आज का पंचांग 19 सितंबर 2026: तिथि, शुभ मुहूर्त, राहुकाल, चौघड़िया, सूर्योदय-सूर्यास्त
आज की तिथि क्या है?: आज भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि है, जो दोपहर 3 बजकर 27 मिनट तक रहेगी। इसके बाद नवमी तिथि शुरू हो जाएगी। यहां जानें ज्योतिषाचार्य डॉक्टर मनीष गौतम जी महाराज से आज के दिन का पंचांग, सूर्य, चंद्रमा की स्थिति और शुभ-अशुभ समय।
- वार: शनिवार
- नक्षत्र: मूल-देर रात लगभग 1:43 बजे तक
- योग: आयुष्मान-दोपहर 2:29 बजे तक
- करण: बव-दोपहर 3:27 बजे तक
शुभ मुहूर्त
- अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:55 बजे से दोपहर 12:44 बजे तक
- ब्रह्म मुहूर्त: सुबह 4:40 बजे से 5:27 बजे तक
- अमृत काल: शाम 6:31 बजे से रात 8:19 बजे तक
- विजय मुहूर्त: लगभग 11:55 बजे से 12:44 बजे तक
राहुकाल
- राहुकाल: सुबह 9:17 बजे से 10:48 बज तक
- यमगण्ड: दोपहर 1:51 बजे से 3:23 बजे तक
- गुलिक काल: सुबह 6:14 बजे से 7:45 बजे तक
- दुर्मुहूर्त: सुबह लगभग 7:03 बजे से 7:51 बजे तक
सूर्योदय-सूर्यास्त
- सूर्योदय: सुबह 6:14 बजे
- सूर्यास्त: शाम 6:26 बजे
- चंद्रोदय: दोपहर लगभग 1:30 बजे
- चंद्रास्त: रात लगभग 12:10 बजे (20 सितंबर)
आज के व्रत
- राधाष्टमी व्रत
- दुर्गाष्टमी व्रत
- 16 दिवसीय महालक्ष्मी व्रत का आरंभ
आज का पर्व
राधाष्टमी, दुर्गाष्टमी और महालक्ष्मी व्रत आरंभ।
आज का धार्मिक महत्व
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की अष्टमी को राधाष्टमी के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता में यह श्रीराधा के प्राकट्य दिवस से जुड़ा पर्व है और इस दिन राधा-कृष्ण की पूजा, व्रत तथा भक्ति-साधना की जाती है। इसी दिन से सोलह दिवसीय महालक्ष्मी व्रत की शुरुआत भी मानी जाती है। भक्त माता लक्ष्मी की पूजा-अर्चना और व्रत के माध्यम से सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
Vishwakarma Puja 2026: विश्वकर्मा पूजा पर क्यों की जाती है औजारों-मशीनों की पूजा? जानें उन्हें विश्राम देने की वजह
Vishwakarma Puja 2026: भगवान विश्वकर्मा को हिंदू धर्म में शिल्प, वास्तु और निर्माण का देवता माना जाता है। हर साल 17 सितंबर को कन्या संक्रांति के अवसर पर विश्वकर्मा पूजा मनाने की परंपरा है। इस दिन खासतौर पर कारखानों, दुकानों, वर्कशॉप और दूसरे कार्यस्थलों पर भगवान विश्वकर्मा की पूजा की जाती है।
विश्वकर्मा पूजा की सबसे खास परंपराओं में औजारों, मशीनों, वाहनों और काम में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों का पूजन शामिल है। कई जगह इस दिन मशीनों को बंद रखकर उन्हें आराम भी दिया जाता है। ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर यंत्रों की पूजा क्यों की जाती है और उन्हें एक दिन विश्राम देने के पीछे क्या मान्यता है?
भगवान विश्वकर्मा को माना जाता है पहला शिल्पकार
धार्मिक ग्रंथों और पौराणिक परंपराओं में भगवान विश्वकर्मा को सृष्टि का पहला शिल्पकार और निर्माण का देवता माना गया है। मान्यता है कि उन्होंने सोने की लंका, द्वारका नगरी, इंद्रपुरी और पुष्पक विमान जैसी अद्भुत रचनाओं का निर्माण किया था।
इसी धार्मिक मान्यता के चलते शिल्प, निर्माण और तकनीकी काम से जुड़े लोग अपने काम में इस्तेमाल होने वाले औजारों और मशीनों को भगवान विश्वकर्मा का प्रतीक मानते हैं। विश्वकर्मा पूजा के दिन इन यंत्रों की पूजा करके उनके प्रति सम्मान और कृतज्ञता प्रकट किया जाता है।
मशीनों को क्यों दिया जाता है विश्राम?
विश्वकर्मा पूजा पर कई कारखानों, दुकानों और वर्कशॉप में काम बंद रखा जाता है। सुबह कार्यस्थल की सफाई करने के बाद मशीनों और औजारों को साफ किया जाता है और उनका पूजन किया जाता है।
पूरे साल काम में लगे रहने वाले उपकरणों को इस दिन इस्तेमाल न करने की परंपरा भी कई जगह देखने को मिलती है। धार्मिक दृष्टि से इसे यंत्रों के प्रति सम्मान से जोड़कर देखा जाता है। वहीं व्यावहारिक रूप से भी यह दिन मशीनों की सफाई, रखरखाव और उनकी स्थिति जांचने के लिए उपयोगी हो सकता है।
कैसे करें औजारों और मशीनों की पूजा?
विश्वकर्मा पूजा के दिन सबसे पहले कार्यस्थल, दुकान या कारखाने की अच्छी तरह सफाई की जाती है। इसके बाद एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर भगवान विश्वकर्मा और भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित करने की परंपरा है।
इसके बाद रोली, अक्षत, चंदन, फूल और माला से भगवान की पूजा की जाती है। काम में इस्तेमाल होने वाले औजारों, मशीनों और वाहनों पर भी तिलक लगाया जाता है। कई स्थानों पर यंत्रों पर रक्षा सूत्र बांधने की परंपरा है। धूप-दीप जलाकर आरती की जाती है और भगवान को फल व मिठाई का भोग लगाया जाता है। पूजा के बाद प्रसाद सभी लोगों में बांटा जाता है।
क्या होती है औजारों की पूजा की मान्यता?
धार्मिक मान्यता के अनुसार, काम में इस्तेमाल होने वाले औजार और मशीनें भगवान विश्वकर्मा की कृपा का प्रतीक मानी जाती हैं। इसलिए इनकी पूजा करने से कार्यक्षेत्र में शुभता और समृद्धि आने की मान्यता है।
विश्वास किया जाता है कि भगवान विश्वकर्मा की पूजा से कारोबार में तरक्की, कार्य में सफलता और कार्यस्थल पर सुख-शांति बनी रहती है। मशीनों और वाहनों की नियमित देखभाल को भी इस परंपरा से जोड़ा जाता है।
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