15 वर्षीय वैभव सूर्यवंशी पर न्यूजीलैंड के कोच का बड़ा बयान, चुनौती देते हुए कहा- 'मैं उसका इंतजार कर रहा हूं...'
Vaibhav Sooryavanshi : वैभव सूर्यवंशी इन दिनों भारतीय क्रिकेट टीम के साथ जापान में मौजूद हैं. वो भारत के लिए एशियन गेम्स 2026 में हिस्सा ले रहे हैं, जहां उनके मुकाबले 28 सितंबर से शुरू होंगे. इससे पहले वैभव सूर्यवंशी को अफगानिस्तान के खिलाफ खेली गई 3 मैचों की घरेलू सीरीज से बाहर बैठना पड़ा था. अब वो एशियन गेम्स की प्लेइंग-11 में संजू सैमसन से ऊपर जगह बना पाएंगे या नहीं ये तो आने वाला समय ही बताएगा.
उससे पहले न्यूजीलैंड क्रिकेट टीम के कोच रॉब वॉल्टर ने वैभव सूर्यवंशी को लेकर बड़ा बयान दिया है. उन्होंने इशारों-इशारों में कहा है कि, न्यूजीलैंड की तेज और उछाल वाली पिचों पर भारतीय बैटिंग सेंसेशन वैभव सूर्यवंशी को उनके गेंदबाज टेस्ट करने के लिए काफी ज्यादा उत्साहित हैं. उन्होंने वैभव को लेकर और क्या कहा है, आइए इस बारे में विस्तार से जानते हैं.
वैभव सूर्यवंशी पर न्यूजीलैंड के कोच का बयान
रॉब वॉल्टर ने कहा कि, 'मैं उसे उछाल वाली विकेटों पर देखना पसंद करूंगा और देखना चाहूंगा कि यह कितना अलग दिखता है. वो एक रोमांचक खिलाड़ी है. आपने उसे आईपीएल में दुनिया के श्रेष्ठ गेंदबाजों के खिलाफ हावी होते देखा है. मुझे लगता है कि चुनौती हमेशा यह देखना है कि यह अलग-अलग कंडीशंस में कैसे काम करता है और हम अपने कंडीशंस में उसे कैसे बॉलिंग करते हैं. एक कोच के तौर पर आप हमेशा अपने खिलाड़ी को थोड़े दबाव में देखना चाहते हैं. मैं उसका इंतजार कर रहा हूं'.
Maiden international fifty ????
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Vaibhav Sooryavanshi becomes the youngest batter ever to score a T20I half-century ????
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वैभव सूर्यवंशी का अंतरराष्ट्रीय करियर
वैभव सूर्यवंशी का अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट करियर जुलाई में शुरू हुआ था. उन्होंने इंग्लैंड के खिलाफ टी20 सीरीज में अपना डेब्यू किया था, जहां उनको तीन मुकाबले खेलने के लिए मिले थे. इसके बाद वैभव ने जिम्बाब्वे के खिलाफ तीन मैच खेले. उन्होंने अपने टी20 करियर के सभी मुकाबले श्रेयस अय्यर की कप्तानी में खेले हैं.
वैभव सूर्यवंशी ने अब तक इंडियन मेंस क्रिकेट टीम के लिए 6 टी20 मुकाबले खेले हैं. इस दौरान वैभव सूर्यवंशी ने 2 हाफ सेंचुरी की मदद से कुल 193 रन बनाए हैं. उनका हाईएस्ट स्कोर 81 रन रहा है, जो जिम्बाब्वे के खिलाफ आया था. वैभव के बल्ले से अब तक कुल 16 चौके और 14 छक्के निकले हैं. उनके पास न्यूजीलैंड सीरीज में अपने आंकड़े और बेहतर करने का मौका होगा.
8️⃣1️⃣ runs
— BCCI (@BCCI) July 26, 2026
4️⃣9️⃣ deliveries
8️⃣ fours
4️⃣ sixes
Vaibhav Sooryavanshi thrilled Harare with another special outing ????????
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वैभव को पिछले 4 मुकाबलों से खेलने का मौका नहीं मिला है. अब वो कब अपना अगला मैच खेलेंगे ये तो आने वाला समय बताएगा लेकिन न्यूजीलैंड के खिलाफ अक्टूबर में होने वाली पांच मैचों की टी20 सीरीज में वैभव सूर्यवंशी खेल सकते हैं. इस सीरीज के लिए न्यूजीलैंड ने अपने स्क्वाड का भी ऐलान कर दिया है. इन दोनों टीमों के बीच सीरीज 22 अक्टूबर से 1 नवंबर तक खेली जाएगी. इस सीरीज में भारतीय बैटिंग का असली टेस्ट होगा.
न्यूजीलैंड का टी20 स्क्वाड
मिशेल सेंटनर (कप्तान), फिन एलन, माइकल ब्रेसवेल, मार्क चैपमैन, डेवोन कॉनवे, जैकब डफी, लॉकी फर्ग्यूसन, ज़ैक फाउल्केस, मैट हेनरी, बेवोन जैकब्स, काइल जैमीसन, एडम मिल्ने, डेरिल मिशेल, ग्लेन फिलिप्स, टिम सीफर्ट, नाथन स्मिथ.
Seven fast bowlers in New Zealand's 16-player group to take on India at home in five T20Is ????
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आयुर्वेद दिवस विशेष : केवल चिकित्सा नहीं, संपूर्ण जीवन का शाश्वत विज्ञान है आयुर्वेद
नई दिल्ली, 23 सितंबर (आईएएनएस)। प्रतिवर्ष जब आयुर्वेद दिवस का आयोजन होता है, तो यह केवल भारत की प्राचीन धरोहर का स्मरण मात्र नहीं होता बल्कि आधुनिक विश्व में भटकती हुई जीवनशैली को एक नई दिशा देने का वैश्विक आह्वान बन जाता है। आज जब दुनिया अवांछित दुष्प्रभावों और जीवनपर्यंत चलने वाली दवाओं की जकड़न से त्रस्त है, तब समूचा विश्व योग और आयुर्वेद की निरापद छांव की ओर देख रहा है। इसके बावजूद आधुनिक जनमानस के मन में आयुर्वेद को लेकर कुछ संशय, मिथक और जिज्ञासाएं बनी रहती हैं। इसे लेकर आईएएएनएस की हिंदी टीम ने ग्वालियर के राजकीय आयुर्वेद कॉलेज के विभागाध्यक्ष डॉ. केएल शर्मा से बातचीत की।
दरअसल, आयुर्वेद पर अक्सर यह ठप्पा लगा दिया जाता है कि यह एलोपैथी की तुलना में बहुत धीमा उपचार है। इसका जवाब जानने के लिए आईएएनएस की हिंदी टीम ने ग्वालियर के आयुर्वेदाचार्य डॉ. एलके शर्मा से बात की। डॉ. एलके शर्मा ने बताया कि वास्तव में यह धारणा ही वैज्ञानिक रूप से त्रुटिपूर्ण और ऐतिहासिक दृष्टि से प्रायोजित है। ब्रिटिश औपनिवेशिक काल से पूर्व संपूर्ण भारत और विश्व के कई हिस्सों में आयुर्वेद ही स्वास्थ्य संरक्षण और रोगोपचार का मूल आधार था। ब्रिटिश शासन और आधुनिक पेट्रो-केमिकल आधारित फार्मा उद्योग के प्रसार के दौरान यह नैरेटिव गढ़ा गया कि पारंपरिक चिकित्सा पद्धति का असर धीमा है। सच यह है कि एलोपैथी कई बार केवल लक्षणों को दबाने का त्वरित काम करती है, जिसे लोग घ्र आराम समझ लेते हैं। इसके विपरीत, आयुर्वेद रोग के मूल कारक को समाप्त करने पर कार्य करता है।
मानव शरीर कोई निर्जीव मशीन नहीं है जिसका पुर्जा रातोंरात बदल दिया जाए। जब किसी जटिल विकार जैसे मधुमेह, गठिया (आमवात/आर्थराइटिस), दमा (अस्थमा), त्वचा विकार, यकृत (लिवर) या गुर्दे (किडनी) से जुड़े रोगों का उपचार किया जाता है, तो शरीर को पुनः प्राकृतिक संतुलन में लौटने में समय लगता है। आधुनिक चिकित्सा में जहां कई विकारों में आजीवन दवाएं खानी पड़ती हैं और उनके दुष्प्रभावों से नए रोग जन्म लेते हैं, वहीं आयुर्वेद कुछ समय अवश्य ले सकता है लेकिन वह बिना किसी साइड-इफेक्ट के रोग का स्थायी समाधान प्रदान करता है।
जब आईएएनएस ने डॉ शर्मा से पूछा कि क्या आयुर्वेद जटिल रोगों को पूरी तरह खत्म कर सकता है, तो डॉ एलके शर्मा ने बताया कि इसका उत्तर आयुर्वेद की मौलिक कार्यप्रणाली में निहित है। आधुनिक चिकित्सा पद्धति मुख्य रूप से सिंगल मॉलिक्यूल (एकल अणु) आधारित दृष्टिकोण पर काम करती है जबकि आयुर्वेद का आधार पंचभौतिक सिद्धांत (आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी) है। आयुर्वेद में हर मरीज का इलाज व्यक्तिशः यानी पर्शनालाइज्ड होता है। यहां रोग के साथ-साथ रोगी की प्रकृति, सत्व (मानसिक बल), सात्म्य (अनुकूलता) और शारीरिक शक्ति का सूक्ष्म विश्लेषण किया जाता है। यही कारण है कि जहां एलोपैथी हाथ खड़े कर देती है या केवल रोग प्रबंधन की बात करती है, वहां आयुर्वेद की हर्बो-मिनरल (काष्ठौषधि एवं रसौषधि) संरचनाएं चमत्कारिक प्रभाव दिखाती हैं। हेपेटाइटिस, फैटी लिवर, गंभीर चर्म रोग और मेटाबॉलिक विकारों में आयुर्वेद ने बार-बार सिद्ध किया है कि यह केवल रोग को दबाता नहीं, बल्कि धातु स्तर पर जाकर विकृति को समूल नष्ट करने का सामर्थ्य रखता है।
डॉ शर्मा कहते हैं कि वैदिक और पौराणिक काल से (विशेषकर त्रेतायुग से) आयुर्वेद समाज को रोगमुक्त करता आया है। सतयुग तक जब विकृतियां न्यूनतम थीं, तब भी स्वास्थ्य संरक्षण के रूप में यह ज्ञान उपस्थित था। दुर्भाग्यवश, पराधीनता के दौर में भारतीय संस्कृति के साथ-साथ हमारी इस ऋषि-परंपरा को सुनियोजित ढंग से हाशिए पर धकेला गया। अंग्रेजों ने एलोपैथी को मुख्यधारा बनाकर आयुर्वेद को सीमित किया और स्वतंत्रता के बाद भी तात्कालिक नीतियों ने इसी ढर्रे को जारी रखा। परिणामस्वरूप, अपनी ही भूमि पर अमृत तुल्य यह विज्ञान अल्टरनेटिव मेडिसिन (वैकल्पिक चिकित्सा) बनकर रह गया लेकिन आज परिदृश्य बदल रहा है। आज जब आधुनिक विज्ञान प्रिवेंटिव हेल्थकेयर और होलिस्टिक वेलनेस की बात कर रहा है, तो आयुर्वेद स्वतः पहली प्राथमिकता बनने की क्षमता रखता है। आपातकालीन सर्जिकल हस्तक्षेप को छोड़कर जीवनशैली जन्य अधिकांश विकारों और प्राथमिक स्वास्थ्य के लिए आयुर्वेद को पहली पसंद बनाया जाना न केवल व्यावहारिक है बल्कि मानव स्वास्थ्य के दीर्घकालिक हित में भी है।
डॉ केएल शर्मा आगे बताते हैं कि आमतौर पर समझा जाता है कि चिकित्सा केवल बीमारों के लिए होती है लेकिन आयुर्वेद मूलतः जीवन का विज्ञान है। महर्षि चरक ने आयुर्वेद का परम प्रयोजन स्पष्ट करते हुए लिखा है, स्वस्थस्य स्वास्थ्य रक्षणम्, आतुरस्य विकार प्रशमनम् च अर्थात स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना पहली प्राथमिकता है और रोगी के विकार को शांत करना दूसरा उद्देश्य है। आयुर्वेद के पास एक स्वस्थ व्यक्ति को देने के लिए दीर्घायु और सक्रिय यौवन का पूरा विधान है। आचार्यों ने चरक और सुश्रुत संहिता के आरंभिक अध्यायों में ही दिनचर्या (दैनिक अनुशासन), ऋतुचर्या (ऋतु अनुसार आचरण) और रात्रिचर्या का विशद वर्णन किया है। यदि कोई स्वस्थ व्यक्ति इन नियमों का पालन करे, जैसे ब्रह्म मुहूर्त में जागरण, उषःपान, शरीर की मालिश (अभ्यंग) और मौसमी बदलावों के अनुरूप दिनचर्या, तो उसके बीमार पड़ने की आशंका कम हो जाती है।
डॉ केएल शर्मा ने बताया कि आयुर्वेद केवल चूर्ण या काढ़े की पुड़िया नहीं है; इसका मूल स्तंभ आहार और विहार है। आयुर्वेद में भोजन को ही महाभेषज (सर्वश्रेष्ठ औषधि) माना गया है। आयुर्वेदिक आहार की अवधारणा अत्यंत वैज्ञानिक और समृद्ध है। आचार्यों ने प्रकृति से मिलने वाले हर अन्न-जल को विभिन्न वर्गों में विभाजित किया है, जिसमें जलवर्ग, शूकधान्य वर्ग, शमीधान्य वर्ग और शाक व फल वर्ग शामिल हैं।
इसके साथ ही विहार के अंतर्गत अष्टांग योग और मानसिक गुणों का उल्लेख मिलता है। आयुर्वेद के अनुसार स्वास्थ्य केवल अंगों की क्रियाशीलता नहीं बल्कि दोषों और गुणों की समरसता है, जिसमें शारीरिक त्रिदोष, मानसिक त्रिगुण शामिल हैं। जब मनुष्य अपनी प्रकृति के अनुसार आहार ग्रहण करता है और योग तथा प्राणायाम द्वारा मानसिक सत्व को बढ़ाता है, तब वह वास्तविक स्वास्थ्य का अनुभव करता है। दोषों का विषम होना ही रोग है और उनका सम होना ही आरोग्य।
--आईएएनएस
वीकेयू/पीएम
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
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