बन रही थी तो निर्माण के दौरान संबंधित नगर निगम अधिकारी कहां थे? यदि वहां व्यावसायिक गतिविधियां चल रही थी तो फायर विभाग ने सुरक्षा का आकलन क्यों नहीं किया? बिजली और पानी के कनेक्शन किस आधार पर मिले? पुलिस और स्थानीय प्रशासन की नजर उस भवन पर क्यों नहीं पड़ी? और यदि सब कुछ नियमों के अनुसार था तो फिर हादसा हुआ कैसे? यही वे प्रश्न हैं, जिनका जवाब केवल ठेकेदार या किसी छोटे कर्मचारी को दोषी ठहराकर नहीं दिया जा सकता। सत्य निकेतन की त्रासदी इसलिए भी गंभीर है क्योंकि दिल्ली में पीजी संस्कृति तेजी से बढ़ी है। देशभर से राजधानी में पढ़ने, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने और रोजगार तलाशने आने वाले हजारों युवा ऐसी इमारतों में रहते हैं, जहां कमरे छोटे हैं, गलियां संकरी हैं, सीढ़ियां संकरी हैं और सुरक्षा मानकों की स्थिति अक्सर संदिग्ध रहती है। मकान मालिक के लिए कमरों की संख्या बढ़ाना कारोबार है लेकिन उस कमरे में रहने वाला छात्र अपने सपने लेकर वहां आता है। जब छह कमरों की अनुमति वाली इमारत में 25 से अधिक कमरे बना दिए जाते हैं, जब बेसमेंट को पार्किंग के बजाय व्यावसायिक गतिविधियों के लिए इस्तेमाल किया जाता है, जब एक ही निकास मार्ग पर सैंकड़ों लोगों की सुरक्षा निर्भर कर दी जाती है, तब यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं रहता, यह मानव जीवन के साथ खिलवाड़ बन जाता है।

दिल्ली में अतीत की त्रासदियां भी हमें बार-बार चेताती रही हैं। 1997 का उपहार सिनेमा अग्निकांड हो या हाल के वर्षों में सामने आए बेसमेंट, कोचिंग सेंटर और व्यावसायिक इमारतों से जुड़े हादसे, हर घटना के बाद सुरक्षा मानकों पर सवाल उठे। बंद दरवाजे, अवरुद्ध निकास, अवैध निर्माण, अग्निशमन उपकरणों की अनुपलब्धता और प्रशासनिक उदासीनता बार-बार त्रासदियों की पृष्ठभूमि में दिखाई देती रही है। फिर भी व्यवस्था की स्मृति इतनी कमजोर है कि कुछ दिनों बाद सब कुछ फिर पुराने ढ़र्रे पर लौट आता है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि सस्पेंशन हमेशा छोटे कर्मचारी का ही क्यों होता है? यदि किसी इलाके में वर्षों तक अवैध निर्माण चलता रहा, यदि नियमों के विपरीत इमारतें खड़ी होती रही और उनमें पीजी, कोचिंग सेंटर, दुकानें या अन्य व्यावसायिक गतिविधियां चलती रही तो उस पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही तय होनी चाहिए, जिसने इसे होने दिया। तत्कालीन अवैध निर्माण प्रभारी, संबंधित वरिष्ठ अधिकारी, जोनल स्तर के जिम्मेदार अधिकारी और संबंधित विभागों की भूमिका की निष्पक्ष जांच क्यों न हो? यदि मिलीभगत प्रमाणित होती है तो कार्रवाई भी उसी अनुपात में कठोर क्यों न हो?

समस्या किसी एक इमारत की नहीं है। दिल्ली और देश के तमाम शहरों में हजारों ऐसी इमारतें हैं, जो बाहर से सामान्य दिखाई देती हैं लेकिन भीतर से मौत के जाल में बदल चुकी हैं। कहीं बेसमेंट में अवैध निर्माण है, कहीं बिना वेंटिलेशन के कोचिंग सेंटर, कहीं संकरी सीढ़ियां, कहीं बंद खिड़कियां, कहीं लोहे की ग्रिलें और कहीं एक ही प्रवेश-निकास द्वार। अग्निशमन उपकरण कई जगह केवल निरीक्षण के समय दिखाने के लिए रखे जाते हैं और आपातकालीन निकास कागजों पर मौजूद रहते हैं, वास्तविकता में नहीं। ऐसी स्थिति में हादसा होने पर दमकल की गाड़ियां भी संकरी गलियों में फंस जाती हैं। बचाव दल के पास पहुंचने का रास्ता नहीं होता और अंदर फंसे लोगों के पास बाहर निकलने का रास्ता नहीं होता। फिर कुछ ही मिनटों में एक इमारत कब्रिस्तान में बदल जाती है।

अब जरूरत केवल दोषी खोजने की नहीं, व्यवस्था बदलने की है। दिल्ली की सभी पुरानी बहुमंजिला और व्यावसायिक इमारतों का व्यापक सुरक्षा ऑडिट होना चाहिए। पीजी, हॉस्टल, कोचिंग सेंटर और बेसमेंट में संचालित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की अनिवार्य जांच होनी चाहिए। फायर एनओसी की प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल, पारदर्शी और समयबद्ध हो। अवैध निर्माण पर केवल जुर्माना लगाकर उसे वैध बनाने की प्रवृत्ति समाप्त होनी चाहिए। गंभीर उल्लंघन वाली इमारतों को तत्काल सील और आवश्यकतानुसार ध्वस्त किया जाना चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण यह कि जिम्मेदारी ऊपर तक जानी चाहिए। किसी दुर्घटना के बाद दो-चार छोटे कर्मचारियों को निलंबित कर देना प्रशासनिक कार्रवाई नहीं, अक्सर जिम्मेदारी से बचने का तरीका बन जाता है। यदि किसी अधिकारी की लापरवाही, मिलीभगत या भ्रष्ट आचरण के कारण लोगों की जान जोखिम में पड़ी है तो उसके विरुद्ध कठोर आपराधिक कार्रवाई होनी चाहिए। पद जितना बड़ा हो, जवाबदेही भी उतनी ही बड़ी होनी चाहिए।

सत्य निकेतन का मलबा केवल ईंट-पत्थरों का ढ़ेर नहीं है। उसके नीचे प्रशासनिक दावों की विश्वसनीयता, भवन सुरक्षा के नियमों और नागरिकों के भरोसे की भी परीक्षा हो रही है। इस त्रासदी को ‘हादसा’ कहकर आगे बढ़ जाना सबसे बड़ा अपराध होगा। हादसा वह होता है, जिसे रोका न जा सके लेकिन जिस दुर्घटना की जमीन अवैध निर्माण, नियमों की अनदेखी, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लापरवाही से तैयार होती है, उसे केवल हादसा कहना सच्चाई को छोटा करना है। यदि इस बार भी जांच के नाम पर खानापूर्ति हुई, छोटे कर्मचारियों पर गाज गिराकर बड़े जिम्मेदार बच निकले और कुछ लाख रुपये के मुआवजे को न्याय का विकल्प बना दिया गया तो अगली त्रासदी केवल समय की प्रतीक्षा करेगी। तब फिर कोई इमारत गिरेगी, कोई परिवार उजड़ेगा, कोई बच्चा मलबे में दबेगा और हम फिर पूछेंगे कि आखिर असली गुनहगार कौन है? जबकि सच हम सभी जानते होंगे। गुनहगार केवल वह व्यक्ति नहीं होगा, जिसने अवैध निर्माण किया बल्कि गुनहगार वह पूरा तंत्र होगा, जिसने उसे बनने दिया, चलने दिया और तब तक आंखें बंद रखी, जब तक मलबे ने चीखना शुरू नहीं कर दिया। अब समय चीख सुनने का नहीं, व्यवस्था को जवाबदेह बनाने का है।

- योगेश कुमार गोयल
(लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)

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Samsung Galaxy S26 FE Price: Galaxy S26 FE खरीदने का बना रहे हैं प्लान? 79,999 रुपये की कीमत पर Exchange के बाद फोन कितने में मिलेगा? जानें यहां

Samsung Galaxy S26 FE Price: भारत में Samsung Galaxy S26 FE की बिक्री शुरू हो गई है। फोन की शुरुआती कीमत 79,999 रुपये है। कंपनी ग्राहकों को Exchange Offer, EMI और Bank Cashback जैसे कई फायदे दे रही है। इन ऑफर्स का लाभ उठाकर ग्राहक फोन को बेहद कम कीमत में खरीद सकते हैं।

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  Sports

IPL में CSK के नए Bowling Coach बनेंगे Mohit Sharma, CEO ने की पुष्टि

चेन्नई सुपर किंग्स के खेमे से जुड़ी बड़ी खबर सामने आई है। भारत के पूर्व तेज गेंदबाज मोहित शर्मा अगले सीजन से टीम के गेंदबाजी कोच की जिम्मेदारी संभालते नजर आएंगे। वह मुख्य कोच जहीर खान की अगुवाई वाले सहयोगी स्टाफ का हिस्सा होंगे। इस नियुक्ति की पुष्टि चेन्नई सुपर किंग्स के मुख्य कार्यकारी अधिकारी काशी विश्वनाथन ने की है।

काशी विश्वनाथन ने टाइम्स ऑफ इंडिया को बताया कि मोहित शर्मा को नए गेंदबाजी कोच के रूप में टीम में शामिल किया जा रहा है। उनके नाम की सिफारिश मुख्य कोच जहीर खान ने की है। उन्होंने कहा कि मोहित बतौर खिलाड़ी भी चेन्नई सुपर किंग्स के साथ शानदार रहे हैं और टीम को उम्मीद है कि वह गेंदबाजी कोच के रूप में भी अच्छा काम करेंगे।

बता दें कि चेन्नई सुपर किंग्स के बाकी सहयोगी स्टाफ में भी आने वाले हफ्तों में बदलाव देखने को मिल सकता है। काशी विश्वनाथन के अनुसार, नए कोचिंग स्टाफ की नियुक्तियां भी जहीर खान की सिफारिश के आधार पर की जाएंगी। मोहित शर्मा टीम के गेंदबाजी कोच के तौर पर एरिक सिमंस की जगह लेंगे।

मोहित का चेन्नई सुपर किंग्स के साथ पुराना रिश्ता रहा है। वह टीम के लिए 2 अलग-अलग दौर में कुल 4 सीजन खेल चुके हैं। आईपीएल में उनका आखिरी कार्यकाल दिल्ली कैपिटल्स के साथ रहा था। उन्होंने पंजाब किंग्स के लिए भी 2016 से 2018 तक खेला है।

गौरतलब है कि मोहित शर्मा ने आईपीएल में 120 मुकाबले खेले हैं और उनके नाम 134 विकेट हैं। गुजरात टाइटंस के साथ उनका प्रदर्शन खास तौर पर चर्चा में रहा था। टीम के साथ बिताए 2 सत्रों में उन्होंने 41 विकेट लिए और अपनी सटीक गेंदबाजी तथा अलग-अलग तरह की गेंदों से बल्लेबाजों को परेशान किया था।

आईपीएल में मोहित का सबसे यादगार सीजन2014 रहा था। उस समय चेन्नई सुपर किंग्स की ओर से खेलते हुए उन्होंने 23 विकेट हासिल किए और टूर्नामेंट में सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज को मिलने वाली पर्पल कैप अपने नाम की थी। यही प्रदर्शन उनके आईपीएल करियर के सबसे खास दौर में शामिल है।

भारतीय टीम के साथ भी मोहित का सफर खास रहा है। 2015 विश्व कप में महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी वाली भारतीय टीम का हिस्सा रहे मोहित टूर्नामेंट में संयुक्त रूप से तीसरे सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाजों में शामिल थे। उन्होंने भारत के लिए 26 एकदिवसीय और 8 टी20 अंतरराष्ट्रीय मुकाबले खेले हैं। एकदिवसीय मैचों में उनके नाम 31 विकेट और टी20 अंतरराष्ट्रीय में 6 विकेट हैं।

मोहित ने पिछले साल दिसंबर में पेशेवर क्रिकेट से संन्यास लेने की घोषणा की थी। अपने भावुक संदेश में उन्होंने हरियाणा से लेकर भारतीय टीम और आईपीएल तक के सफर को याद किया था। उन्होंने हरियाणा क्रिकेट संघ, बीसीसीआई, अपने कोच, साथियों, आईपीएल टीमों और सहयोगी स्टाफ का आभार जताया था।

अब क्रिकेट से खिलाड़ी के रूप में विदाई लेने के बाद मोहित के सामने कोच के रूप में नई जिम्मेदारी होगी। चेन्नई सुपर किंग्स के साथ उनका पुराना अनुभव और जहीर खान के साथ काम करने का मौका टीम की गेंदबाजी व्यवस्था में उनके लिए अहम भूमिका बना सकता है। अगले सीजनसे वह मैदान के बाहर रहकर गेंदबाजों की तैयारी और रणनीति में योगदान देते नजर आने वाले हैं।

Tue, 29 Sep 2026 19:59:00 +0530

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