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ग्रीनलैंड को सिर्फ अमेरिका बचा सकता है, पुतिन-जिनपिंग का नाम लेकर ट्रंप ने दावोस में किया बड़ा दावा

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने दावोस में विश्व आर्थिक मंच को संबोधित करते हुए अपने भाषण की शुरुआत अमेरिका में हुई महत्वपूर्ण आर्थिक उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए की। ट्रंप ने दावोस में कहा कि मुझे चुनकर अमेरिकी जनता बहुत खुश है, दो साल पहले हम एक मृत देश थे, लेकिन अब हम फिर से जीवित हो गए हैं। यूरोप में कुछ स्थान तो पहचाने जाने लायक भी नहीं हैं; मुझे यूरोप से प्यार है, लेकिन यह सही रास्ते पर नहीं चल रहा है। हम दूसरे देशों द्वारा किए गए नुकसान की भरपाई के लिए उन पर बढ़ा रहे हैं कर।  हमने कुछ बेहतरीन व्यापार समझौते किए हैं; हर कोई जानता है कि जब अमेरिका बढ़ता है तो आप भी बढ़ेंगे। उन्होंने आय स्तर में सुधार और मुद्रास्फीति में कमी का जिक्र करते हुए इसे सभी देशों के लिए अच्छा बताया। 

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ट्रम्प ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था के वैश्विक प्रभाव पर जोर देते हुए कहा कि अमेरिका इस ग्रह पर सभी देशों का आर्थिक इंजन है। जब अमेरिका में आर्थिक उछाल आता है, तो पूरी दुनिया में उछाल आता है। जब हालात बिगड़ते हैं। तो आप सभी का पतन होता है। ट्रम्प ने यूरोप से अमेरिका जैसी नीतियां अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि मुझे यूरोप से प्यार है और मैं यूरोप को तरक्की करते देखना चाहता हूं, लेकिन यह सही दिशा में नहीं बढ़ रहा है। ट्रम्प ने यूरोप के बढ़ते सरकारी खर्च, प्रवासन नियमों और व्यापार नीतियों की आलोचना करते हुए दावा किया कि इन फैसलों ने महाद्वीप के कुछ हिस्सों को “पहचान से परे” बना दिया है। उन्होंने आगे कहा कि यूरोप को अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के लिए वही करना चाहिए जो हम कर रहे हैं।

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दावोस में डब्ल्यूईएफ की वार्षिक बैठक में डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि ट्रम्प ने कहा कि अमेरिका के लगातार दबाव के बाद वेनेजुएला ने वाशिंगटन के साथ समझौता करने में तेजी दिखाई। ट्रम्प ने दावा किया कि दक्षिण अमेरिकी देश अब आने वाले महीनों में पिछले दो दशकों की तुलना में अधिक धन अर्जित करने की स्थिति में है। उन्होंने तर्क दिया कि वेनेजुएला की पिछली आर्थिक नीतियां खराब थीं और अमेरिका के दबाव के कारण दृष्टिकोण में बदलाव आया। “हमला खत्म होने के बाद, उन्होंने कहा, चलो एक समझौता करते हैं। और भी लोगों को ऐसा करना चाहिए।

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इससे पहले विमान में मामूली तकनीकी समस्या के कारण दूसरे विमान में सवार होने के लिए उन्हें वाशिंगटन लौटना पड़ा था। व्हाइट हाउस ने कहा कि देर से पहुंचने से स्विस आल्प्स में आयोजित होने वाले मंच पर उनके निर्धारित भाषण में कोई देरी नहीं होगी।  ट्रंप दावोस में अंतरराष्ट्रीय मंच पर डेनमार्क और सात अन्य सहयोगी देशों पर भारी अमेरिकी आयात कर लगाने की धमकी देने के बाद नजर आए। ट्रंप ने कहा कि शुल्क अगले महीने से 10 प्रतिशत से शुरू होंगे और जून में बढ़कर 25 प्रतिशत हो जाएंगे। ये दरें इतनी अधिक होंगी कि लागत में वृद्धि होगी और विकास धीमा होगा, जिससे जीवन यापन की उच्च लागत को कम करने संबंधी ट्रंप के प्रयासों को संभावित रूप से नुकसान पहुंच सकता है। इस बीच, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने चेतावनी दी कि अगर ट्रंप टैरिफ के साथ आगे बढ़ते हैं, तो आयोग की प्रतिक्रिया ‘‘अडिग, एकीकृत और उसी के अनुरूप’’ होगी।

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हाथों को थोड़ा राउंड घुमाके, आंखों पर नीला चश्मा चढ़ाकर, मैक्रों ने ट्रंप को समझाई बर्दाश्त की हद, ग्रीनलैंड में अब होगा यूरोपियन देशों का वॉर एक्सरसाइज?

क्या अमेरिका का राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप पूरी तरह से अब दादागिरी और हिटलर शाही पर उतर आए हैं? अब तो हदें पार कर रहे हैं। अमेरिका और फ्रांस के बीच तक अब जंग जैसे हालात बन रहे हैं। और उधर पूरे नाटो और पूरे यूरोप से तो जंग के हालात लगातार बना ही रहे हैं। अपनी जिद के आगे  ट्रंप किसी की सुनने को तैयार नहीं है। यह बात तो जगजाहिर हो गई है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रो को पसंद नहीं करते। यही वजह है कि मंच कोई भी हो वो मैक्रो की बेइज्जती से पीछे नहीं हटते। कभी वो मैक्रो के कुर्सी से उतर जाने की बात कहते हैं तो कभी वो मैक्रो के पर्सनल व्हाट्सएप चैट को पब्लिक फोरम पर पोस्ट कर देते हैं। इस बात से अब मैक्रों नाराज हैं। मैक्रों ट्रंप की तरह नाम तो नहीं ले रहे हैं लेकिन निशाने पर वो ट्रंप और अमेरिका को ही रख रहे हैं। उन्होंने दावोस में इकोनॉमिक फोरम पर साफ तौर पर यह कहा कि अब जरूरी यह है कि यूरोप अपने सम्मान को बचाए और जो लोग एक तरह से वर्ल्ड ऑर्डर चेंज करने की कोशिश कर रहे हैं और जिस तरह से यूरोप को अपमानित किया जा रहा है उसके खिलाफ उचित कदम उठाया जाना चाहिए। 

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मैक्रो ने साफ तौर पर अपने भाषण में जिस तरह से बुली शब्द का इस्तेमाल किया वह साफ तौर पर अमेरिकी राष्ट्रपति की तरफ इशारा करता है। उन्होंने यह भी कहा है कि अब जहां जरूरत ताकत की हो वहां यूरोप ताकत से जवाब दे और जैसी स्थिति हो वैसे हालात पर वो काम करें। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा कि ग्रीनलैंड पर अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की शुल्क संबंधी धमकियों के सामने यूरोपीय संघ (ईयू) को व्यापार समूह के दबाव विरोधी तंत्र का उपयोग करने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। स्विट्जरलैंड के दावोस में विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) में अपने संबोधन में मैक्रों ने आक्रामक अमेरिकी व्यापार दबाव और नए शुल्क के अंतहीन संचय का विरोध किया। उन्होंने कहा कि दबाव विरोधी तंत्र एक शक्तिशाली साधन है और हमें आज के कठिन माहौल में इसका उपयोग करने में संकोच नहीं करना चाहिए।

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वही ग्रीनलैंड जिस पर कब्जे की ख्वाहिश ट्रंप रखते हैं और बार-बार यह कह रहे हैं कि आज नहीं तो कल हम ग्रीनलैंड पर अपना कब्जा कर ही लेंगे। उसे लेकर फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनबल मैक्रों का कहना है कि हमने यह तय किया है कि ग्रीनलैंड पर अब हम मिलिट्री एक्सरसाइज करेंगे और यह किसी और को धमकी नहीं होगी बल्कि यूरोपियन देशों की एकता के लिए होगी। ग्रीनलैंड एक नया क्षेत्र है जहां दोनों देशों के बीच टकराहट साफ तौर पर दिख रही है। वहीं गाज़ा पीस प्लान को लेकर भी दोनों देश एक दूसरे से टकरा चुके हैं। अब ऐसे में आने वाले दिनों में मैक्रो और ट्रंप की लड़ाई किस तरफ जाती है, यह देखना होगा। फिलहाल दोनों नेता एक दूसरे की धज्जियां उड़ाने में जुटे हुए हैं।

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फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने इस सप्ताह पेरिस में यूरोपीय नेताओं की एक आपात बैठक बुलाने का आह्वान किया है, जिसमें ग्रीनलैंड को हासिल करने की ट्रंप की कोशिशों और शुल्क (टैरिफ) को लेकर अमेरिका के साथ बढ़ते तनाव पर चर्चा की जानी है। ट्रंप ने संवाददाताओं से कहा कि वह इस बैठक में शामिल नहीं होंगे। उन्होंने इसका एक कारण यह बताया कि मैक्रों अधिक समय तक अपने देश का नेतृत्व नहीं करेंगे। इससे पहले इस सप्ताह ट्रंप ने सोशल मीडिया पर मैक्रों और नाटो महासचिव मार्क रुटे के साथ हुए निजी संदेश भी साझा किए थे।

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  Sports

IND vs NZ: शुभमन गिल की कप्तानी पर अश्विन के सवाल, मिडिल ओवर्स को बताया हार की वजह

सीरीज़ हार के बाद भारतीय टीम की कप्तानी और मैदान पर लिए गए फैसलों पर सवाल उठना नई बात नहीं है। न्यूज़ीलैंड के खिलाफ 1–2 से वनडे सीरीज़ गंवाने के बाद यह बहस एक बार फिर तेज हो गई है। इस बार चर्चा के केंद्र में टीम के युवा कप्तान शुभमन गिल रहे, जिनके कुछ अहम मौकों पर लिए गए फैसलों पर पूर्व भारतीय स्पिनर रविचंद्रन अश्विन ने खुलकर अपनी राय रखी है।

अश्विन ने अपने यूट्यूब चैनल पर पूरी सीरीज़ का विश्लेषण करते हुए नेतृत्व और अनुभव के अंतर को सरल शब्दों में समझाया। उनके अनुसार, बड़े कप्तानों की पहचान यह होती है कि वे अपने संसाधनों का इस्तेमाल कब, कहां और किस बल्लेबाज़ के खिलाफ करना है, इसे अच्छी तरह जानते हैं। अश्विन ने कहा कि रोहित शर्मा और महेंद्र सिंह धोनी को बतौर कप्तान इसलिए सराहा जाता है क्योंकि वे दबाव की परिस्थितियों में भी सही समय पर सही गेंदबाज़ को आक्रमण पर लाते हैं।

उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, अश्विन को लगा कि न्यूज़ीलैंड के खिलाफ सीरीज़ में भारतीय कप्तानी में यही पहलू कमजोर नजर आया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि किसी गेंदबाज़ पर पिछले मैच के प्रदर्शन के आधार पर भरोसा कम नहीं किया जाना चाहिए। अश्विन के अनुसार, एक मुकाबले में असफल रहने के कारण गेंदबाज़ से आत्मविश्वास छीनना टीम के हित में नहीं होता।

पूर्व स्पिनर ने सीरीज़ के दौरान मिडिल ओवर्स को निर्णायक चरण बताया। उनका मानना है कि इसी दौर में भारत न्यूज़ीलैंड की टीम पर पर्याप्त दबाव बनाने में असफल रहा। कीवी बल्लेबाज़ों को क्रीज़ पर जमने का समय मिल गया और वहीं से मुकाबले भारत के हाथ से फिसलते चले गए।

अश्विन का कहना था कि समस्या गेंदबाज़ी विकल्पों की कमी नहीं थी, बल्कि उनके इस्तेमाल की टाइमिंग सही नहीं रही। उन्होंने विशेष तौर पर कुलदीप यादव के उपयोग पर सवाल उठाए। उनके मुताबिक, कुलदीप जैसे कलाई के स्पिनर को लंबे स्पेल की बजाय छोटे लेकिन आक्रामक स्पेल में आज़माया जाना चाहिए था।

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि अगर बीच के ओवरों में ग्लेन फिलिप्स जैसे बल्लेबाज़ को दो-दो ओवर के स्पेल में कुलदीप का सामना करना पड़ता, तो मैच की तस्वीर अलग हो सकती थी। अश्विन का यह भी मानना था कि डेरिल मिचेल जैसे बल्लेबाज़ के खिलाफ राउंड द विकेट गेंदबाज़ी करते हुए एक-दो रन देना भी स्वीकार्य हो सकता था, ताकि बल्लेबाज़ पर लगातार दबाव बनाए रखा जा सके।

अश्विन के अनुसार, सबसे अहम बात यह है कि टीम के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाज़ों को सबसे निर्णायक समय पर गेंद सौंपी जाए। यदि उस रणनीति में असफलता भी मिलती है, तो कम से कम यह संतोष रहता है कि सही योजना के साथ प्रयास किया गया। लेकिन जब उपलब्ध संसाधनों का प्रभावी उपयोग ही न हो, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।

उन्होंने यह भी महसूस किया कि शुभमन गिल दबाव के क्षणों में कुछ ज्यादा सतर्क दिखाई दिए। अश्विन के संकेत थे कि शायद पिछले मैचों के अनुभव ने कप्तानी फैसलों को प्रभावित किया। साथ ही, जब मैच का रुख बदलने लगा, तो मैदान पर किसी स्पष्ट ‘प्लान बी’ के संकेत नजर नहीं आए।

कुल मिलाकर, अश्विन की टिप्पणियां केवल एक सीरीज़ की हार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे उस नेतृत्व दृष्टिकोण की ओर इशारा करती हैं, जो बड़े मुकाबलों में अंतर पैदा करता है। आने वाले समय में, खासकर बड़े टूर्नामेंट्स को ध्यान में रखते हुए, भारतीय टीम प्रबंधन के लिए यह आत्ममंथन का विषय हो सकता है कि दबाव की परिस्थितियों में अनुभव और स्पष्ट रणनीति कितनी निर्णायक भूमिका निभाती है।
Wed, 21 Jan 2026 21:43:51 +0530

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