'बुरांश का जल्दी खिलना खतरे की घंटी':नौटियाल बोले- सरकार इसे हल्के में ले रही; पर्यावरणविद का दावा- ये स्थायी बदलाव नहीं
उत्तराखंड का राज्य वृक्ष बुरांश पर इस बार समय से पहले ही फूल खिलने लगे हैं। आमतौर पर मार्च-अप्रैल में पहाड़ इसके रंग से भर जाते थे, लेकिन इस साल बारिश और बर्फबारी न होने से सूखे जैसे हालात बने हुए हैं। ऐसे में बारिश और बर्फबारी ना होना ही बुरांश जल्दी खिलने की वजह माना जा रहा है। मामले पर एक्टिविस्ट अनूप नौटियाल इसे गवर्नेंस और पॉलिसी से जोड़कर देख रहे हैं, उनका कहना है की बुरांश का जल्दी खिलना कोई नई बात नहीं है, मुद्दा ये है कि सरकार क्लाइमेट चेंज के लिए कुछ कर नहीं रही है। वहीं, पर्यावरणविद एसपी सती कहते हैं कि इसे बुरांश की प्राकृतिक टेंडेंसी और मौसम की वेरिएबिलिटी के तौर पर भी समझना चाहिए। यह कोई स्थायी चीज नहीं है, अगर बारिश जल्दी हो तो बुरांश पहले की तरह मार्च-अप्रैल में ही खिलता हुआ दिखेगा। सूखे के बीच समय से पहले खिलना, बदलते मौसम की तरफ इशारा आमतौर पर बसंत ऋतु में बुरांश के फूल पहाड़ों की खूबसूरती बढ़ाते हैं। माघ, फागुन, चैत्र, बैशाख के महीनों में पहाड़ी इलाकों में मौसमी फल-फूलों की गतिविधि बढ़ती है और मार्च-अप्रैल में बुरांश अपने पीक पर रहता है। लेकिन इस साल बारिश और बर्फबारी न होने से सूखे जैसे हालात हैं। ऐसे में बुरांश का जल्दी खिलना इस बात की तरफ इशारा कर रहा है कि तापमान और नमी के पैटर्न में बदलाव के साथ पौधों की प्रतिक्रिया भी बदल रही है। उत्तराखंड का राजकीय वृक्ष, हिमाचल-नागालैंड का राजकीय पुष्प बुरांश उत्तराखंड का राजकीय वृक्ष है। जबकि यह हिमाचल प्रदेश और नागालैंड का राजकीय पुष्प भी है। नेपाल में भी बुरांश के फूल को राष्ट्रीय फूल घोषित किया गया है। यही वजह है कि बुरांश सिर्फ उत्तराखंड की पहचान नहीं, बल्कि पूरे हिमालयी क्षेत्र की एक अहम प्राकृतिक पहचान माना जाता है। अनूप नौटियाल बोले- 'ये क्लाइमेट नहीं, गवर्नेंस का भी इश्यू है' अनूप नौटियाल का कहना है कि बुरांश का समय से पहले खिलना कोई पहली बार की घटना नहीं है। उनके मुताबिक यह बदलाव पिछले कई सालों से देखा जा रहा है, इसलिए सवाल सिर्फ “क्यों हो रहा है” का नहीं, बल्कि यह भी है कि इसे लेकर कोई गंभीर स्टडी और नीति स्तर पर तैयारी क्यों नहीं हुई। 'ये बुरांश की प्रकृति में भी है, इसे स्थायी बदलाव मत मानिए' पर्यावरणविद एसपी सती का कहना है कि बुरांश का जल्दी खिलना हमेशा “स्थायी परिवर्तन” का संकेत नहीं होता। उनके मुताबिक बुरांश मौसम के बदलावों को काफी हद तक एकॉमॉडेट कर लेता है और बारिश, ठंड या तापमान के हिसाब से फूलने में फ्लक्चुएशन दिखाता है। सती के मुताबिक अगर यह बदलाव स्थायी रूप से होने लगे तो उसे जेनेटिक चेंज की तरह देखा जा सकता है, लेकिन अभी इसे पूरी तरह “परमानेंट” मान लेना सही नहीं है। उनके मुताबिक अगले साल अगर दिसंबर से मार्च के बीच बारिश का पैटर्न बदल जाए तो फूलने का समय भी पुराने ढंग में लौट सकता है। 'क्लाइमेट वेरिएबिलिटी बढ़ रही, कई प्रजातियां अपना सीजन बदलती हैं' एसपी सती के मुताबिक मौसम में वेरिएबिलिटी बढ़ने से सिर्फ बुरांश नहीं, कई पौधे और जीव भी अपने व्यवहार में बदलाव दिखाते हैं। उनका कहना है कि कई प्रजातियां अपने ब्रीडिंग या सीजनल एक्टिविटी में बदलाव करती हैं, ताकि सर्वाइवल बना रहे। वहीं अनूप नौटियाल का कहना है कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्य में ऐसे संकेतों को केवल “नेचुरल फ्लक्चुएशन” कहकर हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए। उनके मुताबिक यह इकोलॉजिकल बदलाव का संकेत है और इसे लेकर राज्य को तैयारी और नीति स्तर पर सोचना होगा। अब समझिए बुरांश की अहमियत... --------------------- ये खबर भी पढ़ें... केदारनाथ-बद्रीनाथ में अभी तक नहीं जमी बर्फ:NASA की सैटेलाइट तस्वीरों में पहाड़ सूखे-काले; तुंगनाथ में 1985 के बाद पहली बार बर्फ गायब उत्तराखंड में इस बार सर्दियों के पीक सीजन में भी हिमालय के कई इलाकों में सामान्य के मुकाबले बहुत कम हिमपात रिकॉर्ड हुआ है। NASA FIRMS प्लेटफॉर्म से ली गई सैटेलाइट तस्वीरें इसकी गवाही दे रही हैं, जिसमें केदारनाथ और बद्रीनाथ जैसे प्रमुख धार्मिक धामों के आसपास के पहाड़ सूखे और काले नजर आ रहे हैं।(पढ़ें पूरी खबर)
सख्त भू कानून के बावजूद अल्मोड़ा में बिक रही जमीन:ग्रामीणों का दावा- बिचौलिए जमीन खरीदकर 20 गुना ज्यादा रेट में बेच रहे
उत्तराखंड में सख्त भू-कानून के बावजूद अल्मोड़ा जिले में बाहरी व्यक्तियों को जमीन बेची जा रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि यूपी के पहले मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत के पैतृक गांव खूंट, धामस और बलसा गांवों में बिचौलिए दबाव, धमकी और मारपीट के जरिए जमीन औने-पौने दामों में खरीद रहे हैं और फिर बाहरी लोगों को कई गुना महंगे रेट पर बेच रहे हैं। ग्रामीणों के मुताबिक 50 हजार से 1.5 लाख रुपए प्रति नाली में जमीन खरीदी जा रही है, जबकि बाद में यही जमीन 10 से 15 लाख रुपए प्रति नाली तक में बेची जा रही है। मामले में तीन वीडियो सामने आए हैं, जिनमें कब्जे, धमकियों और गोल खाते की जमीन की रजिस्ट्री तक के आरोप लगाए गए हैं। ग्रामीणों और वकील ने कार्रवाई नहीं होने पर जिलाधिकारी घेराव की चेतावनी दी है। पहले जानिए सामने आए तीन वीडियो में क्या? पहला वीडियो ग्रामीण बोला “गांव की जमीन बाहरी लोगों को नहीं मिलेगी” पहले वीडियो में एक ग्रामीण बाहरी लोगों से तीखी बहस करता नजर आता है। वह कहता है कि गांव की जमीन बाहर के लोगों को नहीं दी जाएगी और जबरदस्ती नहीं चलेगी। ग्रामीण का आरोप है कि विरोध करने पर उसके साथ मारपीट की गई और उसका पैर व पसली तक तुड़वा दी गई। वह यह भी दावा करता है कि गांव की जमीन गोल खाते में रजिस्ट्री कराई जा रही है और अब तक करीब 500 नाली जमीन बिक चुकी है। वीडियो में ग्रामीण मुख्यमंत्री और जिलाधिकारी से हस्तक्षेप की गुहार लगाता है। साथ ही चेतावनी देता है कि अगर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो कोई बड़ी घटना हो सकती है। दूसरा वीडियो खेत में पहुंचे बाहरी लोग, 1.5 लाख में जमीन बेचने का दबाव दूसरे वीडियो में धामस गांव का एक व्यक्ति सड़क किनारे खड़े लोगों से तीखी बहस करता नजर आता है। वीडियो में वह दावा कर रहा है कि ये लोग बाहरी लोग हैं और यहां गांव में जमीन खरीदने आए हैं। वीडियो में व्यक्ति कहता है कि गांव की जमीन बाहर के लोगों को नहीं दी जाएगी और जबरदस्ती नहीं चलेगी। इस वीडियो में मोहन सिंह नाम के व्यक्ति का भी जिक्र आता है, जिस पर जमीन की खरीद-फरोख्त कराने के आरोप लगाए जा रहे हैं। तीसरा वीडियो वकील ने अधिकारियों से बहस की, “गोल खाते की जमीन की भी रजिस्ट्री” तीसरे वीडियो में हाईकोर्ट के वकील विनोद तिवारी नायब तहसीलदार और अन्य अधिकारियों से बहस करते दिख रहे हैं। इसके साथ ही एक व्यक्ति रोते हुए अपने साथ हुई मारपीट के बारे में बता रहा है। वीडियो में वकील अधिकारियों के साथ तीखी बहस और व्यक्ति के साथ मारपीट करने वालों पर कार्रवाई की बात भी कर रहे हैं। अब समझिए पूरा मामला आखिर है क्या 50 हजार नाली खरीद 10 लाख में बेच रहे वकील विनोद नेगी का दावा है की खूंट, धामस और बलसा क्षेत्र में 500 से 600 नाली जमीन की खरीद-फरोख्त हो चुकी है। उनके अनुसार ग्रामीणों से 50 हजार से 1.5 लाख रुपए प्रति नाली में जमीन खरीदकर बाहरी लोगों को 10 से 15 लाख रुपए प्रति नाली में बेची जा रही है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कई जमीनें गोल खाते की हैं, जिनका बंटवारा अभी तक नहीं हुआ, फिर भी उनकी रजिस्ट्री कर दी गई। अधिवक्ता का कहना है कि सड़क किनारे की जमीनों को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है, जिससे गांव के नीचे जाने के रास्ते तक बंद हो रहे हैं। विरोध करने पर ग्रामीणों के साथ मारपीट और जान से मारने की धमकियां दी जा रही हैं। गांव में हुई बैठक- नायब तहसीलदार-पटवारी पहुंचे इस पूरे मामले को लेकर रविवार को खूंट–धामस गांव में ग्रामीणों की अलग बैठक हुई। बैठक में ग्रामीणों ने एक स्वर में भूमाफियाओं के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की मांग रखी। ग्रामीणों का कहना है कि जमीन बिकवाने के लिए दबाव बनाया जा रहा है और विरोध करने वालों के साथ मारपीट तक की जा रही है। बैठक में नायब तहसीलदार और पटवारी भी पहुंचे। ग्रामीणों ने अधिकारियों को पूरे घटनाक्रम की जानकारी दी और निष्पक्ष जांच कराने के साथ दोषियों पर मुकदमा दर्ज करने की मांग की। नाली में कैसे मापी जाती है जमीन पहाड़ों में जमीन नाली के हिसाब से नापी जाती है। 1 नाली में करीब 200 वर्ग मीटर जमीन आती है, यानी लगभग 2152 स्क्वायर फीट। ग्रामीण इलाकों में इसे 16 मुट्ठी जमीन के बराबर 1 नाली भी माना जाता है। जमीन की सही स्थिति जानने के लिए लोग अपनी तहसील के रिकॉर्ड रजिस्टर में पिछले 12 से 20 साल का रिकॉर्ड देख सकते हैं। इसी गांव में जन्में थे गोविंद बल्लभ पंत... गोविंद बल्लभ पंत उत्तरप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री और भारत रत्न से सम्मानित नेता थे। उनका जन्म अल्मोड़ा के खूंट गांव में हुआ था। बचपन का ज्यादा समय अल्मोड़ा में बीता और उनका पालन-पोषण मौसी धनीदेवी ने किया। उन्होंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से पढ़ाई की और कानून में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। वकालत के जरिए काशीपुर-नैनीताल क्षेत्र में उनकी मजबूत पहचान बनी। उन्होंने कुमाऊं में राष्ट्रीय आंदोलन को अहिंसा के आधार पर संगठित किया और 1921, 1930, 1932 व 1934 के आंदोलनों में भाग लेकर करीब 7 साल जेल में रहे। 1937 से लेकर 1954 तक वह यूपी के मुख्यमंत्री रहे। 1961 में 73 साल की उम्र में उन्होंने अपनी आखिरी सांस ली। 4 प्वाइंट्स में समझिए उत्तराखंड का लैंड लॉ नगर निकायों में भी ले सकते हैं जमीन प्रदेश का भू-कानून सभी 13 जिलों के नगर निगम, नगर पालिका और नगर पंचायत जैसे निकाय क्षेत्रों में प्रभावी नहीं है। यानी निकाय सीमा के भीतर जमीन की खरीद-फरोख्त पर भू-कानून के तहत कोई रोक लागू नहीं होती। उत्तराखंड में कुल 107 निकाय हैं, जिनमें हरिद्वार और ऊधम सिंह नगर में 33, जबकि पहाड़ी जिलों में 73 निकाय आते हैं। इसमें श्रीनगर, अल्मोड़ा, पिथौरागढ़ और उत्तरकाशी जैसे बड़े शहर भी शामिल हैं। -------------- ये खबर भी पढ़ें.... पर्यटकों के कारण खतरे में उत्तराखंड की धरोहर:छूने से मिट रही हजारों साल पुरानी पेंटिंग्स, आदिमानवों ने लखुडियार गुफा में बनाए थे ये चित्र उत्तराखंड की ऐतिहासिक धरोहर 'लखुडियार' की प्राचीन रॉक पेंटिंग्स मिटने की कगार पर हैं। अल्मोड़ा में सुयाल नदी के तट पर स्थित इस प्रागैतिहासिक स्थल पर पर्यटकों द्वारा नाम लिखने और सुरक्षा कर्मियों की कमी के चलते हजारों साल पुराना इतिहास खतरे में आ गया है। अब इस धरोहर के संरक्षण के लिए मजबूत दीवार बनाई जाएगी। (पढ़ें पूरी खबर)
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