Greenland पर कब्जे के लिए Donald Trump की नई चाल! समर्थन न करने वाले देशों पर 'टैरिफ' लगाने की धमकी, NATO सहयोगियों में दरार
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के ग्रीनलैंड अधिग्रहण की महत्वाकांक्षा ने एक बार फिर वैश्विक कूटनीति में हलचल पैदा कर दी है। शुक्रवार को व्हाइट हाउस में एक कार्यक्रम के दौरान ट्रंप ने स्पष्ट संकेत दिए कि जो देश ग्रीनलैंड पर अमेरिकी नियंत्रण का समर्थन नहीं करेंगे, उन्हें भारी आयात शुल्क (Tariff) का सामना करना पड़ सकता है।
राष्ट्रीय सुरक्षा और 'टैरिफ' की धमकी
ट्रंप ने ग्रीनलैंड को अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपरिहार्य बताया। उन्होंने यूरोपीय सहयोगियों को दी गई अपनी पिछली धमकियों का हवाला देते हुए कहा कि जिस तरह उन्होंने दवाओं पर शुल्क लगाने की बात कही थी, वैसा ही रुख वह ग्रीनलैंड के मामले में भी अपना सकते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि "अगर कोई देश ग्रीनलैंड के मामले में सहयोग नहीं करता है, तो मैं उस पर शुल्क लगा सकता हूँ। राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए हमें ग्रीनलैंड की आवश्यकता है।"
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ट्रंप ने कहा, ‘‘अगर कोई देश ग्रीनलैंड के मामले में सहयोग नहीं करता है, तो मैं उस पर शुल्क लगा सकता हूं, क्योंकि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए हमें ग्रीनलैंड की आवश्यकता है। इसलिए मैं ऐसा कर सकता हूं।’’ कोपेनहेगन में सीनेटर और प्रतिनिधि सभा के सदस्यों के एक समूह ने शुक्रवार को डेनमार्क के प्रधानमंत्री मेटे फ्रेडरिक्सन के साथ ही डेनिश और ग्रीनलैंड के सांसदों सहित नेताओं से मुलाकात की।
प्रतिनिधिमंडल के नेता और डेलावेयर के डेमोक्रेट सीनेटर क्रिस कून्स ने समूह के मेजबानों को ‘‘225 वर्षों तक एक अच्छा और भरोसेमंद सहयोगी तथा भागीदार’’ होने के लिए धन्यवाद दिया और कहा कि ‘‘हमने इस संबंध को भविष्य में कैसे आगे बढ़ाया जाए, इस बारे में एक मजबूत और सार्थक संवाद किया।
ग्रीनलैंड का सामरिक महत्व
ग्रीनलैंड एक रणनीतिक स्थान पर स्थित है जो आर्कटिक क्षेत्र में व्यापारिक मार्गों और प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
नाटो और भविष्य की चुनौतियां
ग्रीनलैंड नाटो (NATO) का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। ट्रंप के इस बयान से अमेरिका और उसके यूरोपीय सहयोगियों के बीच दरार बढ़ने की आशंका है। विशेषज्ञों का मानना है कि व्यापारिक शुल्क को ग्रीनलैंड जैसे क्षेत्रीय मुद्दे से जोड़ना अंतरराष्ट्रीय संधियों और कूटनीतिक मर्यादाओं को चुनौती दे सकता है।
Jaffna का कायाकल्प! Sri Lanka के KKS बंदरगाह के लिए भारत देगा 500 करोड़ डॉलर की मदद, राष्ट्रपति दिसानायके ने किया बड़ा एलान
भारत और श्रीलंका के बीच द्विपक्षीय संबंधों और क्षेत्रीय विकास की दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए, श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने जाफना के कंकेसंथुरई (KKS) बंदरगाह के आधुनिकीकरण के लिए भारत की ओर से मिलने वाली बड़ी सहायता की घोषणा की है। श्रीलंका के राष्ट्रपति अनुरा कुमारा दिसानायके ने शुक्रवार को कहा कि उत्तरी श्रीलंका के जाफना जिले में स्थित कंकेसंथुरई (केकेएस) बंदरगाह के नवीनीकरण के लिए भारत ने छह करोड़ अमेरिकी डॉलर उपलब्ध कराने पर सहमति जताई है।
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दिसानायके ने जाफना के पास एक कार्यक्रम में सभा को संबोधित करते समय इस संबंध में घोषणा की। जाफना, अल्पसंख्यक तमिल समुदाय की सांस्कृतिक राजधानी है। उन्होंने कहा कि जाफना जिले में खूबसूरत तटरेखा और कई आकर्षणों के कारण पर्यटन विकास की अपार संभावनाएं हैं।
भारत की ₹500 करोड़ (60 मिलियन डॉलर) की मदद
राष्ट्रपति दिसानायके ने जाफना में आयोजित एक कार्यक्रम में स्पष्ट किया कि भारत सरकार ने KKS बंदरगाह के नवीनीकरण के लिए 6 करोड़ अमेरिकी डॉलर (लगभग 500 करोड़ रुपये) का अनुदान देने पर सहमति जताई है।
उद्देश्य: इस सहायता का प्राथमिक लक्ष्य बंदरगाह की बुनियादी सुविधाओं को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाना है।
विकास योजना: इसमें बंदरगाह की गहराई बढ़ाना (ड्रेजिंग), नए ब्रेकवाटर का निर्माण और जहाजों की आवाजाही के लिए आधुनिक टर्मिनल बनाना शामिल है।
पर्यटन को बढ़ावा: जाफना की खूबसूरत तटरेखा को देखते हुए, इस बंदरगाह के विकसित होने से भारत और श्रीलंका के बीच फेरी सेवा (Ferry Service) और क्रूज पर्यटन को नई मजबूती मिलेगी।
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श्रीलंका के राष्ट्रपति का बयान
दिसानायके ने कहा, ‘‘हम पलाली हवाई अड्डे की कमियों को दूर करने और उसका जीर्णोद्धार करने की योजना बना रहे हैं। हम कंकेसंथुरई (केकेएस) बंदरगाह पर बहुत जल्द काम शुरू करेंगे और भारत सरकार ने इसके लिए छह करोड़ अमेरिकी डॉलर की सहायता देने पर सहमति जताई है।” दिसानायके ने कहा कि उनकी सरकार उत्तरी प्रांत में व्यापक विकास लाने और वहां के लोगों के जीवन स्तर में सुधार करने के लिए पहले से ही एक कार्यक्रम लागू कर रही है।
भारत-श्रीलंका संबंधों पर प्रभाव
यह परियोजना भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट' (पड़ोसी पहले) नीति का एक अहम हिस्सा है।
कनेक्टिविटी: यह बंदरगाह भारत के नागपट्टिनम और कराइकल बंदरगाहों के काफी करीब है, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापारिक दूरी कम होगी।
सामरिक महत्व: चीन के बढ़ते प्रभाव के बीच, उत्तरी श्रीलंका में भारत की यह सक्रिय भागीदारी सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
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