राजस्थान के 3 बड़े शहरों में आज मेयर का चुनाव, जानिए जयपुर-कोटा में क्या है गणित और जोधपुर में क्यों फंसा पेंच
Rajasthan Mayor Election Explainer: राजस्थान की तीन बड़ी नगर निगमों जयपुर, जोधपुर और कोटा में आज महापौर पद के लिए मतदान होगा. इन चुनावों की खास बात यह है कि यहां आम मतदाता सीधे मेयर का चुनाव नहीं करेंगे, बल्कि नगर निगम के निर्वाचित पार्षद मतदान के जरिए महापौर चुनेंगे. मतदान सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक चलेगा और इसके बाद मतगणना शुरू होगी. राज्य निर्वाचन आयोग के कार्यक्रम के अनुसार परिणाम भी शुक्रवार को ही सामने आएंगे.
इन तीनों शहरों में चुनावी गणित एक जैसा नहीं है. जयपुर में एक दल बहुमत के आंकड़े से ऊपर है, कोटा में भी स्पष्ट संख्या बल मौजूद है, जबकि जोधपुर में दोनों प्रमुख दल बहुमत से नीचे हैं. यही वजह है कि जोधपुर के नतीजे को लेकर सबसे ज्यादा चर्चा है.
मेयर का चुनाव कैसे होता है?
इन चुनावों को समझने के लिए सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि नगर निगम का मेयर सीधे जनता द्वारा नहीं चुना जाता. जनता पहले अपने-अपने वार्ड से पार्षद चुनती है. इसके बाद निर्वाचित पार्षद महापौर के चुनाव में वोट डालते हैं.
इसलिए मेयर चुनाव में किसी पार्टी के पार्षदों की संख्या सबसे महत्वपूर्ण होती है. यदि किसी दल के पास बहुमत है तो उसके उम्मीदवार की स्थिति संख्या के लिहाज से मजबूत होती है. लेकिन जब किसी निगम में किसी दल को बहुमत नहीं मिलता, तब निर्दलीय या अन्य दलों के पार्षदों की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है. इसी वजह से जोधपुर में 100 सदस्यीय सदन का बहुमत आंकड़ा 51 है, जबकि दोनों प्रमुख दल इस संख्या से काफी नीचे हैं.
जयपुर में 76 का आंकड़ा, एक दल के पास 78 पार्षद
जयपुर नगर निगम में कुल 150 वार्ड हैं और मेयर चुनने के लिए 76 पार्षदों का समर्थन जरूरी है. उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार एक प्रमुख दल के पास 78 पार्षद हैं, जबकि कांग्रेस के पास 57 और निर्दलीय समेत अन्य पार्षदों की संख्या 15 है.
जयपुर में मुकाबला दो उम्मीदवारों के बीच है. एक तरफ बीजेपी के सुनील कोठारी हैं, जबकि कांग्रेस ने सुनीता महावर को मैदान में उतारा है. नामांकन वापसी के बाद मुकाबला सीधा हो गया.
संख्या बल के हिसाब से 78 पार्षद रखने वाले दल के पास बहुमत से दो सीट अधिक हैं. लेकिन मेयर चुनाव में हर पार्षद का वोट महत्वपूर्ण होने के कारण दोनों खेमे अपने-अपने पार्षदों को एकजुट रखने पर जोर दे रहे हैं.
यही कारण है कि जयपुर में चर्चा सिर्फ बहुमत के आंकड़े की नहीं, बल्कि संभावित क्रॉस वोटिंग और पार्षदों की रणनीति की भी है.
जयपुर में क्यों महत्वपूर्ण है एक-एक वोट?
जयपुर में बहुमत का आंकड़ा 76 और एक दल की संख्या 78 है. यानी कागज पर उसे सिर्फ दो वोट की अतिरिक्त बढ़त हासिल है. ऐसी स्थिति में पार्टी के सभी पार्षदों का समर्थन बनाए रखना अहम हो जाता है.
दूसरी तरफ कांग्रेस के सामने अपनी संख्या से आगे जाकर समर्थन जुटाने की चुनौती है. चुनाव से पहले दोनों दलों की ओर से पार्षदों के समर्थन को लेकर अलग-अलग दावे किए गए हैं. इसलिए अंतिम तस्वीर मतदान के बाद ही स्पष्ट होगी.
जयपुर का चुनाव इसलिए भी राजनीतिक रूप से चर्चा में है क्योंकि राजधानी राज्य की प्रशासनिक और राजनीतिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र है.
कोटा में भी संख्या बल साफ
कोटा नगर निगम में कुल 100 पार्षद हैं. यहां बहुमत के लिए 51 वोट चाहिए. उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक एक प्रमुख दल के पास 57 पार्षद हैं, जबकि कांग्रेस के 39 और चार निर्दलीय पार्षद हैं.
मेयर पद के लिए अनुसुइया गोस्वामी और कांग्रेस की सुनीता कुमारी के बीच मुकाबला है. 57 पार्षदों के साथ एक दल के पास बहुमत से छह अधिक सीटें हैं.
इस लिहाज से कोटा में चुनावी गणित जयपुर से भी ज्यादा स्पष्ट दिखाई देता है. हालांकि मेयर चुनाव में अंतिम फैसला मतदान से ही होगा और किसी भी संभावित क्रॉस वोटिंग का असर परिणाम पर पड़ सकता है.
जोधपुर में सबसे बड़ा सस्पेंस
जोधपुर नगर निगम में कुल 100 पार्षद हैं और बहुमत का आंकड़ा 51 है. यहां एक प्रमुख दल के 45 और कांग्रेस के 44 पार्षद हैं. बाकी पार्षद निर्दलीय हैं.
यानी दोनों प्रमुख दल बहुमत से दूर हैं और उनके बीच सिर्फ एक सीट का अंतर है. ऐसे में निर्दलीय पार्षदों का रुख मेयर चुनाव में निर्णायक भूमिका निभा सकता है.
मेयर पद के लिए प्रसन्न चंद मेहता और राजेंद्र सिंह सोलंकी आमने-सामने हैं. दोनों उम्मीदवारों के नामांकन को लेकर आपत्तियां भी सामने आई थीं, लेकिन रिटर्निंग अधिकारी ने दोनों के नामांकन को मंजूरी दे दी. यही वजह है कि जोधपुर में चुनाव से पहले दोनों प्रमुख दल निर्दलीय पार्षदों के समर्थन को लेकर सक्रिय रहे हैं.
जोधपुर में निर्दलीयों के पास क्यों है चाबी?
जोधपुर का गणित बेहद सीधा है. 100 सदस्यीय सदन में जीत के लिए 51 वोट चाहिए. लेकिन दोनों प्रमुख दलों के पास 51 से कम पार्षद हैं.
इस स्थिति में किसी उम्मीदवार को बहुमत तक पहुंचने के लिए निर्दलीय पार्षदों का समर्थन हासिल करना होगा. यदि निर्दलीय पार्षद किसी एक पक्ष के साथ जाते हैं तो चुनाव का गणित बदल सकता है. क्रॉस वोटिंग की स्थिति में भी नतीजा अलग हो सकता है.
यही वजह है कि जोधपुर के चुनाव में उम्मीदवारों से ज्यादा पार्षदों की रणनीति और मतदान के दौरान उनकी पसंद पर नजर रहेगी.
पहले ही आ चुके हैं कई मेयर चुनावों के नतीजे
राजस्थान की नगर निगम चुनाव प्रक्रिया में जयपुर, जोधपुर और कोटा के अलावा अन्य निगमों में महापौर के चुनाव हो चुके हैं. राज्य के 10 नगर निगमों में से सात में मेयर पद के परिणाम पहले ही सामने आ चुके हैं. आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अलवर, अजमेर, उदयपुर और पाली में चुनाव के जरिए मेयर चुने गए, जबकि भरतपुर और भीलवाड़ा में निर्विरोध चुनाव हुआ. बीकानेर में कांग्रेस उम्मीदवार ने जीत दर्ज की.
इन परिणामों में एक महत्वपूर्ण बात यह भी सामने आई कि कई जगह पार्टी की पार्षद संख्या और मेयर चुनाव का परिणाम एक जैसा नहीं रहा. पाली इसका उदाहरण है, जहां कांग्रेस के पास ज्यादा पार्षद होने के बावजूद मेयर पद उसके हाथ नहीं आया.
इससे यह साफ होता है कि मेयर चुनाव में केवल वार्डों की संख्या ही पर्याप्त नहीं होती, बल्कि पार्षदों के बीच समर्थन जुटाना भी अहम होता है.
किस बात पर रहेगी सबसे ज्यादा नजर?
शुक्रवार को तीनों शहरों में मतदान के दौरान मुख्य रूप से तीन चीजें महत्वपूर्ण होंगी पार्षदों की एकजुटता, संभावित क्रॉस वोटिंग और निर्दलीय पार्षदों का रुख.
जयपुर में बहुमत से थोड़ा ऊपर मौजूद दल के लिए अपने पार्षदों को एकजुट रखना अहम होगा. कोटा में बहुमत का आंकड़ा पार करने के बावजूद मतदान की प्रक्रिया पर नजर रहेगी. वहीं जोधपुर में मुकाबला पूरी तरह संख्या के गणित और अतिरिक्त समर्थन पर निर्भर दिखाई दे रहा है.
मतदान सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे तक होगा. इसके बाद मतगणना शुरू होगी और उसी दिन परिणाम घोषित किए जाएंगे.
मेयर के बाद 26 सितंबर को डिप्टी मेयर का चुनाव
महापौर चुनाव के ठीक अगले दिन यानी 26 सितंबर को उपमहापौर पद के लिए चुनाव होगा. राज्य निर्वाचन आयोग ने तीनों नगर निगमों के साथ संबंधित अन्य निकायों के लिए भी यही कार्यक्रम तय किया है.
इस तरह 25 और 26 सितंबर को होने वाली प्रक्रिया के बाद जयपुर, जोधपुर और कोटा के नगर निगमों का नया नेतृत्व पूरी तरह तय हो जाएगा.
इन चुनावों का महत्व सिर्फ मेयर की कुर्सी तक सीमित नहीं है. नगर निगम शहर की सड़क, सफाई, शहरी नियोजन, संपत्ति कर, स्थानीय विकास और कई नागरिक सेवाओं से जुड़े फैसले लेता है. इसलिए पार्षदों के जरिए चुना जाने वाला मेयर आने वाले समय में इन शहरों के स्थानीय प्रशासन की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा.
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'आप हाफ़िज़ सईद पर मुक़दमा कब चलाएंगे?' संयुक्त राष्ट्र में शहबाज़ शरीफ़ पर दागे गए तीखे सवाल, पाकिस्तान के Pakistan Prime ने साधी चुप्पी
संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) के सत्र में हिस्सा लेने न्यूयॉर्क पहुँचे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उस समय बेहद असहज स्थिति का सामना करना पड़ा, जब पत्रकारों ने उनसे पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद और लश्कर-ए-तैयबा (LeT) प्रमुख हाफ़िज़ सईद को लेकर सीधे और तीखे सवाल दाग दिए। गुरुवार को जब शहबाज़ शरीफ़ संयुक्त राष्ट्र (UN) मुख्यालय में दाख़िल हो रहे थे, तब पत्रकारों ने उनसे पूछा, "प्रधानमंत्री, आप आतंकवादियों को पनाह देना कब बंद करेंगे?" इस सवाल पर शरीफ़ बिना कोई जवाब दिए चुप्पी साधकर परिसर के भीतर चले गए। बात यहीं ख़त्म नहीं हुई। UN मुख्यालय से बाहर निकलते समय एक पत्रकार ने उनसे दूसरा तीखा सवाल किया, "आप लश्कर-ए-तैयबा प्रमुख हाफ़िज़ सईद पर मुक़दमा कब चलाएंगे?" इस सवाल पर भी पाकिस्तानी प्रधानमंत्री ने पूरी तरह ख़ामोश रहना ही मुनासिब समझा और बिना कोई प्रतिक्रिया दिए आगे बढ़ गए।
UN मुख्यालय से निकलते समय पाकिस्तानी प्रधानमंत्री को एक और सीधे सवाल का सामना करना पड़ा। एक पत्रकार ने पूछा, "आप लश्कर-ए-तैयबा (LeT) प्रमुख हाफ़िज़ सईद पर मुक़दमा कब चलाएंगे?" शरीफ़ ने फिर से जवाब न देने का फ़ैसला किया। बिना जवाब वाले इन दो सवालों ने आतंकवाद पर पाकिस्तान के रिकॉर्ड से जुड़े सबसे विवादास्पद मुद्दों में से एक पर ध्यान केंद्रित किया, खासकर हाफ़िज़ सईद के मामले में, जिसे भारत लंबे समय से चाहता रहा है।
हाफ़िज़ सईद कौन है और भारत उस पर मुक़दमा क्यों चलाना चाहता है?
हाफ़िज़ मुहम्मद सईद, जो पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के सरगोधा का रहने वाला है, प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा का संस्थापक है। भारत ने उसे गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 के तहत आतंकवादी घोषित किया है। सईद 26/11 के मुंबई आतंकी हमलों से जुड़ी साज़िश में भी आरोपी है। मुंबई आतंकी हमले की साज़िश के मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) के रिकॉर्ड में सईद का नाम आरोपियों की सूची में है और कहा गया है कि उसके ख़िलाफ़ गैर-ज़मानती वारंट जारी किए गए हैं।
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22 अप्रैल, 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद यह मुद्दा फिर से अहम हो गया है। NIA ने आरोप लगाया है कि प्रतिबंधित LeT के पाकिस्तान-स्थित ऑपरेटिव इस साज़िश में शामिल थे। मामले में दायर एक सप्लीमेंट्री चार्जशीट में, एजेंसी ने हाफ़िज़ सईद को आरोपी बनाया और हमले के पीछे की बड़ी साज़िश में उसकी भूमिका का आरोप लगाया।
पाकिस्तान के टेरर रिकॉर्ड पर सवालों के बीच शरीफ़ खामोश रहे
शरीफ़ ने तब जवाब देने से इनकार किया जब UN में पाकिस्तान के आतंकवाद से निपटने के तरीके पर फिर से सवाल उठ रहे थे। सईद के बारे में खास सवालों का जवाब देने या उस पर मुक़दमे के बारे में इस्लामाबाद का पक्ष रखने के बजाय, पाकिस्तानी प्रधानमंत्री दोनों ही मौकों पर पत्रकारों के पास से गुज़र गए।
यह बातचीत इसलिए भी अहम थी क्योंकि सवाल किसी आम राजनीतिक मतभेद के बारे में नहीं थे। वे सीधे तौर पर पाकिस्तान में मौजूद LeT के संस्थापक सईद से जुड़े थे, जिसे भारत ने आतंकवादी घोषित किया है और जो 26/11 मुंबई आतंकी हमले के मामले में वांछित है।
UN में भारत ने पाकिस्तान को करारा जवाब दिया
सईद को लेकर शरीफ़ से सवाल पूछे जाने से एक दिन पहले, भारत ने संयुक्त राष्ट्र में पाकिस्तान की कड़ी आलोचना की और इस्लामाबाद पर आरोप लगाया कि वह भारत के खिलाफ़ मुद्दे उठाने के साथ-साथ अपनी घरेलू समस्याओं से ध्यान भटका रहा है।
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UN मानवाधिकार परिषद में जवाब देने के अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए, भारतीय राजनयिक क्षितिज त्यागी ने कहा कि पाकिस्तान को क्षेत्रीय दावों या सीमा पार आतंकवाद का समर्थन करने के बजाय अपनी आर्थिक और विकास संबंधी चुनौतियों पर ध्यान देना चाहिए।
"पाकिस्तान दूसरों की ज़मीन पर कब्ज़ा करने या आतंकवाद फैलाने के बजाय विकास पर ध्यान देकर अपने लोगों की बेहतर सेवा कर सकता है, क्योंकि न तो ये हरकतें और न ही परिषद में उसके ड्रामे उन कर्ज़ों को चुकाने में मदद करेंगे जिन पर उसकी अर्थव्यवस्था टिकी है।"
त्यागी ने पाकिस्तान के कब्ज़े वाले कश्मीर में मानवाधिकारों और मानवीय चिंताओं का भी ज़िक्र किया, जिन्हें भारत ने गंभीर बताया है। उन्होंने नागरिकों की मौत, गिरफ़्तारियों और ज़रूरी चीज़ों की आपूर्ति पर लगी पाबंदियों की रिपोर्टों का हवाला दिया।
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"पिछले शुक्रवार को इस परिषद को बताया गया था कि जून के बाद से पाकिस्तान के कब्ज़े वाले इलाके में कई नागरिक मारे गए हैं, इस्लामाबाद और रावलपिंडी में छात्रों को गिरफ़्तार किया गया है, और भोजन व दवाइयाँ रोकी गई हैं। जब ये बातें बताई गईं, तो पाकिस्तान का जवाब 'पॉइंट ऑफ़ ऑर्डर' था। अगर इस कमरे में कोई प्रतिनिधिमंडल इस परिषद की जाँच के हर मकसद को पूरा करता है, तो वह पाकिस्तान है।"
हाफ़िज़ सईद भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव का एक बड़ा मुद्दा बना हुआ है
शरीफ़ से पूछे गए सवालों ने हाफ़िज़ सईद के मुद्दे को फिर से चर्चा में ला दिया है, ऐसे समय में जब भारत पाकिस्तान स्थित आतंकी नेटवर्क पर चिंताएँ जता रहा है। पहलगाम हमले की NIA की जाँच में सप्लीमेंट्री चार्जशीट में हाफ़िज़ सईद का खास तौर पर नाम लिया गया है। एजेंसी का आरोप है कि यह हमला एक बड़ी साज़िश का हिस्सा था, जिसमें पाकिस्तान में मौजूद LeT/TRF के सदस्य शामिल थे।
इस माहौल में, जब शरीफ़ से पूछा गया कि पाकिस्तान सईद पर कब मुक़दमा चलाएगा, तो उनकी चुप्पी ने मुख्य सवाल को अनुत्तरित छोड़ दिया: भारत ने जिसे बार-बार एक मुख्य आतंकी संदिग्ध बताया है, उसके ख़िलाफ़ इस्लामाबाद क्या कार्रवाई करने का इरादा रखता है?
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