CGPSC Scam: पूर्व अध्यक्ष Taman Singh Sonwani ने CSR के नाम पर ली 45 लाख की रिश्वत, ED ने दाखिल की चार्जशीट
प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने दावा किया है कि छत्तीसगढ़ लोक सेवा आयोग (सीजीपीएससी) के गिरफ्तार पूर्व अध्यक्ष टामन सिंह सोनवानी ने 2021 की राज्य सेवा परीक्षा में एक व्यवसायी के बेटे और बहू को फायदा पहुंचाने के बदले अपने नियंत्रण वाली एक संस्था के जरिये 45 लाख रुपये लिये थे। इस धन को कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) फंडिंग के तौर पर दिखाया गया था। जांच एजेंसी ने दावा किया कि इस मामले में अपराध से हुई कुल कमाई अब तक 3.28 करोड़ रुपये आंकी गई है।
केंद्रीय एजेंसी ने राज्य में पिछली कांग्रेस सरकार के दौरान सीजीपीएससी परीक्षा घोटाले में कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के मामले में रायपुर की एक विशेष अदालत में अपनी पहली अभियोजन शिकायत (आरोप-पत्र) दाखिल की है। अभियोजन शिकायत में सात लोगों को आरोपी बनाया गया है, जिनमें सोनवानी के अलावा श्री बजरंग पावर एंड इस्पात लिमिटेड के निदेशक श्रवण गोयल, सीजीपीएससी के तत्कालीन उपनियंत्रक (परीक्षा) ललित गनवीर, उत्कर्ष चंद्राकर, उनके जीजा अनिल चंद्राकर, स्वास्थ्य अधिकारी डॉक्टर विकास चंद्राकर और अतिरिक्त कलेक्टर चेतन बोरघरिया शामिल हैं। ईडी ने दावा किया है कि परीक्षा में कथित भ्रष्टाचार से हुई कमाई ग्रामीण विकास समिति (जीवीएस) के जरिये सीएसआर फंडिंग के तौर पर मिली।
साथ ही, उम्मीदवारों से इकट्ठा किए गए पैसे को बाद में अपने पास रखा गया, इस्तेमाल किया गया, अंतरण किया गया या वैध लेन-देन के तौर पर दिखाया गया। ईडी ने वर्ष 2020 से 2023 तक सीजीपीएससी के अध्यक्ष पद पर रहे सोनवानी को धनशोधन की जांच के सिलसिले में जुलाई में गिरफ्तार किया था। यह जांच 2020 और 2021 में आयोग द्वारा डिप्टी कलेक्टर और पुलिस उपाधीक्षक जैसे पदों पर भर्ती के लिए आयोजित परीक्षाओं में कथित भ्रष्टाचार, प्रश्नपत्र लीक और हेरफेर से जुड़ी थी।
ईडी ने इस महीने की शुरुआत में बोरघरिया और उत्कर्ष चंद्राकर को गिरफ्तार किया था। धनशोधन की यह जांच छत्तीसगढ़ आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (ईओडब्ल्यू) द्वारा दर्ज प्राथमिकी, बालोद जिले में राज्य पुलिस द्वारा दर्ज एक और प्राथमिकी और 2024 में सीबीआई द्वारा दर्ज शिकायत से जुड़ी है। सीबीआई ने 2025 में एक आरोप-पत्र एवं दो पूरक आरोप-पत्र दाखिल किये थे।
एजेंसी ने सोनवानी को भी 2024 में गिरफ्तार किया था। ईडी के अनुसार, इस मामले में अपराध से हुई कमाई दो अलग-अलग स्रोतों से आई थी। पहला मामला सीजीपीएससी राज्य सेवा परीक्षा में कथित धांधली से जुड़ा है, जिसमें सोनवानी ने अध्यक्ष के रूप में प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, उनकी उपलब्धता और पूरी परीक्षा प्रक्रिया में मुख्य भूमिका निभाई थी।
ईडी का आरोप है कि व्यवसायी श्रवण कुमार गोयल के बेटे और बहू को लाभ पहुंचाने के बदले, सोनवानी द्वारा नियंत्रित संस्था ग्रामीण विकास समिति को श्री बजरंग पावर एंड इस्पात लिमिटेड से उसके सीएसआर के माध्यम से 45 लाख रुपये मिले। एजेंसी ने कहा कि यह भुगतान 20 लाख और 25 लाख रुपये की दो किस्तों में किया गया था और इसे वैध संस्थागत फंडिंग के तौर पर दिखाया गया था। एजेंसी ने कहा है सोनवानी को इस पैसे के बारे में जानकारी थी और उन्होंने इसे हासिल किया, अपने पास रखा और इसका इस्तेमाल किया।
शिकायत में कहा गया है कि गोयल के बेटे शशांक गोयल और बहू भूमिका कटियार का चयन क्रमशः तीसरी और चौथी रैंक पर हुआ था। इसमें सोनवानी के भतीजों नितेश सोनवानी और साहिल सोनवानी के क्रमशः डिप्टी कलेक्टर और पुलिस उपाधीक्षक (डीएसपी) के रूप में, और उनकी बहुओं- मीशा कोसले और दीपा आडिल के क्रमशः डिप्टी कलेक्टर और जिला आबकारी अधिकारी के रूप में चयन का भी उल्लेख किया गया है। एजेंसी ने सीजीपीएससी के परीक्षा उप-नियंत्रक ललित गनवीर की भूमिका का भी ज़िक्र किया है।
एजेंसी का दावा है कि वह दिसंबर 2020 से इस पद पर थे और साथ ही ग्रामीण विकास समिति के कोषाध्यक्ष और बैंक ऑफ महाराष्ट्र में समिति के खाते के संयुक्त अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता के तौर पर भी काम कर रहे थे। ईडी का दावा है कि उम्मीदवारों और उनके परिवारों से पैसे लिये गए थे। यह पैसा इस वादे पर लिया गया था कि उन्हें परीक्षा के प्रश्नपत्र पहले ही मिल जाएंगे और वह निश्चित तौर पर चुन लिये जाएंगे।
एजेंसी ने इस वसूली की रकम 3.13 करोड़ रुपये बताई है। एजेंसी के मुताबिक, अबतक अपराध से हुई कुल कमाई 3.28 करोड़ रुपये आंकी गई है। ईडी ने साफ किया कि उत्कर्ष चंद्राकर के बैंक खाते में जमा 72.18 लाख रुपये नकद, उसी 3.13 करोड़ रुपये का हिस्सा थे, न कि कोई अतिरिक्त कमाई।
एजेंसी ने बोरघरिया के खाते में जमा 69.85 लाख रुपये को भी उसके पास मौजूद अपराध की कमाई माना। जांच से संकेत मिला है कि उम्मीदवारों को कथित तौर पर 50 लाख से 60 लाख रुपये के भुगतान के एवज में परीक्षा प्रश्नपत्रों तक पहुंच और चयन की पेशकश की गई थी। आरोप है कि डॉक्टर विकास चंद्राकर ने भर्ती कराने वाले और संग्राहक की भूमिका निभाई।
उन्होंने उम्मीदवारों और उनके परिवारों से संपर्क किया तथा पैसे इकट्ठा किए। ईडी के रिकॉर्ड किए गए बयानों में बताया गया है कि विकास ने अनिल चंद्राकर और उत्कर्ष चंद्राकर को लगभग 3.20 करोड़ रुपये पहुंचाए। एजेंसी ने बताया कि सीजीपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा 13 फरवरी 2022 को हुई थी और इसका नतीजा आठ मार्च को घोषित किया गया था।
मुख्य परीक्षा 26 से 29 मई 2022 के बीच हुई, इसका नतीजा 22 अगस्त को घोषित किया गया, साक्षात्कार 19 से 30 सितंबर के बीच हुए और अंतिम नतीजा 11 मई 2023 को घोषित किया गया। एजेंसी का दावा है कि प्रारंभिक परीक्षा से एक दिन पहले, 12 फरवरी 2022 की शाम को उत्कर्ष चंद्राकर ने रायपुर के सिद्धि विनायक मैरिज पैलेस में लगभग 30 उम्मीदवारों को इकट्ठा किया और उन्हें लीक हुए पेपर की कॉपियां बांटीं। ईडी ने 15 सितंबर 2026 को रिकॉर्ड किए गए एक बयान का भी जिक्र किया, जिसमें विकास चंद्राकर ने कथित तौर पर कहा था कि उत्कर्ष ने उन्हें बताया था कि वह बोरघरिया से सीजीपीएससी का प्रश्नपत्र हासिल कर रहा है और बोरघरिया भी इसी तरीके से अपनी बहन का सिलेक्शन करवा रहा है।
एजेंसी ने बताया कि इसके बाद उम्मीदवारों के लिए रहने और तैयारी करने का इंतजाम आठ से 25 मई 2022 तक बरनवापारा (बलौदाबाजार) में और बाद में मुख्य परीक्षा से पहले रायपुर के होटल वेंकटेश इंटरनेशनल में किया गया। बताए गए सवालों के जवाब सिखाने के लिए कथित तौर पर ‘सक्सेस एकेडमी’ के ट्यूटर्स को पांच लाख रुपये में लाया गया। जब उम्मीदवारों का चुनाव नहीं हुआ, तो पैसे वापस करने की मांग की गई।
एजेंसी का आरोप है कि जब उम्मीदवारों ने पैसे वापस करने की मांग की, तब उत्कर्ष उन्हें जनवरी 2025 में रायपुर में बोरघरिया के सरकारी आवास पर ले गया और बताया कि उन्हीं के पास उनके पैसे हैं। एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया कि जब मार्च-अप्रैल 2023 में उम्मीदवारों की शिकायतें भिलाई में तत्कालीन मुख्यमंत्री के आवास तक पहुंचीं, तो कृष्ण कुमार चंद्रवंशी ने अनिल चंद्राकर को फोन किया और उन्हें मामला सुलझाने का निर्देश दिया। इसके बाद अनिल चंद्राकर ने आरंग (रायपुर) के परागांव में उत्कर्ष के फार्महाउस पर बैठकें कीं और उन्हें भरोसा दिलाया कि उनके पैसे छह महीने के भीतर लौटा दिए जाएंगे।
एजेंसी का दावा है कि बाद में अनिल चंद्राकर ने 25 लाख रुपये नकद लौटा दिए।
Save India Save Shariat अभियान पर जबरदस्त घमासान, All India Muslim Personal Law Board की मुहिम का Muslims ने ही कर दिया विरोध
मुस्लिम पर्सनल लॉ और समान नागरिक संहिता की बहस एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। दरअसल, 92 मुस्लिम कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और महिला अधिकार समर्थकों ने ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के राष्ट्रव्यापी ‘सेव इंडिया, सेव शरीयत’ अभियान पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि धार्मिक स्वतंत्रता के नाम पर ऐसे निजी कानूनों और व्याख्याओं का बचाव नहीं किया जा सकता जो समानता और महिलाओं के अधिकारों के प्रश्न से टकराते हों। उनका आरोप है कि सेव इंडिया, सेव शरीयत अभियान पुरुष-प्रधान व्यक्तिगत कानूनों और उनकी रूढ़िवादी व्याख्याओं को बचाने की कोशिश करता है, जबकि मुस्लिम महिलाओं के समान नागरिक अधिकारों और व्यक्तिगत कानून में सुधार की जरूरत को पीछे धकेलता है। बयान पर नसीरुद्दीन शाह, रत्ना पाठक, अमोल पालेकर, तुषार गांधी, मल्लिका साराभाई, जीनत शौकत अली, तिस्ता सीतलवाड़, राम पुनियानी सहित 92 लोगों के हस्ताक्षर बताए गए हैं।
इन लोगों की आपत्ति केवल शरीयत के नाम पर चलाए जा रहे अभियान तक सीमित नहीं है। उनका कहना है कि ऐसा अभियान राजनीतिक ध्रुवीकरण को और बढ़ा सकता है और ऐसी राजनीतिक कथा को बल दे सकता है जिसमें मुसलमानों को संवैधानिक कानून के समानांतर किसी अलग कानूनी व्यवस्था की मांग करने वाले समुदाय के रूप में प्रस्तुत किया जाए। देखा जाये तो इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा सवाल यही है कि भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा क्या है और उसके बाद संविधान की समानता कहाँ से शुरू होती है?
बोर्ड की स्थापना से ही टकराव की एक विचारधारा
हम आपको बता दें कि ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड कोई नया संगठन नहीं है। इसकी औपचारिक स्थापना अप्रैल 1973 में हुई थी। बोर्ड स्वयं अपने गठन का उद्देश्य मुस्लिम व्यक्तिगत कानून की रक्षा और ऐसे कानूनों या न्यायिक फैसलों का विरोध बताता है, जो उसके अनुसार मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के अनुप्रयोग में हस्तक्षेप करते हैं। उसके घोषित उद्देश्यों में मुस्लिम व्यक्तिगत कानून की निरंतरता सुनिश्चित करना और ऐसे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कानूनों अथवा न्यायिक फैसलों से उसे बचाना शामिल है।
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यानी आज का ‘सेव इंडिया, सेव शरीयत’ अभियान अचानक पैदा हुई सोच नहीं है। व्यक्तिगत कानून को बाहरी कानूनी हस्तक्षेप से बचाना बोर्ड की स्थापना के समय से ही उसकी केंद्रीय भूमिका का हिस्सा रहा है। बोर्ड के अपने अभिलेख बताते हैं कि 1970 और 1980 के दशक से उसके प्रस्तावों में समान नागरिक संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125-127, पारिवारिक कानून, सामाजिक सुधार और शरीयत के संरक्षण जैसे मुद्दे लगातार मौजूद रहे हैं।
बोर्ड के इतिहास का सबसे विवादित अध्याय: शाह बानो से तीन तलाक तक
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पुराने रुख को समझना हो तो शाह बानो प्रकरण से लेकर तीन तलाक तक की पूरी यात्रा को एक साथ देखना होगा। 1985 में सर्वोच्च न्यायालय ने शाह बानो मामले में स्पष्ट किया कि स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ तलाकशुदा मुस्लिम महिला दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत भरण-पोषण मांग सकती है और यह अधिकार केवल इद्दत की अवधि तक सीमित नहीं है। बाद में संसद ने 1986 में मुस्लिम महिला अधिकार संरक्षण कानून बनाया। वर्षों बाद सर्वोच्च न्यायालय ने इस कानून की व्याख्या करते हुए भी कहा कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला के लिए उचित और न्यायसंगत प्रावधान तथा भरण-पोषण की व्यवस्था केवल इद्दत की अवधि तक सीमित समझना उचित नहीं है।
शाह बानो विवाद में मुस्लिम रूढ़िवादी नेतृत्व की ओर से न्यायालय के हस्तक्षेप का विरोध हुआ और व्यक्तिगत कानून की रक्षा को धार्मिक अधिकार का प्रश्न बनाया गया। 1986 का कानून उसी राजनीतिक दबाव के वातावरण में आया। उस समय मुस्लिम महिलाओं के संगठनों और सुधारवादी समूहों ने भी कानून के खिलाफ आवाज उठाई थी। यह इतिहास इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पता चलता है कि मुस्लिम समाज के भीतर भी व्यक्तिगत कानून के प्रश्न पर कभी एकमत नहीं रहा।
इसके बाद तीन तलाक का मामला सामने आया। शायरा बानो बनाम भारत संघ मामले में तत्काल तीन तलाक की संवैधानिकता पर सवाल उठा। सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने हलफनामा भी दाखिल किया था। न्यायालय के रिकॉर्ड में दर्ज है कि बोर्ड ने निकाह के समय दूल्हे को तीन तलाक न देने की सलाह देने जैसी व्यवस्था का प्रस्ताव रखा था। 2017 में सर्वोच्च न्यायालय ने तत्काल तीन तलाक को अमान्य कर दिया।
सवाल सिर्फ शरीयत का नहीं, महिला के अधिकार का है
देखा जाये तो यहीं से आज की बहस को सबसे गंभीरता से देखने की जरूरत है। किसी व्यक्ति को अपने धर्म में विश्वास रखने, उसका पालन करने और धार्मिक आस्था के अनुसार जीवन जीने की स्वतंत्रता संविधान देता है। लेकिन अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता लोक व्यवस्था, नैतिकता, स्वास्थ्य और संविधान के अन्य प्रावधानों के अधीन है। दूसरी तरफ संविधान का अनुच्छेद 14 कानून के सामने समानता की गारंटी देता है और अनुच्छेद 15 धर्म तथा लिंग सहित निर्धारित आधारों पर भेदभाव से सुरक्षा देता है।
इसलिए धार्मिक स्वतंत्रता का अर्थ यह नहीं निकाला जा सकता कि धर्म के नाम पर चलने वाली प्रत्येक सामाजिक व्यवस्था स्वतः कानून की समीक्षा से बाहर हो जाएगी। विवाह, तलाक, भरण-पोषण, उत्तराधिकार, अभिभावकत्व और बच्चों की देखभाल जैसे विषय सीधे नागरिक अधिकारों से जुड़े हैं।
इसीलिए 92 हस्ताक्षरकर्ताओं ने मुस्लिम व्यक्तिगत कानून के संहिताकरण और सुधार की मांग करते हुए न्यूनतम विवाह आयु, बहुविवाह, तलाक, उत्तराधिकार, बच्चों की अभिरक्षा और गोद लेने जैसे विषयों में समान अधिकार की बात की है। उन्होंने हलाला और महिला जननांग विकृति जैसी प्रथाओं के खिलाफ भी आवाज उठाई है। उन्होंने पाकिस्तान, बांग्लादेश, ट्यूनीशिया और मोरक्को जैसे मुस्लिम-बहुल देशों में व्यक्तिगत कानूनों में हुए सुधारों का उदाहरण देते हुए भारत में भी सुधार की मांग की है।
क्या हर विरोध संविधान-विरोधी है?
संविधान का अनुच्छेद 44 राज्य को पूरे देश में समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने का निर्देश देता है, लेकिन यह नीति-निर्देशक तत्व है, मूल अधिकार नहीं। इसलिए असली संवैधानिक सवाल यह होगा कि जो भी कानून बनाया जाए, उसकी वास्तविक धाराएं समानता, स्वतंत्रता और धार्मिक अधिकारों के साथ किस तरह संतुलन बनाती हैं।
लेकिन इसका दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। किसी धार्मिक संस्था को यह दावा करने का संवैधानिक विशेषाधिकार नहीं है कि उसके द्वारा संरक्षित हर व्यक्तिगत कानून न्यायिक समीक्षा या सामाजिक सुधार से ऊपर है। धार्मिक संस्था नागरिकों का प्रतिनिधित्व कर सकती है, अपनी राय रख सकती है, अभियान चला सकती है, लेकिन अंतिम कानूनी अधिकार संविधान, संसद और न्यायपालिका की संवैधानिक व्यवस्था में ही निहित है।
बोर्ड से एक और बड़ा सवाल: प्रतिनिधित्व आखिर किसका?
इसके साथ ही मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से सबसे बुनियादी प्रश्न यही पूछा जा सकता है कि क्या वह पूरे मुस्लिम समाज की आवाज है या धार्मिक नेतृत्व के एक प्रभावशाली हिस्से की? क्योंकि 92 हस्ताक्षरकर्ताओं का बयान खुद इस धारणा को चुनौती देता है कि मुस्लिम समाज व्यक्तिगत कानून के प्रश्न पर एक ही राय रखता है। मुस्लिम महिलाओं के संगठन, सुधारवादी मुस्लिम बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता लंबे समय से व्यक्तिगत कानून में बदलाव की मांग करते रहे हैं। इसलिए किसी एक संस्था की व्याख्या को पूरे समुदाय की अंतिम इच्छा मान लेना अपने आप में बहस को सीमित कर देता है। इसलिए ‘सेव इंडिया, सेव शरीयत’ अभियान पूरी तरह गलत है और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के इतिहास को देखते हुए उक्त समाज को बेहद सतर्क रहना चाहिए।
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