Allahabad High Court का फैसला, पीड़ित की बिना अर्जी भी अदालतें बढ़ा सकती हैं मुआवजा
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा है कि मोटर दुर्घटना के मामले में अपील सुनने वाली अदालत मुआवज़े की रकम बढ़ा सकती है, भले ही पीड़ितों या उन पर निर्भर लोगों ने अलग से कोई अपील या क्रॉस-ऑब्जेक्शन न किया हो; बशर्ते बीमा कंपनी ने तय की गई मुआवज़े की रकम को चुनौती दी हो। कोर्ट ने कहा कि मोटर वाहन अधिनियम एक कल्याणकारी कानून है और अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि पीड़ितों और उन पर निर्भर लोगों को कानून के मुताबिक उचित और सही मुआवज़ा मिले। लखनऊ बेंच के जस्टिस प्रशांत कुमार ने फ़ैज़ाबाद मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल के फ़ैसले के ख़िलाफ़ नेशनल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड की अपील को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की। बीमा कंपनी की अपील को खारिज करते हुए, हाई कोर्ट ने सभाजीत तडमाली के परिवार के लिए मुआवज़े की रक़म 7.20 लाख रुपये से बढ़ाकर 11,43,565 रुपये कर दी और सालाना ब्याज दर को 7 प्रतिशत पर ही बनाए रखा। यह मामला 16 नवंबर 2017 को हुए एक हादसे से जुड़ा है, जब ताडमाली अंबेडकर नगर में पैदल चल रहे थे। एक SUV ने उन्हें टक्कर मार दी, जिससे वे गंभीर रूप से घायल हो गए और बाद में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। उनके परिवार ने 49.70 लाख रुपये के मुआवज़े की मांग की थी। बीमा कंपनी ने तर्क दिया कि दुर्घटना से पहले ही गाड़ी चोरी हो गई थी और उस समय वह गाड़ी के मालिक या ड्राइवर के पास नहीं थी। कंपनी ने ड्राइवर की पहचान पर भी सवाल उठाए और चार्जशीट तथा ड्राइविंग लाइसेंस के रिकॉर्ड में उसके नाम में अंतर की ओर इशारा किया।
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चोरी के दावे को खारिज करते हुए, कोर्ट ने कहा कि गाड़ी के मालिक ने न तो कोई FIR दर्ज कराई थी और न ही ऐसा कोई ठोस सबूत पेश किया जिससे यह साबित हो सके कि दुर्घटना से पहले SUV चोरी हुई थी। कोर्ट ने यह भी माना कि ड्राइवर के नाम में अंतर होने की वजह से अभियोजन पक्ष और दावा करने वालों के मामले पर अविश्वास नहीं किया जा सकता। उम्र के सवाल पर, कोर्ट ने कहा कि आधार में दर्ज उम्र को ताडमाली की जन्मतिथि का पक्का सबूत नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने गौर किया कि परिवार रजिस्टर में उनके जन्म का साल 1967 दर्ज था, हालांकि सही तारीख और महीना उपलब्ध नहीं था। इसलिए, कोर्ट ने दुर्घटना के समय उनकी उम्र 50 साल मानी और 13 का मल्टीप्लायर लागू किया।
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हाई कोर्ट ने मृतक की मासिक आय को भी ट्रिब्यूनल द्वारा तय 5,000 रुपये से बढ़ाकर 7,400.46 रुपये कर दिया, जो अकुशल श्रमिक के लिए न्यूनतम मजदूरी के बराबर है। इसके अलावा, कोर्ट ने मृतक की पत्नी और दो बच्चों में से प्रत्येक को 48,400 रुपये का 'कंसोर्टियम' (पारिवारिक नुकसान के लिए मुआवजा) भी दिया। कोर्ट ने कहा कि दुर्घटना पीड़ितों और उन पर निर्भर लोगों को उचित मुआवजा दिलाने में तकनीकी बातें बाधा नहीं बननी चाहिए।
Milan Pradhan के खिलाफ 12 अक्टूबर तक न हो कार्रवाई, Nandigram उपचुनाव पर High Court सख्त
कलकत्ता हाई कोर्ट ने गुरुवार को फिर कहा कि गिरफ्तार कांग्रेस उम्मीदवार मिलान प्रधान को नंदीग्राम उपचुनाव ठीक से लड़ने की इजाज़त दी जानी चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि उन्हें 2007 के उस मामले में गिरफ्तार नहीं माना जाएगा जिसमें निचली अदालत ने उन्हें 7 अक्टूबर तक न्यायिक हिरासत में भेजा था। नंदीग्राम में उपचुनाव 6 अक्टूबर को होना है और प्रचार 4 अक्टूबर को खत्म होगा। कोर्ट प्रधान के वकील की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। वकील ने कहा कि उनके मुवक्किल को 2007 के एक और आपराधिक मामले में गिरफ्तार कर हिरासत में भेजा गया है, जबकि 22 सितंबर को हाई कोर्ट के सामने 11 मामलों का ज़िक्र किया गया था। जस्टिस सौगत भट्टाचार्य ने कहा कि राज्य ने ऐसा कोई दस्तावेज़ पेश नहीं किया जिससे यह साबित हो सके कि प्रधान को प्रोडक्शन वारंट दिया गया था। जज ने संबंधित पुलिस अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे पूर्वी मेदिनीपुर ज़िले के खेजुरी पुलिस स्टेशन में दर्ज 2007 के केस नंबर 45 के सिलसिले में 12 अक्टूबर तक प्रधान के ख़िलाफ़ कोई कार्रवाई न करें, और कहा कि उस आपराधिक मामले में उन्हें गिरफ़्तार नहीं माना जाएगा।
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अदालत ने कहा यह हैरानी की बात है कि उक्त आपराधिक मामला 2007 का है और जांच अधिकारी ने 19 सितंबर को याचिकाकर्ता को 'गिरफ़्तार दिखाया' (shown arrest) मानने का अनुरोध किया।" जस्टिस भट्टाचार्य ने अतिरिक्त एडवोकेट जनरल राजदीप मजूमदार से मौखिक रूप से यह भी कहा कि वे प्रधान को चुनाव लड़ने दें। 22 सितंबर को जस्टिस भट्टाचार्य ने पश्चिम बंगाल सरकार के वकील से मौखिक रूप से कहा था कि कांग्रेस उम्मीदवार को नंदीग्राम उपचुनाव ठीक से लड़ने दिया जाए, बशर्ते उन्हें उन पांच आपराधिक मामलों में ज़मानत मिल जाए जिनमें उन्हें गिरफ़्तार किया गया था। गुरुवार को कोर्ट ने गौर किया कि प्रधान को 22 सितंबर के बाद खेजुरी पुलिस स्टेशन वाले मामले में गिरफ़्तार किया गया था। सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने सवाल किया कि 22 सितंबर के आदेश के बाद प्रधान को एक और मामले में क्यों आरोपी बनाया गया, जबकि राज्य ने बताया था कि उनके खिलाफ़ पाँच आपराधिक मामले लंबित हैं। 2007 में पूर्वी मेदिनीपुर ज़िले के नंदीग्राम और खेजुरी पुलिस स्टेशनों में प्रधान के खिलाफ़ कई आपराधिक मामले दर्ज किए गए थे।
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प्रधान ने अपने खिलाफ़ दर्ज छह अन्य मामलों में सख़्त कार्रवाई से सुरक्षा की मांग करते हुए एक अर्ज़ी दायर की थी। इस पर सुनवाई करते हुए, 22 सितंबर को हाई कोर्ट को राज्य ने बताया था कि उनमें से पाँच मामले पिछली सरकार ने वापस ले लिए थे और छठे मामले में उनकी ज़रूरत नहीं थी। कोर्ट को यह भी बताया गया था कि प्रधान को पाँच अन्य आपराधिक मामलों के सिलसिले में गिरफ़्तार करके न्यायिक हिरासत में भेजा गया था।
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