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Explainer:  मोबाइल स्क्रीन पर छिड़ी अखिलेश-योगी की जंग! AI वीडियो पर चुनाव आयोग का 3 घंटे वाला सख्त फरमान

उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव अभी दूर हैं लेकिन इससे पहले ही प्रदेश में सियासी लड़ाई अपने पूरे चरम पर पहुंच गई है. इसका जीता जागता उदाहरण है राजनीतिक पार्टियों का बीते कुछ समय में एक-दूसरे के खिलाफ प्रचार के लिए जारी AI वीडियोज. चुनाव से पहले राज्य में समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी दोनों एक-दूसरे के खिलाफ AI-जनित वीडियो जारी कर रही हैं. बता दें इन वीडियोज से अब चुनाव आयोग की चिंता भी बढ़ गई है. इन वीडियो पर आपत्ति जताते हुए रानीतिक दल अपनी-अपनी शिकायतें भी दर्ज करवा रहे हैं. 

UP Election 2027 से पहले यह AI वीडियो वॉर शुरू कैसे हुई?

इस विवाद की शुरुआत एक ऐसे वीडियो से हुई जिसमें अखिलेश यादव को नकारात्मक अंदाज में पेश किया गया था. भाजपा समर्थक बताए जा रहे कुछ सोशल मीडिया अकाउंट्स से शेयर हुए इस वीडियो में अखिलेश यादव को विवादित नाम से संबोधित करते हुए निशाना बनाया गया. इसके जवाब में अखिलेश यादव ने भी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बनावटी AI वीडियो चलाकर भाजपा पर पलटवार किया.

UP Election 2027 में सपा-बीजेपी ने एक-दूसरे पर क्या आरोप लगाए हैं?

अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि भाजपा AI तकनीक के जरिए उनकी और उनकी पत्नी डिंपल यादव की छवि खराब करने के लिए फर्जी वीडियो और नकली सोशल मीडिया अकाउंट तैयार करवा रही है. वहीं, भाजपा प्रवक्ता की तरफ से पलटवार करते हुए कहा गया कि बार-बार झूठ फैलाने की कोशिश सफल नहीं होगी और सपा भी AI का इस्तेमाल कर भाजपा नेताओं की छवि बिगाड़ने की कोशिश में जुटी है.

AI वीडियो से दुष्प्रचार क्या सिर्फ यूपी तक सीमित है?

इससे पहले दिल्ली विधानसभा चुनाव के दौरान भी राजनीतिक दलों की तरफ से डीपफेक वीडियो और भ्रामक कंटेंट के इस्तेमाल को लेकर साइबर विशेषज्ञों ने चिंता जताई थी. अब आगामी पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों से पहले यह चलन यूपी में और तेज होता दिख रहा है जहां सपा और बीजेपी दोनों प्रमुख दल इस हथियार का जमकर इस्तेमाल कर रहे हैं.

AI-जनित कंटेंट को लेकर चुनाव आयोग के मौजूदा नियम क्या हैं?

चुनाव आयोग ने सभी राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को निर्देश दिया है कि वे अपने प्रचार में इस्तेमाल होने वाली किसी भी सिंथेटिक या AI-जनित सामग्री को स्पष्ट रूप से लेबल करें. आयोग का मानना है कि डीपफेक जैसी तकनीक का बढ़ता इस्तेमाल मतदाताओं को भ्रमित कर उनके फैसलों को प्रभावित कर सकता है.

फर्जी वीडियो सामने आने पर आयोग ने क्या सख्ती दिखाई है?

जानकारी के मुताबिक हाल ही में निर्वाचन आयोग ने राजनीतिक दलों को साफ हिदायत दी है कि प्रचार के दौरान सोशल मीडिया पर कोई भी फर्जी या डीपफेक वीडियो सामने आने पर उसे जानकारी मिलते ही अधिकतम 3 घंटे के भीतर हटाना अनिवार्य होगा. आयोग ने इसे लेकर सभी दलों को सोशल मीडिया का जिम्मेदारी से इस्तेमाल करने की सख्त हिदायत भी दी है.

अगर कोई पार्टी या नेता इस नियम का उल्लंघन करता है, तो क्या हो सकता है?

अगर तय समय सीमा में आपत्तिजनक या भ्रामक AI कंटेंट नहीं हटाया जाता तो संबंधित दल और उससे जुड़े जिम्मेदार व्यक्तियों के खिलाफ आदर्श आचार संहिता उल्लंघन के साथ-साथ सूचना प्रौद्योगिकी कानून और मौजूदा साइबर कानूनों के तहत भी कार्रवाई हो सकती है. आयोग ने साफ किया है कि लगातार निर्देशों की अनदेखी करने वाले दलों और उम्मीदवारों पर सख्ती और बढ़ाई जा सकती है.

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क्या फर्जी वीडियो बनाने वालों की पहचान और सजा को लेकर कोई ठोस कदम उठाया गया है?

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार AI वीडियो में नेताओं के चेहरे, आवाज और यहां तक कि उनके संवाद तक बदल दिए जा रहे हैं लेकिन इसके बावजूद ऐसा करने वालों पर ठोस कार्रवाई नहीं हो रही है. बता दें इस बारे में कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर सीधा हमला बोलते हुए दावा किया था कि उनके नेतृत्व में आयोग एक निष्पक्ष पर्यवेक्षक की बजाय पक्षकार जैसी भूमिका निभा रहा है. कांग्रेस की तरफ से राज्यसभा में सीईसी को पद से हटाने के लिए औपचारिक नोटिस तक दिया जा चुका है जिसमें कथित दुर्व्यवहार के गंभीर आरोप लगाए गए हैं.

क्या इस विवाद का AI वीडियो के मामलों पर भी कोई असर पड़ सकता है?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब खुद चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर ही सवाल उठ रहे हों तो AI वीडियो और डीपफेक जैसे मामलों में सख्त और निष्पक्ष कार्रवाई की उम्मीद और भी चुनौतीपूर्ण हो जाती है. विपक्षी दलों का कहना है कि अगर आयोग खुद ही भरोसे के संकट से जूझ रहा है तो प्रचार में हो रहे इस तकनीकी दुरुपयोग पर लगाम लगाना और मुश्किल हो सकता है.

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ये नियम आपको जानना जरूरी...

कानून के जानकारों के मुताबिक इस बारे में अलग-अलग परिस्थितियों में ये धाराएं लग सकती हैं

IT Act Section 66D (cheating by personation) में अधिकतम 3 साल की जेल और ₹1 लाख तक जुर्माने की सजा है.  

IT Act Section 66C (identity theft) में अधिकतम 3 साल की जेल और ₹1 लाख तक जुर्माने की सजा है.

IT Act Section 67 में अश्लील सामग्री के मामले में पहली बार 3 साल तक जेल और ₹5 लाख तक जुर्माना, दूसरे बार या दोहराने में ये जुर्माना और सजा बढ़ जाती है. 

IT Act Section 67A: (sexually explicit material) के मामले में पहली बार 5 साल तक जेल और ₹10 लाख तक जुर्माना. 

यहां स्पष्ट कर दें कि राजनीतिक AI/deepfake वीडियो के सामान्य मामले में अपराध की प्रकृति जैसे impersonation, fraud, obscene content, privacy violation या misinformation के आधार पर अलग-अलग कानून लागू होने और सजा का प्रावधान है.

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4 दिन पहले ही इस्लामाबाद की किलेबंदी, एक के ऊपर एक कंटेनर लगाए, 22 हजार सुरक्षाकर्मी मुस्तैद; 27 को PTI का मार्च

पाकिस्तान की जेल में बंद पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के समर्थकों द्वारा प्रस्तावित मार्च से पहले पाकिस्तानी हुकूमत ने राजधानी इस्लामाबाद में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी है. बता दें, इमरान की पार्टी पीटीआई ने 27 सितंबर को इस्लामाबाद में मार्च का ऐलान किया है.  प्रशासन ने मार्च को देखते हुए इस्लामाबाद में प्रवेश करने वाले प्रमुख रास्तों पर कंटेनर लगा दिए हैं, जिससे आवाजाही नियंत्रित हो चुकी है. अधिकारियों के अनुसार, शहर में हजारों सुरक्षाकर्मियों की तैनाती कर दी गई है.

प्रशासन ने इस्लामाबाद के कई प्रमुख प्रवेश मार्गों, चौराहों, हाइवे को कंटेनर से बंद कर दिया है. कई जगहों पर तो एक के ऊपर एक कंटेनर रख दिए गए हैं. खास बात है कि सरकार की इस किलेबंदी ने आम लोगों को परेशान कर दिया है. इस्लामाबाद के आस-पास कई स्थानों पर ट्रैफिक जाम की स्थिति बनी हुई है. लोगों के पास वैकल्पिक रास्तों का इस्तेमाल करने के अलावा कोई चारा नहीं है. वैक्लिपक रास्ते लंबे और समय खपाने वाले होते हैं.

22 हजार सुरक्षाकर्मियों की तैनाती

रिपोर्ट के मुताबिक, इस्लामाबाद में करीब 22 हजार पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों के जवान तैनात किए गए हैं. इससे पहले एक पाकिस्तानी गृह मंत्रालय के अधिकारी ने राजधानी और उसके आसपास करीब 35 हजार अतिरिक्त पुलिस तथा अर्धसैनिक बलों की तैनाती की जानकारी दी थी. सुरक्षा बलों की तैनाती का उद्देश्य प्रस्तावित प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखना और प्रदर्शनकारियों को संवेदनशील इलाकों तक पहुंचने से रोकना बताया गया है. इस्लामाबाद के उस इलाके में भी सुरक्षा बढ़ाई गई है जहां संसद, प्रधानमंत्री आवास और विदेशी दूतावास स्थित हैं. इस क्षेत्र को हाई-सिक्योरिटी रेड जोन के तौर पर देखा जाता है. यहां जाने वाले रास्तों पर भी कंटेनर लगाए गए हैं.

खैबर पख्तूनख्वा से राजधानी का संपर्क प्रभावित

इमरान खान की पार्टी PTI का प्रभाव खैबर पख्तूनख्वा में मजबूत है और वहां उसकी सरकार है. ऐसे में प्रशासन ने इस प्रांत से इस्लामाबाद आने वाले रास्तों पर भी निगरानी और सुरक्षा बढ़ा दी है. दो प्रमुख हाईवे को बंद किए जाने की जानकारी सामने आई है. इससे खैबर पख्तूनख्वा और राजधानी के बीच सड़क संपर्क प्रभावित हुआ है. अल जजीरा की रिपोर्ट के मुताबिक, इस्लामाबाद-पेशावर मोटरवे, इस्लामाबाद-डेरा इस्माइल खान मोटरवे और ग्रैंड ट्रंक रोड के कुछ हिस्सों को बंद करने के निर्देश दिए गए हैं. राजधानी के आसपास करीब 2,000 शिपिंग कंटेनरों के इस्तेमाल की भी रिपोर्ट सामने आई है.

PTI कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी

मार्च से पहले PTI के कई नेताओं और कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारियां भी हुई हैं. अधिकारियों ने इन कार्रवाइयों को कानून-व्यवस्था बनाए रखने से जोड़कर बताया है. PTI का आरोप है कि सरकार पार्टी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों पर कार्रवाई कर रही है ताकि प्रस्तावित मार्च को रोका जा सके. इमरान खान की तीन बहनों—अलीमा खान, उज़मा खान और नूरीन नियाज़ी—को भी हिरासत में लिए जाने की जानकारी सामने आई है. अधिकारियों की ओर से जारी आदेशों में सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़े कारणों का हवाला दिया गया है. PTI ने इन कार्रवाइयों की आलोचना की है. PTI के सूचना सचिव शेख वकास अकरम ने दावा किया है कि पार्टी के करीब 1,500 कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया है. हालांकि, यह आंकड़ा पार्टी की ओर से दिया गया है.

सरकार और PTI आमने-सामने

इमरान खान की पार्टी का कहना है कि यह प्रदर्शन शांतिपूर्ण होगा और इसका उद्देश्य इमरान खान की रिहाई की मांग को उठाना है. दूसरी ओर, पाकिस्तान सरकार ने साफ किया है कि राजधानी में कानून-व्यवस्था बिगाड़ने की किसी भी कोशिश को रोकने के लिए सुरक्षा बल तैयार हैं. अब नजर 27 सितंबर के प्रस्तावित मार्च पर है और इस बात पर है कि PTI के समर्थक राजधानी तक किस तरह पहुंचते हैं तथा प्रशासन उन्हें रोकने के लिए क्या कदम उठाता है.

 

 

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