अंतर्राष्ट्रीय जगत में आर्थिक और तकनीकी दृष्टिकोण से संपन्न अमेरिका अपनी 'डीप स्टेट खलनीति' के बल पर दुनिया का दादा बन चुका है। चूंकि जी-7 के देश उसके मजबूत हाथ हैं, इसलिए ब्रिक्स देशों की औकात उससे खुलेआम उलझने की आजतक नहीं बन पाई है। आखिर पहले भारत के पास-पड़ोस में, फिर ईरान में और अब बेनेज़ुएला के दास्तान जो चुगली कर रही हैं, उसके वैश्विक मायने तो यही हैं। अब अगला नम्बर शायद कम्बोडिया का आएगा, जिसे ट्रंफ ने ताजा धमकी दी है।
देखा जाए तो मेक अमेरिका ग्रेट अगेन के स्वप्नद्रष्टा डॉनल्ड ट्रंफ उनकी मुद्रा को चुनौती दिलवाने वाले, यदा कदा उनको आंखें दिखाने वाले रूस-चीन के मजबूत समर्थकों के एक एक कर रीढ़ तोड़ने और इसी झांसे में जांबाज भारत को धमकाकर अपने खेमे में मिलाने के लिए सधी चालें चलना शुरू कर चुके हैं। डीप स्टेट से जुड़े लोगों की मानें तो आगे अमेरिका अभी बहुत कुछ करने वाला है। इस बात का संकेत कभी न्यूयॉर्क के महापौर ममदानी और भारतीय-अमेरिकी आशा जडेजा के इशारों से चलता है। ममदानी जहां खुलेआम स्वजातीय भारतीय देशद्रोहियों के पक्ष में खत लिख रहे हैं, वहीं आशा जडेजा ने तो खुलेआम भारत को रूसी सम्बन्धों पर नसीहत दी है।
मतलब साफ है कि दुनिया भर में ब्रिक्स और रिक (रूस-भारत-चीन) देशों का हौव्वा खड़ा करके रूसी राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन, चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो कभी अलग अलग और कभी संयुक्त मंच पर अमेरिका विरोधी शेखी बघारते आये हैं, उनके ग्लोबल साउथ के सपनों पर बम्बार्डिंग शुरू हो चुकी है। यदि डीप स्टेट के समक्ष ट्रंफ ने घुटने टेके हैं तो अब उन्हें रणनीतिक बुलंदी भी मिल रही है। रूस को यूक्रेन में, भारत को पाकिस्तान-बंगलादेश से और चीन को दक्षिण चीन सागर में उलझाए रखने की जो खतरनाक अमेरिकी साजिश है, उसकी काट अभी किसी के पास नहीं है।
अभी तक एशिया, दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका में अमेरिका को कमजोर करने की जो चालें चीन व भारत की तरफ से अलग अलग चली जा रही थीं, इनकी हवा निकालने के लिए ही अमेरिका ने अपना आक्रामक तेवर दिखा दिया है, जिसे रोकना अब किसी के बूते की बात नहीं। सच कहूं तो अमेरिका ने 19वीं शताब्दी से ही अपना विरोधी रहे कई देशों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता परिवर्तन करवाए हैं, जिनमें मुख्य रूप से लैटिन अमेरिका, एशिया और मध्य-पूर्व के देश शामिल हैं।
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार बताते हैं कि वाकई ये हस्तक्षेप अक्सर डीप स्टेट के इशारे पर सीआईए के माध्यम से गुप्त अभियानों, सैन्य आक्रमणों या समर्थन के जरिए हुए। इस बात को स्पष्ट करने वाले कुछ प्रमुख ऐतिहासिक उदाहरण निम्नलिखित हैं, जो अमेरिका के विरोधी देशों को अपने हद में रहने की खुली नसीहत देते हैं। चाहे अमेरिका का पुराना प्रतियोगी सोवियत संघ हो या फिर उसके अवशेष पर खड़ा रूस और उसका नया वैश्विक पार्टनर चीन, अमेरिका के नापाक इरादों में कभी मजबूत बाधक नहीं बन पाए।
मसलन, कारण चाहे जो भी हो, लेकिन इनकी अंतर्राष्ट्रीय विवशता जगजाहिर हो चुकी है। यह स्थिति जहां एकध्रुवीय विश्व की अमेरिका परिकल्पना और उसकी दादागिरी को परिपुष्ट करती है। वहीं, बहुध्रुवीय विश्व के पैरोकारों रूस, चीन और भारत आदि की नीतिगत बेचारगी की बखिया उधेड़ देती है। आइए अमेरिकी षड्यंत्र की साल दर साल मिली सफलता पर एक नजर डालते हैं। पहला, 1953 में ईरान में मोहम्मद मोसद्देघ की सरकार को अमेरिका के इशारे उखाड़ फेंका गया, और शाह को सत्ता में लाया।
दूसरा, 1954 में ग्वाटेमाला में राष्ट्रपति जैकोबो आरबेंज को हटाया गया और कार्लोस कास्टिलो आर्मास को सत्ता दी गई। तीसरा, 1963 में दक्षिण वियतनाम में राष्ट्रपति न्गो दिन्ह दीम की हत्या में सहायता दी। चतुर्थ, 1973 में चिली में सल्वाडोर एलेन्डे को उखाड़ा, और ऑगस्टो पिनोशे को सत्ता सौंपी। पांचवां, 1983 में ग्रेनाडा में सैन्य आक्रमण से सरकार बदली। छठा, 1989 में पनामा में मैनुअल नोरिएगा को हटाया। सातवां, 2003 में इराक में सद्दाम हुसैन शासन को समाप्त कर उन्हें फांसी पर लटकवाया।
आठवां, 2011में लीबिया में मुअम्मर गद्दाफी के पतन में सहयोग दिया। नवाँ, 2026 में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को बंदी बनाया और कम्बोडिया के राष्ट्रपति को धमकाया। दरअसल, ये सूची प्रमुख मामलों तक सीमित है; जबकि कुल 80 से अधिक ज्ञात अमेरिकी हस्तक्षेप हुए हैं।
हैरत की बात है कि अमेरिका के विरोधी देशों ने उसके सत्ता परिवर्तनों पर अक्सर खामोशी साधी या सीमित विरोध किया, क्योंकि सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक शक्तियों का असंतुलन उन्हें प्रत्यक्ष टकराव से रोकता था। सोवियत संघ जैसे प्रतिद्वंद्वी भी कई मामलों में अपनी सीमाओं के कारण सक्रिय हस्तक्षेप से परहेज करते रहे। वह सिर्फ भारत के मामले में ही कामयाब हो पाया, जहां अमेरिका को पीछे हटना पड़ा। इसके प्रमुख कारण इस प्रकार हैं-
पहला, सैन्य श्रेष्ठता: अमेरिका की परमाणु क्षमता और विशाल सेना ने विरोधियों को जोखिम लेने से रोका, जैसे चिली (1973) में सोवियत संघ ने केवल निंदा की। दूसरा, आर्थिक निर्भरता: कई देश अमेरिकी सहायता या व्यापार पर निर्भर थे, जिससे खुला विरोध अव्यवहारिक था। तीसरा, क्षेत्रीय प्रभाव: लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों में अमेरिका का प्रभुत्व (मुनरो सिद्धांत) विरोध को अप्रभावी बनाता था। इसलिए सामरिक प्रतिक्रियाएं नगण्य रहीं। चतुर्थ, प्रतिसाद: विरोधी देशों ने खुद गुप्त सहायता दी, जैसे क्यूबा ने अंगोला में हस्तक्षेप किया। पांचवां, कूटनीति: संयुक्त राष्ट्र में प्रस्ताव लाए गए लेकिन वीटो के कारण विफल रहे। छठा, आंतरिक प्राथमिकताएं: चीन-रूस जैसे देशों की अपनी घरेलू चुनौतियां सक्रिय विरोध को सीमित करती रहीं।
हैरत की बात तो यह है कि अब रूस और चीन की तरह ही गुटनिरपेक्ष देश भारत को भी अमेरिकी नसीहत मिल रही है, जो गम्भीर बात है। गत दिनों जब वेनेजुएला पर अमेरिका के हमले ने दुनिया का ध्यान खींचा है तो इस घटनाक्रम पर अलग-अलग तरह के रिएक्शन दुनियाभर से सामने आ रहे हैं। इसी बीच भारतीय-अमेरिकी वेंचर कैपिटलिस्ट आशा जडेजा मोटवानी ने वेनेजुएला के घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया देते हुए भारत पर तंज कसा है।
आशा ने कहा है कि वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो ने रूस से बहुत सारे हथियार खरीद रखे थे। हालांकि जब अमेरिका ने हमला किया तो ये हथियार काम नहीं आए। अमेरिकी सैनिक मादुरो तक पहुंचे और उनको बंधक बनाकर अमेरिका ले आए। ऐसे में भारत को भी इससे सतर्क हो जाना चाहिए क्योंकि भारत के पास भी ज्यादातर रूस के ही हथियार हैं।
आशा मोटवानी ने एक्स पर किए गए अपने पोस्ट में लिखा, 'वेनेजुएला के रूसी मिलिट्री इक्विपमेंट अमेरिकी मिलिट्री के सामने कुछ सेकंड में टूट गए। उम्मीद है भारत देख रहा होगा। हमारे लिए यह जानना समझदारी होगी कि हमारी रोटी का कौन सा हिस्सा मक्खन लगा हुआ है, कौन हमारे ताकतवर दोस्त हैं और कौन नहीं।' अपनी पोस्ट में आशा ने भारतीय अमेरिकियों और भारतीय रूसियों की संख्या के अंतर को बढ़ा-चढ़ाकर बताते हुए एक गलत आंकड़ा दिया- 'भारतीय अमेरिकी: 5,000,000। भारतीय रूसी: 5।'
दरअसल, भारतीय मूल की वेंचर कैपिटलिस्ट आशा जडेजा हालिया समय में अमेरिका में चर्चा में आती रही हैं। हाल ही में उन्होंने दावा किया था कि उनकी वजह से डोनाल्ड ट्रंप ने H1-B पर अपना रुख बदला था। सिलिकॉन वैली की वेंचर कैपिटलिस्ट आशा डानाल्ड ट्रंप को सबसे ज्यादा दान देने वाले लोगों में शुमार हैं। आशा जडेजा मोटवानी ने 200 से ज्यादा टेक स्टार्टअप्स में निवेश किया है। उनके प्रमुख निवेशों में गूगल, पिंटरेस्ट, यूलू, क्रेडलवाइज, एडहैक टेक्नोलॉजीज, क्लिमैक्टिक और नेशनल एसोसिएशन ऑफ पेडियाट्रिक नर्स प्रैक्टीशनर्स शामिल हैं। आशा के पति राजीव मोटवानी स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में कंप्यूटर विज्ञान के प्रोफेसर रहे हैं। 2001 में उन्हें गोडेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक
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अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर पूरी दुनिया को चौंकाने वाला बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि क्यूबा आर्थिक रूप से टूटने के कगार पर है, ग्रीनलैंड अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए जरूरी है और अगर ईरान में सरकार ने जनता पर दमन तेज किया तो अमेरिका कड़ा जवाब देगा। यही नहीं वेनेजुएला की राजधानी पर अमेरिकी हमले को लेकर उन्होंने खुले तौर पर कहा कि हम ही प्रभारी हैं और यह अभियान शांति के लिए था। कोलंबिया को भी ट्रंप ने चेतावनी दी है और भारत को भी रूसी तेल खरीदने पर शुल्क बढ़ाने की धमकी दी है। देखा जाये तो ट्रंप के इन बयानों और कार्रवाइयों ने अमेरिका की आक्रामक विदेश नीति को फिर उजागर कर दिया है। इस बीच, संयुक्त राष्ट्र में भी वेनेजुएला पर अमेरिकी कार्रवाई की वैधता पर बहस तेज हो गई है और दुनिया एक बार फिर दो ध्रुवों में बंटती दिख रही है।
अमेरिका यह दावा कर रहा है कि उसने अपराधी को पकड़ा है। लेकिन सवाल यह है कि अपराध तय करने का अधिकार किसने दिया। क्या दुनिया में केवल एक ही देश न्यायाधीश है। क्या लोकतंत्र की परिभाषा अब बंदूक की नली से तय होगी। अगर यही नियम है, तो कल किसी और देश की बारी भी आ सकती है। यह पूरा घटनाक्रम बताता है कि दुनिया एक खतरनाक मोड़ पर खड़ी है। जहां ताकतवर देश खुलेआम कमजोर देशों की सरकारें गिराने लगे हैं। आज मादुरो जेल में है। कल कोई और होगा। सवाल यह नहीं कि मादुरो सही था या गलत। सवाल यह है कि क्या दुनिया अब बंदूक के कानून से चलेगी। अगर इसका जवाब हां है, तो यह केवल वेनेजुएला की हार नहीं, बल्कि पूरी वैश्विक व्यवस्था की हार होगी।
यह भी साफ दिख रहा है कि डोनाल्ड ट्रंप की राजनीति अब धमकी की भाषा बोल रही है। वह हर मंच से खुद को शांति दूत बताने की कोशिश करते हैं लेकिन उनके कदम लगातार युद्ध और हस्तक्षेप की ओर बढ़ते दिखते हैं। क्यूबा, कोलंबिया और ग्रीनलैंड को लेकर उनकी ताजा धमकियां उस सोच का हिस्सा हैं जिसमें अमेरिका खुद को पूरी दुनिया का निर्णायक मानता है।
क्यूबा पर ट्रंप का बयान यह दिखाता है कि अमेरिका अब भी शीत युद्ध की मानसिकता से बाहर नहीं आया है। क्यूबा को कमजोर बताकर वह यह संकेत देना चाहते हैं कि वेनेजुएला से उसका आर्थिक सहारा टूट चुका है और अब दबाव डालने का सही समय है। अमेरिका के लिए क्यूबा सिर्फ एक द्वीप नहीं बल्कि वैचारिक चुनौती रहा है। अगर अमेरिका क्यूबा पर सीधे हमले की कोशिश करता है तो यह लैटिन अमेरिका में भारी अस्थिरता ला सकता है। इससे अमेरिका विरोधी भावनाएं और तेज होंगी और रूस तथा चीन को दखल का नया मौका मिलेगा।
वहीं, ट्रंप का कोलंबिया को धमकी देना बताता है कि अमेरिका अब अपने पुराने सहयोगियों को भी नहीं बख्श रहा। वेनेजुएला प्रकरण के बाद लैटिन अमेरिका में हालात पहले ही तनावपूर्ण हैं। कई देश अमेरिकी दबाव से थक चुके हैं। वेनेजुएला पर हमले को क्षेत्र के कई देशों ने संप्रभुता पर हमला माना है। अमेरिका पहले भी चिली, निकारागुआ और पनामा जैसे देशों में दखल देता रहा है। कभी तख्तापलट के जरिए तो कभी आर्थिक प्रतिबंधों से। आज भी वही नीति नए शब्दों में लौट आई है।
दूसरी ओर, ग्रीनलैंड को लेकर ट्रंप का बयान दरअसल आर्कटिक क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा को दिखाता है। ग्रीनलैंड अमेरिका के लिए सामरिक दृष्टि से अहम है। यहां से रूस और चीन की गतिविधियों पर नजर रखी जा सकती है। लेकिन किसी क्षेत्र को जरूरत बताकर हथियाने की सोच उपनिवेशवादी मानसिकता का उदाहरण है। अगर अमेरिका ग्रीनलैंड पर दबाव बढ़ाता है तो यह यूरोप और नाटो के भीतर भी दरार पैदा कर सकता है।
वहीं ईरान को लेकर ट्रंप की चेतावनी यह दिखाती है कि अमेरिका खुद को विश्व का पुलिसमैन मानता है। ईरान के आंतरिक मामलों में इस तरह की धमकी अंतरराष्ट्रीय कानून की अवहेलना है। यह संदेश दिया जा रहा है कि जो भी सरकार अमेरिका की लाइन से हटेगी उसे बल प्रयोग से सुधारा जाएगा। इससे पश्चिम एशिया में पहले से जारी तनाव और भड़क सकता है।
उधर, भारत के साथ अमेरिका के रणनीतिक संबंधों के बावजूद ट्रंप की धमकियां बताती हैं कि उनकी दोस्ती भी शर्तों पर टिकी है। भारत को रूसी तेल खरीदने पर चेतावनी देकर वह यह साबित करना चाहते हैं कि अमेरिकी हित सर्वोपरि हैं। यह दबाव नीति भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को चुनौती देती है और बताती है कि अमेरिका साझेदारी को बराबरी का नहीं बल्कि नियंत्रण का जरिया मानता है।
हम आपको यह भी बता दें कि वेनेजुएला पर अमेरिकी हमले को दुनिया ने अलग-अलग नजर से देखा है। वेनेजुएला का कहना है कि यह सीधी आक्रामकता है जबकि अमेरिका इसे शांति अभियान बता रहा है। वहीं संयुक्त राष्ट्र में इस कार्रवाई की वैधता पर सवाल उठे हैं। कई देशों ने इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन कहा है। इस हमले ने दुनिया को दो हिस्सों में बांट दिया है। एक तरफ अमेरिका और उसके समर्थक हैं तो दूसरी तरफ वह देश हैं जो संप्रभुता और बहुपक्षीय व्यवस्था की बात कर रहे हैं।
इसके अलावा, वेनेजुएला के बाद लैटिन अमेरिका में अमेरिका विरोधी भावना और मजबूत हुई है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या अमेरिका आज भी मोनरो सिद्धांत के नाम पर पूरे महाद्वीप को अपना हिस्सा मानता है। ट्रंप ने खुद कहा कि यह हमारा गोलार्ध है। यह बयान साफ करता है कि अमेरिका अब भी क्षेत्रीय वर्चस्व की पुरानी सोच से बाहर नहीं निकला है।
यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि जो नेता रोज शांति की बात करता है और नोबेल शांति पुरस्कार पर अपना दावा करता है वही युद्ध क्यों छेड़ता जा रहा है? इसका जवाब ट्रंप की घरेलू राजनीति में छिपा है। दरअसल आक्रामक राष्ट्रवाद उनके समर्थकों को जोश देता है। हर नया टकराव उन्हें मजबूत नेता के रूप में पेश करता है। शांति उनके लिए लक्ष्य नहीं बल्कि नारा है।
बहरहाल, डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति आज धमकी, दबाव और बल प्रयोग का मिश्रण बन चुकी है। क्यूबा, कोलंबिया, ग्रीनलैंड, ईरान, भारत और वेनेजुएला सभी इस नीति के अलग-अलग शिकार हैं। यह रवैया दुनिया को सुरक्षित नहीं बल्कि और अस्थिर बना रहा है। अगर यही सिलसिला चला तो अमेरिका खुद को अलग थलग पाएगा और वैश्विक व्यवस्था और कमजोर होगी। शांति की बात करने वाले हाथों में जब मिसाइल हो तो दुनिया को सतर्क हो जाना चाहिए।
-नीरज कुमार दुबे
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