भारत के ऑफिस मार्केट के लिए प्राइमरी ग्रोथ इंजन बना जीसीसी, लीज में हिस्सेदारी 45 प्रतिशत हुई
नई दिल्ली, 19 जनवरी (आईएएनएस)। ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (जीसीसी) 2025 में भारत के ऑफिस मार्केट का प्राइमरी ग्रोथ इंजन बनकर उभरा है और कुल ऑफिस लीज में इनकी हिस्सेदारी बढ़कर 45 प्रतिशत हो गई है, जो कि 2024 में 41 प्रतिशत थी। यह जानकारी सोमवार को एक रिपोर्ट में दी गई।
वेस्टियन की रिपोर्ट में कहा गया कि जीसीसी द्वारा 2025 में 34.9 मिलियन स्क्वायर फीट ऑफिस स्पेस लीज पर लिया गया है। इसमें सालाना आधार पर 20 प्रतिशत की बढ़त देखने को मिली है।
रिपोर्ट में कहा गया कि जीसीसी की ओर से मजबूत मांग, अनुकूल नीतिगत माहौल और एच1-बी वीजा पर प्रतिबंधों के कारण पूरे भारत में ऑफिस स्पेस की लीज 2025 में बढ़कर ऑल-टाइम हाई 78.2 मिलियन स्क्वायर फीट पर पहुंच गई है।
रिपोर्ट के मुताबिक, वैश्विक स्तर पर जारी व्यापक आर्थिक अनिश्चितताओं और भू-राजनीतिक चुनौतियों के बावजूद, कुल मांग में सालाना आधार पर 11 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो भारत के ऑफिस बाजार की मजबूती को दिखाता है।
ऑफिस स्पेस लीज में आईटी सेक्टर लगातार शीर्ष पर बना हुआ है और इसकी हिस्सेदारी कुल लीज में 38 प्रतिशत रही है। इसके बाद बीएफएसआई, फ्लेक्स स्पेस की हिस्सेदारी 14-14 प्रतिशत रही है। यह दिखाता है कि ऑफिस स्पेस की मांग में विविधीकरण बढ़ रहा है।
2025 में ऑफिस स्पेस लीज पर लेने वाले आईटी-आईटीईएस क्षेत्र के आधे से अधिक नियोक्ता जीसीसी कंपनियां थीं।
मूल्य के हिसाब से, आईटी-आईटीईएस क्षेत्र द्वारा अधिग्रहित कुल क्षेत्रफल में जीसीसी कंपनियों का योगदान लगभग 60 प्रतिशत था, जो बाजार विस्तार में उनकी केंद्रीय भूमिका की पुष्टि करता है।
2025 में जीसीसी कंपनियों द्वारा लीज पर लिए गए कुल क्षेत्रफल में बेंगलुरु 32 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ शीर्ष पर था। इसके बाद हैदराबाद 19 प्रतिशत के बाद दूसरे स्थान पर था।
रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑफिस स्पेस की मांग में लगातार वृद्धि देखी जा रही है और मौजूदा गति को देखते हुए, 2026 के अंत तक यह बढ़कर 85-90 मिलियन वर्ग फुट तक पहुंचने की उम्मीद है। इस वृद्धि का मुख्य कारण जीसीसी की निरंतर मांग होगी।
--आईएएनएस
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क्या लाल बाल वाले लोगों को कम होता है कैंसर का खतरा? नई स्टडी में हुआ बड़ा खुलासा
आपने अक्सर महिलाओं को देखा होगा जो अपने बालो पर लाल कलर और तरह-तरह के कलर करवाती रहती है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि लाल बाल कैंसर के खतरे को कम कर सकता है. हाल ही में सामने आई एक नई रिसर्च ने लाल बालों को लेकर एक दिलचस्प बात बताई है. वैज्ञानिकों का कहना है कि लाल बालों में मौजूद एक खास पिगमेंट शरीर को कुछ हानिकारक तत्वों से बचाने में मदद कर सकता है. स्पेन के शोधकर्ताओं के अनुसार, शरीर में सिस्टीन नामक एक अमीनो एसिड होता है. सामान्य मात्रा में यह नुकसानदेह नहीं है. लेकिन अगर यह अधिक मात्रा में जमा हो जाए, तो यह सूजन, कोशिकाओं को नुकसान और समय से पहले बूढ़ापन जैसी समस्याएं पैदा कर सकता है.
क्या है फियोमेलेनिन?
लाल बालों में पाए जाने वाले पीले-नारंगी रंग के पिगमेंट को फियोमेलेनिन कहा जाता है. वैज्ञानिकों का मानना है कि यह पिगमेंट शरीर में अतिरिक्त सिस्टीन को संतुलित रखने में मदद करता है. इससे किडनी, लिवर, आंखें, मांसपेशियां और दिमाग जैसे अहम अंग सुरक्षित रह सकते हैं.
पक्षियों पर किया गया एक्सपेरिमेंट
इस अध्ययन के लिए स्पेन के नेशनल म्यूजियम ऑफ नेचुरल साइंसेज की टीम ने जेब्रा फिंच नाम के पक्षियों पर रिसर्च की. इन पक्षियों के पंख और चोंच चमकीले नारंगी रंग के होते हैं. कुल 65 पक्षियों को तीन समूहों में बांटा गया. एक समूह को सिस्टीन दिया गया. दूसरे समूह को सिस्टीन के साथ एक दवा दी गई, जिससे फियोमेलेनिन बनना रुक जाए और तीसरा समूह सामान्य रखा गया. 30 दिनों बाद उनके खून और नए उगते पंखों की जांच की गई. इसके जरिए यह देखा गया कि कोशिकाओं पर कितना असर पड़ा.
क्या निकला नतीजा?
शोध में पाया गया कि जिन नर पक्षियों में फियोमेलेनिन बन रहा था, उनकी कोशिकाओं को कम नुकसान हुआ. वहीं जिन पक्षियों में यह पिगमेंट बनने से रोका गया, उनमें कोशिकाओं का नुकसान ज्यादा देखा गया. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह पिगमेंट सिस्टीन के हानिकारक प्रभाव को संतुलित करने का काम कर सकता है.
इंसानों पर अभी और शोध जरूरी
हालांकि, फियोमेलेनिन धूप की पराबैंगनी किरणों से सुरक्षा नहीं देता. इसी वजह से लाल बाल और गोरी त्वचा वाले लोगों में त्वचा कैंसर का खतरा ज्यादा माना जाता है. यह रिसर्च अभी पक्षियों पर की गई है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह जानने के लिए और अध्ययन जरूरी हैं कि इंसानों में भी यही प्रक्रिया काम करती है या नहीं.
सिस्टीन कहां मिलता है?
सिस्टीन प्रोटीन से भरपूर भोजन में पाया जाता है. यह सप्लीमेंट के रूप में भी मिलता है, जिसे आमतौर पर एनएसी कहा जाता है. सामान्य संतुलित आहार लेने वालों में इसकी अधिकता से खतरा कम माना जाता है. इस स्टडी का मुख्य संदेश यही है कि शरीर के बाहरी रंग और पिगमेंट का संबंध हमारी अंदरूनी सेहत से भी हो सकता है. यह शोध PNAS Nexus नाम की जर्नल में प्रकाशित हुआ है.
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