1961 तक कुवैत में वैध था भारत का रुपया, जानें दोनों देश के बीच कैसा है संबंध?
नई दिल्ली, 17 जनवरी (आईएएनएस)। भारत और बांग्लादेश के बीच दीर्घकालिक संबंध हैं। खाड़ी क्षेत्र में कुवैत को भारत का एक अहम साझेदार माना जाता है। खास तौर से ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों और व्यापार के संदर्भ में दोनों देशों के बीच बहुआयामी संबंध हैं।
भारत और कुवैत के बीच राजनयिक संबंध 1961 में कुवैत की आजादी के तुरंत बाद स्थापित हुए थे। दोनों देश एक-दूसरे की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान करते हैं। भारत खाड़ी क्षेत्र में शांति और स्थिरता का समर्थक रहा है। वहीं कुवैत ने भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कई बार भारत के रुख को समझा और समर्थन दिया। 1961 तक कुवैत में भारतीय करेंसी रुपया वैध था। वर्ल्डोमीटर के हिसाब से कुवैत की जनसंख्या 5,026,078 और क्षेत्रफल करीब 17,818 वर्ग किलोमीटर है।
दोनों देशों के बीच विदेश मंत्रालय स्तर पर लगातार संवाद, राजनीतिक परामर्श और उच्चस्तरीय यात्राएं होती रही हैं। कुवैत भारत को एक भरोसेमंद एशियाई साझेदार के रूप में देखता है, जबकि भारत के लिए कुवैत खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) में एक संतुलित और स्थिर देश है। वहीं तेल की खोज के बाद भारत के साथ कुवैत के संबंध और भी गहरे होते गए।
पीएम मोदी के नेतृत्व में दोनों देशों के संबंधों में और मजबूती आई है। इस सिलसिले में पीएम मोदी का 2024 का कुवैत दौरा खास माना जाता है। पीएम मोदी ने 21-22 दिसंबर 2024 को कुवैत का दौरा किया था। करीब 43 सालों के बाद भारत के किसी प्रधानमंत्री ने कुवैत का दौरा किया।
इससे पहले 1981 में तत्कालीन पीएम इंदिरा गांधी कुवैत पहुंची थीं। भारत और कुवैत के बीच तेल से पहले खजूर का व्यापार होता था। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से घोड़ों का व्यापार खत्म हो गया, लेकिन उससे पहले भारत और कुवैत के बीच इसका भी व्यापार होता था।
1962 में जब भारत और चीन के बीच युद्ध हुआ था, तो कुवैत ने भारत का साथ दिया था, लेकिन 1990 में इराक और कुवैत के युद्ध में भारत का रुझान इराक की तरफ देखने के बाद से दोनों देशों के बीच दूरी देखने को मिली।
कुवैत में लगभग 10 लाख से अधिक भारतीय रहते हैं, जो वहां की सबसे बड़ी प्रवासी आबादी है। ये भारतीय स्वास्थ्य, शिक्षा, निर्माण, इंजीनियरिंग, आईटी और घरेलू सेवा जैसे क्षेत्रों में अहम भूमिका निभाते हैं।
कुवैत से भारत कच्चा तेल, एलपीजी और पेट्रोलियम उत्पाद, रसायन (पेट्रोकेमिकल), विमान, उनके पुर्जे और सल्फर आयात करता है।
कुवैत भारत को खाद्य पदार्थ (चावल, मसाले, चाय), फार्मास्यूटिकल्स, इंजीनियरिंग और मशीनरी उत्पाद, कपड़ा और रेडीमेड गारमेंट्स, सूती धागा, आईटी और सर्विस सेक्टर से जुड़ी सेवाएं निर्यात करता है।
--आईएएनएस
केके/वीसी
डिस्क्लेमरः यह आईएएनएस न्यूज फीड से सीधे पब्लिश हुई खबर है. इसके साथ न्यूज नेशन टीम ने किसी तरह की कोई एडिटिंग नहीं की है. ऐसे में संबंधित खबर को लेकर कोई भी जिम्मेदारी न्यूज एजेंसी की ही होगी.
ताइवान ने बीजिंग पर लगाया क्षेत्रीय शांति भंग करने का आरोप, बोला- 'चीनी ड्रोन ने भरी उकसावे वाली उड़ान'
ताइपे, 17 जनवरी (आईएएनएस)। ताइवान ने शनिवार को चीनी जासूसी ड्रोन पर उसके क्षेत्र में घुसपैठ का आरोप लगाया। रक्षा मंत्रालय (एमएनडी) ने अपने बयान में कहा कि एक चीनी जासूसी ड्रोन कुछ समय के लिए दक्षिण चीन सागर के उत्तरी छोर पर ताइवान के कंट्रोल वाले प्रातास द्वीपों के ऊपर से उड़ा जो उकसावे और गैर-जिम्मेदाराना कदम था।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, शनिवार सुबह 5:44 बजे ताइवान के कंट्रोल वाले डोंगशा द्वीप (जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतास द्वीप के नाम से जाना जाता है) के एयरस्पेस में चीनी पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) का एक मिलिट्री ड्रोन देखा गया और चार मिनट बाद वह चला गया।
एमएनडी ने एक प्रेस रिलीज में कहा कि सर्विलांस और टोही ड्रोन को सुबह-सुबह देखा गया था, जब वह डोंगशा द्वीप के क्षेत्रीय एयरस्पेस में घुस रहा था। यह द्वीप दक्षिण चीन सागर में स्थित है और ताइवान के दक्षिणी शहर काओशुंग से लगभग 444 किलोमीटर दूर है।
एमएनडी ने कहा कि ताइवान की सेना द्वारा एक अंतरराष्ट्रीय चैनल के जरिए चेतावनी प्रसारित करने के बाद, ड्रोन शनिवार सुबह 5:48 बजे चला गया।
मंत्रालय ने पीएलए की कार्रवाई की निंदा करते हुए इसे बेहद उकसाने वाला और गैर-जिम्मेदाराना बताया और कहा कि इससे क्षेत्रीय स्थिरता कमजोर हुई है और ये अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन हुआ है।
मंत्रालय ने कहा कि ताइवान की सेना हाई अलर्ट पर रहेगी और रेगुलर कॉम्बैट रेडिनेस पीरियड के दौरान आकस्मिक स्थितियों से निपटने के अपने नियमों के अनुसार जवाब देगी।
लोकतांत्रिक तरीके से शासित ताइवान, जिसे चीन अपना इलाका बताता है, लगभग रोजाना अपने आसपास चीनी सैन्य गतिविधियों की रिपोर्ट करता है, जिसमें ड्रोन भी शामिल हैं, हालांकि वे बहुत कम ही ताइवानी एयरस्पेस में घुसते हैं।
पिछले कुछ महीनों से जापानी पीएम साने ताकाइची के एक बयान के बाद से ही बीजिंग नाराज है। दरअसल, साने ताकाइची ने 7 नवंबर 2025 को कहा था कि अगर चीन ने ताइवान पर हमला किया तो जापान मदद के लिए अपनी सेना भेजेगा। इस पर चीन ने सख्त ऐतराज जताया था और मामला यूएन तक भी पहुंचा था।
--आईएएनएस
केआर/
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