Pakistani Soldiers Killed In Attack: उड़ा डाला पाकिस्तानी सेना का काफिला, सैनिकों के उड़े चिथड़े!
पाकिस्तान में लगातार हमलों का सिलसिला बढ़ता जा रहा है। कुछ घंटे पहले ही खबर पख्तूखा की। एक मस्जिद में कई धमाके हुए थे जिसमें 30 से ज्यादा लोगों के चिथड़े उड़ गए। इस हमले से अभी पाकिस्तान उभर नहीं पाया था कि अब एक और भीषण ब्लास्ट से पूरा देश दहल उठा हुआ है। यह बड़ा हमला उस वक्त हुआ है जब पाकिस्तान ने अफगानिस्तान के इलाके में एयर स्ट्राइक करके कई लोगों को मार डाला है। जिसके बाद बढ़ के तालिबान ने ऐलान करते हुए कहा है कि इस हमले का तगड़ा जवाब दिया जाएगा। उधर तालीबान हमले की तैयारी में जुटा हुआ था कि पाकिस्तान में अचानक से भीषण धमाके शुरू हो गए। दरअसल बलूचिस्तान के नौकुंडी इलाके में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के एक काफिले पर बड़े हमले की खबर सामने आई है। मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि हमले में पाकिस्तान के सात सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं। इनमें से पांच शव मौके से निकाल लिए जाने की बात कही जा रही है। जबकि दो शव रेगिस्तान में ही रह गए।
इसे भी पढ़ें: Pakistan: PTI के प्रदर्शन से पहले Imran Khan की दो और बहनें हिरासत में, कोट लखपत जेल भेजी गईं
सुरक्षा खतरे के कारण उन्हें वहां से निकालना संभव नहीं हो सका। हालांकि पाकिस्तानी सेना मौत के सटीक आंकड़े को छिपा रही है। नौकुंडी इलाका वो इलाका है जो ईरान और अफगानिस्तान की सीमाओं के करीब है। जैसे ही हमला हुआ और कई जवानों के चितड़े उड़े तो पाकिस्तानी सेना के जवान इलाका छोड़कर भाग छूटे। यहां तक कि एंबुलेंस टीम भी मौके तक पहुंचने में हिचक रही थी क्योंकि दोबारा हमले का खतरा बताया जा रहा था। यही वजह बताई जा रही है कि मारे गए सुरक्षा कर्मियों में से दो के शव अब तक मौके से नहीं निकाले जा सके हैं। बलूचिस्तान के कई हिस्सों में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों और अलगाववादी समूहों के बीच हिंसा की लगातार खबरें सामने आ रही हैं। बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी यानी कि बीएलए पर पाकिस्तानी सैन्य काफिलों, चौकियों को निशाना बनाने के आरोप लगते रहे हैं। बीएएलए ने हाल ही के कई हमलों की जिम्मेदारी भी ली है।
इसे भी पढ़ें: तालिबान के सफेद विमान ने मचाया तहलका, चौंके करोड़ों भारतीय!
3 सितंबर को ही पाकिस्तानी सेना और सुरक्षा बलों के खिलाफ दो अलग-अलग हमले हुए थे। जिसमें पाकिस्तान के कुछ जवान मारे गए थे। इसके अलावा अगस्त के अंत में मस्तुंग के पास एक सैन्य काफिले पर आईडी हमला हुआ था जिसमें 13 सैनिकों मारे गए थे। तो वहीं जुलाई में ग्वादर कोस्ट गार्ड कैंप पर आत्मघाती हमला हुआ था। जिसकी जिम्मेदारी बीएएलए की मजीद ब्रिगेड ने ली थी और 30 से ज्यादा पैरामिलिट्री जवान मारे जाने की खबर सामने आई थी। यानी कि बीएलए लगातार पाकिस्तानी सेना को भारी नुकसान पहुंचा रही है क्योंकि पाकिस्तान की सेना लगातार बलूचों पर अत्याचार कर रही है और उनकी जायज मांगे वाले आंदोलन को दबाने के लिए निहत्ते लोगों पर गोलियां बरसा रही है। जिसके चलते बलूच विद्रोही और ज्यादा भड़कते हुए दिखाई दे रहे हैं। बलोच लिबरेशन आर्मी यानी बीएलए पाकिस्तान पर हमला इसलिए भी कर रही है क्योंकि वह बलूचिस्तान को पाकिस्तान से पूरी तरह आजाद कराना चाहती है और बलूच लोगों के लिए एक स्वतंत्र देश की मांग कर रही है। बीएएलए और स्थानीय लोगों का आरोप है कि सरकार यहां के संसाधनों का इस्तेमाल तो करती है लेकिन उसका फायदा स्थानीय बलूच आबादी को नहीं मिलता। बीएएलए चीन पाकिस्तान आर्थिक गलियारे और चीनी नागरिकों की मौजूदगी का भी खड़ा विरोध कर रही है। लेकिन पाकिस्तानी सेना और सरकार उनकी मांगों को नजरअंदाज करके उनको गोलियों से भून रही है।
Russia-China Counter: ग्रीनलैंड में मिलिट्री बेस बनाएगा अमेरिका, हो गई बड़ी डील!
ग्रीनलैंड को लेकर पिछले कई महीनों से अमेरिका और डेनमार्क के बीच तनाव चरम पर था। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की नजरें लंबे वक्त से ग्रीनलैंड पर थी। ट्रंप का कहना था कि आर्कटिक में रूस और चीन की बढ़ती मौजूदगी के बीच ग्रीनलैंड अमेरिका की सुरक्षा के लिए बेहद जरूरी है। ट्रंप तो ग्रीनलैंड को अमेरिका का हिस्सा बनाने की मांग तक कर चुके थे। लेकिन अब कहानी में बड़ा मोड़ आ गया। न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के दौरान अमेरिका डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने एक त्रिपक्षीय रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए और इस समझौते का मतलब ग्रीनलैंड का अमेरिका में विलय नहीं। ग्रीनलैंड डेनमार्क के साम्राज्य के भीतर एक स्वायत क्षेत्र बना रहेगा। लेकिन इसके बदले अमेरिका को ग्रीनलैंड में अपनी सैन्य मौजूदगी काफी बढ़ाने का रास्ता मिल गया है। सबसे पहले अगर इस समझौते की बात कर लें तो अमेरिका ग्रीनलैंड में गोल्डन डोम मिसाइल डिफेंस सिस्टम स्थापित कर सकता है। यह सिस्टम अमेरिका की तरफ आने वाले बैलेस्टिक मिसाइल खतरों से सुरक्षा के लिए बनाया जा रहा है। इसके अलावा अमेरिका को ग्रीनलैंड में दो और सैन्य साइट्स खोलने की अनुमति का रास्ता मिला है। इनमें से एक नजा स्वार्क है जो कभी अमेरिकी सैन्य एयरबेस से रह चुका है। दूसरा है मेस्टर्स विंग जहां फिलहाल डेनमार्क की स्पेशल फोर्स यूनिट की गतिविधियां होती हैं।
इसे भी पढ़ें: UNGA 2026 Live: अमेरिका-ईरान तनाव के बीच न्यूयॉर्क पहुंचे पेजेशकियन, दुनिया के मंच पर रखेंगे अपना पक्ष
ध्यान देने वाली बात यह है कि अमेरिका की ग्रीनलैंड में पहले से ही एक बड़ी सैनी मौजूदगी है। वहां पिटोफिक स्पेस बेस मौजूद है जो अमेरिका के लिए अंतरिक्ष और मिसाइल निगरानी के लिहाज से बेहद अहम है। और अब इस नए समझौते के बाद अमेरिका भविष्य में और सैन्य सुविधाओं की मांग कर सकता है। हालांकि इसके लिए आपसी सहमति जरूरी होगी। अब एक सवाल कि आखिरकार अमेरिका को ग्रीनलैंड में इतनी दिलचस्पी क्यों है? इसके लिए ग्रीनलैंड की लोकेशन को समझना जरूरी है। ग्रीनलैंड उत्तरी अमेरिका और यूरोप के बीच आर्कटिक में स्थित है। यह इलाका रूस के बेहद करीब है और आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की गतिविधियां बढ़ने के बीच अमेरिका इसे रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण मानता है। इसके अलावा ग्रीनलैंड प्राकृतिक संसाधन और खनिजों से समृद्ध है और यही वजह है कि अमेरिका वहां रूस और चीन की सैन्य या रणनीतिक मौजूदगी को लेकर चिंतित है। नए समझौते में यह भी तय किया गया कि नेटो से बाहर के देशों को ग्रीनलैंड में सैन्य ठिकाने स्थापित करने की इजाजत नहीं होगी। इसके साथ ही संवेदनशील क्षेत्रों जैसे महत्वपूर्ण इंफ्रास्ट्रक्चर और प्राकृतिक संसाधन की निकासी में कुछ विदेशी निवेश पर प्रतिबंध लगाए गए हैं। यानी अमेरिका की चिंता सिर्फ सैन्य ठिकानों तक सीमित नहीं है। ग्रीनलैंड में चीन या रूस जैसे देशों के रणनीतिक और आर्थिक प्रभाव को रोकना इस समझौते का अहम हिस्सा है।
इसे भी पढ़ें: UNGA 2026 highlights: ट्रंप ने ईरान को धमकाया, तुर्किये ने कश्मीर का मुद्दा उठाया, भूटान ने मोदी का गुण गाया, UN में किसने क्या-क्या कहां, सब विस्तार से यहां पढ़ें
वहीं समझौते पर हस्ताक्षर के बाद ट्रंप ने इसे अमेरिकी सुरक्षा के लिहाज से अहम बताया। ट्रंप ने कहा कि यह समझौता लंबे समय से चल रही कोशिशों का नतीजा है और अब अमेरिका, डेनमार्क और ग्रीनलैंड मिलकर काम करेंगे। यूएन में अपने संबोधन के दौरान भी ट्रंप ने यह कहा कि इस समझौते से ग्रीनलैंड की सुरक्षा और वहां की दूसरी जरूरत पर अमेरिका को परमानेंट कंट्रोल मिलेगा। ट्रंप ने साफ किया कि अमेरिका नहीं चाहता कि उसका कोई प्रतिद्वंदी ग्रीनलैंड में सैन्य मौजूदगी बनाए। या संवेदनशील क्षेत्रों में ऐसा निवेश करें जिससे उसे रणनीतिक प्रभाव हासिल हो सके और इसके बाद ट्रंप ने वह बात भी कही जो बताती है कि अमेरिका ग्रीनलैंड में कितनी बड़ी सैन्य मौजूदगी चाहता है। ट्रंप ने कहा कि अमेरिका जल्द ही ग्रीनलैंड में बड़ी सैन्य मौजूदगी विकसित करने की प्रक्रिया शुरू करेगा और दो बड़े सैन्य ठिकाने बनाए जाएंगे। करीब 75 साल पहले ग्रीनलैंड की रक्षा को लेकर अमेरिका और डेनमार्क के बीच समझौता हुआ था और अब उससे भी बड़ा समझौता किया जा रहा है। फ्रेडरिकन ने इसे ऐसा समझौता बताया जो हमेशा तक चल सकता है। उन्होंने कहा कि इससे अमेरिका, ग्रीनलैंड, डेनमार्क और नेटो की साझा सुरक्षा मजबूत होगी।
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
prabhasakshi









