CEC और EC चयन पैनल में LoP की मौजूदगी महज दिखावा, Supreme Court में बोले Justice Datta
प्रधानमंत्री, एक कैबिनेट मंत्री और विपक्ष के नेता (LoP) के पैनल द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के कानून की वैधता पर विचार करते हुए, जस्टिस दीपांकर दत्ता ने बुधवार को इसकी कमियां बताईं। उन्होंने कहा कि इससे सरकार (एग्जीक्यूटिव) को बहुत ज़्यादा ताकत मिलती है और विपक्ष के नेता की मौजूदगी सिर्फ़ दिखावे की रह जाती है, जिससे चुनाव प्रक्रिया की आज़ादी पर सवाल उठते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि आज़ादी के बाद से ही सरकारें चुनाव आयोग को अपने कंट्रोल में रखने की कोशिश करती रही हैं।
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जस्टिस दत्ता ने कहा कि सात दशकों से ज़्यादा समय में, सत्ता में आने वाली हर सरकार को उन संस्थाओं को अपने कंट्रोल में रखना सुविधाजनक लगा, जिन्हें संविधान ने आज़ाद रखने की कल्पना की थी। आर्टिकल 324(2) के तहत कानून बनाने का मतलब होता ECI को सरकार के पूरी तरह से कंट्रोल से आज़ाद करना और सत्ताधारी सरकार के लिए मुश्किलें खड़ी करना। इस कोर्ट की राय में, यह किसी एक पार्टी या एक दौर की नाकामी नहीं रही है। दशकों से राजनीतिक सत्ता की एक लगातार दिखने वाली बात यह रही है कि वह उसी संस्था पर अपना दबदबा बनाए रखना चाहती है, जिसे सत्ता पर उसके दावे को परखने का काम सौंपा गया है।
उन्होंने कहा कि अगर निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने हैं, तो यह ज़रूरी है कि चुनाव आयोग (EC) न सिर्फ़ एक स्वतंत्र संस्था हो, बल्कि स्वतंत्र रूप से काम करता हुआ भी दिखे। साथ ही, यह दुखद है कि सत्ता में रही किसी भी पार्टी ने—जिसे भारत के लोगों ने इस महान देश पर शासन करने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी—उस तरह का कानून बनाने की पहल नहीं की, जैसा कानून बनाने का काम अनुच्छेद 324(2) ने देश की सर्वोच्च कानून बनाने वाली संस्था, यानी संसद, पर छोड़ा था।
जस्टिस दत्ता ने कहा कि साफ़ वजहों से, कोई भी राजनीतिक पार्टी अपनी चुनावी किस्मत को पूरी तरह से स्वतंत्र मध्यस्थ के हाथों में नहीं सौंपना चाहती थी। सत्ता में बने रहने के लिए, कार्यकारी कार्रवाई के ज़रिए लगातार यही कोशिश की जाती रही है—चुनाव आयोग के गठन को प्रभावित करना, CEC और EC की नियुक्ति की प्रक्रिया को नियंत्रित करना और इस तरह, चुनाव के प्रतिकूल नतीजों को अपने पक्ष में करना।
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कानून के ख़िलाफ़ उठाए गए तर्कों का सारांश देते हुए उन्होंने कहा कि इस तर्क का मूल सार यह है: यह कहना गलत नहीं होगा कि अगर क्रिकेट मैच में अंपायर को एक टीम का कप्तान चुनता है और उसकी टीम जीत जाती है, तो भले ही अंपायर के फ़ैसले सही हों, उन पर शक की गुंजाइश बनी रहती है, क्योंकि आख़िरकार अंपायर को जीतने वाले कप्तान ने ही चुना होता है। जस्टिस दत्ता ने आगे कहा कि इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि निष्पक्ष चुनाव काफ़ी हद तक एक पूरी तरह से स्वतंत्र चुनाव आयोग पर निर्भर करते हैं। चुनाव आयोग का स्वतंत्र होना ही काफ़ी नहीं है, बल्कि उसका स्वतंत्र दिखना भी ज़रूरी है।
IIT Bombay छात्र Sahil Wakode की मौत पर Rahul Gandhi ने परिजनों से की बात, मदद का दिया भरोसा
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने IIT बॉम्बे के दिवंगत छात्र साहिल वाकोडे के माता-पिता से बात की और उन्हें अपने बेटे के लिए न्याय पाने की लड़ाई में हर संभव मदद का भरोसा दिलाया। सूत्रों ने बताया कि राहुल गांधी ने रवींद्र और सोनाली वाकोडे से तब वीडियो कॉल पर बात की, जब वे वाशिम जिले से मुंबई जा रहे थे। लगभग 17 मिनट की इस बातचीत के दौरान, गांधी ने दंपति से कहा कि वह उनके साथ हैं और उन्हें हर तरह की मदद का भरोसा दिलाया।
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बातचीत के दौरान साहिल के माता-पिता के साथ इंडियन यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष उदय भानु चिब और महाराष्ट्र यूनिट के प्रमुख शिवराज मोरे भी मौजूद थे। यह बातचीत साहिल की मौत की स्वतंत्र जांच की बढ़ती मांगों और विरोध-प्रदर्शनों के बीच हुई है। उनके माता-पिता ने आरोप लगाया है कि उनके बेटे को IIT बॉम्बे में जाति-आधारित भेदभाव और मानसिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था और उन्होंने इसके लिए जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है।
IIT बॉम्बे में BTech के दूसरे साल के छात्र साहिल का शव 18 सितंबर की शाम को उनके हॉस्टल के कमरे में लटका हुआ मिला। उनकी मौत मिड-सेमेस्टर परीक्षा के दौरान ChatGPT का इस्तेमाल करने के लिए मोबाइल फोन का उपयोग करते हुए पकड़े जाने के कुछ ही घंटों बाद हुई। परीक्षा के दौरान हुई यह घटना मामले का मुख्य केंद्र बन गई, क्योंकि आरोप है कि एक प्रोफेसर ने साहिल को रोका और उन्हें परीक्षा हॉल से बाहर ले गए। बुधवार को कुछ टीवी चैनलों पर दिखाए गए हॉल के CCTV फुटेज में कथित तौर पर प्रोफेसर के पास आने और उन्हें ले जाने से पहले साहिल की गतिविधियां दिखाई दे रही हैं।
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मुंबई पुलिस की क्राइम ब्रांच इस मौत की जांच कर रही है। जातिगत भेदभाव के आधार पर आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगाते हुए FIR दर्ज की गई है। FIR में नामजद फैकल्टी सदस्य सूर्यनारायण डूला को निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए छुट्टी पर भेज दिया गया है। IIT बॉम्बे का कहना है कि उनके SC/ST सेल को साहिल की मौत से पहले उनसे कोई शिकायत नहीं मिली थी। संस्थान ने घटना से जुड़ी परिस्थितियों की जांच के लिए 10 सदस्यों की एक समिति भी गठित की है।
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