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'द वन'- मूवी रिव्यू:वन देवी की लोककथा, छठी मइया की आस्था और रहस्य से भरी कहानी, जंगल में छिपा है कौन सा राज?

हमारे देश में कहानियों की कोई कमी नहीं है, कमी है उन्हें बड़े पर्दे पर नए अंदाज में सुनाने की। ‘द वन: फोर्स ऑफ द फॉरेस्ट’ बिहार की मिट्टी से निकली ऐसी ही एक लोककथा को लेकर आती है, जहां वन देवी, रहस्यमयी जंगल, छठी मइया की आस्था और इंसान की अपनी सोच आमने-सामने आती है। फिल्म की शुरुआत जितनी दिलचस्पी जगाती है, उतना ही सवाल भी छोड़ती है कि जंगल के अंदर आखिर है क्या? अच्छी बात यह है कि फिल्म काफी देर तक इस सवाल को जिंदा रखती है, बस बाद में जब जवाब मिलने शुरू होते हैं तो कुछ रहस्य उतने रहस्यमयी नहीं रह जाते। फिल्म की कहानी कैसी है कहानी ऋषि (सिद्धार्थ मल्होत्रा) की है, जो अपनी पत्नी ममता (तमन्ना भाटिया) के साथ बिहार के पुश्तैनी गांव आता है। शहर में पले ऋषि के लिए गांव और उसकी मान्यताएं पुरानी सोच का हिस्सा हैं। दोनों का अपना पारिवारिक दर्द भी है और छठ के लिए घर लौटने का रिश्ता भी। गांव के पास एक जंगल है, जिसके बीच वन देवी का मंदिर है। स्थानीय लोककथा के मुताबिक सूर्यास्त के बाद इस जंगल में जाना मना है। फिल्म की प्रेरणा बिहार के बिहटा स्थित वन देवी मंदिर से जुड़ी इसी लोककथा से ली गई है, जहां जंगल और देवी को लेकर पीढ़ियों से कई मान्यताएं चली आ रही हैं। ऋषि इन बातों को नहीं मानता। इसी बीच जंगल को लेकर विकास और प्रकृति के बीच खींचतान सामने आती है, लेकिन जब ऋषि जंगल में पहुंचता है और एक पुरानी मुहर टूटने के बाद अलौकिक ताकत जागती है, तब उसकी अपनी सोच भी सवालों के घेरे में आ जाती है। पहला हिस्सा यहीं सबसे ज्यादा पकड़ बनाता है। गांव का माहौल, रिश्ते, हल्का हास्य और जंगल का रहस्य साथ-साथ चलते हैं। लेकिन दूसरे हिस्से में कहानी प्रकृति और जमीन के सवाल से निकलकर सीधे अच्छाई बनाम बुराई की बड़ी लड़ाई की तरफ बढ़ जाती है। इससे शुरुआत में बना वह जमीन से जुड़ा संघर्ष थोड़ा पीछे छूटता है। कहानी में विचार कम नहीं हैं, बस कुछ विचारों को पूरी तरह खुलने का मौका नहीं मिलता। फिल्म में एक्टिंग कैसी है सिद्धार्थ मल्होत्रा ऋषि के किरदार में एक्शन के साथ भावनात्मक बदलाव भी संभालते हैं। उनका अविश्वास धीरे-धीरे विश्वास में बदलता है, हालांकि इस बदलाव को थोड़ा और समय मिलता तो किरदार और गहराता। तमन्ना भाटिया सहज लगती हैं और सिद्धार्थ के साथ उनकी पति-पत्नी वाली केमिस्ट्री फिल्म के फैंटेसी हिस्से को मानवीय आधार देती है। उनके किरदार में संभावनाएं हैं, लेकिन स्क्रीनप्ले उन्हें पूरी तरह इस्तेमाल नहीं करता। सुनील ग्रोवर फिल्म का अच्छा सरप्राइज हैं। गंभीर किरदार में उनका अंदाज अलग लगता है और उनकी कहानी खुलने के साथ उत्सुकता बढ़ती है। मनीष पॉल पहले हिस्से में हंसी और हल्कापन लाते हैं। श्वेता तिवारी और अनूप सोनी भी अपने किरदारों में ठीक बैठते हैं। फिल्म का निर्देशन कैसा है निर्देशक दीपक कुमार मिश्रा की सबसे बड़ी कामयाबी यह है कि उन्होंने बिहार की एक कम सुनी गई लोककथा को सिर्फ डर की कहानी नहीं बनाया। इसमें परिवार है, प्रकृति है, आस्था है, विकास का सवाल है और फैंटेसी भी है। दिक्कत बस यही है कि इतनी सारी चीजों को साथ लेकर चलने की कोशिश में स्क्रीनप्ले कभी-कभी खुद अपनी रफ्तार से आगे निकल जाता है। शुरुआत में जो रहस्य धीरे-धीरे बनता है, बाद में उसके कई जवाब जल्दी मिल जाते हैं। कुछ चीजें अगर थोड़ी देर और छिपी रहतीं तो जंगल का रोमांच और टिक सकता था। सिनेमैटोग्राफी फिल्म की बड़ी ताकत है। जंगल की हरियाली, धुंध, अंधेरा और रोशनी मिलकर ऐसा माहौल बनाते हैं कि कई बार जंगल खुद कहानी का किरदार लगता है। प्रोडक्शन डिजाइन में बिहार की मिट्टी और गांव की पहचान बनी रहती है। रहस्यमयी जीवों और पुराने घटनाक्रम को समझाने वाला एनीमेशन भी फिल्म का दिलचस्प प्रयोग है। वीएफएक्स में पैमाना बड़ा रखा गया है। कुछ दृश्य शानदार लगते हैं, जबकि कुछ जगह कंप्यूटर से बने हिस्से उतने सहज नहीं बैठते। बड़े पर्दे पर फिल्म का स्केल जरूर दिखाई देता है। फिल्म का म्यूजिक कैसा है ‘समझो ना’ कहानी के रोमांटिक हिस्से को जगह देता है, जबकि ‘ठुमक ठुमक’ माहौल में मस्ती भरता है। लेकिन सबसे ज्यादा फिल्म की जड़ों से जुड़ता है ‘छठी मइया’। छठ के घाट, अर्घ्य और भक्ति वाला माहौल फिल्म को बिहार की संस्कृति से जोड़ता है। हां, यहां सिनेमा ने अपनी थोड़ी आजादी भी ली है—कुछ दृश्य असली छठ की सादगी से ज्यादा फिल्मी और सजाए हुए लगते हैं। असल छठ चार दिन की साधना, व्रत, अनुशासन और डूबते-उगते सूर्य को अर्घ्य देने की परंपरा पर टिका है; फिल्म उसका भाव पकड़ती है, हर बारीकी नहीं। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट ‘द वन’ एक देसी फैंटेसी एडवेंचर है, जो बिहार की लोककथा, छठी मइया की आस्था और रहस्यमयी जंगल को अपनी दुनिया का आधार बनाती है। फिल्म का माहौल, सिनेमैटोग्राफी और कलाकार इसे देखने लायक बनाते हैं। दूसरे हिस्से में कहानी कुछ जानी-पहचानी राह पकड़ती है, लेकिन अपनी मिट्टी से जुड़ी दुनिया और बड़े पर्दे का स्केल इसका असर बनाए रखते हैं। रास्ता हर जगह बराबर मजबूत नहीं है, लेकिन ‘द वन’ की दुनिया में कदम रखना एक दिलचस्प सिनेमाई अनुभव जरूर है।

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Love And War: रणबीर कपूर के बाद 'लव एंड वॉर' से जारी हुआ आलिया भट्ट का लुक, कैबरे डांसर बन पहली झलक से लगाई आग

Love And War: संजय लीला भंसाली के निर्देशन में बन रही फिल्म ‘लव एंड वॉर’ से बीते गुरुवार को रणबीर कपूर का लुक जारी हुआ. रणबीर कपूर के बाद अब आज आलिया भट्ट का लुक रिलीज हुआ जिसे सोशल मीडिया पर काफी पसंद किया जा रहा है. आलिया कैबरे डांसर के लुक में दिखी हैं.

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  Sports

CWI का बड़ा फैसला, खिलाड़ियों के Contract में 25% कटौती और Super50 टूर्नामेंट पर लगाई रोक

वेस्टइंडीज क्रिकेट इस समय आर्थिक और खेल से जुड़ी कई चुनौतियों से गुजर रहा है। इन्हीं परेशानियों से निपटने के लिए क्रिकेट वेस्टइंडीज ने कई बड़े फैसले लिए हैं। बोर्ड ने अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों की सालाना अनुबंध फीस में 25% कटौती करने का फैसला किया है। इसके साथ ही इस साल पुरुषों की सुपर50 और महिलाओं की टी20 ब्लेज घरेलू प्रतियोगिताओं को भी रोक दिया गया है।

मौजूद जानकारी के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों को आगे भी 12 महीने का अनुबंध मिलता रहेगा, लेकिन उनकी तय फीस पहले के मुकाबले 25% कम होगी। वहीं घरेलू खिलाड़ियों के अनुबंध को 7 महीने तक सीमित किया जाएगा। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब वेस्टइंडीज के कई खिलाड़ी राष्ट्रीय अनुबंध की जगह अलग-अलग देशों की घरेलू और फ्रेंचाइजी क्रिकेट प्रतियोगिताओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। फीस में कटौती से यह चुनौती और बढ़ सकती है।

क्रिकेट वेस्टइंडीज के मुख्य कार्यकारी अधिकारी क्रिस डियरिंग ने कहा कि खिलाड़ियों और वेस्टइंडीज प्लेयर्स एसोसिएशन ने मौजूदा परिस्थितियों को समझते हुए सहयोग किया है। उन्होंने माना कि फीस में कटौती आदर्श स्थिति नहीं है, लेकिन आर्थिक स्थिरता के लिए इसे जरूरी कदम माना गया है।

बोर्ड ने पुरुषों की सुपर50 और महिलाओं की टी20 ब्लेज प्रतियोगिताओं को भी इस साल आयोजित नहीं करने का फैसला किया है। इसके पीछे घरेलू प्रतियोगिताओं के आयोजन पर आने वाला भारी खर्च बताया गया है। बता दें कि सुपर50 वेस्टइंडीज की पुरुष एकदिवसीय टीम तक पहुंचने वाले खिलाड़ियों के लिए अहम मंच रहा है। ऐसे में इसका रुकना विकास और चयन प्रक्रिया पर भी असर डाल सकता है।

गौरतलब है कि वेस्टइंडीज को फरवरी-मार्च 2027 में एकदिवसीय विश्व कप क्वालीफायर खेलना है। टीम 2023 के एकदिवसीय विश्व कप में जगह नहीं बना सकी थी। अब क्रिकेट वेस्टइंडीज का कहना है कि उसका ध्यान पुरुष टीम को इस क्वालीफायर के लिए तैयार करने पर रहेगा। नवंबर में इंग्लैंड ए टीम के खिलाफ सीमित ओवरों की कुछ मुकाबलों की श्रृंखला के बाद एकदिवसीय टीम का विशेष शिविर लगाया जाएगा।

क्रिस डियरिंग के मुताबिक, घरेलू क्रिकेट व्यवस्था पर यात्रा, होटल, मैच और आयोजन से जुड़ा खर्च लगातार बढ़ता गया है। उन्होंने कहा कि पिछले 15 वर्षों में केवल घरेलू विमान सेवाओं पर 80 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक खर्च किए गए हैं। बोर्ड का कहना है कि मौजूदा आर्थिक दबाव में इस तरह का खर्च उठाना मुश्किल हो गया है।

इस बदलाव का असर 2027 पैन अमेरिकी खेलों और 2028 लॉस एंजिल्स ओलंपिक की तैयारी पर भी पड़ सकता है। 2025-26 सुपर50 और टी20 ब्लेज में शीर्ष 4 स्थान हासिल करने वाली टीमों को पैन अमेरिकी खेलों के लिए पहले ही तय किया जा चुका है। वहीं ओलंपिक के लिए अलग आमंत्रण प्रतियोगिताएं आयोजित की जाएंगी, जिनका खर्च संबंधित देशों के क्रिकेट बोर्ड और अन्य संस्थाएं उठाएंगी।

महिलाओं की अगले साल की सुपर50 की जगह सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों वाली विकास प्रतियोगिता होगी। हालांकि वेस्टइंडीज चैंपियनशिप अपने 2025-26 प्रारूप में जारी रहेगी। क्रिस डियरिंग ने मौजूदा स्थिति की तुलना 2016 टी20 विश्व कप फाइनल में कार्लोस ब्रेथवेट के लगातार 4 छक्कों से करते हुए कहा कि अब वेस्टइंडीज क्रिकेट को भी साहस के साथ बड़े फैसले लेने होंगे और नई शुरुआत करनी होगी।

Fri, 25 Sep 2026 22:00:00 +0530

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