Wildlife SOS के 12 केंद्रों की होगी जांच, CZA ने छह राज्यों को दिया निरीक्षण का निर्देश
(अलिंद चौहान) नयी दिल्ली, 24 सितंबर केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (सीजेडए) ने छह राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश के मुख्य वन्यजीव वार्डन (सीडब्ल्यूएलडब्ल्यू) से कहा है कि वे दिल्ली के प्रमुख एनजीओ ‘वाइल्डलाइफ एसओएस’ द्वारा चलाए जा रहे केंद्रों का निरीक्षण करें जिन पर ‘वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972’ का उल्लंघन करने का आरोप है। ‘पीटीआई-भाषा’ को मिले सीजेडए के पत्रों के अनुसार, ‘वाइल्डलाइफ एसओएस’ के केंद्रों पर मुख्य रूप से सीजेडए की आवश्यक मंजूरी या कानूनी मान्यता के बिना चिड़ियाघर की तरह काम करने, बचाए गए जंगली जानवरों को लंबे समय तक देखभाल के लिए जरूरी मंजूरी के बिना रखने और तय समय-सीमा के भीतर जानवरों की सूची जमा न करने के आरोप हैं। सीजेडए के ये पत्र 12 सितंबर की तारीख के हैं और हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, कर्नाटक और जम्मू-कश्मीर के सीडब्ल्यूएलडब्ल्यू को भेजे गए थे।
इन राज्यों में मौजूद कुल 12 केंद्र जांच के दायरे में हैं। केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय के तहत आने वाली वैधानिक संस्था सीजेडए ने सीडब्ल्यूएलडब्ल्यू से कहा है कि वे पत्र जारी होने के सात दिन के भीतर रिपोर्ट सौंपें। सीजेडए को सवालों के जवाब का इंतजार है।
वन्यजीव कार्यकर्ता अजय दुबे ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘इन नियमों का उल्लंघन जानवरों के मूल स्थान, माइक्रोचिपिंग और कानूनी संरक्षण को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है। इससे जानवरों की मौत, जन्म और उन्हें हासिल करने के मामलों में भी पूरी तरह से अंधेरा बना रहता है।’’ ये चिट्ठियां तब भेजी गई हैं जब मध्य प्रदेश में तेंदुए के शिकार के एक कथित मामले में ‘वाइल्डलाइफ एसओएस’ का नाम आने की खबरें सामने आईं। इस महीने की शुरुआत में, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने इस मामले में एनजीओ के सह-संस्थापक और मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) कार्तिक सत्यनारायण को मिली अंतरिम सुरक्षा वापस ले ली थी, लेकिन मंगलवार को उच्चतम न्यायालय ने वह सुरक्षा बहाल कर दी।
वर्ष 1995 में स्थापित इस संगठन ने पिछले कुछ वर्षों में भारत के लुप्तप्राय जानवरों और उनके प्राकृतिक आवास की रक्षा के लिए कई पहल शुरू की हैं, जिनमें शिकार-रोधी गतिविधियां, बचाव और पुनर्वास केंद्र आदि शामिल हैं। हालांकि, हाल की घटनाओं, जिनमें सीजेडए के पत्र भी शामिल हैं, ने इस एनजीओ के कामकाज पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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अदालत ने कहा कि ‘आंकड़े बताते हैं कि हिंसा का शिकार हुई महिलाओं का चुप रहना कोई अपवाद नहीं बल्कि एक आम बात है, और घटना की रिपोर्ट न कर पाना एक बहुत ही आम प्रतिक्रिया है, न कि कोई ऐसी असामान्य बात जिस पर शक किया जाए।’
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