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Matri Navami 2026: कब है पितृ पक्ष में मातृ नवमी? जानें तर्पण का महत्व और इस दिन किसका श्राद्ध होगा

Matri Navami 2026: पितृपक्ष को पूर्वजों को याद करने और उनका सम्मान करने का समय माना जाता है. साल 2026 में पितृ पक्ष का प्रारंभ 26 सितंबर से शुरू होगा. इन दिनों में लोग पारंपरिक रूप से अपने पूर्वजों की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण, दान और पिंडदान किया जाता है. पितृ पक्ष के दौरान अलग-अलग विभिन्न तिथियों में नवमी और अमावस्या को विशेष माना जाता है. मातृ नवमी मातृ पूर्वजों से संबंधित तिथि होती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस तिथि का क्या महत्व है. आइए विस्तार से जानते हैं इसके बारे में.

मातृ नवमी 2026 कब है? (Matri Navami 2026 Date)

द्रिक पंचांग के अनुसार, पितृ पक्ष का नौवां दिन मातृ नवमी के नाम से जाना जाता है. यह मातृ पूर्वजों को समर्पित तिथि है. इस वर्ष मातृ नवमी 4 अक्टूबर 2026 को मनाया जाने वाला है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन उन माताओं, बहनों और बेटियों के लिए श्राद्ध किया जाता है, जिनका निधन उनके पतियों के जीवित रहते हुआ है. यह दिन उन मातृ पूर्वजों के लिए भी है, जिनकी मृत्यु की सही तिथि पता न हों.

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पितृ पक्ष में मातृ नवमी का महत्व

ऐसा माना जाता है कि मातृ नवमी पर श्राद्ध और तर्पण करने से दिवंगत माता-पिता को शांति मिलती है और उनके आशीर्वाद से घर में सुख-समृद्धि आती है. इस दिन श्राद्ध करने वालों को महिलाओं को भोजन कराना चाहिए तथा उन्हें उपहार देना चाहिए. इस दिन ब्राह्मण की पत्नी को भोजन कराना विशेष रूप से परंपरा का हिस्सा है.

कैसे किया जाता है मातृ नवमी पर श्राद्ध?

पंचांग के अनुसार, मातृ नवमी का श्राद्ध 4 अक्टूबर को किया जाएगा. इस दिन किसी पवित्र नदी के घाट पर जाना चाहिए. इसके बाद वहां दिवंगत महिलाओं का श्राद्ध करना चाहिए. दाहिने हाथ में कुशा लेकर दिवंगत महिलाओं के नाम का तर्पण किया जाता है. इसके बाद उन्हें पिंडदान अर्पित करना चाहिए. श्राद्ध के खाने का हिस्सा कौवे, गाय और कुत्ते के लिए अलग से निकालकर खाना रखना होता है. इसके बाद पितरों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करनी चाहिए. गरीबों तथा ब्राह्मण को सामर्थ्य अनुसार दान-दक्षिणा देनी चाहिए.

तर्पण की महत्वता क्या है?

हिंदू धर्म में तर्पण का अर्थ पूर्वजों और देवताओं को जल अर्पित करके उन्हें तृप्त या संतुष्ट करना चाहिए. यह शब्द संस्कृत के शब्द तृप से बने तर्पण का मुख्य उद्देश्य दिवंगत आत्माओं के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का होता है. तर्पण करने से पितृ ऋण से मुक्ति मिलती है. पितृ ऋण यानी पूर्वजों का कर्ज उतरता है. नियमित रूप से पितृपक्ष में पितरों को जल देने से पितरों की प्यास बूझती है. तर्पण न करने से पितृ असंतुष्ट हो सकते हैं और परिवार में पितृ दोष और कई प्रकार की बाधाएं आ सकती हैं. इसलिए, पितृ पक्ष में तर्पण करने का खास महत्व है.

मातृ नवमी पर किन बातों का ध्यान रखें?

मातृ नवमी पर सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद पितरों का स्मरण करना चाहिए. श्राद्ध और तर्पण करते समय मन में श्रद्धा और कृतज्ञता का भाव रखना महत्वपूर्ण होता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन किसी का अपमान या अनादर करने से बचना चाहिए, खासतौर पर महिलाओं का असम्मान नहीं करना चाहिए. साथ ही, इस दिन सात्विक भोजन खाना चाहिए और घर में शांतिपूर्ण वातावरण बनाए रखना चाहिए.

मातृ नवमी पर किन चीजों दान करना चाहिए?

मातृ नवमी के दिन आपको जरूरतमंदों को भोजन कराना चाहिए और सामर्थ्य के अनुसार दान करना चाहिए. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस दिन अन्न, वस्त्र, फल और दक्षिणा का दान करना भी शुभ माना जाता है. खासतौर पर महिलाओं को भोजन कराकर उन्हें सम्मानपूर्वक उपहार देना भी पुण्यकारी माना जाता है. ऐसा माना जाता है कि जरूरतमंदों की मदद करने से पूर्वजों का आशीर्वाद प्राप्त होता है.

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(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए प्रदान की गई है. News Nation इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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शोहरतगढ़ से डुमरियागंज तक, सिद्धार्थनगर की 5 सीटों पर किस पार्टी का रहा दबदबा?

यूपी में अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव को लेकर सभी पार्टियों ने अपनी तैयारियां शुरू कर दी है. यूपी की सिद्धार्थनगर विधानसभा सीट अहम सीटों में से एक है. सिद्धार्थनगर विधानसभा में 5 विधानसभा शोहरतगढ़, कपिलवस्तु, बांसी, इटवा, डुमरियागंज सीटें हैं. ऐसे में आज हम अपने कार्यक्रम कुर्सी का काउंडाउन में सिद्धार्थनगर विधानसभा सीट के बारे में जानेंगे. 

शोहरतगढ़ विधानसभा सीट का इतिहास

उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले में स्थित शोहरतगढ़ विधानसभा सीट इस इलाके की एक प्रमुख और चर्चित राजनीतिक पृष्ठभूमि वाली सीट मानी जाती है. शोहरतगढ़ कस्बे और इसके इर्द-गिर्द फैले ग्रामीण क्षेत्रों को मिलाकर इस सीट का गठन किया गया है, जो प्रशासनिक रूप से तहसील मुख्यालय भी है. स्थानीय अर्थव्यवस्था की बात करें तो यहां की बहुसंख्यक आबादी अपनी आजीविका और दैनिक जरूरतों के लिए पूरी तरह से खेती-किसानी पर निर्भर है. इस समूचे अंचल में कल-कारखानों और औद्योगिक विकास का भारी अभाव रहा है, जिसके कारण हर साल यहां से बड़ी संख्या में नौजवान बेहतर रोजगार की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर होते हैं.

शोहरतगढ़ के राजनीतिक इतिहास के पन्नों को पलटें तो यहां किसी एक दल का वर्चस्व लंबे समय तक नहीं रहा है और जनता ने अलग-अलग दौर में विभिन्न विचारधाराओं पर भरोसा जताया है. वर्ष 1977 में जनता पार्टी के बैनर तले शिवलाल मित्तल ने यहां से जीत का परचम लहराया था, जो बाद में 1991 की राम लहर के दौरान भाजपा के टिकट पर भी दोबारा विधायक चुने गए. इसके बीच 1980, 1985 और 1989 के दौर में कांग्रेस पार्टी का दबदबा देखने को मिला, जब कमला साहनी लगातार तीन बार यहां से विधानसभा पहुंचे. 90 के दशक में 1993 और 1996 के चुनावों में भाजपा के रवींद्र प्रताप उर्फ पप्पू चौधरी ने इस सीट पर अपनी मजबूत पकड़ बनाई.

21वीं सदी की शुरुआत के साथ ही यहां की राजनीति में फेरबदल का दौर जारी रहा. साल 2002 में कांग्रेस के दिनेश सिंह और 2007 में कांग्रेस के ही चौधरी रवींद्र प्रताप ने जीत दर्ज कर पार्टी की वापसी कराई. इसके बाद 2012 के चुनाव में प्रदेश भर में चली समाजवादी पार्टी की लहर के दौरान सपा प्रत्याशी लालमुनि सिंह ने बाजी मारी और पहली बार सपा का खाता यहां खोला. दिलचस्प बात यह है कि सोशल इंजीनियरिंग के बल पर सूबे की सत्ता में आने वाली बहुजन समाज पार्टी का उम्मीदवार इस सीट पर कभी जीत का स्वाद नहीं चख सका है.

साल 2017 के विधानसभा चुनाव में शोहरतगढ़ सीट पर एक नया राजनीतिक समीकरण देखने को मिला, जब भारतीय जनता पार्टी ने अपना दल (सोनेलाल) के साथ मिलकर चुनाव लड़ा. इस गठबंधन के तहत अपना दल के प्रत्याशी अमर सिंह चौधरी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए बड़ी जीत दर्ज की. उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी बसपा के मोहम्मद जमील को 22 हजार से अधिक वोटों के भारी अंतर से पराजित किया.  इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी उग्रसेन सिंह तीसरे स्थान पर खिसक गए, जबकि राष्ट्रीय लोक दल के उम्मीदवार के रूप में मैदान में उतरे पूर्व विधायक चौधरी रवींद्र प्रताप उर्फ पप्पू चौधरी को चौथे स्थान से संतोष करना पड़ा. वहीं, 2022 के चुनाव में भी अपना दल के  प्रत्याशी विनय वर्मा ने जीत दर्ज की थी.  

कपिलवस्तु विधानसभा सीट का इतिहास

उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले से सटी कपिलवस्तु (सुरक्षित) विधानसभा सीट का राजनीतिक इतिहास काफी रोचक और उतार-चढ़ाव भरा रहा है. वर्ष 2009 के परिसीमन के बाद यह सीट अपने वर्तमान नाम और नए स्वरूप में सामने आई. आजादी के बाद वर्ष 1951 में हुए देश के पहले आम चुनाव के दौरान इस क्षेत्र को 'बांसी उत्तरी' के नाम से जाना जाता था. इसके बाद 1957 में आयोजित दूसरे चुनाव में इसका नाम बदलकर 'नौगढ़' कर दिया गया. लंबे समय तक नौगढ़ के नाम से पहचाने जाने के बाद 2012 के परिसीमन में इसे 'कपिलवस्तु' नया नाम मिला और साथ ही यह सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित घोषित कर दी गई. इस समूचे क्षेत्र में किसी एक विचारधारा के बजाय हमेशा से स्थानीय चेहरों और दलीय प्रभाव की प्रमुखता देखने को मिली है. आजादी के बाद के शुरुआती दौर में जहां कांग्रेस के मथुरा प्रसाद पांडेय ने चार बार जीत हासिल कर अपनी धाक जमाई, वहीं बाद के वर्षों में भारतीय जनता पार्टी के पूर्व मंत्री धनराज यादव का यहां एक छत्र राज रहा और वे पाँच बार विधायक चुने गए.

आजादी के बाद से परिसीमन तक का सियासी सफर

इस सीट के चुनावी इतिहास के पन्नों को पलटने पर कांग्रेस और जनसंघ के बीच का कड़ा मुकाबला साफ नजर आता है. 1951 के पहले चुनाव और 1957 के दूसरे चुनाव में कांग्रेस के मथुरा प्रसाद पांडेय ने लगातार जीत दर्ज कर अपनी मजबूत पकड़ बनाई थी. हालांकि, 1962 के तीसरे चुनाव में भारतीय जनसंघ के प्रत्याशी जगदीश ने कांग्रेस के इस अभेद्य किले को ढहा दिया. इसके बाद 1967 में जनसंघ के धनराज यादव ने जीत हासिल कर अपने लंबे राजनीतिक सफर की शुरुआत की. 1969 में कांग्रेस के अभिमन्यु ने यह सीट वापस जीती, तो 1974 में जनसंघ के राम रेखा यादव चुनाव जीते. 1977 और 1980 के चुनावों में कांग्रेस के मथुरा प्रसाद पांडेय ने एक बार फिर शानदार वापसी की और भाजपा के धनराज यादव को मात दी.

90 के दशक की शुरुआत में क्षेत्रीय और राष्ट्रीय राजनीति के बदलाव का असर यहां भी दिखा. 1989 में लोकदल के मोहम्मद सईद भ्रमर ने जीत हासिल कर कांग्रेस और जनसंघ के दबदबे को तोड़ा. लेकिन 1991 की राम लहर में भाजपा के धनराज यादव ने पुनः जोरदार वापसी की और इसके बाद 1993 तथा 1996 के चुनावों में भी अपना परचम लहराया. साल 2002 में पहली बार समाजवादी पार्टी का खाता खुला और अनिल सिंह विधायक बने. इसके बाद 2007 के चुनाव में त्रिकोणीय मुकाबले के बीच कांग्रेस के ईश्वर चंद्र शुक्ला ने जीत दर्ज कर पार्टी का परचम फहराया था.

सीट आरक्षित होने के बाद का राजनीतिक परिदृश्य

वर्ष 2012 में जब यह सीट अनुसूचित वर्ग के लिए आरक्षित होकर 'कपिलवस्तु' बनी, तो राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गए. 2012 के चुनाव में समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी विजय कुमार पासवान ने एकतरफा मुकाबले में बड़ी जीत हासिल की और भाजपा के बाहरी प्रत्याशी श्रीराम चौहान को लगभग 26 हजार से अधिक वोटों के अंतर से हरा दिया. हालांकि, 2017 में सत्ता परिवर्तन की लहर के साथ भारतीय जनता पार्टी ने जोरदार वापसी की. भाजपा प्रत्याशी श्याम धनी राही ने सपा के निवर्तमान विधायक विजय कुमार पासवान को रिकॉर्ड 38 हजार से भी ज्यादा मतों के अंतर से पराजित कर कमल खिलाया. वही, 2022 में एक बार फिर यूपी विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी श्याम धनी राही ने जीत हासिल की. भाजपा की नजर 2027  में एक बार इस सीट पर जीत दर्ज करने की होगी, वहीं, सपा 2027   में इस सीट पर जीत दर्ज के साथ ही वापिसी का रास्ता देख रही है.

बांसी विधानसभा का इतिहास

सिद्धार्थनगर जिले के गठन के समय से ही बांसी विधानसभा क्षेत्र का राजनीतिक परिदृश्य पूर्व राजपरिवार के इर्द-गिर्द घूमता रहा है. इस सीट पर भाजपा और जय प्रताप सिंह का बोलबाला रहा है. वर्ष 1989 से लेकर अब तक इस सीट पर राजा जय प्रताप सिंह का वर्चस्व कायम रहा है. इस क्षेत्र की राजनीति की सबसे बड़ी खासियत यह रही है कि यहां हर चुनाव में मुख्य मुकाबला भारतीय जनता पार्टी और समाजवादी पार्टी के बीच ही सिमट कर रह जाता है. जय प्रताप सिंह इस बार लगातार आठवीं बार चुनावी समर में किस्मत आजमा रहे हैं, जबकि इससे पहले वे छह बार यहां का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं. समाजवादी पार्टी केवल एक बार लाल जी यादव के दम पर यहां अपनी साइकिल चलाने में सफल रही थी.
 
बांसी की सियासी जमीन पर बहुजन समाज पार्टी ने बार-बार अपने उम्मीदवार बदले हैं, लेकिन हर बार पार्टी तीसरे स्थान पर ही ठिठक कर रह जाती है. इस सीट की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गोरखपुर के कद्दावर नेता पंडित हरिशंकर तिवारी के पुत्र विनय शंकर तिवारी और लाल चंद निषाद जैसे नेता भी बसपा के सिंबल पर यहां से किस्मत आजमा चुके हैं, पर जीत का स्वाद नहीं चख सके. 
 
जय प्रताप सिंह की राजनीतिक यात्रा की शुरुआत बेहद दिलचस्प रही. उन्होंने अपना पहला चुनाव एक निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में लड़ा था और तत्कालीन विधायक एवं कांग्रेस नेता नर्वदेश्वर शुक्ला को शिकस्त दी थी. इसके बाद 1991 की राम लहर के दौरान उन्होंने निर्दलीय रहते हुए ही भाजपा के परमात्मा प्रसाद पांडेय को बेहद कड़े मुकाबले में महज 379 मतों से हराया था. उनकी इस अपार लोकप्रियता को देखते हुए भारतीय जनता पार्टी ने उन्हें अपने साथ जोड़ लिया.  इसके बाद 1997 के चुनाव में उन्होंने रिकॉर्ड 42.56 प्रतिशत वोट हासिल करके सपा के लालजी यादव को करारी मात दी. वर्ष 2002 के चुनाव में हालांकि उनके वोट प्रतिशत में थोड़ी गिरावट आई, लेकिन इसके बावजूद वे अपनी सीट बचाने में कामयाब रहे.

वर्ष 2007 का विधानसभा चुनाव बांसी के इतिहास में एक बड़े उलटफेर का गवाह बना. इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के लाल जी यादव ने बेहद करीबी मुकाबले में राजा जय प्रताप सिंह को 2511 मतों से हरा दिया था. इस हार में बसपा प्रत्याशी गोपाल जी मिश्रा द्वारा हासिल किए गए वोटों की बड़ी भूमिका रही थी. हालांकि, जय प्रताप सिंह ने 2012 के चुनाव में जोरदार वापसी करते हुए लाल जी यादव को 2894 वोटों से हराकर अपनी खोई हुई सीट वापस हासिल कर ली. इसके बाद 2017 की प्रचंड मोदी लहर में जय प्रताप सिंह ने सपा के लाल जी को रिकॉर्ड 18942 मतों के भारी अंतर से पराजित किया. वहीं, 2022 के  चुनाव  में भी जय प्रताप सिंह जीत हासिल की थी. 

इटवा विधानसभा सीट का इतिहास

इटवा विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले में स्थित है. यह डोमरियागंज लोकसभा क्षेत्र की पांच विधानसभा सीटों में से एक है. यह सामान्य श्रेणी की सीट है.

सीट का गठन

इटवा विधानसभा सीट 1974 में अस्तित्व में आई।
2008 के परिसीमन के बाद इसका नंबर 305 हो गया।

प्रमुख राजनीतिक विशेषता

इस सीट पर माता प्रसाद पांडेय का लंबा वर्चस्व रहा है. उन्होंने विभिन्न दलों (जनता पार्टी, लोकदल, जनता दल और समाजवादी पार्टी) से 7 बार जीत दर्ज की है. वे उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके हैं.

वर्ष विजेता पार्टी टिप्पणी
1974 गोपीनाथ कामेश्वर पुरी कांग्रेस -
1977 विश्वनाथ पांडेय जनता पार्टी -
1980 माता प्रसाद पांडेय जनता पार्टी (सेक्युलर) पहली जीत
1985 माता प्रसाद पांडेय लोकदल -
1989 माता प्रसाद पांडेय जनता दल -
1991 मोहम्मद मुकीम कांग्रेस -
1993 स्वयंवर चौधरी भाजपा -
1996 मोहम्मद मुकीम निर्दलीय -
2002 माता प्रसाद पांडेय समाजवादी पार्टी -
2007 माता प्रसाद पांडेय समाजवादी पार्टी -
2012 माता प्रसाद पांडेय समाजवादी पार्टी -
2017 डॉ. सतीश चंद्र द्विवेदी भाजपा भाजपा की पहली जीत
2022 माता प्रसाद पांडेय समाजवादी पार्टी वर्तमान विधायक


महत्वपूर्ण चुनाव परिणाम (हाल के)

2022: माता प्रसाद पांडेय (सपा) — 64,253 वोट (38.54%), सतीश चंद्र द्विवेदी (भाजपा) को 1,662 वोटों के मामूली अंतर से हराया.
2017: डॉ. सतीश चंद्र द्विवेदी (भाजपा) — 59,524 वोट, अरशद खुर्शीद (बसपा) को 10,208 वोटों से हराया। माता प्रसाद पांडेय तीसरे स्थान पर रहे.
2012: माता प्रसाद पांडेय (सपा) — 46,142 वोट, सुबोध चंद्र (बसपा) को 11,734 वोटों से हराया.

राजनीतिक समीकरण

लंबे समय तक सपा का गढ़ रहा, वहीं 2017 के चुनाव में भाजपा ने सेंध लगाई, लेकिन 2022 में सपा ने सीट वापस ले ली. इटवा की इस सीट पर बसपा और कांग्रेस भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती रही हैं. माता प्रसाद पांडेय की व्यक्तिगत लोकप्रियता इस सीट का सबसे बड़ा फैक्टर है.

वर्तमान में यह माता प्रसाद पांडेय (समाजवादी पार्टी)  के विधायक है, जिन्होंने 2022  के चुनाव में जीत दर्ज की थी. वहीं, यह सीट मुख्य रूप से ग्रामीण क्षेत्र है, जहां सपा और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला रहता है.

डुमरियागंज विधानसभा सीट का इतिहास
डुमरियागंज विधानसभा सीट (सीट नंबर 306) का इतिहासडुमरियागंज विधानसभा सीट उत्तर प्रदेश के सिद्धार्थनगर जिले में स्थित है. यह डोमरियागंज लोकसभा क्षेत्र की पांच विधानसभा सीटों में से एक है. यह सामान्य (GEN) श्रेणी की सीट है.

सीट का गठन

डुमरियागंज विधानसभा सीट 1967 में अस्तित्व में आई.
2008 के परिसीमन के बाद इसका नंबर 306 हो गया.
प्रमुख राजनीतिक विशेषताइस सीट पर लंबे समय तक मलिक कमाल यूसुफ और तौफीक अहमद परिवार का प्रभाव रहा. हाल के चुनावों में लड़ाई बेहद कांटे की रही है—2017 में सिर्फ 171 वोट और 2022 में 771 वोट के अंतर से फैसला हुआ.

वर्ष विजेता पार्टी टिप्पणी
1967 जय दत्त सिंह भारतीय जनसंघ -
1969 जलील अब्बासी कांग्रेस -
1974 जलील अब्बासी कांग्रेस -
1977 कमाल यूसुफ मलिक जनता पार्टी -
1980 कमाल यूसुफ मलिक जनता पार्टी (सेक्युलर) -
1985 कमाल यूसुफ मलिक लोकदल -
1989 प्रेम प्रकाश उर्फ जिप्पी तिवारी भाजपा -
1991 प्रेम प्रकाश उर्फ जिप्पी तिवारी भाजपा -
1993 प्रेम प्रकाश उर्फ जिप्पी तिवारी भाजपा -
1996 तौफीक अहमद समाजवादी पार्टी -
2002 कमाल यूसुफ मलिक समाजवादी पार्टी -
2007 तौफीक अहमद बसपा -
2010 (उपचुनाव) खातून तौफीक बसपा -
2012 कमाल यूसुफ मलिक पीस पार्टी -
2017 राघवेंद्र प्रताप सिंह भाजपा -
2022 सैयदा खातून समाजवादी पार्टी वर्तमान विधायक

महत्वपूर्ण चुनाव परिणाम (हाल के)

2022: सैयदा खातून (सपा) — 85,098 वोट (41.19%), राघवेंद्र प्रताप सिंह (भाजपा) को 771 वोटों के बेहद कम अंतर से हराया।
2017: राघवेंद्र प्रताप सिंह (भाजपा) — 67,227 वोट, सैयदा खातून (बसपा) को सिर्फ 171 वोटों से हराया (सबसे करीबी मुकाबलों में से एक)।
2012: कमाल यूसुफ मलिक (पीस पार्टी) — 44,428 वोट।

राजनीतिक समीकरण

इस सीट पर सपा, भाजपा, बसपा और पीस पार्टी के बीच मुकाबला रहा है. यहां मुस्लिम वोट और यादव-मुस्लिम गठजोड़ यहां महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. 2017 और 2022 दोनों चुनाव बेहद रोमांचक और कांटे की लड़ाई वाले रहे. वर्तमान में डुमरियागंज से समाजवादी पार्टी के सैयदा खातून विधायक है, जिन्होंने 2022 के चुनाव में शानदार जीत हासिल की थी. यह सीट पूर्वांचल की सीमावर्ती और संवेदनशील क्षेत्र की राजनीति का उदाहरण है, जहां छोटे मार्जिन से नतीजे बदलते रहते हैं.

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