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Crude Oil: ग्रीनलैंड में तनाव और सरप्लस की चिंताओं के बीच तेल की कीमतें स्थिर

Crude Oil: ग्रीनलैंड पर US के कदम और ग्लोबल सरप्लस को लेकर चिंताओं पर नज़र रखने से तेल की कीमतें स्थिर हुईं। ब्रेंट का भाव 64 डॉलर के करीब पहुंचा। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट $59 प्रति बैरल के करीब स्थिर रहा

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अमेरिका ने ग्रीनलैंड में मिलिट्री एयरक्राफ्ट भेजा:पिटुफिक स्पेस बेस पर तैनात होगा; डेनमार्क ने भी सैनिक भेजे

ग्रीनलैंड पर कब्जे को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच विवाद बढ़ता जा रहा है। अमेरिका ने नॉर्थ अमेरिकन एयरोस्पेस डिफेंस कमांड (NORAD) का एक सैन्य विमान ग्रीनलैंड भेजा है। यह विमान जल्द ही पिटुफिक स्पेस बेस पहुंचेगा। NORAD ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर कहा कि यह तैनाती पहले से तय सैन्य गतिविधियों के तहत की जा रही है। कमांड ने साफ किया कि इस पूरी प्रक्रिया की जानकारी डेनमार्क और ग्रीनलैंड को दी गई है। ट्रम्प की ग्रीनलैंड पर कब्जे की धमकी के बीच डेनमार्क ने भी ग्रीनलैंड में अतिरिक्त सैनिक तैनात किए हैं। फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक सोमवार को कई विमान डेनमार्क के सैनिकों और सैन्य उपकरणों को लेकर ग्रीनलैंड पहुंचे। ग्रीनलैंड और डेनमार्क को बताकर अमेरिका ने विमान भेजा NORAD के बयान के मुताबिक, पिटुफिक स्पेस बेस पर पहुंचने वाला यह विमान अमेरिका और कनाडा के ठिकानों से संचालित अन्य विमानों के साथ मिलकर लंबे समय से तय रक्षा गतिविधियों में शामिल होगा। इन गतिविधियों को अमेरिका, कनाडा और डेनमार्क के बीच चली आ रही रक्षा साझेदारी का हिस्सा बताया गया है। NORAD ने यह भी कहा कि इस तैनाती के लिए जरूरी सभी कूटनीतिक मंजूरियां ली गई हैं। अमेरिका का यह कदम डेनमार्क की अगुआई में हुए एक सैन्य अभ्यास ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस के बाद सामने आया है। यह अभ्यास ग्रीनलैंड में हुआ था, जिसमें जर्मनी, स्वीडन, फ्रांस, नॉर्वे, नीदरलैंड और फिनलैंड ने भी सीमित संख्या में अपने सैनिक भेजे थे। ग्रीनलैंड में बड़े पैमाने पर सैनिकों के तैनाती की संभावना डेनमार्क पहले से ग्रीनलैंड में करीब 200 सैनिक तैनात किए हुए है। इसके अलावा 14 सदस्यीय सीरियस डॉग स्लेज पेट्रोल भी वहां मौजूद है, जो आर्कटिक इलाकों में गश्त करते हैं। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने कहा है कि आने वाले दिनों में इन्हें जमीन, हवा और समुद्र के जरिए और मजबूत किया जाएगा। यह संख्या छोटी है, लेकिन यह राजनीतिक संदेश देने के लिए है कि NATO एकजुट है। डेनमार्क की अगुवाई में चल रहा ऑपरेशन आर्कटिक एंड्योरेंस एक सैन्य अभ्यास है। इसका मकसद यह देखना है कि अगर भविष्य में ग्रीनलैंड में बड़ी संख्या में सैनिक तैनात करने पड़े, तो उसकी तैयारी कैसी होगी। डेनमार्क के रक्षा मंत्रालय के मुताबिक इस अभ्यास का फोकस आर्कटिक इलाके में सहयोगी देशों के बीच तालमेल और काम करने की क्षमता बढ़ाने पर है। आगे चलकर इससे भी बड़ा मिशन लाने की योजना है, जिसे ऑपरेशन आर्कटिक सेंट्री कहा जा रहा है। यह एक नाटो मिशन होगा। इसका उद्देश्य ग्रीनलैंड और उसके आसपास के इलाकों में निगरानी बढ़ाना और किसी भी खतरे का सैन्य जवाब देने की ताकत मजबूत करना है। हालांकि यह मिशन तुरंत शुरू नहीं होगा। जर्मनी के रक्षा मंत्री बोरिस पिस्टोरियस के मुताबिक, ऑपरेशन आर्कटिक सेंट्री को शुरू होने में अभी कई महीने लग सकते हैं। यानी फिलहाल ग्रीनलैंड में कोई बड़ा नया सैन्य मिशन शुरू नहीं हुआ है, बल्कि उसकी तैयारी और योजना पर काम चल रहा है। ग्रीनलैंड की अपनी सेना नहीं, अमेरिका और डेनमार्क के सैनिक तैनात ग्रीनलैंड की अपनी कोई सेना नहीं है। उसकी रक्षा और विदेश नीति की जिम्मेदारी डेनमार्क की है। यह डेनमार्क का एक स्वायत्त क्षेत्र है। यहां का अबादी महज 57 हजार है। 2009 के बाद, ग्रीनलैंड सरकार को तटीय सुरक्षा और कुछ विदेशी मामलों में छूट मिली है, लेकिन रक्षा और विदेश नीति के मुख्य मामले अभी भी डेनमार्क के पास हैं। अमेरिकी सैनिक: अमेरिका का पिटुफिक स्पेस बेस (थुले एयर बेस)। ग्रीनलैंड के उत्तर-पश्चिम में स्थित यह बेस अमेरिका चलाता है। यह बेस मिसाइल चेतावनी सिस्टम और स्पेस मॉनिटरिंग के लिए इस्तेमाल होता है। NYT के मुताबिक यहां करीब 150 से 200 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। ये मिसाइल चेतावनी, स्पेस निगरानी और आर्कटिक सुरक्षा के लिए हैं। यह अमेरिका का सबसे उत्तरी सैन्य अड्डा है। डेनिश सैनिक: डेनमार्क की जॉइंट आर्कटिक कमांड ग्रीनलैंड में काम करती है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक यहां कुल करीब 150 से 200 डेनिश सैन्य और सिविलियन कर्मी हैं। जो निगरानी, सर्च एंड रेस्क्यू, और संप्रभुता की रक्षा करते हैं। इसमें प्रसिद्ध सीरियस डॉग स्लेज पेट्रोल (एक छोटी एलीट यूनिट, करीब 12-14 लोग) भी शामिल है, जो कुत्तों की स्लेज से लंबी गश्त करती है। अमेरिका पर जवाबी टैरिफ लगाने की तैयारी में यूरोपीय देश ट्रम्प ने ग्रीनलैंड पर कब्जे का विरोध कर रहे 8 देशों पर 10% टैरिफ लगाने का ऐलान किया है, जो 1 फरवरी से लागू होगा। इसके जवाब में यूरोपीय यूनियन भी अमेरिका पर ट्रेड पाबंदियां लगाने पर गंभीरता से विचार कर रहा है। इसके लिए EU एक खास कानूनी हथियार के इस्तेमाल पर सोच रहा है, जिसे अनौपचारिक तौर पर ‘ट्रेड बाजूका’ कहा जाता है। इसका मकसद उन देशों के खिलाफ कड़ा कदम उठाना है, जो यूरोपीय देशों पर जबरदस्ती आर्थिक दबाव बनाने की कोशिश करते हैं। ग्रीनलैंड को क्या ट्रम्प अमेरिका में मिला सकते हैं, नियम जानिए ट्रम्प ग्रीनलैंड को अमेरिका में मिलाने (खरीदने या कब्जा करने) की बात 2019 से ही कर रहे हैं। उनके दूसरे कार्यकाल में यह मुद्दा फिर से बहुत जोर पकड़ गया है। लेकिन कानूनी रूप से यह इतना आसान नहीं है। ग्रीनलैंड और अमेरिका दोनों ही NATO देश हैं। कानून के मुताबिक एक NATO देश दूसरे NATO देश पर कानूनी रूप से कब्जा नहीं कर सकता। ये पूरी तरह अवैध और NATO संधि के खिलाफ होगा। NATO का Article 5 कहता है कि एक सदस्य पर हमला सभी पर हमला है। अगर कोई बाहरी दुश्मन हमला करे तो सभी सदस्य मिलकर मदद करेंगे। ग्रीनलैंड पहले स्वतंत्र हो, फिर अमेरिका से जुड़े: ग्रीनलैंड अभी डेनमार्क का स्वायत्त क्षेत्र है। 2009 के सेल्फ गवर्नमेंट एक्ट के तहत ग्रीनलैंड के लोग रेफरेंडम (जनमत संग्रह) करके स्वतंत्र हो सकते हैं, लेकिन इसके लिए डेनिश संसद की भी मंजूरी जरूरी है। ग्रीनलैंड क्यों इतना खास… खास भौगोलिक स्थिति: ग्रीनलैंड की भौगोलिक स्थिति बहुत खास है। यह उत्तर अमेरिका और यूरोप के बीच, यानी अटलांटिक महासागर के बीचों-बीच के पास स्थित है। इसी वजह से इसे मिड-अटलांटिक क्षेत्र में एक बेहद अहम ठिकाना माना जाता है। रणनीतिक सैन्य महत्व: ग्रीनलैंड यूरोप और रूस के बीच सैन्य और मिसाइल निगरानी के लिए बेहद अहम है। यहां अमेरिका का थुले एयर बेस पहले से है, जो मिसाइल चेतावनी और रूसी/चीनी गतिविधियों पर नजर रखने के लिए जरूरी है। चीन और रूस पर नजर: आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की गतिविधियां बढ़ रही हैं। ग्रीनलैंड पर प्रभाव होने से अमेरिका इस इलाके में अपनी भू-राजनीतिक पकड़ मजबूत रखना चाहता है। प्राकृतिक संसाधन: ग्रीनलैंड में दुर्लभ खनिज, तेल, गैस और रेयर अर्थ एलिमेंट्स के बड़े भंडार माने जाते हैं, जिनका भविष्य में आर्थिक और तकनीकी महत्व बहुत ज्यादा है। चीन इनका 70-90% उत्पादन नियंत्रित करता है, इसलिए अमेरिका अपनी निर्भरता कम करना चाहता है। नई समुद्री व्यापारिक राहें: ग्लोबल वार्मिंग के कारण आर्कटिक की बर्फ पिघल रही है, जिससे नई शिपिंग रूट्स खुल रही हैं। ग्रीनलैंड का नियंत्रण अमेरिका को इन रूटों पर प्रभुत्व और आर्कटिक क्षेत्र में रूस-चीन की बढ़त रोकने में मदद करेगा। अमेरिकी सुरक्षा नीति: अमेरिका ग्रीनलैंड को अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा की “फ्रंट लाइन” मानता है। वहां प्रभाव बढ़ाकर वह भविष्य के संभावित खतरों को पहले ही रोकना चाहता है।

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  Sports

New Zealand से घरेलू वनडे हार पर अश्विन की दो टूक, टीम इंडिया की प्रतिक्रिया पर उठे सवाल

भारत और न्यूजीलैंड के बीच खेली गई घरेलू वनडे सीरीज़ को लेकर पूर्व भारतीय ऑफ स्पिनर रविचंद्रन अश्विन ने खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने इस हार को हल्के में लेने से इनकार करते हुए टीम इंडिया की मानसिकता और दबाव में प्रतिक्रिया पर सवाल खड़े किए हैं।

बता दें कि भारत को न्यूजीलैंड के खिलाफ घरेलू मैदान पर 2-1 से सीरीज़ गंवानी पड़ी, जो हाल के वर्षों में एक दुर्लभ नतीजा माना जा रहा है। मौजूद जानकारी के अनुसार, अश्विन ने अपने यूट्यूब शो ‘ऐश की बात’ में कहा कि स्कोरलाइन भारत के लिए उतनी राहत देने वाली नहीं है, जितनी दिखती है। उनके मुताबिक, मैदान पर हालात ऐसे थे जैसे न्यूजीलैंड पूरी सीरीज़ पर हावी रहा हो।

अश्विन का मानना है कि आने वाले हफ्ते यह तय करेंगे कि यह हार लोगों की याद में कितने समय तक बनी रहती है। उन्होंने कहा कि आईपीएल और टी20 वर्ल्ड कप जैसे बड़े टूर्नामेंट सामने हैं और अगर वहां प्रदर्शन अच्छा रहा, तो यह सीरीज़ धीरे-धीरे भुला दी जाएगी। लेकिन अगर प्रदर्शन उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा, तो दबाव बढ़ना तय है।

गौरतलब है कि अश्विन ने साफ तौर पर कहा कि समस्या टीम की प्रतिभा या गुणवत्ता की नहीं है। उनके अनुसार, भारतीय टीम अतीत में दबाव में बेहतर प्रतिक्रिया देने के लिए जानी जाती रही है, लेकिन इस सीरीज़ में वह जज़्बा और आक्रामकता नजर नहीं आई। उन्होंने इसे “सॉफ्ट क्रिकेट” करार देते हुए कहा कि भारत ने कई मौकों पर न्यूजीलैंड को दबाव में डालने के मौके गंवाए।

उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह तय करना मुश्किल है कि यह कमी तैयारी की थी या मानसिक रूप से तैयार न होने की, लेकिन बाहर से देखने पर टीम की प्रतिक्रिया फीकी लगी। अश्विन के शब्दों में, भारत ने पहले कई बार मुश्किल हालात से रास्ता निकाला है, मगर इस बार वह आदत दिखाई नहीं दी।

अब जब क्रिकेट कैलेंडर टी20 प्रारूप की ओर बढ़ रहा है और टी20 वर्ल्ड कप 2026 नजदीक है, तो यह सीरीज़ एक चेतावनी की तरह देखी जा रही है। अगर टीम और उसके बड़े खिलाड़ी आने वाले टूर्नामेंट्स में लय पकड़ लेते हैं, तो यह हार पीछे छूट जाएगी। लेकिन अगर ऐसा नहीं हुआ, तो यह आलोचना सिर्फ एक सीरीज़ की नहीं, बल्कि दबाव में टीम की प्रतिक्रिया के पैटर्न पर सवाल बनकर सामने रहेगी, जो लंबे समय तक चर्चा में बनी रह सकती है।
Tue, 20 Jan 2026 22:14:25 +0530

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