दिल्ली की हवा फिर बनी जहर! GRAP-III लागू, गाड़ियों से लेकर जानिए कहां-कहां लगा ब्रेक
Delhi News: दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण की लगातार बिगड़ती स्थिति को देखते हुए Commission for Air Quality Management ने शुक्रवार को ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान के स्टेज-III यानी GRAP-III को दोबारा सख्ती से लागू कर दिया. आयोग ने कहा कि आने वाले दिनों में एयर क्वालिटी इंडेक्स के गंभीर श्रेणी में पहुंचने का अनुमान है, जिसके चलते यह कदम उठाया गया है.
सर्दियों में बढ़ा प्रदूषण संकट
दिल्ली-एनसीआर बीते कई महीनों से भारी प्रदूषण से जूझ रहा है. दिसंबर में भी AQI गंभीर स्तर तक पहुंचने के बाद GRAP-III के सभी उपाय लागू किए गए थे. अधिकारियों के मुताबिक कम हवा की गति, स्थिर वातावरण और एडवर्स वेदर कंडीशन के कारण पोल्यूटेंट का फैलाव नहीं हो पा रहा है, जिससे एयर क्वालिटी और खराब हो गई है.
कंस्ट्रक्शन और फैक्टरियों लगे रोक
GRAP-III के तहत गैर-आवश्यक निर्माण और तोड़फोड़ गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध लगाया गया है. इसमें मिट्टी की खुदाई, पाइलिंग, खुली खाइयों का निर्माण, वेल्डिंग, पेंटिंग, प्लास्टर, टाइल और फ्लोरिंग कार्य शामिल हैं. रेडी-मिक्स कंक्रीट प्लांट्स के संचालन पर भी रोक रहेगी. इसके अलावा कच्ची सड़कों पर सीमेंट, रेत और फ्लाई ऐश जैसे निर्माण सामग्री के परिवहन पर प्रतिबंध लगाया गया है.
प्रदूषण फैलाने वाली इकाइयों जैसे स्टोन क्रशर, ईंट भट्टे, खनन गतिविधियां और बिना स्वीकृत ईंधन का उपयोग करने वाले उद्योगों को बंद करने के आदेश दिए गए हैं.
वाहनों पर भी प्रतिबंध
वाहनों पर भी सख्त पाबंदियां लागू की गई हैं. GRAP-III के अंतर्गत BS-III पेट्रोल और BS-IV डीजल चार पहिया वाहनों, गैर-जरूरी डीजल चालित मध्यम मालवाहक वाहनों और ऐसे अंतर-राज्य डीजल बसों पर रोक है जो CNG, इलेक्ट्रिक या BS-VI मानकों को पूरा नहीं करतीं.
हालांकि, आवश्यक सेवाओं को छूट दी गई है. मेट्रो, रेलवे, हवाई अड्डों, राजमार्गों, रक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता से जुड़े बुनियादी ढांचा और सार्वजनिक उपयोगिता परियोजनाएं सख्त धूल नियंत्रण और अपशिष्ट प्रबंधन नियमों के तहत जारी रहेंगी. दिव्यांग व्यक्तियों द्वारा उपयोग किए जाने वाले वाहनों को भी प्रतिबंध से मुक्त रखा गया है.
स्कूलों के लिए जारी हुए नियम
सार्वजनिक परिवहन के उपयोग को बढ़ावा देने के साथ-साथ कक्षा 5 तक के स्कूलों को हाइब्रिड या ऑनलाइन मोड में संचालित करने की सलाह दी गई है. CAQM ने कहा है कि वह वायु गुणवत्ता पर लगातार नजर रखेगा और यदि हालात और बिगड़ते हैं तो अतिरिक्त कदम उठाए जाएंगे.
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जनस्वास्थ्य व्यवस्था में आदिवासी चिकित्सक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं: मंत्री जुएल ओराम
हैदराबाद, 16 जनवरी (आईएएनएस)। जनजातीय मामलों के मंत्री जुएल ओराम ने शुक्रवार को जनस्वास्थ्य प्रणाली के भीतर सहयोगी साझेदारों के रूप में आदिवासी चिकित्सकों को औपचारिक रूप से मान्यता देने और उन्हें शामिल करने की एक राष्ट्रीय पहल के बारे में बताया।
ओराम ने आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच को मजबूत करने के लिए आदिवासी चिकित्सकों के क्षमता निर्माण कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि औपनिवेशिक शासन भी भारत की स्वदेशी औषधीय परंपराओं को खत्म नहीं कर सका जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं।
अधिकारी ने बयान में कहा कि उन्होंने अपने व्यक्तिगत अनुभवों को साझा करते हुए, देश भर से लगभग 400 आदिवासी चिकित्सकों सहित प्रतिभागियों के सामने स्वदेशी उपचार पद्धतियों की प्रभावशीलता पर प्रकाश डाला।
उन्होंने कहा कि एम्स दिल्ली, एम्स जोधपुर, आईसीएमआर भुवनेश्वर, डब्ल्यूएचओ, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, आयुष मंत्रालय और अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान के विशेषज्ञों द्वारा आयोजित तकनीकी सत्रों से आदिवासी चिकित्सकों के तकनीकी ज्ञान और सेवा वितरण क्षमताओं में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
मंत्री ने राज्यों को पारंपरिक चिकित्सा के क्षेत्र में आजीविका के अवसर पैदा करने के लिए एफएमसीजी और दवा कंपनियों के साथ बाजार संबंध और साझेदारी तलाशने के लिए प्रोत्साहित किया।
उन्होंने राष्ट्रीय सिकल सेल एनीमिया उन्मूलन मिशन, पीएम-जनमान और धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान (डीएजेजीयूए) जैसी पहलों के माध्यम से जनजातीय स्वास्थ्य असमानताओं को दूर करने पर मंत्रालय के निरंतर ध्यान केंद्रित करने को दोहराया।
जनजातीय मामलों की सचिव रंजना चोपड़ा ने समुदाय-आधारित और समुदाय-नेतृत्व वाली स्वास्थ्य समाधानों को मुख्यधारा में लाने में आदिवासी चिकित्सकों की महत्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया।
उन्होंने कहा कि इस तरह के दृष्टिकोण लागत प्रभावी, टिकाऊ और स्थानीय वास्तविकताओं पर आधारित होते हैं।
कई आदिवासी जिलों में मलेरिया, तपेदिक और कुष्ठ रोग जैसी संक्रामक बीमारियों के लगातार प्रसार को उजागर करते हुए, उन्होंने इन बीमारियों को स्थानिक आदिवासी क्षेत्रों से खत्म करने के लिए अंतिम, लक्षित प्रयास करने का आह्वान किया।
अतिरिक्त सचिव मनीष ठाकुर ने कहा कि आदिवासी चिकित्सकों को उनके समुदायों के भीतर पीढ़ियों से विश्वास और सामाजिक वैधता प्राप्त है।
उन्होंने कहा कि मंत्रालय अब आदिवासी चिकित्सकों को अपने स्वास्थ्य कार्यक्रमों में सहयोगी साझेदार के रूप में देखता है, विशेष रूप से निवारक देखभाल, बीमारी की शीघ्र पहचान और समय पर रेफरल के क्षेत्र में।
उन्होंने कहा कि भौगोलिक, सांस्कृतिक और प्रणालीगत बाधाएं आदिवासी समुदायों की औपचारिक स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच को सीमित करती रहती हैं, और विश्वसनीय चिकित्सकों की सक्रिय भागीदारी अंतिम छोर तक सेवा वितरण को महत्वपूर्ण रूप से मजबूत कर सकती है।
जनजातीय मामलों के राज्य मंत्री दुर्गादास उइके ने कहा कि अनुसूचित जनजातियां विकसित भारत की परिकल्पना का अभिन्न अंग हैं। हालांकि, संक्रामक और गैर-संक्रामक बीमारियां आदिवासी क्षेत्रों को प्रभावित करती रहती हैं, लेकिन आदिवासी समुदायों ने पारंपरिक चिकित्सा और प्रकृति-आधारित जीवन शैली के समृद्ध पीढ़ीगत ज्ञान को संरक्षित रखा है।
--आईएएनएस
एएसएच/एबीएम
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