गैंगस्टर Manpal Dhilla को कंबोडियाई साथी से शादी के लिए मिली 12 घंटे की कस्टडी पैरोल
जेल में बंद गैंगस्टर मैनपाल ढिल्ला को अपनी कंबोडियाई साथी से शादी करने के लिए 12 घंटे की कस्टडी पैरोल पर रिहा किया गया है। वह पिछले साल प्रत्यर्पित किए जाने से पहले फर्जी पहचान का इस्तेमाल कर भारत से फरार होने के बाद कंबोडिया में उससे मिला था। 50 वर्षीय ढिल्ला को बृहस्पतिवार को जिले के एक फार्महाउस में लाया गया, जहां शादी की रस्में हुईं।
अधिकारियों ने यह जानकारी दी। पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि शादी की रस्में पूरी कराने के लिए ढिल्ला को कड़ी सुरक्षा के बीच लाया गया। वह सुबह आठ बजे से 12 घंटे की कस्टडी पैरोल पर बाहर है।
अधिकारी ने बताया कि ढिल्ला अपनी कंबोडियाई साथी मेटा चान से शादी करेगा। गैंगस्टर की मुलाकात मेटा चान से उस समय हुई थी, जब वह 2018 में पैरोल से फरार होकर कंबोडिया चला गया था। इसके बाद दोनों साथ रहने लगे और उनके बच्चे हुए।
उसके तीन बच्चे भी उसके साथ यहां आए हैं। सितंबर 2025 में हरियाणा पुलिस को वांछित कुख्यात अपराधी ढिल्ला को केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा राज्य पुलिस तथा केंद्रीय गृह और विदेश मंत्रालयों के सहयोग से चलाए गए अभियान के तहत कंबोडिया से प्रत्यर्पित किए जाने के बाद गिरफ्तार किया गया था। पिछले साल गिरफ्तारी के समय झज्जर जिले के बादली गांव के निवासी ढिल्ला उर्फ मैनपाल बादली के खिलाफ हत्या समेत 22 मामले दर्ज थे।
इससे पहले वह हिसार की जेल में आजीवन कारावास की सजा काट रहा था। उसे 2007 और 2010 में दर्ज तीन मामलों में दोषी ठहराया गया था। आजीवन कारावास की सजा काटने के दौरान उसे हिसार केंद्रीय जेल से छह सप्ताह की पैरोल पर रिहा किया गया था, लेकिन वह फरार हो गया।
अधिकारियों ने पिछले साल उसकी गिरफ्तारी के समय बताया था कि उसे 17 जुलाई, 2018 को पैरोल पर रिहा किया गया था और वह 29 अगस्त, 2018 को सोनू कुमार के नाम से फर्जी पहचान का इस्तेमाल कर देश से फरार हो गया था। राज्य पुलिस के अनुरोध पर सीबीआई ने छह नवंबर, 2024 को इंटरपोल के माध्यम से ढिल्ला के खिलाफ रेड नोटिस जारी कराया और एनसीबी-बैंकॉक से संपर्क किया। एनसीबी-बैंकॉक से पता चला कि वह थाईलैंड से कंबोडिया गया था।
अधिकारियों ने पिछले साल बताया था कि आरोपी कोलकाता से बैंकॉक होते हुए कंबोडिया गया था। इसके बाद सीबीआई ने तुरंत एनसीबी-नोम पेन्ह से संपर्क किया और अधिकारियों को सूचित किया कि वांछित अपराधी फर्जी यात्रा दस्तावेजों पर यात्रा कर रहा था। ढिल्ला ने कंबोडिया के सिएम रीप इलाके में अपना ठिकाना बना लिया था।
वह एक नाइट क्लब चला रहा था, उसने स्थानीय महिला से शादी कर ली थी और उनके बच्चे भी थे। 26 मार्च, 2025 को इंटरपोल के माध्यम से एनसीबी-नोम पेन्ह को ढिल्ला की अस्थायी गिरफ्तारी का अनुरोध भेजा गया था। एनसीबी-नोम पेन्ह ने 24 जुलाई, 2025 को ढिल्ला की गिरफ्तारी की जानकारी दी और राजनयिक माध्यमों से उसके प्रत्यर्पण का अनुरोध किया।
बाद में कंबोडियाई अधिकारियों ने सूचित किया कि उन्होंने ढिल्ला को भारतीय अधिकारियों को सौंपने का फैसला किया है। इसके बाद हरियाणा विशेष कार्य बल (एसटीएफ) की एक टीम उसे वापस लाने के लिए कंबोडिया भेजी गई और दिल्ली पहुंचने के बाद उसे औपचारिक रूप से गिरफ्तार कर लिया गया।
Vanakkam Poorvottar: Meghalaya में BJP ने कर दिया बहुत बड़ा खेल, एक झटके में बदल डाला विधानसभा का पूरा गणित
मेघालय की राजनीति में बड़ा उलटफेर हुआ है। यूनाइटेड डेमोक्रेटिक पार्टी के आठ विधायक दिल्ली आकर भारतीय जनता पार्टी में शामिल हो गए। इसके साथ ही विधानसभा में भाजपा की संख्या बढ़कर दस हो गई और वह सत्तारुढ़ नेशनल पीपुल्स पार्टी के बाद सदन की दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। क्षेत्रीय दल के इतने बड़े समूह का भाजपा के साथ जाना केवल विधायकों के पाला बदलने की घटना नहीं है, बल्कि यह मेघालय की राजनीति में बदलते समीकरणों और 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा के बढ़ते प्रभाव का बड़ा संकेत माना जा रहा है।
साथ ही यह घटनाक्रम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि मेघालय की राजनीति लंबे समय से राष्ट्रीय दलों की सीधी प्रतिस्पर्धा से ज्यादा स्थानीय पहचान, जनजातीय हितों और क्षेत्रीय दलों के प्रभाव के इर्द-गिर्द घूमती रही है। खासकर खासी-जैंतिया पहाड़ियों में क्षेत्रीय राजनीति का अपना मजबूत आधार रहा है। यूडीपी इसी राजनीति की प्रमुख धुरी रही है। अब उसी दल के दो-तिहाई विधायक भाजपा में चले गए हैं। मेघालय के स्थानीय मीडिया ने इसे यूडीपी के लिए बड़ा झटका और राज्य के राजनीतिक नक्शे में निर्णायक बदलाव के रूप में देखा है।
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मेघालय का सामाजिक समीकरण भी इस बदलाव को सामान्य राजनीतिक जोड़-घटाव से कहीं बड़ा बनाता है। राज्य में खासी, जैंतिया और गारो समुदायों की राजनीतिक आकांक्षाएं अलग-अलग क्षेत्रीय संदर्भों में प्रभाव डालती हैं। यहां जनजातीय पहचान, जमीन, बाहरी लोगों की आमद, स्थानीय रोजगार, भाषा और सांस्कृतिक अधिकार चुनावी राजनीति के बेहद संवेदनशील मुद्दे हैं। इसलिए इन आठ विधायकों का भाजपा के साथ जाना केवल विधानसभा की सीटों का हस्तांतरण नहीं है; यह भाजपा के लिए उन इलाकों और सामाजिक आधारों तक सीधी पहुंच का अवसर है, जहां अब तक क्षेत्रीय दलों की पकड़ मजबूत रही है। मेघालय की क्षेत्रीय राजनीति पर किए गए हालिया अध्ययन भी बताते हैं कि खासी-जैंतिया क्षेत्रों में क्षेत्रीय अस्मिता और स्थानीय मुद्दे राजनीतिक समर्थन तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि भाजपा में जाने वाले विधायकों ने जिन मुद्दों को आधार बनाया, वे विशुद्ध रूप से राष्ट्रीय मुद्दे नहीं बल्कि मेघालय की स्थानीय राजनीति की धड़कन हैं। इनमें खासी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करना, कोयला खनन से जुड़ी पाबंदियों में बदलाव, मेघालय निवासी सुरक्षा एवं सुरक्षा कानून में संशोधन तथा थेम इव मावलांग स्थित हरिजन कॉलोनी के पुनर्वास जैसे मुद्दे शामिल हैं। कुछ रिपोर्टों में खासी और गारो भाषाओं की मान्यता तथा स्थानीय लोगों के हितों की सुरक्षा से जुड़े अन्य मुद्दों का भी उल्लेख है।
यही भाजपा की इस रणनीति का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश है। पार्टी मेघालय में केवल राष्ट्रीय नेतृत्व और विकास के नाम पर विस्तार नहीं कर रही, बल्कि क्षेत्रीय अस्मिता से जुड़े मुद्दों को भी अपने राजनीतिक एजेंडे में समाहित करने की कोशिश कर रही है। भाजपा नेताओं ने भी कहा है कि पूर्वोत्तर में केंद्र सरकार के विकास कार्यों और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व से प्रभावित होकर विधायकों ने यह निर्णय लिया।
लेकिन असली परीक्षा अब शुरू होगी। मेघालय में भाजपा पहले से ही एनपीपी के नेतृत्व वाली सरकार की सहयोगी है। एनपीपी के पास 33 विधायक हैं और मुख्यमंत्री कॉनराड संगमा ने ताजा घटनाक्रम के बाद सरकार को स्थिर बताया है। मगर भाजपा के दस विधायक हो जाने से गठबंधन के भीतर शक्ति-संतुलन निश्चित रूप से बदला है। अभी भाजपा ने मंत्रिमंडल में अतिरिक्त हिस्सेदारी की मांग नहीं की है, लेकिन दस विधायकों वाली पार्टी का राजनीतिक वजन दो विधायकों वाली भाजपा से बिल्कुल अलग होगा।
इसका सबसे बड़ा असर 2028 के विधानसभा चुनाव की तैयारी पर दिखाई देगा। भाजपा अब केवल सहयोगी की भूमिका में संतुष्ट रहने की बजाय अपने संगठन और जनाधार के विस्तार का प्रयास कर सकती है। स्थानीय मीडिया में पहले से ही यह चर्चा रही है कि भाजपा 2028 में अपने दम पर सरकार बनाने की महत्वाकांक्षा रखती है। साथ ही, खासी-जैंतिया क्षेत्र में उभर चुकी वॉयस ऑफ द पीपल पार्टी जैसी क्षेत्रीय ताकतें भी भाजपा के सामने अलग चुनौती पेश करती हैं।
दूसरी ओर, इस घटनाक्रम से यूडीपी के सामने अस्तित्व का सवाल खड़ा हो गया है। चार विधायकों तक सिमट चुकी पार्टी के लिए अब अपने पुराने क्षेत्रीय आधार को बचाना सबसे बड़ी चुनौती होगी। दूसरी ओर भाजपा ने एक ही झटके में विधानसभा में संख्या, प्रभावशाली स्थानीय चेहरे और क्षेत्रीय मुद्दों पर राजनीतिक प्रवेश, तीनों हासिल कर लिए हैं।
साथ ही पूर्वोत्तर के व्यापक परिदृश्य में भी इसका महत्व है। असम और त्रिपुरा के बाद मेघालय भाजपा के लिए ऐसा राज्य है जहां विस्तार का रास्ता आसान नहीं रहा है। अब आठ क्षेत्रीय विधायकों का एक साथ भाजपा में जाना बताता है कि पार्टी अब पूर्वोत्तर में केवल चुनावी गठजोड़ पर निर्भर नहीं रहना चाहती, बल्कि स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व को अपने साथ जोड़कर संगठनात्मक विस्तार की रणनीति पर आगे बढ़ रही है।
बहरहाल, दिल्ली में हुआ यह दल-बदल असल में शिलांग की सत्ता के गलियारों से कहीं बड़ा संदेश देता है। मेघालय में क्षेत्रीय राजनीति की जमीन पर अब भाजपा ने अपनी सबसे मजबूत राजनीतिक चौकी बना ली है। आगे की लड़ाई इस बात की होगी कि भाजपा इस विधानसभा संख्या को स्थायी जनाधार में बदल पाती है या नहीं और क्या क्षेत्रीय अस्मिता की राजनीति उसके विस्तार के रास्ते में दीवार बनती है या वही उसके लिए नया रास्ता खोलती है।
-नीरज कुमार दुबे
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