'रील नहीं बनता तो पकड़ा जाता क्या':जमुई-समस्तीपुर घटना पर बेतुकी बातें क्यों कर रहे मंत्री, बेटियों को दरिंदों से बचाने के 3 उपाय
जमुई के बाद अब समस्तीपुर… सड़क पर लड़की को खींचा, दबोचा, छेड़खानी की गई। कैमरे में कैद इन तस्वीरों ने पूरे देश को झकझोर दिया। इन घटनाओं पर भी सत्ता में बैठे मंत्री-नेता बेतुकी बातें कर रहे। वह ऐसा क्यों कर रहे, क्या लॉ एंड ऑर्डर कंट्रोल में नहीं है, ऐसी घिनौनी घटनाएं कैसे रुकेंगी, जानेंगे; बूझे की नाही में...। पहले पूरा मामला जानिए… 19 सितंबर की शाम जमुई में अपने दोस्त के साथ घूमने निकली नाबालिग लड़की को युवकों ने घेर लिया। उसके साथ छेड़खानी की। रेप करने की कोशिश की। इसका वीडियो वायरल हुआ तो पुलिस ने FIR कर 5 लोगों को गिरफ्तार किया। 23 सितंबर की शाम समस्तीपुर में ऐसी ही हुई एक और घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ। इसमें पुलिस ने 4 आरोपियों को गिरफ्तार किया। सवाल-1ः नाबालिग के साथ छेड़खानी पर किसने विवादित बयान दिए? जवाबः सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने के बाद बिहार के सत्ताधारी नेताओं ने कई विवादित बयान दिए। इसे सिलसिलेवार तरीके से पढ़िए… सवाल-2ः सत्ता में बैठे लोग ऐसी बातें क्यों कर रहे? जवाबः मौटे तौर पर इसके 2 बड़े कारण हैं। 1. जेन-Z सवाल पूछ रहे थे, सरकार की इमेज बचाना जरूरी पॉलिटिकल एनालिस्ट केके लाल कहते हैं, ‘इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। देशभर के लोगों ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया दी। सरकार के पास इसका कोई जवाब नहीं था।’ केके लाल कहते हैं, ‘सोशल मीडिया पर घिरते देख सत्ताधारी दलों के नेताओं और मंत्रियों ने इसे छोटी घटना बताने का प्रयास किया। ताकि सरकार की इमेज बचाई जा सके, लेकिन यह कारगर नहीं रही।’ 2. जंगलराज का नैरेटिव कमजोर हो रहा है बीच के कुछ महीनों को छोड़ दे तो बिहार में नवंबर 2005 से NDA की सरकार है। इसके बावजूद सरकार जैसे ही क्राइम के मामले पर घिरती है, लोगों को जंगलराज की याद दिलाने लगती है। एक चुनावी रणनीतिकार के मुताबिक, ‘BJP-JDU अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए कथित जंगलराज का सहारा लेती है। लेकिन इस बार जंगलराज वाला नैरेटिव कमजोर पड़ गया। लोगों ने सोशल मीडिया पर सरकार को सीधे निशाने पर लिया। CM सम्राट चौधरी का एक बयान भी वायरल हो गया। ऐसे में सरकार में शामिल पार्टियों को कुछ समझ नहीं आया कि ऐसी परिस्थिति का काउंटर कैसे किया जाए। इसी में अनाप-शनाप बयान देने लगे। चूंकि इस बार मामला सिर्फ पटना तक ही सीमित नहीं था, दिल्ली तक पहुंच गया था।’ सवाल-3ः ऐसी घिनौनी घटनाओं को कैसे रोका जा सकता है? जवाबः इसे 3 तरीके से रोका जा सकता है। 1. नीतीश के स्पीडी ट्रायल के मॉडल पर लौटना होगा मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी को जल्दी से जल्दी फास्ट ट्रैक कोर्ट के कॉन्सेप्ट पर लौटना होगा। यह बिहार में लॉ एंड ऑर्डर को दुरुस्त करने का एक अजमाया हुआ फॉर्मूला है। 2005 में नीतीश कुमार ने इसी मॉडल के जरिए राज्य से कथित जंगलराज को खत्म किया था। इसे विस्तार से समझिए… कुछ महीने पहले दिए अपने इंटरव्यू में बिहार के पूर्व DGP अभ्यनांद ने कहा था, ‘अगर स्पीडी ट्रायल का फायदा पहले क्राइम कंट्रोल में मिला है तो उसे आज भी गति दी जा सकती है।’ एक तिहाई भी नहीं बचे फास्ट ट्रैक कोर्ट PIB की 30 अप्रैल 2026 की रिपोर्ट के मुताबिक, बिहार में सिर्फ 54 फास्ट ट्रैक कोर्ट काम कर रहे हैं। इनमें से 48 विशेष रूप से पॉक्सो एक्ट से जुड़े मामलों सुनवाई करती हैं। यह आंकड़ा 2006 की तुलना में एक तिहाई से भी कम है। हालांकि, हाल में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने 100 नए फास्ट ट्रैक कोर्ट खोलने की घोषणा की है। ताकि पहले से पेंडिंग गंभीर आपराधिक मामलों में पीड़ितों को न्याय मिलने में और तेजी आए। 2. UP-तेलंगाना और केरलम का मॉडल अपनाएं बिहार पुलिस फिलहाल देश के अलग-अलग राज्यों में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पुलिसिंग में बदलाव किए गए हैं। तेलंगाना की सी-टीम (SHE Teams), UP की मिशन शक्ति और केरलम की पिंक पेट्रोल सबसे कारगर मॉडल है। बिहार पुलिस चाहे तो तेलंगाना से प्रिवेंशन, UP से इंटेरोगेशन और केरलम से विजिबल पुलिसिंग के तरीके को अपना सकती है। बिहार पुलिस को 7 सुझाव… 1. हर जिले में ‘विमेन एंड चाइल्ड सेफ्टी टीम’ 2. स्कूल-कॉलेज के आसपास हॉटस्पॉट पुलिसिंग हर थाने को अपने क्षेत्र के ऐसे 10–20 स्थान चिह्नित करने चाहिए जहां... इन जगहों पर सादे कपड़े में सिपाही रहें। महिला पुलिस समय-समय पर पेट्रोलिंग करें। 3. हर थाने में महिला हेल्प डेस्क को सिर्फ ‘डेस्क’ न रहने दें महिला हेल्प डेस्क को 3 शक्तियां मिलनी चाहिए: पीड़िता को यह पता हो कि उसकी शिकायत अभी किस अधिकारी के पास है और अगली कार्रवाई कब होगी। 4. साइबर और मिसिंग चाइल्ड को एक साथ जोड़ें नाबालिग के गायब होने के मामलों में शुरुआती जांच में ही देखा जाए। इसके लिए हर जिले के साइबर थाने को स्थानीय थानों के साथ रैपिड रिस्पांस प्रोटोकॉल दिया जाए। 5. बार-बार अपराध करने वालों का अलग रजिस्टर छेड़खानी, स्टाकिंग, महिलाओं को धमकाने और नाबालिगों को टारगेट करने वाले मामलों में कानून के अनुरूप बार-बार अपराध करने वालों की निगरानी की व्यवस्था हो। ताकि एक व्यक्ति के खिलाफ अलग-अलग थानों में शिकायतें हैं तो वे अलग-अलग घटनाएं बनकर न रह जाएं। 6. स्कूलों में ‘सेफ रिपोर्टिंग’ सिस्टम हर स्कूल/कॉलेज में एक प्रशिक्षित महिला नोडल अधिकारी हो। ताकि बच्ची सीधे बता सके कि मुझे इस व्यक्ति से खतरा है। हर शिकायत को FIR में बदलना जरूरी नहीं, लेकिन हर क्रेडिबल रिस्क का एसेसमेंट और उचित रेफरल जरूरी होना चाहिए। 7. हर गंभीर घटना के बाद ‘पुलिस फेलियर रिपोर्ट’ किसी नाबालिग के साथ गंभीर अपराध होने के बाद सिर्फ आरोपी की गिरफ्तारी की समीक्षा न हो। एक अलग सवाल पूछा जाए- क्या इसे घटना से पहले रोका जा सकता था? जांच हो... 3. समाज और परिवार को आगे आना होगा मगध महिला कॉलेज की असिस्टेंट प्रोफेसर निधि सिंह और पटना हाईकोर्ट की एडवोकेट स्मृति तिवारी कहती हैं- इस तरह की घटना एक जेंडर वेस वायलेंस है। इसका संबंध सेक्सुअल वायलेंस से है। जब इंसान अंदर से अग्रेसिव होता है और दूसरों की इच्छाओं का सम्मान नहीं करता है, तभी ये एक हिंसात्मक व्यवहार के तौर पर सामने आता है। इसके पीछे की कई वजह हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यौन अपराध केवल क्षणिक आवेश या शारीरिक भूख का परिणाम नहीं होते, बल्कि इसके पीछे एक गहरी विकृत मानसिकता और सामाजिक-मनोवैज्ञानिक कारण होते हैं। 1. ओटीटी और पोर्नोग्राफी डिजिटल क्रांति ने एडल्ट कंटेंट तक पहुंच को बेहद आसान बना दिया है। इसका प्रभाव युवाओं के कोमल मन पर घातक हो रहा है। पोर्नोग्राफी अक्सर सहमति और सम्मान को दरकिनार कर देती है। इससे युवाओं में यह गलत धारणा बनती है कि हिंसा या जबरदस्ती भी यौन व्यवहार का हिस्सा है। ओटीटी प्लेटफॉर्म्स और वेब सीरीज में कई बार महिलाओं को केवल ग्लैमर और शारीरिक आकर्षण के केंद्र के रूप में दिखाया जाता है। जब महिलाएं इंसान के बजाय वस्तु के रूप में देखी जाने लगती हैं तो उनके प्रति संवेदनशीलता खत्म हो जाती है। हिंसक यौन दृश्यों को मर्दानगी से जोड़कर पेश करना युवाओं को यह सिखा रहा है कि शक्ति का प्रदर्शन ही यौन सुख है। 2. युवाओं में बढ़ता नशा का प्रभाव
पहली बार AI एजेंट ने सरकारी पोर्टल हैक किया:जानकारी चुराई, ऑस्ट्रेलियाई हेल्थ पोर्टल में घुसा ओपनएआई एजेंट
दुनिया में पहली बार किसी एआई एजेंट के सरकारी वेबसाइट में सेंध लगाने का मामला सामने आया है। यह घटना ऑस्ट्रेलिया में हुई, जहां ओपनएआई के एजेंट ने हेल्थकेयर सर्विस पोर्टल में सेंध लगा कर फाइलों तक पहुंच बना जानकारी हासिल की इनमें हेल्थ खर्च और दवा सब्सिडी से जुड़ा डेटा था। ओपनएआई ने इस घटना की सूचना 54 दिन बाद सरकार को दी। प्रधानमंत्री अल्बनीज ने न्यूयॉर्क में ओपनएआई प्रमुख सैम ऑल्टमैन से फोन पर बात कर देरी पर नाराजगी जताई। ऑस्ट्रेलिया अब जांच करेगा कि कंपनी पर आपराधिक मामला बनता है या नहीं और ऑस्ट्रेलियाई सुरक्षा एजेंसियां इस घुसपैठ को पहले क्यों नहीं पकड़ सकीं। ओपनएआई ने भी माना कि उसके मॉडलों ने ऐसे कदम उठाए, जिनका इरादा कंपनी का नहीं था। क्लॉड ने खोजा नया एंजाइम सिस्टम, जीन शोध में खुलेंगे रास्ते एंथ्रोपिक के एआई मॉडल क्लॉड ने डीएनए डेटा खंगालकर एआरटी नाम का एंजाइम सिस्टम खोजा है। वैज्ञानिक पहले इसकी पहचान नहीं कर पाए थे। क्लॉड की इस रिसर्च से जीन शोध में नए रास्ते खुलेंगे। डीएनए एडिट कर बीमारी पैदा करने वाली चीजें हटाई व कोशिका में मनचाही खासियतें जोड़ी जा सकेंगी। एआरटी जीन एडिटिंग में इस्तेमाल होने वाली क्रिस्पर तकनीक के पैटर्न जैसा है। 950 एआई एजेंट्स ने 2 लाख से ज्यादा एंजाइम खंगालकर यह सिस्टम 21 घंटे में खोजा। इसकी अहमियत यह है कि एआई भविष्य में रिसर्च की रफ्तार काफी बढ़ाएगा। यूएन में एआई दिग्गज बोले- अब वैश्विक नियंत्रण जरूरी एआई के बढ़ते खतरों पर यूएनएससी में टेक दिग्गजों ने अपनी चिंताएं रखीं। सभी बोले कि अब वैश्विक नियंत्रण जरूरी है। ओपनएआई: सीईओ सैम बोले, एआई पर नियंत्रण खोने का खतरा है। देश मिलकर सुरक्षा मानक तय करें, ताकि तकनीक ज्यादा शक्तिशाली होने पर भी नियंत्रण में रहे। एंथ्रोपिक: सीईओ अमोडेई ने चेताया कि गलत तरीके से संभाला गया एआई पूरी मानवता के लिए खतरा बन सकता है। उन्होंने जैविक हथियार बनाने में एआई के इस्तेमाल को रोकने के साझा नियम मांगे। हगिंग फेस: सीईओ क्लेमेंट डेलांग ने एआई की ताकत किसी एक कंपनी या देश तक सीमित न रहने देने पर जोर दिया। ------------------------------- ये खबर भी पढ़ें… एआई से पूछ रहे अमेरिकी- क्या खाएं: चटपटे स्नैक्स की मांग बढ़ी अमेरिका में हल्की भूख लगने पर क्या खाएं, इसका जवाब अब लोग एआई से भी मांग रहे हैं। ग्राहक किसी खास उत्पाद को खोजने के बजाय ज्यादा प्रोटीन या फाइबर वाले स्नैक्स के विकल्प पूछ रहे हैं। खाद्य कंपनी कोनाग्रा ब्रांड्स के मुताबिक, यह बदलाव ज्यादा प्रोटीन, चटपटे स्वाद और खास स्वास्थ्य जरूरतों के हिसाब से बने उत्पादों की मांग बढ़ाने में मदद कर रहा है। पूरी खबर पढ़ें…
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