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शी चिनफिंग तीन दिवसीय यात्रा पर अमेरिका पहुंचे, ट्रंप ने खुद हवाई अड्डे पर की अगवानीPitru Paksha 2026: पितृपक्ष में किस दिन करें पितरों का श्राद्ध? जानें तिथि तय करने का सही तरीका
Pitru Paksha 2026: सनातन परंपरा में पितरों का विशेष स्थान माना गया है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए पितृपक्ष में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म किए जाते हैं। मान्यता है कि इस अवधि में विधि-विधान से पितरों का स्मरण करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख-शांति बनी रहती है। साल 2026 में पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर से होगी और इसका समापन 10 अक्टूबर को होगा। यह अवधि भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक मानी जाती है। पितृपक्ष के दौरान अलग-अलग तिथियों पर उन पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है, जिनकी मृत्यु की तिथि परिवार को ज्ञात होती है।
मृत्यु तिथि से तय होती है श्राद्ध की तारीख
किसी पूर्वज का श्राद्ध किस दिन किया जाना चाहिए, इसका आधार उनकी मृत्यु की हिंदू तिथि होती है। यानी जिस तिथि को व्यक्ति का निधन हुआ था, पितृपक्ष में उसी तिथि के दिन श्राद्ध करने की परंपरा है। उदाहरण के तौर पर यदि किसी व्यक्ति का निधन शुक्ल या कृष्ण पक्ष की द्वितीया तिथि को हुआ था, तो पितृपक्ष में उस पूर्वज का श्राद्ध द्वितीया तिथि पर किया जाएगा। वर्ष 2026 में पितृपक्ष की द्वितीया तिथि 28 सितंबर को पड़ रही है।
अगर मृत्यु की तिथि मालूम न हो तो क्या करें?
कई परिवारों में पुराने पूर्वजों की मृत्यु की सही तिथि उपलब्ध नहीं होती। ऐसी स्थिति में उनके लिए पितृपक्ष की अमावस्या को श्राद्ध करने की परंपरा है। इसे सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार यह दिन उन सभी पितरों के स्मरण और श्राद्ध के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है, जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है। दुर्घटना, प्राकृतिक आपदा अथवा किसी अन्य कारण से जिन लोगों की मृत्यु हुई हो और उनकी तिथि निश्चित रूप से मालूम न हो, उनके लिए भी इस दिन श्राद्ध किया जा सकता है।
मातृ नवमी पर किनका श्राद्ध किया जाता है?
पितृपक्ष की नवमी तिथि का भी विशेष धार्मिक महत्व बताया गया है। इसे मातृ नवमी के नाम से जाना जाता है। परंपरा के अनुसार जिन महिलाओं का निधन उनके पति के जीवित रहते हो गया हो, जैसे माता, बहन या बेटी, उनके श्राद्ध के लिए नवमी तिथि को विशेष माना जाता है। इस दिन मातृ पक्ष के पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण और तर्पण करने की परंपरा है।
संन्यासी के लिए कौन सी तिथि मानी जाती है?
यदि परिवार में किसी व्यक्ति ने जीवन में संन्यास ग्रहण किया था और बाद में उनका निधन हो गया, तो उनके श्राद्ध के लिए पितृपक्ष की एकादशी या द्वादशी तिथि को उपयुक्त माना जाता है। इस प्रकार पितृपक्ष में श्राद्ध की तारीख सभी लोगों के लिए एक समान नहीं होती। सामान्यतः पूर्वज की मृत्यु के समय की हिंदू तिथि के आधार पर श्राद्ध किया जाता है, जबकि कुछ विशेष परिस्थितियों के लिए परंपरा में अलग तिथियों का उल्लेख मिलता है।
पितृपक्ष में इन बातों का रखें ध्यान
पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध कर्म करते समय परिवार अपनी परंपरा और स्थानीय धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करता है। तिथि को लेकर किसी प्रकार का भ्रम हो तो पंचांग या किसी योग्य आचार्य से परामर्श लेना उचित माना जाता है। पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और स्मरण ही श्राद्ध परंपरा का मूल भाव है। इसलिए कर्मकांड के साथ-साथ इस अवधि में जरूरतमंदों की सहायता, अन्नदान और सेवा जैसे कार्य भी धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जाते हैं।
डिस्क्लेमर: यह जानकारी सिर्फ धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है। हरिभूमि.कॉम इसकी पुष्टि नहीं करता है।
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