Responsive Scrollable Menu

Jan Gan Man: IIT Bombay की घटना से एक बार फिर उठा बड़ा सवाल- क्या देश में SC/ST Act का दुरुपयोग बढ़ रहा है?

दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल में छात्रों का प्रदर्शन प्रश्नपत्र लीक की घटनाओं को लेकर हुआ था। वहीं मुंबई के आईआईटी में छात्र उस प्रोफेसर के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं, जिसने एक विद्यार्थी को परीक्षा में नकल करते हुए पकड़ा था। यह विरोधाभास कई गंभीर सवाल खड़े करता है। एक ओर परीक्षा की शुचिता और व्यवस्था की विफलताओं को लेकर छात्रों का आक्रोश सामने आया, तो दूसरी ओर एक विद्यार्थी की मौत के बाद संस्थागत जवाबदेही पर सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या किसी छात्र को परीक्षा में अनुचित साधन इस्तेमाल करते हुए पकड़ना गलत है, या जांच पूरी होने से पहले उस घटना और उससे जुड़े आरोपों को सार्वजनिक करना गलत है?

उल्लेखनीय है कि आईआईटी-बंबई के बीटेक द्वितीय वर्ष के विद्यार्थी साहिल वाकोड़े की 18 सितंबर को मृत्यु के बाद परिसर में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गया जोकि एक बड़े आंदोलन का रूप ले चुका है क्योंकि इसमें राजनीतिक स्वर भी शामिल हो गये हैं। हम आपको याद दिला दें कि संस्थान की शुरुआती सूचना में परीक्षा के दौरान कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित मंच (चैटजीपीटी) के कथित इस्तेमाल का उल्लेख किया गया था। छात्रों का आरोप था कि जिस विद्यार्थी की मृत्यु हो चुकी है, उसे अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना उसके खिलाफ अनुशासनात्मक आरोप सार्वजनिक करना अनुचित था। बाद में आईआईटी-बंबई ने स्वयं अपनी पूर्व सूचना पर खेद जताते हुए कहा कि घटना से जुड़े तथ्य अभी जांच के अधीन हैं और जांच पूरी होने से पहले घटनाक्रम को इस तरह प्रस्तुत करना उचित नहीं था।

इसे भी पढ़ें: IIT Bombay छात्र की मौत के बाद मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या पर फिर तेज हुई बहस

यहीं से असली सवाल शुरू होता है। क्या किसी विद्यार्थी को नकल करते पकड़ना गलत है? इस प्रश्न का जवाब है नहीं। परीक्षा में नकल रोकना शिक्षक की जिम्मेदारी है। यदि किसी विद्यार्थी के पास परीक्षा के दौरान अनुचित साधन पाए जाते हैं, तो संस्थान की निर्धारित प्रक्रिया के तहत कार्रवाई होना स्वाभाविक है। आईआईटी-बंबई के शिक्षक मंच का भी कहना है कि संबंधित प्रोफेसर ने संस्थान की निर्धारित शैक्षणिक प्रक्रिया के अनुसार अपना दायित्व निभाया। छात्रों के प्रतिनिधियों ने भी स्पष्ट किया है कि उनका आंदोलन नकल का समर्थन करने के लिए नहीं, बल्कि संस्थागत व्यवस्था और जांच प्रक्रिया को लेकर है। लेकिन नकल पकड़ना और नकल का आरोप सिद्ध हो जाना दो अलग बातें हैं।

यही अंतर इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। किसी शिक्षक को परीक्षा में अनुचित साधन रोकने का अधिकार है, लेकिन किसी आरोप को जांच पूरी होने से पहले अंतिम सत्य की तरह प्रस्तुत करना अलग प्रश्न है। आईआईटी-बंबई ने इसी बिंदु पर अपनी प्रारंभिक सूचना वापस ली और माना कि जांच पूरी होने से पहले घटनाओं का चरित्र-निर्धारण करना उचित नहीं था।

हम आपको बता दें कि छात्रों ने इस मामले में 18 मांगें रखीं हैं। इनमें प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला को निलंबित करना, स्वतंत्र जांच समिति बनाना, मानसिक स्वास्थ्य और परामर्श व्यवस्था मजबूत करना, अनुशासनात्मक प्रक्रिया में सुधार, छात्र प्रतिनिधित्व बढ़ाना और जांच की समयसीमा तय करना शामिल है। छात्रों ने जांच के अंतरिम परिणाम के लिए 30 सितंबर और अंतिम रिपोर्ट के लिए 15 अक्टूबर की समयसीमा भी मांगी है। इसके बाद आईआईटी-बंबई ने प्रोफेसर डूला को तत्काल प्रभाव से प्रशासनिक अधिष्ठाता के पद से हटा दिया। हालांकि वह शिक्षक बने हुए हैं और छात्रों की मांग है कि उन्हें अध्यापन दायित्व से भी हटाया जाए।

मामला यहीं नहीं रुकता। साहिल के माता-पिता की शिकायत के आधार पर दर्ज प्राथमिकी में प्रोफेसर डूला पर जातिगत भेदभाव के आरोप लगाए गए हैं। दूसरी ओर, आईआईटी-बंबई के शिक्षक मंच के अध्यक्ष राजकुमार पंत का दावा है कि संस्थान के अनुसूचित जाति-जनजाति प्रकोष्ठ के पास साहिल की ओर से पिछले तीन-चार महीनों में ऐसी कोई शिकायत दर्ज होने का रिकॉर्ड नहीं है। शिक्षक मंच ने डूला के समर्थन में कहा है कि उन्होंने संस्थान की निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार अपना कर्तव्य निभाया।

यहीं से अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून के इस्तेमाल को लेकर बड़ी बहस खड़ी होती है। देखा जाये तो अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून का उद्देश्य जातिगत अपमान और अत्याचार से पीड़ित व्यक्ति को प्रभावी कानूनी सुरक्षा देना है। लेकिन इसी के साथ एक असहज सवाल भी लगातार उठता रहा है कि क्या कुछ मामलों में इस कठोर कानून का इस्तेमाल वास्तविक अत्याचार की बजाय व्यक्तिगत विवाद, संस्थागत संघर्ष या दबाव बनाने के साधन के रूप में तो नहीं किया जा रहा? सुप्रीम कोर्ट ने भी ऐसे मामलों में चेताया है कि यदि प्रथम दृष्टया अपराध के आवश्यक तत्व ही मौजूद न हों या कानून का इस्तेमाल निजी दुश्मनी निपटाने के लिए किया जा रहा हो, तो न्यायालय को ऐसे दुरुपयोग को रोकने में संकोच नहीं करना चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि किसी मामले में आरोप साबित नहीं होना अपने-आप में यह प्रमाण नहीं है कि शिकायत झूठी थी या कानून का दुरुपयोग हुआ। इसलिए बहस इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि “एससी-एसटी कानून लग गया, तो शिकायत झूठी होगी”, बल्कि बहस इस बात पर होनी चाहिए कि हर शिकायत की निष्पक्ष और समयबद्ध जांच हो। मामला चाहे शिक्षक-छात्र का हो, नौकरी का हो, विश्वविद्यालय का हो या निजी विवाद का, पहले आरोप, फिर जांच और उसके बाद निष्कर्ष, यही न्याय का रास्ता है। कानून पीड़ित को सुरक्षा दे, लेकिन किसी निर्दोष को बिना जांच सामाजिक और कानूनी सजा देने का माध्यम नहीं बने।

देखा जाये तो जातिगत भेदभाव और अपमान की वास्तविक शिकायतों को गंभीरता से लेना संवैधानिक और कानूनी आवश्यकता है। किसी भी संस्थान में जाति के आधार पर भेदभाव हो तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी ही चाहिए। लेकिन दूसरी तरफ यह सिद्धांत भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी कानून के तहत आरोप लगना और आरोप सिद्ध होना एक बात नहीं है। इस मामले में भी आरोपों की जांच बाकी है। न शिक्षक को जांच से पहले दोषी घोषित किया जा सकता है, न विद्यार्थी के खिलाफ लगाए गए अनुशासनात्मक आरोपों को जांच के बिना अंतिम सत्य माना जा सकता है।

बहरहाल, आईआईटी जैसे संस्थानों की असली परीक्षा केवल कठिन परीक्षा लेने में नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में न्यायपूर्ण व्यवस्था कायम रखने में है। जंतर-मंतर से लेकर आईआईटी परिसर तक सवाल अलग-अलग दिखाई दे सकते हैं, लेकिन जड़ में एक ही चिंता है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था विद्यार्थी को केवल अंक और अनुशासन की इकाई मान रही है, या उसे एक संवेदनशील मनुष्य भी समझ रही है? नकल रोकिए, कठोरता से रोकिए। परीक्षा की शुचिता से कोई समझौता मत कीजिए। लेकिन आरोप को जांच से पहले फैसला मत बनाइए। जातिगत भेदभाव की शिकायत हो तो स्वतंत्र जांच कराइए और यदि आरोप झूठा निकले तो निर्दोष व्यक्ति की प्रतिष्ठा की रक्षा भी उतनी ही मजबूती से कीजिए। इसमें कोई दो राय नहीं कि न्याय का अर्थ न शिक्षक के पक्ष में खड़ा होना है, न विद्यार्थी के। न्याय का अर्थ है सत्य सामने आने तक किसी को दोषी घोषित नहीं करना और सत्य सामने आने के बाद दोषी को बचने नहीं देना।

-नीरज कुमार दुबे

Continue reading on the app

नोएल टाटा के पक्ष में उतरे शरद पवार, टाटा ग्रुप की विरासत को प्रोटेक्ट करने को लेकर कही बड़ी बात

शरद पवार ने जमशेदजी टाटा के विचारों का जिक्र करते हुए कहा कि टाटा परिवार ने इंडस्ट्री को समाज सेवा की दिशा दी है। उन्होंने लिखा कि इस सोच का मूल यह है कि इंडस्ट्री से पैदा हुई संपत्ति का इस्तेमाल समाज के हित के लिए किया जाना चाहिए

Continue reading on the app

  Sports

एशियन गेम्स में पांचवें दिन भारत ने जीते 5 पदक, कुल पदकों की संख्या पहुंची 12, देखिए आज का पूरा रिपोर्ट कार्ड

एशियन गेम्स के पांचवें दिन भारत ने पांच पदक जीते। कुल पदकों की संख्या 12 हो गई। मीराबाई चानू ने देश को रजत पदक दिलाया। चार कांस्य पदक आए। गोल्ड मेडल एक भी नहीं मिला। देखिए आज का पूरा रिपोर्ट कार्ड। Wed, 23 Sep 2026 22:22:30 +0530

  Videos
See all

Final Cut: पलटा घी का टैंकर..मची लूट! | Moradabad News | IIT Bombay suicide case | Sahil Wakode #tmktech #vivo #v29pro
2026-09-23T18:07:07+00:00

Keshav Prasad Maurya Exclusive Interview: डिप्टी CM केशव मौर्य ने News18 से की Exclusive बातचीत #tmktech #vivo #v29pro
2026-09-23T18:15:09+00:00
Editor Choice
See all
Photo Gallery
See all
World News
See all
Top publishers