UP ITI Admission: 27 सितंबर से चौथे चरण की काउंसलिंग, अब वंचित छात्रों को मिलेगा मौका, जानें कब होगा एडमिशन
उत्तर प्रदेश ITI में प्रवेश का इंतजार खत्म! चौथे चरण की काउंसलिंग 27-29 सितंबर तक चलेगी. रिक्त सीटों पर मेरिट के आधार पर मिलेगा दाखिला.
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ज्ञानेश कुमार के खिलाफ किस एक्शन की तैयारी में हैं राहुल गांधी? कैसे हटाएं जा सकते हैं मुख्य चुनाव आयुक्त, जानिए धारा 16 का कानूनी कवच
देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कांग्रेस के नेतृत्व वाला विपक्ष महाभियोग प्रस्ताव लाने जाएगा। कांग्रेस से जुड़े सूत्रों ने यह जानकारी दी। फिलहाल कानूनी के जानकारों से बात करके इस प्रस्ताव का ड्राफ्ट तैयार किया जा रहा है। इससे पहले बजट सत्र में भी विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार को हटाने की कोशिश की थी। लेकिन उनके नोटिस को राज्यसभा के सभापति और लोकसभा के स्पीकर ने अस्वीकार कर दिया था। आपको बता दें कि इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक चुनाव आयुक्त विवेक जोशी और सुखवीर संधू पिछले 10 महीने में 14 बार लिखित में चुनाव आयोग की गतिविधियों और फैसलों पर गंभीर असहमतियां जता चुके हैं। इसमें बंगाल चुनाव के दौरान ट्रिब्यूनल के सामने आयोग के द्वारा की गई अपील गोवा के जायज वोटरों को ना जोड़ पाना क्योंकि रोल बैक का ऑप्शन नहीं है सॉफ्टवेयर में। नए वोटर के लिए अनिवार्य फॉर्म सिक्स में जोड़ी गई नई शर्तें और सॉफ्टवेयर का दिल्ली से नियंत्रण और डाटा के सेंट्रलाइजेशन जैसे कई मसले हैं। ज्ञानेश कुमार के खिलाफ पहली कोशिश बंगाल चुनाव के दौरान तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्षी दलों ने की थी। 12 मार्च को संसद के दोनों सदनों में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए नोटिस जमा किए गए थे। लोकसभा वाले नोटिस पर 130 जबकि राज्यसभा वाले नोटिस पर 63 सांसदों ने दस्तखत किए थे। नियम के मुताबिक महाभियोग प्रस्ताव पेश करने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में कम से कम 50 सांसदों के दस्तखत जरूरी हैं। यानी विपक्ष के पास संख्या बल पूरा था। विपक्ष का आरोप ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति के बाद से चुनाव आयोग अपनी स्वतंत्रता और संवैधानिक निष्ठा बनाए रखने में विफल रहा। मशीन से पढ़ी जा सकने वाली मतदाता सूचियों के रखरखाव और देश भर में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन के विस्तार को लेकर भी आयोग के रवैया पर विपक्ष ने सवाल खड़े किए। इन दोनों के बाद सदन में चर्चा हो सकती थी पर नहीं हो पाई और वजह इसकी 6 अप्रैल को राज्यसभा के सभापति सीपी राधाकृष्णन ने नोटिस खारिज कर दिया। उन्होंने अपने आदेश में लिखा कि विपक्ष की तरफ से लगाए गए आरोप पहली नजर में संविधान के अनुच्छेद 3245 और 124 के तहत कदाचार नहीं है। विपक्ष ने जिन बातों का जिक्र किया है उनमें से कुछ मामलों पर पहले ही फैसला हो चुका है या फिर वह अदालत में विचाराधीन है। लोकसभा में स्पीकर ओम बिरला ने भी ऐसे ही तर्क देते हुए नोटिस अस्वीकार किया। यह तो पिछली बार की बात हुई है। इस दफा क्या होगा? यह जानने के लिए पहले आप समझिए कि चुनाव आयोग की भर्ती और हटाने के नियम क्या है?
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चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति कैसे होती है?
ECI (भारत निर्वाचन आयोग) पर देश में निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराने की ज़िम्मेदारी है। संविधान का अनुच्छेद 324 और 'CEC और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023' CEC की नियुक्ति, कार्यकाल और उन्हें हटाने से जुड़े प्रावधान तय करते हैं। राष्ट्रपति, CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तीन सदस्यों वाली एक सिलेक्शन कमिटी की सिफारिश पर करते हैं। इस कमिटी में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता (LoP) और केंद्रीय कैबिनेट का एक सदस्य शामिल होता है। 2023 के कानून के अनुसार, जिन लोगों को नियुक्त किया जाता है, उन्होंने पहले सरकार में सेक्रेटरी-लेवल के पदों पर काम किया हो और वे "ईमानदार व्यक्ति हों, जिन्हें चुनाव के मैनेजमेंट और संचालन का ज्ञान और अनुभव हो। ये नियुक्तियाँ छह साल के कार्यकाल या 65 साल की उम्र तक, जो भी पहले हो, के लिए की जाती हैं। CEC को वही सेवाएँ और आर्थिक लाभ मिलते हैं जो सुप्रीम कोर्ट के जजों को मिलते हैं।
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मुख्य चुनाव आयुक्त को कैसे हटाया जा सकता है?
संविधान के अनुच्छेद 324(5) में कहा गया है कि CEC को पद से केवल "उसी तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है, जैसे सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाया जाता है। यह बात 2023 के एक्ट की धारा 11(2) में भी कही गई है। आर्टिकल में आगे कहा गया है कि मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना किसी अन्य चुनाव आयुक्त या क्षेत्रीय आयुक्त को उनके पद से नहीं हटाया जाएगा। ECI को राजनीतिक दबाव से बचाने के लिए, CEC को हटाने की प्रक्रिया को जानबूझकर बहुत मुश्किल रखा गया है। संविधान के आर्टिकल 124(4) के अनुसार, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया बताई गई है, उन्हें केवल साबित कदाचार या अक्षमता के आधार पर ही हटाया जा सकता है। लत व्यवहार में कोई भी भ्रष्ट तरीका या पद का दुरुपयोग शामिल हो सकता है। समय के साथ, अदालतों ने इसका मतलब ऐसे कामों से निकाला है जो CEC के पद के अनुकूल नहीं हैं, या CEC का अपने आधिकारिक कर्तव्यों को पूरा न कर पाना। अक्षमता का मतलब ऐसी स्थिति से है जिसमें अधिकारी अपने कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ होता है। CEC को हटाने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए, दोनों सदनों के सदस्यों को गलत व्यवहार या अक्षमता का साफ़ आरोप लगाते हुए एक प्रस्ताव का नोटिस लाना होगा। महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार किए जाने के लिए, लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर ज़रूरी हैं। वे प्रस्ताव को स्वीकार या अस्वीकार करने के लिए लोगों और जानकारी से सलाह ले सकते हैं। अगर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है, तो आरोपों की सच्चाई की जाँच के लिए एक जाँच की जाती है। इसमें गलत व्यवहार या अक्षमता के सबूतों की जाँच करने के लिए एक समिति बनाना शामिल है। हटाने के प्रस्ताव को दोनों सदनों के कुल सदस्यों में से बहुमत का समर्थन मिलना चाहिए और संसद के दोनों सदनों में "मौजूद और वोट देने वाले" सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से इसे पास होना चाहिए। एक बार सफलतापूर्वक पास हो जाने पर, राष्ट्रपति CEC को हटाने का आदेश देते हैं। एक बार संवैधानिक ज़रूरतें पूरी हो जाने के बाद कोई विवेकाधिकार नहीं रह जाता, क्योंकि इस मामले में राष्ट्रपति संसद की सलाह पर काम करते हैं।
क्या पद पर रहते हुए CEC को किया जा सकता है गिरफ्तार?
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी की मांग उठ रही है, लेकिन भारत के 2023 के चुनाव कानून की धारा 16 एक अलग कानूनी सवाल खड़ा करती है: आधिकारिक कार्यों को लेकर दीवानी और आपराधिक कार्यवाही से मुख्य चुनाव आयुक्त को क्या सुरक्षा प्राप्त है? इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद चुनाव आयोग के भीतर एक नए विवाद के बीच इस प्रावधान की फिर से जांच शुरू हो गई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने चुनाव आयोग के कामकाज और मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (एसआईआर) से संबंधित निर्णयों और आदेशों पर 10 महीनों में कम से कम 14 बार औपचारिक आपत्ति जताई थी। आपत्तियों में मतदाता पंजीकरण, नामों को हटाना और बहाल करना, फॉर्म 6 में बदलाव और मतदाता सूची डेटाबेस के प्रबंधन और सुरक्षा से संबंधित मुद्दे शामिल थे। चुनाव आयोग ने कहा है कि अलग-अलग विचार और टिप्पणियां आंतरिक विचार-विमर्श का हिस्सा हैं और इस बात पर कायम रहा कि SIR से जुड़े फैसलों समेत उसके सभी अंतिम फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।
धारा 16 क्या कहती है?
मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 16 का शीर्षक है मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों का संरक्षण। कोई भी अदालत किसी भी ऐसे व्यक्ति के खिलाफ कोई दीवानी (सिविल) या आपराधिक (क्रिमिनल) कार्यवाही न तो स्वीकार करेगी और न ही उसे आगे जारी रखेगी, जो मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) या चुनाव आयुक्त (EC) है या पहले कभी इस पद पर रहा हो। ह छूट या संरक्षण उनके द्वारा किए गए किसी भी कार्य, कदम या कहे गए किसी भी शब्द के लिए मिलता है, बशर्ते वह अपने आधिकारिक कर्तव्यों या कार्यों के निर्वहन के दौरान या उस दायित्व को पूरा करने के सिलसिले में किया या कहा गया हो।
इस प्रावधान के दो हिस्से खास तौर पर अहम हैं।
पहला, इसमें सिविल और क्रिमिनल, दोनों तरह की कानूनी कार्यवाही शामिल है। दूसरा, यह ऐसे व्यक्ति पर लागू होता है जो CEC या चुनाव आयुक्त है या रह चुका ह"। इसलिए, यह सुरक्षा सिर्फ़ उस समय तक सीमित नहीं है जब वह व्यक्ति पद पर हो। लेकिन धारा 16 यह नहीं कहती कि मौजूदा या पूर्व चुनाव आयुक्त के हर काम को सुरक्षा मिलती है। इसकी भाषा सुरक्षा को उस काम, चीज़ या बात से जोड़ती है जो सरकारी ड्यूटी या काम करते समय या उसे करने की कोशिश के दौरान की गई या कही गई हो।
क्या धारा 16 का मतलब यह है कि ज्ञानेश कुमार को गिरफ़्तार नहीं किया जा सकता?
धारा 16 में गिरफ़्तारी, पुलिस जांच या जांच जैसे शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया गया है। इसे अदालतों द्वारा दीवानी या आपराधिक कार्यवाही शुरू करने या जारी रखने के संदर्भ में तैयार किया गया है। इसलिए, इस प्रावधान को गिरफ़्तारी पर अपने-आप लगी रोक बताना सही नहीं होगा। धारा 16 अदालत के सामने होने वाली कार्यवाही के संदर्भ में बनाई गई है; इसमें गिरफ़्तारी या जांच पर कोई अलग रोक साफ़ तौर पर नहीं बताई गई है। किसी खास मामले में जांच या मुक़दमे से पहले की कार्रवाई पर यह प्रावधान कैसे लागू होगा, यह लागू होने वाले कानून और अदालती व्याख्या पर निर्भर करेगा। यह धारा साफ़ तौर पर अदालत को ऐसी कार्यवाही पर विचार करने या उसे जारी रखने से रोकती है जो इसके दायरे में आती हैं। इसलिए, मुख्य कानूनी सवाल यह होगा कि क्या कथित व्यवहार किसी ऐसे काम, चीज़ या शब्द से जुड़ा है जो कमिश्नर ने अपनी आधिकारिक ड्यूटी या काम करते समय, या ऐसा करने का दिखावा करते हुए किया या कहा था।
कानून में धारा 16 कैसे शामिल हुई?
जब यह बिल पहली बार पेश किया गया था, तो इसमें यह सुरक्षा शामिल नहीं थी। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त बिल, 2023' को 10 अगस्त 2023 को राज्यसभा में पेश किया गया था। 12 दिसंबर को बिल पर विचार-विमर्श के दौरान, सरकार ने एक नया क्लॉज़ 15A जोड़ने के लिए एक संशोधन पेश किया, जिसका शीर्षक था मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों का संरक्षण। राज्यसभा के आधिकारिक रिकॉर्ड में संशोधन संख्या 39 का ज़िक्र है और प्रस्तावित क्लॉज़ को भी इसमें शामिल किया गया है। इसे तत्कालीन कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने पेश किया था और राज्यसभा ने इसे मंज़ूरी दी थी। नए क्लॉज़ की भाषा काफी हद तक उस प्रावधान जैसी ही है जो बाद में कानून बनने पर धारा 16 बनी। इसके बाद, 21 दिसंबर को लोकसभा ने बिल को मंज़ूरी दी और 28 दिसंबर 2023 को इसे राष्ट्रपति की मंज़ूरी मिली। यह कानून 2 जनवरी 2024 से लागू हुआ और इसके साथ ही धारा 16 भी प्रभावी हो गई। इसलिए, यह सुरक्षा संसदीय विचार-विमर्श के दौरान सरकार के एक औपचारिक संशोधन के ज़रिए जोड़ी गई थी; जब बिल पहली बार पेश किया गया था, तब यह उसका हिस्सा नहीं थी।
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