मुख्यमंत्री तो राजभर का बेटा ही होगा... बयान से मचा सियासी बवाल, योगी सरकार ने भी गुस्से में दे दी तगड़ी नसीहत!
योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री जैसा बड़ा पद संभालने वाले सुहेलदेव राजभर समाज पार्टी के अध्यक्ष ओम प्रकाश राजभर भी अब मुख्यमंत्री बनने का ख्वाब देखने लगे हैं। यूपी की सत्ता योगी आदित्यनाथ संभाल रहे हैं और साल 2027 का यूपी चुनाव भी योगी के चेहरे पर ही लड़ा जाएगा। यह बात तो सभी जानते हैं। लेकिन इसके बावजूद योगी सरकार में कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने चुनाव से पहले ही मुख्यमंत्री बनाने का एक अलग राग छेड़ दिया है। अब चाहे इसके लिए भले ही यूपी जैसे बड़े राज्य के चार टुकड़े हो जाए। मुख्यमंत्री तो राजभर का बेटा ही बनेगा। दरअसल जिस उत्तर प्रदेश का एक हिस्सा काटकर अलग राज्य उत्तराखंड बना दिया गया उस उत्तर प्रदेश को एक बार फिर बांटने की चर्चाएं तेज होने लगी और इस बार सिर्फ एक हिस्से में नहीं यूपी को चार हिस्सों में बांटने की बात हो रही है और कैबिनेट मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने तो यहां तक ऐलान कर दिया है कि जब भी यूपी का बंटवारा होगा तो पूर्वांचल का मुख्यमंत्री राजभर का बेटा ही होगा। 24 साल से हम लोग इस बात को कहते आए हैं कि जिस दिन प्रदेश का बंटवारा होगा पश्चिम के लोग हरित प्रदेश की बात करते हैं। बुंदेलखंड के लोग बुंदेलखंड की बात करते हैं। पूर्वांचल के लोग पूर्वांचल की बात करते हैं। इसी उत्तर प्रदेश से उत्तराखंड बना रहा है। बिहार से झारखंड और छत्तीसगढ़ बना है। तो इतना बड़ा प्रदेश है। जब प्रदेश का बंटवारा होगा 5 साल लगे, 10 साल लगे, 20 साल लगे जब भी बंटवारा होगा तो उत्तर प्रदेश का पहला मुख्यमंत्री राजभर का बेटा होगा। ओम प्रकाश राजभर होंगे। अब हम कब तक रहेंगे कि नहीं रहेंगे?
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राजभर ने प्रदेश को बांटने में अड़चन का जिक्र करते हुए कहा कि एक सिस्टम है। सिस्टम में चल रहा है अपना काम। हमारी हमारी पार्टी का अपना मानना है। हम अपने जो मेनिफेस्टो है उसमें हम अपने विचार लोगों की राय से पूर्वांचल के लोगों की राय से रखा गया है। जिस सुहेलदेव समाज पार्टी का अस्तित्व ही बीजेपी के दम पर है। उस पार्टी के अध्यक्ष राजभर यूपी के बंटवारे का सपना देख रहे हैं और यूपी का बंटवारा होते ही पूर्वांचल में राजभर के बेटे को मुख्यमंत्री बनाने का ऐलान कर रहे हैं। वह भी ऐसे समय में जब कुछ ही महीनों बाद यूपी में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। इस वक्त उन्हें राजभर के बेटे को मुख्यमंत्री बनाने का अभियान छोड़कर 2027 में लगातार तीसरी बार योगी सरकार बनाने पर काम करना चाहिए था। लेकिन यूपी चुनाव से पहले ही वह राजभर के बेटे को मुख्यमंत्री बनाने का अभियान चलाने लगे। जबकि अभी तो यूपी का बंटवारा भी नहीं हुआ है। यही वजह है कि उनके इस बयान पर योगी सरकार के मंत्री अनिल राजभर ने भी नसीहत देते हुए कहा कि हमें मोदी जी पर भरोसा रखना चाहिए। वह जो भी फैसला लेंगे प्रदेश के हित में लेंगे। सभी को इस बात को मानना चाहिए और उसी आधार पर अपना बयान भी देना चाहिए। हम सब लोग लगातार 60 और 70 के दशक से यह बात सुन रहे हैं। जनता तो धैर्य के साथ सारे चीज का इंतजार कर रही है। मैं अपने सहयोगी दल के साथियों से भी मैं कहूंगा कि वह भी धैर्य बनाए रखें। आज देश के अंदर माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी की सामर्थ्यवान सरकार चल रही है। देश के हित में जो कुछ भी होगा और प्रदेश के हित में भी जो कुछ होगा वो हम सब लोगों को माननीय मोदी जी के ऊपर छोड़ना चाहिए। भारत के सरकार के ऊपर छोड़ना चाहिए। हम सब लोग यह भी जानते हैं कि किसी भी प्रदेश के बंटवारा करने का अधिकार देश की सरकार के पास है। माननीय मोदी जी के पास है। उनकी सरकार के पास है। तो हम सब लोगों को भरोसा रखना चाहिए, विश्वास रखना चाहिए। मोदी जी का जो फैसला है वही प्रदेश के हित में भी है और देश के भी हित में है। सब लोगों को इस बात को मानना चाहिए। उसी आधार पर अपने बयान भी देने चाहिए और आगे भी चलना चाहिए।
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योगी सरकार के मंत्री अनिल राजभर का यह बयान बता रहा है कि बीजेपी को भी ओम प्रकाश राजभर का यह बयान रास नहीं आया क्योंकि उनका यही बयान अब योगी सरकार को भारी पड़ रहा है। ओम प्रकाश राजभर के बहाने सपा नेता शिवपाल यादव ने तो सरकार पर सवाल उठाते हुए यहां तक कह दिया कि पहले बेईमानी और भ्रष्टाचार खत्म करिए। पूर्वांचल बनेगा तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश भी बनेगा। फिर दक्षिण भी दक्षिण भी बनेगा बुंदेलखंड बनेगा। फिर रोहेलखंड बनेगा। बनेगा पहले तो ये ये तो पहले ये तो विचार पहले करो। पूर्वांचल की बात तो तब करो पहले सब एक करो। कितने प्रदेश बनाओ। भाई एक कितने प्रदेश बनाओ? अखिलेश यादव ने भी राजभर के बयान के बहाने योगी सरकार पर पलटवार करते हुए कहा जो देश के बंटवारे की बात कर रहे हैं वह राज्य के बंटवारे की भी बात कर रहे हैं। हमें अपने देश को ताकतवर बनाना है। कमजोर लोग ऐसी बातें करते हैं और कुछ लोग इनके साथ अंडरग्राउंड लेवल पर होंगे।
सभी फैसले रद्द कर दें...CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर, कर दी गई ये बड़ी मांग
सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई है जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलाने की मांग की गई है। यह मांग मतदाता सूची के 'स्पेशल इंटेंसिव रिविजन' (SIR) के संबंध में कानूनी कर्तव्यों के कथित उल्लंघन को लेकर की गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, वकील शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर की। इसमें कुमार के उन फैसलों, गाइडलाइंस और सॉफ्टवेयर में किए गए बदलावों को चुनौती दी गई है, जो कथित तौर पर बाकी दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना किए गए थे। साथ ही, इन फैसलों और बदलावों को असंवैधानिक और अमान्य घोषित करने की मांग की गई है। यह याचिका 'द इंडियन एक्सप्रेस' की उस रिपोर्ट के कुछ दिनों बाद आई है जिसमें बताया गया था कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR से जुड़े फैसलों और आदेशों पर कम से कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कराई थीं। इन फैसलों में 'फॉर्म 6' में बदलाव और वोटर लिस्ट के डेटा का मैनेजमेंट शामिल था। रिपोर्ट के मुताबिक, ये आपत्तियां उन फैसलों के बारे में थीं जो कथित तौर पर उनकी जानकारी के बिना या उनकी सिफारिशों के खिलाफ लिए गए थे।
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इस याचिका में यह घोषणा करने की मांग की गई है कि अन्य दो चुनाव आयुक्तों की सहमति के बिना लिए गए कथित फैसले गैर-कानूनी हैं और इसमें वोटर रजिस्ट्रेशन के लिए इस्तेमाल होने वाले मूल 'फॉर्म 6' को फिर से लागू करने की मांग की गई है। साथ ही, इसमें 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम' के तहत कर्तव्यों के कथित उल्लंघन के लिए ज्ञानेश कुमार, डिप्टी इलेक्शन कमिश्नर मनीष गर्ग और ECI की IT हेड सीमा खन्ना पर मुकदमा चलाने की भी मांग की गई है। यह याचिका 'द इंडियन एक्सप्रेस' की एक रिपोर्ट के बाद दायर की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले 10 महीनों में कम से कम 14 बार उन फैसलों पर औपचारिक रूप से आपत्ति जताई थी, जो मतदाताओं के नाम जोड़ने, हटाने, बहाल करने और मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया में बदलाव से संबंधित थे। याचिकाकर्ता ने 'जन प्रतिनिधित्व अधिनियम' की धारा 32 के तहत ज्ञानेश कुमार पर मुकदमा चलाने की मांग की है। चुनाव आयोग का कहना है कि SIR से जुड़े फैसलों समेत सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे और इसके लिए दोनों चुनाव आयुक्तों और CEC की मंजूरी ली गई थी।
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