आयुर्वेद को पहला उपचार माना गया, जो त्रिकाल सत्य है : आयुर्वेदाचार्य
नई दिल्ली, 23 सितंबर (आईएएनएस)। देश और दुनिया में 11वां आयुर्वेद दिवस मनाया जा रहा है। इसका मकसद भारत की प्राचीन चिकित्सा प्रणाली के बारे में लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाना और दुनिया भर में इसके समग्र स्वास्थ्य लाभों का प्रसार करना है। हालांकि, अधिकांश लोगों का मानना है कि आयुर्वेदिक इलाज एलोपैथी की तुलना में धीमा है। इसको लेकर आयुर्वेदाचार्य राहुल ने प्रतिक्रिया दी।
उन्होंने कहा कि आयुर्वेद से हर रोग का जड़ समेत इलाज किया जा सकता है, क्योंकि हमारे ऋषि-मुनि ने भी यही कहा है कि आयुर्वेद त्रिकाल सत्य है। यह पहले भी था, अब भी है और आने वाले समय में भी रहेगा।
उन्होंने कहा कि शरीर पंच महाभूतों से बना हुआ है। पंच महाभूतों में आकाश, जल, अग्नि, वायु और पृथ्वी तत्व शामिल हैं। इस तरीके से देखा जाए तो हर चीज जो है, संतुलन में है। मगर शरीर के अंदर 7 धातु (सप्त धातु) भी हैं, जिनमें रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र धातु शामिल हैं। शरीर के अंदर एक धातु बनने में 40 दिन लगते हैं। फिर दूसरी, तीसरी धीरे-धारे सातों धातु बनते हैं। ऐसे करते हुए 280 दिन लगते हैं। हालांकि, अगर कोई व्यक्ति आयुर्वेदिक औषधियों को लगातार 240 दिनों तक लें, तो शरीर के अंदर इतना परिवर्तन हो जाएगा की कोई भी रोग हो, कोई भी बड़ा से बड़ा रोग हो, वो 240 दिन के अंदर या उससे पहले भी नष्ट हो सकता है, क्योंकि रोग की प्रतिरोधक शक्ति होती है। अगर रोग तीन दिन का हो और छह दिन दवाई खा ली, तो रोग को बिलकुल नष्ट कर सकते हैं।
आयुर्वेदाचार्य राहुल ने कहा कि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि आयुर्वेद एलोपैथी की तुलना में धीमा है, क्योंकि आयुर्वेद में भी कुछ ऐसी औषधियां हैं, जो तुरंत अपना असर दिखाती हैं। जैसे शरीर में सात धातु बनती हैं, उनमें से रस रक्त धातु सबसे पहला है। इसका मतलब है कि हम जो खाते हैं, उसका जीभ पर रस निकालता है। ऐसे में सीधे रस का सेवन कर रहे हैं और इसका प्रभाव खून में दिखाता है, जिससे शरीर पर इसका असर जल्दी दिखता है। आयुर्वेद को पहला उपचार माना गया है, क्योंकि हमारे ऋषियों ने ही कहा है कि यह त्रिकाल सत्य है, जो पहले भी था, अब भी है और आने वाले समय में भी रहेगा।
वहीं, आयुर्वेद उपचार के साथ-साथ जीवनशैली को भी बेहतर बनाने का माध्यम है। इसे लेकर दिल्ली के आयुर्वेदाचार्य डॉ. कुणाल शंकर (बीएएमएस) ने कहा कि जीवनशैली के अनुसार, स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए वात और पित्त संतुलित रहने चाहिए। मगर ओज तत्व, तेज तत्व और प्राण तत्व को बेहतर करना चाहिए। ओज तत्व को बेहतर बनाने के लिए हम 10 बादाम, सफेद मिर्च 5-6, छोटी इलायची, सौंफ और 1 चम्मच देसी घी गाय का लेंगे और गाय के दूध के अंदर उसको धागे वाली मिश्री के साथ मिलाकर लेंगे।
उन्होंने बताया कि तेज तत्व को बेहतर करने के लिए हम अदरक या सौंठ छोटे-छोटे टुकड़ों में करके लेंगे, उसमें थोड़ा नमक और थोड़ी सी नींबू मिलाकर लेंगे। इससे हमारा तेज तत्व बेहतर होगा। वहीं, प्राण तत्व के लिए हम दो चुटकी चौसठ प्रहरी पीपल को शहद के साथ मिलाकर लेंगे। इससे धीरे-धीरे हमारा प्राण तत्व जागेगा। यहां मुख्य बात हमारी इम्यूनिटी है। यह जितनी बेहतर होगी, उतना ही ज्यादा असर होगा।
--आईएएनएस
डीके/एबीएम
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2030 तक एआई-आधारित 'ट्रांसफॉर्मेशन इंजन' बन सकते हैं भारत के जीसीसी: रिपोर्ट
नई दिल्ली, 23 सितंबर (आईएएनएस)। भारत के ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (जीसीसी) वर्ष 2030 तक केवल बैक-ऑफिस या सपोर्ट इकाइयों की भूमिका से आगे बढ़कर वैश्विक कंपनियों के लिए एआई-संचालित एजेंटिक ट्रांसफॉर्मेशन इंजन बन सकते हैं। डेल टेक्नोलॉजीज और जिनोव की एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले वर्षों में वही जीसीसी सफल होंगे, जो केवल एआई प्रयोगों तक सीमित रहने के बजाय डेटा, तकनीक और शासन से जुड़ी मजबूत नींव तैयार कर वास्तविक कारोबारी परिणाम देने पर ध्यान देंगे।
रिपोर्ट के अनुसार, 70 प्रतिशत जीसीसी नेताओं के पास पहले से एआई से जुड़ा स्पष्ट रोडमैप या चार्टर मौजूद है। भारत के जीसीसी वैश्विक एआई प्रतिभा का लगभग 28 प्रतिशत हिस्सा रखते हैं और देश में 1,200 से अधिक जीसीसी केंद्र एआई तथा मशीन लर्निंग क्षमताएं विकसित कर चुके हैं।
डेल टेक्नोलॉजीज इंडिया के अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक मनीष गुप्ता ने कहा कि जैसे-जैसे जीसीसी अधिक रणनीतिक जिम्मेदारियां संभालेंगे, डेटा, इंफ्रास्ट्रक्चर और गवर्नेंस जैसी मजबूत बुनियादी क्षमताएं नवाचार का आधार बनेंगी। उनका कहना है कि जो जीसीसी अभी से इन क्षेत्रों में निवेश करेंगे, वे तय करेंगे कि वैश्विक कंपनियां एआई का उपयोग किस प्रकार करेंगी।
रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में वर्तमान में 2,100 से अधिक जीसीसी कार्यरत हैं, जो लगभग 23.6 लाख लोगों को रोजगार देते हैं और वित्त वर्ष 2025-26 में करीब 98.4 अरब डॉलर का राजस्व उत्पन्न कर चुके हैं।
जिनोव के अध्यक्ष सिद्धांत रस्तोगी ने कहा कि पिछले दो दशकों में जीसीसी की चर्चा मुख्य रूप से पैमाने, प्रतिभा और क्षमताओं को लेकर होती थी, लेकिन अब अगला दशक स्वामित्व और नेतृत्व का होगा।
रस्तोगी ने कहा कि एआई और एजेंटिक सिस्टम्स के व्यवसायिक प्रक्रियाओं में शामिल होने के साथ जीसीसी से केवल सेवाएं देने की नहीं, बल्कि उत्पादों, प्लेटफॉर्म्स, बाजारों और कारोबारिक परिणामों की जिम्मेदारी लेने की अपेक्षा की जाएगी।
रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 64 प्रतिशत जीसीसी नेता पहले से दोहरी वैश्विक जिम्मेदारियां निभा रहे हैं। वे न केवल भारत स्थित केंद्रों का संचालन कर रहे हैं, बल्कि वैश्विक स्तर पर किसी महत्वपूर्ण कारोबारी कार्य का नेतृत्व भी कर रहे हैं।
एक महत्वपूर्ण संकेत यह भी है कि 66 प्रतिशत जीसीसी नेता अपनी एआई रणनीति में राजस्व और कारोबारी प्रभाव को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं। इससे स्पष्ट है कि एआई की चर्चा अब केवल लागत कम करने तक सीमित नहीं रही, बल्कि व्यवसायिक विकास और प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त से जुड़ चुकी है।
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि एआई-आधारित एजेंटिक वर्कफ्लो पारंपरिक चैट-आधारित एआई सिस्टम्स की तुलना में कहीं अधिक कंप्यूटिंग संसाधनों की मांग करते हैं। जहां एक सामान्य चैट इंटरैक्शन में लगभग 1,000 से 2,000 टोकन्स की आवश्यकता होती है, वहीं एजेंटिक वर्कफ्लो में 10,000 से 5 लाख टोकन्स तक की जरूरत पड़ सकती है। इसलिए समय रहते सही इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश करना बेहद जरूरी होगा।
अध्ययन में यह भी अनुमान लगाया गया है कि जीसीसी में होने वाले 55 प्रतिशत नियमित कार्य एआई आधारित ऑटोमेशन के दायरे में आ सकते हैं, जबकि वर्ष 2030 तक लगभग 60 प्रतिशत कार्यबल को नए कौशल सीखने (रिस्किलिंग) की आवश्यकता होगी, इसलिए अनिवार्यता एआई प्रशिक्षण में वृद्धि करने की नहीं, बल्कि कार्य की मौलिक रूप से पुनर्कल्पना करने की है।
--आईएएनएस
डीबीपी
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