मूवी रिव्यू-'वाइब':कुणाल खेमू की फिल्म पहले हंसाती है, लेकिन इंटरवल के बाद समझना मुश्किल हो जाता है- क्या हो रहा है?
रेटिंग: 2/5 अवधि: 2 घंटे 25 मिनट शैली: कॉमेडी निर्देशक: कुणाल खेमू मुख्य कलाकार: कुणाल खेमू, स्पर्श श्रीवास्तव, प्रीति जिंटा, वंशिका धीर, यशपाल शर्मा, दिनेश लाल यादव रिलीज डेट: 18 सितंबर 2026 कुणाल खेमू की फिल्म ‘वाइब’ शुरू होते ही पुरानी याद ताजा करती है। ‘मडगांव एक्सप्रेस’ में तीन दोस्तों की जिंदगी में बवाल था, यहां दो दोस्त हैं और बवाल सीधा देश की सुरक्षा तक पहुंच गया है। हार्दिक और बग्स की जोड़ी शुरू में कमाल लगती है। दोनों की केमिस्ट्री, कुणाल का टाइमिंग वाला ह्यूमर और कुछ मजेदार संवाद फिल्म को अच्छी रफ्तार देते हैं। पहला हाफ देखकर लगता हैचलो भाई, कुणाल फिर फॉर्म में हैं। फिर इंटरवल होता है और फिल्म अपना ट्रैक बदल देती है। फिल्म की कहानी कैसी है हार्दिक यानी कुणाल खेमू नशे की लत से बाहर निकलकर जिंदगी को दोबारा पटरी पर लाने की कोशिश कर रहा है। उसका दोस्त बग्स यानी स्पर्श श्रीवास्तव उसे अपनी सॉफ्टवेयर कंपनी में नौकरी दिला देता है। लेकिन हार्दिक का ध्यान नौकरी से ज्यादा नई इंटर्न करीना यानी वंशिका धीर पर है। दोनों के बीच बात आगे बढ़ती है और फिर एक ऐसा मामला सामने आता है, जिसकी वजह से हार्दिक और बग्स की एंट्री हो जाती है मैडम एच यानी प्रीति जिंटा की दुनिया में। अब ये दोनों पहुंच जाते हैं एक ऐसे मिशन में, जिसके लिए शायद इनसे ज्यादा गलत लोगों को चुनना मुश्किल था। यहीं तक फिल्म काफी मजेदार है। इसके बाद कहानी में गैंगस्टर, आतंकवाद, एआई, सॉफ्टवेयर अटैक, बड़ी साजिश और सुपर-स्ट्रेंथ वाला सीरम तक आ जाता है। मतलब दो दोस्तों की कॉमेडी से शुरू हुई फिल्म अचानक बोलती है,भाई, अब देश बचाना है। फिल्म में एक्टिंग कैसी है कुणाल खेमू हार्दिक के रोल में शानदार काम किया है। वह बेवकूफ दिखते हुए भी प्यारे लगते हैं और उनकी बॉडी लैंग्वेज कई बार खुद ही हंसा देती है। हालांकि परेशानी यह है कि उनका यह अंदाज अब थोड़ा जाना-पहचाना लगता है। ‘मडगांव एक्सप्रेस’, ‘लूटकेस’ और ‘गो गोवा गॉन’ के बाद इस बार वही मजाकिया कुणाल कुछ नया कम देते हैं। स्पर्श श्रीवास्तव सबसे बड़ा सरप्राइज हैं। बग्स के रोल में उनकी घबराहट और चेहरे के एक्सप्रेशन कई बार कुणाल से भी ज्यादा हंसा देते हैं। प्रीति जिंटा की मैडम एच स्टाइलिश है और उनका एक्शन सीन फिल्म के मजेदार हिस्सों में आता है। वंशिका धीर खूबसूरत दिखती हैं, लेकिन उनके रोल में करने को ज्यादा कुछ नहीं है। यशपाल शर्मा और दिनेश लाल यादव ठीक हैं, जबकि शर्मिला टैगोर का छोटा-सा कैमियो अच्छा लगता है। फिल्म का निर्देशन कैसा है कुणाल खेमू को कॉमेडी की समझ है। दिक्कत यह है कि उन्हें अपनी फिल्म पर थोड़ा और भरोसा करना चाहिए था। पहले हाफ में हार्दिक और बग्स ही काफी हैं। उनकी छोटी-छोटी बेवकूफियां ही फिल्म चला रही हैं। लेकिन दूसरे हाफ में फिल्म परत-दर-परत चीजें जोड़ती जाती है। एक गैंगस्टर चाहिए। डाल दो। एआई चाहिए। डाल दो। सॉफ्टवेयर अटैक चाहिए। डाल दो। सीरम चाहिए। वो भी डाल दो। नतीजा कहानी आगे कम बढ़ती है, सामान ज्यादा बढ़ता जाता है। फिल्म का सबसे बड़ा मजा वहीं था जहां वह खुद को ज्यादा गंभीर नहीं ले रही थी। काश, कुणाल ने उसी रास्ते पर फिल्म को आखिर तक चलाया होता। फिल्म का तकनीकी पक्ष कैसा है फिल्म दिखने में अच्छी है। लोकेशन अच्छी हैं, कैमरा वर्क बढ़िया है और एक्शन सीक्वेंस में पैसा साफ दिखाई देता है। लेकिन दूसरे हाफ में फिल्म की रफ्तार गिर जाती है। कुछ सीन्स जरूरत से ज्यादा लंबे लगते हैं और कहानी कई जगह खिंचती हुई महसूस होती है। फिल्म में कमियां क्या हैं सबसे बड़ी कमी है ओवरडोज। फिल्म में कॉमेडी चाहिए थी, लेकिन बाद में एक्शन भी चाहिए, थ्रिल भी चाहिए, बड़ा विलेन भी चाहिए और देश बचाने वाला ड्रामा भी चाहिए। सब कुछ चाहिए और जब फिल्म सब कुछ देने लगती है, तो जो सबसे अच्छा था हार्दिक और बग्स की कॉमेडी वही पीछे छूट जाती है। रोमांस भी थोड़ा लंबा है और क्लाइमेक्स तक आते-आते फिल्म जरूरत से ज्यादा ओवर-द-टॉप हो जाती है और कुणाल का शर्ट उतारकर मसल्स दिखाने वाला सीन। भाई, ये कॉमेडी फिल्म है या अचानक फिटनेस विज्ञापन? फिल्म का म्यूजिक कैसा है म्यूजिक ठीक है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं जो फिल्म खत्म होने के बाद साथ बाहर आए। कुछ गाने अच्छे लगते हैं, लेकिन कुछ जगह ये कहानी की रफ्तार को और धीमा करते हैं। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट ‘वाइब’ का पहला हाफ बताता है कि कुणाल खेमू एक और शानदार कॉमेडी दे सकते थे। दूसरा हाफ बताता है कि उन्होंने खुद ही फिल्म को ज्यादा बड़ा बनाने के चक्कर में मामला बिगाड़ दिया। कुणाल और स्पर्श की जोड़ी फिल्म की जान है। कुछ संवाद और सीन्स सच में मजेदार हैं। बस दिक्कत यही है कि फिल्म को जितना कम दिखाना चाहिए था, उससे ज्यादा दिखा दिया गया। शुरुआत में वाइब सेट होती है, इंटरवल के बाद फिल्म खुद ही उसे बिगाड़ देती है।
मूवी रिव्यू –'दायरा':पृथ्वीराज का गुस्सा, करीना का सवाल और चार लाशों का राज; कहानी में मसाला खूब, लेकिन यहां कमजोर है मूवी
रेटिंग: 2.5/5 अवधि: 2 घंटे 23 मिनट शैली: क्राइम थ्रिलर / इन्वेस्टिगेटिव ड्रामा निर्देशक: मेघना गुलजार मुख्य कलाकार: करीना कपूर खान, पृथ्वीराज सुकुमारन, क्षिती जोग, कंवलजीत सिंह, जितेंद्र जोशी रिलीज डेट: 18 सितंबर 2026 कुछ फिल्में आपको कुर्सी पर इसलिए बैठाए रखती हैं क्योंकि आपको जानना होता है कि आगे क्या होगा। ‘दायरा’ शुरुआत में बिल्कुल यही काम करती है। एक लड़की की निर्मम हत्या, पुलिस का तेजी से आरोपियों तक पहुंचना, फिर उनका एनकाउंटर और उसके बाद उठता बड़ा सवाल क्या यह सच में न्याय था या कानून को किनारे रखकर किया गया फैसला? मेघना गुलजार की यह फिल्म 2019 के हैदराबाद रेप-मर्डर केस और उसके बाद हुए पुलिस एनकाउंटर से प्रेरित है। फिल्म ने वास्तविक घटना को हूबहू दोहराने के बजाय काल्पनिक नामों और परिस्थितियों के साथ अपनी कहानी गढ़ी है और यहीं से फिल्म दिलचस्प हो जाती है, क्योंकि यह आपको किसी एक पक्ष की तरफ आराम से बैठने नहीं देती। लेकिन दिक्कत यह है कि जिस फिल्म की शुरुआत इतनी मजबूत हो, उससे अंत भी उतना ही दमदार चाहिए। ‘दायरा’ में शुरुआत और पहला हिस्सा जितना पकड़ता है, दूसरा हिस्सा उतना ही धीरे-धीरे हाथ से निकलता जाता है। फिल्म की कहानी कैसी है कहानी शुरू होती है रागिनी (प्रगति मिश्रा) से, जो एक रात हाईवे के पास मुसीबत में फंस जाती है। इसके बाद वह गायब हो जाती है और अगले दिन उसका जला हुआ शव मिलता है। रागिनी की मां पार्वती (क्षिती जोग) और भाई कबीर (भावेश बब्बानी) पुलिस से मदद मांगते हैं, लेकिन शुरुआती स्तर पर सिस्टम जिस तरह से मामले को लेता है, वही आगे की पूरी कहानी की नींव रख देता है। मामला मीडिया में उछलता है और जांच की जिम्मेदारी डीसीपी रमन कुमार (पृथ्वीराज सुकुमारन) को मिलती है। रमन अपनी टीम के साथ चार आरोपियों को पकड़ लेता है, लेकिन अदालत तक मामला पहुंचने से पहले ही चारों एक पुलिस एनकाउंटर में मारे जाते हैं। पुलिस का दावा है कि आरोपियों ने भागने और हमला करने की कोशिश की थी। जवाबी कार्रवाई में वे मारे गए। बस, यहीं से असली फिल्म शुरू होती है। एक तरफ जनता रमन को हीरो मान रही है। दूसरी तरफ सवाल उठ रहा है क्या यह एनकाउंटर सच में हुआ था या सब कुछ पहले से तय था? मामले की जांच के लिए डीसीपी अजूनी कोहली (करीना कपूर खान) के नेतृत्व में विशेष जांच टीम बनाई जाती है। अजूनी का काम सिर्फ एनकाउंटर की जांच करना नहीं है, बल्कि उस पूरी कड़ी को जोड़ना है जो रागिनी के गायब होने से शुरू हुई थी। और फिर फिल्म रमन बनाम अजूनी नहीं, बल्कि तेज न्याय बनाम सही न्याय की बहस बन जाती है। फिल्म में एक्टिंग कैसी है पृथ्वीराज सुकुमारन रमन कुमार के किरदार में पृथ्वीराज फिल्म की सबसे मजबूत कड़ियों में से एक हैं। उनके किरदार में पुलिस अधिकारी का रौब है, लेकिन उसके पीछे एक ऐसा आदमी भी है जो अपने फैसलों को सही मानता है। पृथ्वीराज का अभिनय ज्यादा शोर नहीं करता। खासकर उनकी आंखों और संवाद बोलने के अंदाज में काफी वजन है। वह रमन को पूरी तरह विलेन बनने से रोकते हैं और यही फिल्म के लिए जरूरी भी था। करीना कपूर खान करीना की अजूनी चमक-दमक वाली पुलिस अफसर नहीं है। वह ज्यादा शांत, व्यवस्थित और दिमाग से काम करने वाली अधिकारी है। करीना यहां ओवर-द-टॉप अभिनय नहीं करतीं और यही उनके पक्ष में जाता है। वह सवाल पूछती हैं, लोगों को पढ़ती हैं और छोटी-छोटी विसंगतियों को पकड़ती हैं। हालांकि, किरदार में जितनी संभावनाएं थीं, फिल्म उनका पूरा इस्तेमाल नहीं कर पाती। क्षिती जोग रागिनी की मां पार्वती के रूप में क्षिती जोग कई जगह पूरी फिल्म पर भारी पड़ती हैं। उनका दुख चीखने-चिल्लाने से ज्यादा उनकी खामोशी में दिखाई देता है। फिल्म के सबसे मानवीय और भावुक हिस्से उन्हीं से जुड़े हैं। बाकी कलाकार भी अपने-अपने हिस्से को संभालते हैं और फिल्म को विश्वसनीय बनाने में मदद करते हैं। फिल्म का निर्देशन कैसा है मेघना गुलजार को पता है कि क्राइम स्टोरी को सिर्फ अपराध की कहानी बनाकर नहीं छोड़ना है। ‘तलवार’ की तरह यहां भी वह दर्शक को जांच की प्रक्रिया के भीतर ले जाने की कोशिश करती हैं। फिल्म का पहला हिस्सा काफी प्रभावी है। घटनाओं को धीरे-धीरे खोलने का तरीका अच्छा है और दर्शक लगातार सोचता रहता है कि आखिर सच क्या है, लेकिन इंटरवल के बाद फिल्म का टेम्पो थोड़ा गिरता है। कुछ जगहों पर कहानी जरूरत से ज्यादा समझाने लगती है और वही फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी बन जाती है। फिल्म की स्टोरीलाइन कैसी है विचार बेहद मजबूत है। फिल्म का असली सवाल यह नहीं है कि रमन सही है या अजूनी। सवाल यह है कि अगर सिस्टम धीमा है तो क्या पुलिस को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार मिल जाता है? और अगर किसी अपराधी को अदालत तक पहुंचने से पहले मार दिया जाए, तो क्या वह न्याय कहलाएगा? फिल्म इन सवालों को उठाती जरूर है, लेकिन कई जगह उन पर और गहराई से उतरने की जरूरत महसूस होती है। फिल्म का स्क्रीनप्ले कैसा है स्क्रीनप्ले की शुरुआत काफी चुस्त है। घटनाएं एक-दूसरे से जुड़ती हैं और रहस्य धीरे-धीरे खुलता है, लेकिन दूसरे हिस्से में कुछ चीजें खिंचती हुई लगती हैं। कई जगह कहानी की गति कम हो जाती है और दर्शक को लगता है कि फिल्म उसी बात को थोड़ा अलग तरीके से फिर समझा रही है। सबसे बड़ी समस्या क्लाइमैक्स है। इतने सवाल खड़े करने के बाद फिल्म जिस तरह खत्म होती है, वह दर्शक को संतुष्ट करने के बजाय थोड़ा अधूरा छोड़ देती है। ऐसा लगता है जैसे फिल्म ने पटाखे दिखाए बहुत, लेकिन फुलझड़ी जलाकर घर चली गई। फिल्म का तकनीकी पक्ष कैसा है कैमरा वर्क फिल्म के मूड को अच्छी तरह सपोर्ट करता है। बंद फ्रेम और क्लोज-अप्स किरदारों के तनाव को बढ़ाते हैं। एडिटिंग पहले हिस्से में काफी प्रभावी है, हालांकि इंटरवल के बाद फिल्म थोड़ी और चुस्त हो सकती थी। फिल्म में कमियां क्या हैं सबसे बड़ी कमी है इसका कमजोर दूसरा हिस्सा। दूसरी बड़ी परेशानी है कि फिल्म जिस शानदार सवाल से शुरुआत करती है, उसका जवाब देने की कोशिश में कुछ जगह बहुत ज्यादा समझाने लगती है। और फिर आता है क्लाइमैक्स। इतनी गंभीर कहानी के बाद दर्शक एक मजबूत टकराव और इमोशनल पेऑफ की उम्मीद करता है, लेकिन फिल्म वहां थोड़ी फीकी पड़ जाती है। यही वजह है कि ‘दायरा’ अच्छी फिल्म बनने के बेहद करीब पहुंचकर भी पूरी तरह यादगार फिल्म नहीं बन पाती। फिल्म का म्यूजिक कैसा है फिल्म का संगीत इसका सेलिंग पॉइंट नहीं है। केतन सोढ़ा का बैकग्राउंड स्कोर फिल्म के तनाव वाले हिस्सों को मजबूती देता है। फिल्म में एक मुख्य गीत है, लेकिन यह ऐसा नहीं है जिसे आप सिनेमाघर से निकलते ही गुनगुनाने लगें। यहां असली काम बैकग्राउंड म्यूजिक करता है। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट ‘दायरा’ ऐसी फिल्म है जिसमें सवाल बहुत अच्छे हैं, कलाकार बहुत अच्छे हैं और शुरुआत भी दमदार है, लेकिन जवाब तक पहुंचते-पहुंचते फिल्म की पकड़ ढीली पड़ जाती है। करीना कपूर और पृथ्वीराज सुकुमारन अपने किरदारों को पूरी गंभीरता से निभाते हैं और मेघना गुलजार का निर्देशन कई जगह प्रभावशाली है। लेकिन अगर आप एक ऐसी क्राइम थ्रिलर की उम्मीद लेकर जा रहे हैं जिसमें आखिरी 20 मिनट आपको सीट से चिपका दें, तो यहां थोड़ी निराशा हो सकती है।
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others











