जरूरत की खबर- सहजन के पत्ते हैं ‘सेहत का खजाना’:ब्लड शुगर करे कंट्रोल, पाचन रखे दुरुस्त, डॉक्टर से जानें इसे खाने का सही तरीका
क्या आपने कभी 'मिरेकल ट्री' यानी जादुई पेड़ के बारे में सुना है? हो सकता है, यह नाम आपके लिए नया हो। लेकिन अगर हम सहजन या मोरिंगा कहें तो शायद आप इसे तुरंत पहचान लें। भारत के कई घरों में इसकी फलियां सब्जी के रूप में खाई जाती हैं। वहीं इसके पत्तों को दुनिया के सबसे पौष्टिक खाद्य पदार्थों में गिना जाता है। सहजन (Moringa oleifera) एक ऐसा पेड़ है, जो कम पानी में भी आसानी से उग जाता है। भारत सहजन का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। यहां हर साल करीब 10 से 13 लाख टन सहजन की फलियां पैदा होती हैं। फिलीपींस, श्रीलंका, मलेशिया, इंडोनेशिया और ताइवान जैसे देशों में भी इसकी खेती होती है। अलग-अलग राज्यों में इसे सहजन, शैवगा, मुरुंगई और मुनगाकाया जैसे नामों से जाना जाता है। साल 2024 में साइंस जर्नल ‘हेलियॉन’ (Heliyon) में पब्लिश एक रिव्यू स्टडी के मुताबिक, सहजन के पत्तों में फ्लेवोनॉयड्स, एल्कलॉइड्स और कैरोटेनॉयड्स जैसे कई बायोएक्टिव कंपाउंड्स होते हैं। इनमें एंटीऑक्सिडेंट, एंटी-डायबिटिक, एंटी-इंफ्लेमेटरी और कार्डियोप्रोटेक्टिव गुण होते हैं। यही वजह है कि सहजन को 'मिरेकल ट्री' और इसके पत्तों को 'सुपरफूड' कहा जाता है। इसलिए आज ’जरूरत की खबर’ में सहजन के हेल्थ बेनिफिट्स की बात करेंगे। साथ ही जानेंगे कि- एक्सपर्ट- अमृता मिश्रा, सीनियर डाइटीशियन, दिल्ली सवाल- सहजन के पत्तों को सुपरफूड क्यों कहा जाता है? जवाब- इनमें विटामिन, मिनरल्स, प्रोटीन और एंटीऑक्सिडेंट होते हैं। पोषक तत्वों से भरपूर होने के कारण इन्हें ‘सुपरफूड’ कहा जाता है। सवाल- सहजन के पत्तों में कौन-से पोषक तत्व होते हैं? उनकी न्यूट्रिशनल वैल्यू क्या है? जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए- ग्राफिक में इनकी न्यूट्रिशनल वैल्यू देखिए- सवाल- सहजन के पत्तों के हेल्थ बेनिफिट्स क्या हैं? जवाब- इनमें मौजूद विटामिन, मिनरल्स, फाइबर और एंटीऑक्सिडेंट्स शरीर को जरूरी पोषण देते हैं। साथ ही ये कई तरह के हेल्थ रिस्क को कम करने में मदद करते हैं। ग्राफिक में सभी हेल्थ बेनिफिट्स देखिए- सवाल- सहजन के पत्ते ब्लड शुगर कंट्रोल में कैसे मदद करते हैं? जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए- सवाल- सहजन के पत्ते हार्ट को हेल्दी रखने में कैसे मददगार होते हैं? जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए- सवाल- क्या इससे बढ़ती उम्र में होने वाले ऑस्टियोपोरोसिस से बचाव में मदद मिलती है? जवाब- सहजन के पत्ते ऑस्टियोपोरोसिस का इलाज नहीं हैं। लेकिन ये हड्डियों को मजबूत बनाए रखने में मदद करते हैं। इनमें कैल्शियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस, विटामिन K जैसे पोषक तत्व होते हैं, जो हड्डियों की मजबूती और बोन मिनरल डेंसिटी बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। सवाल- क्या इससे आंखों की रोशनी बेहतर हो सकती है? जवाब- हां, इनमें बीटा-कैरोटीन अच्छी मात्रा में होता है। शरीर बीटा-कैरोटीन को जरूरत के अनुसार विटामिन A में बदल लेता है, जो आई हेल्थ को सपोर्ट करता है। ध्यान रखें, सहजन के पत्ते आंखों को पोषण देते हैं, लेकिन ये चश्मे का नंबर कम नहीं करते और न ही किसी आंख की बीमारी का इलाज करते हैं। सवाल- सहजन के पत्तों को डाइट में कैसे शामिल करें? जवाब- इसे पॉइंटर्स से समझिए- सवाल- घर पर सहजन के पत्तों का पाउडर कैसे बनाएं? जवाब- घर पर सहजन का पाउडर बनाना आसान है। इसे पॉइंटर्स से समझिए- ध्यान रखें- पत्तों को तेज धूप में ज्यादा देर सुखाने से कुछ पोषक तत्व कम हो सकते हैं। इसलिए छाया में सुखाना बेहतर है। सवाल- रोज कितना पाउडर खा सकते हैं? जवाब- आमतौर पर स्वस्थ वयस्क के लिए रोज 1-2 चम्मच (करीब 5-10 ग्राम) मोरिंगा पाउडर खाना सुरक्षित है। अगर पहली बार ले रहे हैं तो कम मात्रा से शुरुआत करें। सवाल- किन लोगों को सहजन के पत्ते नहीं खाने चाहिए? जवाब- सहजन के पत्ते ज्यादातर लोगों के लिए सेफ होते हैं। लेकिन कुछ लोगों को इसे सावधानी के साथ डाइट में शामिल करना चाहिए। ग्राफिक में देखिए- सहजन के पत्ते से जुड़े कुछ कॉमन सवाल-जवाब सवाल- क्या छोटे बच्चों को सहजन के पत्ते दे सकते हैं? जवाब- हां, इनमें प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम, विटामिन A और विटामिन C जैसे कई जरूरी पोषक तत्व होते हैं। यह बच्चों की ग्रोथ में मदद करते हैं। सवाल- क्या सहजन के पत्ते शरीर की कमजोरी और थकान दूर करते हैं? जवाब- अगर थकान खराब खानपान या पोषण की कमी से जुड़ी है, तो नियमित रूप से सहजन के पत्तों का सेवन फायदा पहुंचा सकता है। सवाल- क्या सहजन के पत्ते इम्यूनिटी बढ़ाते हैं? जवाब- सहजन के पत्तों में ऐसे एंटीऑक्सिडेंट्स और प्लांट बेस्ड कंपाउंड होते हैं, जो इम्यूनिटी को सपोर्ट करते हैं। सवाल- क्या सहजन के पत्ते और सहजन की फलियां (सहजन) समान रूप से पौष्टिक हैं? जवाब- दोनों ही पौष्टिक होते हैं, लेकिन सहजन के पत्तों में आमतौर पर विटामिन, मिनरल्स, प्रोटीन और एंटीऑक्सिडेंट्स की मात्रा ज्यादा होती है। वहीं फलियां फाइबर और कुछ जरूरी पोषक तत्वों का अच्छा सोर्स हैं। सवाल- क्या खाली पेट सहजन के पत्तों का सेवन किया जा सकता है? जवाब- हां, खाली पेट सहजन के पत्तों या मोरिंगा पाउडर का सेवन कर सकते हैं। अगर खाने के बाद असहजता महसूस हो तो इसे भोजन के साथ लेना बेहतर है। ………………………………. ये खबर भी पढ़ें… जरूरत की खबर- तुलसी पत्ती के फायदे:शुगर-बीपी कम करे, हार्ट को रखे हेल्दी, डॉक्टर से जानें इससे जुड़े मिथ और फैक्ट, ये लोग न खाएं घर में किसी को सर्दी-जुकाम या खांसी हो जाए तो दादी-नानी अक्सर ‘तुलसी का काढ़ा’ पीने की सलाह देती हैं। चरक संहिता जैसे आयुर्वेदिक ग्रंथों में तुलसी को 'जड़ी-बूटियों की रानी' कहा गया है। हिंदू परंपरा में इसे पवित्र पौधा माना जाता है। साथ ही लंबे समय से औषधीय उपयोग के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता रहा है। पूरी खबर पढ़ें…
बुक रिव्यू- ‘मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था’:एक खुफिया एजेंट के पकड़े जाने, जेल जाने और फिर जिंदा लौट आने की कहानी
किताब- मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था लेखक- मोहनलाल भास्कर प्रकाशक- राजकमल मूल्य- ₹299/- भारत-पाकिस्तान के रिश्तों पर बहुत कुछ लिखा गया है। युद्धों पर, सीमाओं पर, राजनीति पर और खुफिया एजेंसियों पर भी। लेकिन इन सबके बीच कुछ कहानियां ऐसी होती हैं, जो उन लोगों की कहानियां होती हैं, जो देशों के बीच चल रही अदृश्य लड़ाइयों का हिस्सा बनते हैं और जिनकी कीमत अक्सर अपनी पहचान, आजादी और कभी-कभी पूरी जिंदगी से चुकानी पड़ती है। मोहनलाल भास्कर की किताब ‘मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था’ ऐसी ही एक कहानी है। यह उस भारतीय की सच्ची कहानी है, जो पाकिस्तान में सीक्रेट मिशन के दौरान पकड़ा गया। सालों जेल में रहा, यातनाएं सहीं और फिर लौटकर अपनी दास्तान लिखी। कैद और संघर्ष की कहानी किताब हाथ में लेते ही लगता है कि यह एक थ्रिलर होगी, जिसमें सीक्रेट मिशन और खुफिया ऑपरेशन के घटनाक्रम होंगे। लेकिन पढ़ते-पढ़ते समझ आता है कि यह किताब जासूसी से ज्यादा उस इंसान की कहानी है, जो एक मिशन के बाद अचानक कैदी बन जाता है। यहां सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि उसने कौन-सी जानकारी जुटाई, बल्कि यह है कि इतने वर्षों की कैद और यातना के बाद भी वह मानसिक रूप से कैसे बचा रहा। यही बात किताब को एक सामान्य स्पाई स्टोरी से अलग बनाती है। किताब में क्या है मोहनलाल भास्कर भारत की ओर से पाकिस्तान में प्रवेश करते हैं। उनका काम संवेदनशील जानकारियां जुटाना है। वे अलग पहचान के साथ वहां रहते हैं, लोगों से मिलते हैं और अपने मिशन को आगे बढ़ाते हैं। लेकिन यह सफर ज्यादा लंबा नहीं चलता। एक समय ऐसा आता है, जब वे पकड़े जाते हैं और उनकी जिंदगी पूरी तरह बदल जाती है। यहीं से किताब का दूसरा और कहीं ज्यादा बड़ा हिस्सा शुरू होता है। पाकिस्तान की जेलों के भीतर की दुनिया गिरफ्तारी के बाद उनसे पूछताछ होती है। उन पर दबाव बनाया जाता है। मानसिक और शारीरिक यातनाएं दी जाती हैं। उन्हें अलग-अलग जेलों में रखा जाता है। लाहौर, कोट लखपत, मियांवाली और मुल्तान जैसी जेलों का जिक्र किताब में बार-बार आता है। किताब का बड़ा हिस्सा उनके जेल में बिताए गए सालों पर केंद्रित है। इसमें जेल अधिकारियों का व्यवहार, साथी कैदियों के साथ रिश्ते, रोजमर्रा की चुनौतियां, हर पल बना रहने वाला डर, भविष्य की अनिश्चितता और जीवित रहने के संघर्ष का विस्तार से जिक्र है। सादगी से कही गई असरदार कहानी इन अनुभवों के जरिए पाठक उस दुनिया को करीब से देख पाता है, जिसके बारे में आमतौर पर बहुत कम लोग जानते हैं। अच्छी बात यह है कि लेखक हर घटना को सनसनीखेज बनाने की कोशिश नहीं करते। वे चीजों को सीधे ढंग से बताते हैं। शायद इसी कारण कई घटनाएं और ज्यादा प्रभाव छोड़ती हैं। किताब की सबसे बड़ी ताकत इस किताब की सबसे बड़ी ताकत जेल के भीतर की दुनिया का बारीक चित्रण है। लेखक विस्तार से बताते हैं कि पूछताछ के दौरान कैदियों के साथ कैसा व्यवहार किया जाता था, जेल में उनकी दिनचर्या कैसी होती थी और वहां का माहौल किस तरह धीरे-धीरे व्यक्ति के मनोबल और मानसिक स्थिति पर असर डालता है। इन विवरणों में एक तरह की सादगी है, जो उन्हें विश्वसनीय बनाती है। सादगी में छिपी भयावहता कई जगह पढ़ते हुए दृश्य आंखों के सामने बनते चलते हैं। इसका कारण लेखक की भाषा है। वे घटनाएं बताते हैं और पाठक खुद उनकी भयावहता महसूस करने लगता है। एक उदाहरण उन हिस्सों में दिखाई देता है, जहां वे पूछताछ और यातनाओं का जिक्र करते हैं। लेखक बताते हैं कि जेल में उनके कई साथी मानसिक संतुलन खो बैठे और कुछ की मौत हो गई। इन घटनाओं का सादा वर्णन ही उनकी भयावहता को सामने लाने के लिए काफी है। एक कैदी की नजर से देखी गई दुनिया दूसरा दिलचस्प पक्ष जेल में मिलने वाले लोगों का है। किताब केवल जेल अधिकारियों की क्रूरता तक सीमित नहीं रहती। वहां ऐसे लोग भी दिखाई देते हैं, जो मानवीय व्यवहार करते हैं। इससे कहानी काली-सफेद नहीं रह जाती। उसमें कई परतें जुड़ जाती हैं। यही संतुलन किताब को विश्वसनीय बनाता है क्योंकि वास्तविक जीवन में भी लोग पूरी तरह खलनायक या नायक नहीं होते। जासूसी पर लिखी गई कई किताबें ऑपरेशन और रणनीति पर केंद्रित होती हैं। यहां फोकस उस व्यक्ति पर है ,जो मिशन के बाद जेल में पहुंच गया। फिल्म जैसा अनुभव जहां किताब थोड़ी कमजोर पड़ती है भाषा और लेखन शैली यह किताब किसे पढ़नी चाहिए? अगर आपकी रुचि जासूसी कहानियों में है, तो यह किताब आपके लिए दिलचस्प हो सकती है। लेकिन इसे पारंपरिक स्पाई थ्रिलर समझकर न पढ़ें। ग्राफिक में देखिए ये किताब किसे पढ़नी चाहिए- किताब के बारे में मेरी राय ‘मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था’ एक दिलचस्प संस्मरण है। जासूसी अभियानों के बजाय जेल जीवन और व्यक्तिगत अनुभवों पर इसका ज्यादा फोकस कुछ पाठकों को अधूरापन दे सकता है। लेकिन वास्तविक अनुभवों की प्रामाणिकता, सहज भाषा और कैद की दुनिया का प्रभावशाली चित्रण इसे पढ़ने लायक बनाता है। किताब खत्म होने के बाद मिशन से ज्यादा वह आदमी याद रहता है, जो सालों तक जेल में रहा और फिर लौटकर अपनी कहानी लिख सका। यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है। ………………………. ग्राफिक- महेंद्र वर्मा ……………………. ये खबर भी पढ़ें… बुक रिव्यू- घरेलू महिला से बिजनेस वुमन तक का सफर:25 महिलाओं की ये सच्ची कहानियां, जिंदगी को देखने का नजरिया बदल देंगी समाज अक्सर महिलाओं को घर–परिवार की जिम्मेदारियों तक सीमित करके देखता है। आज भी महिलाओं के लिए कारोबार शुरू करना, बड़े फैसले लेना और रिस्क उठाना आसान नहीं है। लेकिन रश्मि बंसल की किताब 'सात रंग के सपने' इसी सोच को चुनौती देती है। इसमें 25 भारतीय महिला उद्यमियों की सच्ची कहानियां हैं। पूरी खबर पढ़ें…
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