असम ने 2031 तक 4,000 एमबीबीएस सीटों का लक्ष्य रखा है: मुख्यमंत्री सरमा
गुवाहाटी/रांची, 23 सितंबर (आईएएनएस)। असम में चिकित्सा शिक्षा का व्यापक विस्तार करने का लक्ष्य है। मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने घोषणा की है कि राज्य 2031 तक एमबीबीएस सीटों की संख्या बढ़ाकर 4,000 करने की योजना बना रहा है।
मुख्यमंत्री सरमा ने बुधवार को झारखंड के देवघर में 750 बेड वाले बाबा बैद्यनाथ मेडिकल ट्रस्ट अस्पताल के उद्घाटन समारोह में यह घोषणा की।
असम में चिकित्सा शिक्षा के विस्तार पर प्रकाश डालते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य में वर्तमान में 16 मेडिकल कॉलेज हैं और प्रतिवर्ष लगभग 2,200 डॉक्टर तैयार होते हैं।
उन्होंने आगे कहा कि राज्य सरकार की योजना राज्य में पहले से कार्यरत एम्स और ईएसआईसी मेडिकल कॉलेज के अतिरिक्त असम में 32 और मेडिकल कॉलेज स्थापित करने की है।
मुख्यमंत्री सरमा ने चिकित्सा शिक्षा के विस्तार और प्रशिक्षित डॉक्टरों की उपलब्धता बढ़ाने के लिए राज्य सरकार की दीर्घकालिक योजना की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि इनमें से 16 मेडिकल कॉलेज पहले ही स्थापित हो चुके हैं।
उन्होंने कहा कि असम में चिकित्सा शिक्षा का बुनियादी ढांचा दशकों से सीमित रहा है।
राज्य का पहला मेडिकल कॉलेज 1950 के दशक में स्थापित हुआ, उसके बाद दूसरा 1960 के दशक में और तीसरा 1970 के दशक में।
मुख्यमंत्री सरमा ने आगे कहा कि असम की लगभग 35 लाख की आबादी के बावजूद, राज्य में केवल तीन मेडिकल कॉलेज थे और प्रतिवर्ष लगभग 300 डॉक्टर ही तैयार होते थे, जिसके परिणामस्वरूप स्वास्थ्य सेवा आवश्यकताओं के अनुपात में डॉक्टरों की कमी थी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि हाल के वर्षों में हुए विस्तार से राज्य में प्रशिक्षित डॉक्टरों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।
असम अब प्रति वर्ष लगभग 2200 डॉक्टर तैयार करता है, जबकि पहले यह संख्या लगभग 350 थी।
उन्होंने कहा कि एमबीबीएस सीटों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ डॉक्टरों की बढ़ती संख्या को रोजगार के अवसर प्रदान करने के उपाय भी किए जाएंगे।
मुख्यमंत्री सरमा ने नवीनतम राज्य बजट का हवाला दिया, जिसमें असम के 5,000 उप-स्वास्थ्य केंद्रों में से प्रत्येक में दो डॉक्टरों की तैनाती की घोषणा की गई है।
उन्होंने कहा कि मेडिकल कॉलेजों और एमबीबीएस सीटों के विस्तार से एक मजबूत चिकित्सा शिक्षा प्रणाली बनाने में मदद मिलेगी और साथ ही पूरे राज्य में स्वास्थ्य सेवा पेशेवरों की उपलब्धता में सुधार होगा।
--आईएएनएस
एमएस/
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
मंदिर में मौन रहकर पूजा करना क्यों माना जाता है विशेष फलदायी? जानें इसका धार्मिक महत्व
Maun rahkar puja karne ka mahatva: हिंदू धर्म में पूजा-पाठ और ध्यान के दौरान मौन धारण करने की परंपरा को अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। मान्यता है कि मौन रहकर की गई पूजा और जप का फल सामान्य पूजा की तुलना में कई गुना अधिक होता है, इसी वजह से कई साधु-संत और श्रद्धालु विशेष अवसरों पर मौन व्रत धारण करते हैं। यही कारण है कि ध्यान और गहन साधना के समय मौन रहने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है।
मौन को क्यों माना जाता है आध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली?
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, मौन को आत्मसंयम और आंतरिक शक्ति का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि जब व्यक्ति बाहरी वाणी पर नियंत्रण रखता है, तो उसकी आंतरिक ऊर्जा बिखरने के बजाय भीतर ही संचित होती है, जिससे ध्यान और भक्ति में गहराई आती है। कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि कई प्राचीन ऋषि-मुनियों ने वर्षों तक मौन व्रत धारण कर कठोर तपस्या की थी, जिसके फलस्वरूप उन्हें दिव्य ज्ञान और सिद्धियों की प्राप्ति हुई।
मौन व्रत धारण करने की परंपरा
धार्मिक परंपराओं के अनुसार, कुछ विशेष दिनों जैसे एकादशी, पूर्णिमा और अन्य पावन तिथियों पर मौन व्रत रखने की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है। मान्यता है कि इन तिथियों पर मौन रहकर भगवान का ध्यान करने से मन को असाधारण शांति मिलती है और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है। इसके अलावा गुरु की सन्निधि में या तीर्थ यात्रा के दौरान भी मौन धारण करने को विशेष रूप से शुभ माना जाता है।
मौन के दौरान मानसिक जप का महत्व
मान्यता है कि मौन अवस्था में बोलने के बजाय मन ही मन मंत्र जाप करना अत्यंत फलदायी माना जाता है, जिसे "मानसिक जप" कहा जाता है। धार्मिक ग्रंथों में इसे जप की सबसे उच्च श्रेणी बताया गया है, क्योंकि इसमें पूरी एकाग्रता और आंतरिक भक्ति भाव शामिल होता है। कहा जाता है कि यह जप शब्दों से किए गए सामान्य जाप से भी अधिक प्रभावशाली माना जाता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी है इसका महत्व
धार्मिक मान्यताओं के साथ-साथ मौन धारण करने को मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से भी अत्यंत लाभकारी माना जाता है। मान्यता है कि कुछ समय के लिए मौन रहने से मस्तिष्क को आराम मिलता है, तनाव कम होता है और निर्णय लेने की क्षमता में भी सुधार आता है। इसके अलावा यह आत्मचिंतन और आत्म-जागरूकता बढ़ाने में भी सहायक माना जाता है।
आज भी कई श्रद्धालु अपनाते हैं मौन व्रत
समय के साथ भले ही आधुनिक जीवनशैली में मौन धारण करना कठिन होता जा रहा हो, लेकिन विशेष धार्मिक अवसरों पर मौन व्रत रखने की यह परंपरा आज भी अनेक श्रद्धालुओं द्वारा श्रद्धापूर्वक निभाई जाती है। आज भी कई आश्रमों और तीर्थ स्थलों पर लोग निर्धारित समय के लिए मौन धारण कर आध्यात्मिक शांति की खोज करते नजर आते हैं।
डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं, पौराणिक ग्रंथों और लोक-परंपराओं पर आधारित है। Haribhoomi.com इनकी किसी भी तरह की सटीकता या तथ्य की पुष्टि नहीं करता है। इन्हें केवल सामान्य जानकारी के तौर पर प्रस्तुत किया जा रहा है।
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others
News Nation
Haribhoomi










