मराठी मूवी 'गोंधल' ऑस्कर में भारत की ऑफिशियल एंट्री:धुरंधर, बॉर्डर 2, हनुमान अंश को पीछे छोड़ा; लोक परम्परा पर बेस्ड है कहानी
मराठी फिल्म 'गोंधल' को 99वें एकेडमी अवॉर्ड्स (ऑस्कर 2027) के लिए भारत की ऑफिशियल एंट्री चुना गया है। फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया (FFI) ने शुक्रवार को इसका ऐलान किया। मराठी लोक परम्परा पर बनी इस थ्रिलर फिल्म को ऑस्कर समारोह में 'बेस्ट इंटरनेशनल फीचर फिल्म' कैटेगरी में भेजा जाएगा। इस बार ऑस्कर की रेस में भारत की तरफ से धुरंधर, बॉर्डर-2, हनुमान अंश समेत 33 फिल्में शामिल हुई थीं। 14 हिंदी फिल्में भी थीं रेस में इस साल ऑस्कर की दावेदारी के लिए देश भर की अलग-अलग भाषाओं से कुल 33 फिल्में FFI के पास भेजी गई थीं। इसमें सबसे ज्यादा 14 फिल्में हिंदी भाषा की थीं। इसके अलावा मराठी, तेलुगु और गुजराती भाषा से 4-4 फिल्में, तमिल से 3 फिल्में और मलयालम व नागामी भाषा से 1-1 फिल्म शामिल थी। 33 भारतीय फिल्मों की सूची में 14 हिन्दी फिल्में हक, 120 बहादुर, तेरा मेरा नाता, मैं वापस आऊंगा, ओह माय डॉग, बॉर्डर 2, खूंटा, धुरंधर, धुरंधर द रिवेंज, गवर्नर, 2020 दिल्ली, इक्कीस, ऑब्सेस और हनुमान अंश हैं। हिंदी और अन्य क्षेत्रीय भाषाओं की मजबूत दावेदारी के बावजूद मराठी फिल्म 'गोंधल' बाजी मारने में सफल रही। साइकोलॉजिकल थ्रिलर फिल्म है गोंधल 2 घंटे के रनटाइम वाली यह मराठी फिल्म ग्रामीण महाराष्ट्र की लोक परंपरा और धार्मिक अनुष्ठान 'गोंधल' पर आधारित एक साइकोलॉजिकल थ्रिलर है। इस फिल्म का लेखन और निर्देशन संतोष डावखर ने किया है। फिल्म की कहानी नवविवाहित जोड़े आनंद और सुमन के घर पर आयोजित रात भर चलने वाले गोंधल अनुष्ठान के इर्द-गिर्द घूमती है। पूजा-पाठ और उत्सव के दौरान गांव के लोगों के बीच दबे हुए पुराने विवाद, व्यक्तिगत रंजिशें और राजनीतिक तनाव बाहर आने लगते हैं। गांव के पाटिल का बेटा सरजेराव, जो सुमन से शादी न हो पाने के कारण नाराज था, इस शादी को स्वीकार नहीं कर पाता और धीरे-धीरे यह पवित्र अनुष्ठान एक क्राइम और सस्पेंस ड्रामा में बदल जाता है। फिल्म में किशोर कदम, इशिता देशमुख, योगेश सोहणी, निषाद भोईर और सुरेश विश्वकर्मा ने मुख्य भूमिकाएं निभाई हैं। इस फिल्म का संगीत महान संगीतकार इलैयाराजा ने तैयार किया है। इसी मेकिंग के लिए निर्देशक संतोष डावखर को इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल ऑफ इंडिया (IFFI) में सिल्वर पीकॉक (सर्वश्रेष्ठ निर्देशक) का पुरस्कार भी मिल चुका है। 13 सदस्यीय जूरी पैनल ने किया फैसला फिल्म के चयन के लिए फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया ने एक विशेष जूरी का गठन किया था। इस जूरी पैनल में पी शेषाद्री, विजय पाटकर, हितू कनोडिया, शांति कुमार, संदीप पराशर, संजय पाटिल, साबू जोसेफ, अनिल थॉमस, विवेक वासवानी, बिजॉन दासगुप्ता, हासन, वासन और तनिष्ठा चटर्जी जैसे दिग्गज शामिल थे। जूरी मेंबर्स ने सभी प्रविष्टियों की गहन समीक्षा करने के बाद इस मराठी थ्रिलर को ऑस्कर 2027 के मंच पर भेजने का फैसला लिया। पिछले साल ‘होमबाउंड’ भारत की ऑस्कर एंट्री थी पिछले साल फिल्म होमबाउंड को भारत की ओर से ऑस्कर के लिए भेजा गया था। फिल्म में ईशान खट्टर और विशाल जेठवा मुख्य भूमिकाओं में थे। 2025 में अलग-अलग भाषाओं की कुल 24 फिल्मों पर भारत की ऑस्कर एंट्री के लिए विचार किया गया था। इनमें होमबाउंड का सेलेक्शन हुआ था। उस समय सेलेक्शन कमेटी के चेयरपर्सन एन चंद्रा ने कहा था कि यह फैसला काफी मुश्किल था। एन चंद्रा ने कहा था, “ये ऐसी फिल्में थीं, जिन्होंने लोगों की जिंदगी को छुआ।” नीरज घायवान के डायरेक्शन में बनी होमबाउंड बशारत पीर के 2020 के न्यूयॉर्क टाइम्स के लेख 'टेकिंग अमृत होम' पर आधारित थी। पिछली बार ‘वन बैटल आफ्टर अनदर’ ने बेस्ट फिल्म समेत 6 अवॉर्ड जीते थे 98वें ऑस्कर अवॉर्ड्स (2026) में ‘वन बैटल आफ्टर अनदर’ ने बेस्ट फिल्म समेत सबसे ज्यादा 6 अवॉर्ड जीते थे। ‘सिनर्स’ के लिए माइकल बी. जॉर्डन को बेस्ट एक्टर और ‘हेमनेट’ के लिए जेसी बकले को बेस्ट एक्ट्रेस चुना गया था। ‘सिनर्स’ को सबसे ज्यादा 16 नॉमिनेशन मिले थे, लेकिन फिल्म ने 4 अवॉर्ड जीते थे। वहीं, भारतीय मूल की फिल्ममेकर गीता गंदभीर की दो डॉक्यूमेंट्री नॉमिनेट हुईं। प्रियंका चोपड़ा ने दूसरी बार ऑस्कर में प्रेजेंटर की भूमिका निभाई थी। पूरी खबर यहां पढ़ें…
मूवी रिव्यू-'लस्ट स्टोरीज 3':चार कहानियां, चार रंग और रिश्तों की वो बातें जो लोग अक्सर कह नहीं पाते
अवधि: 2 घंटे 44 मिनट रेटिंग: (3.5/5) स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म: नेटफ्लिक्स निर्देशक: विक्रमादित्य मोटवानी, किरण राव, शकुन बत्रा, विशाल भारद्वाज कलाकार: कोंकणा सेन शर्मा, राधिका आप्टे, विजय वर्मा, अभिषेक बनर्जी, गुरफतेह पीरजादा, सना थंपी, राधिका मदान, अली फजल, अदिति राव हैदरी, सिद्धार्थ, गजराज राव ‘लस्ट स्टोरीज 3’ को देखने बैठते वक्त उम्मीद यही रहती है कि चार अलग-अलग निर्देशक रिश्तों, आकर्षण और इच्छाओं को अपने-अपने अंदाज में दिखाएंगे। अच्छी बात ये है कि फिल्म इस उम्मीद को पूरी तरह निराश नहीं करती। कहीं कहानी हंसाती है, कहीं रिश्तों की उलझन दिखाती है और कहीं आपको चौंकाती है। हां, चारों कहानियां बराबर दमदार नहीं हैं, लेकिन दो घंटे 40 मिनट में फिल्म इतना मसाला जरूर दे देती है कि देखने वाले का ध्यान बना रहता है और इस बार सबसे ज्यादा सरप्राइज देती हैं अदिति राव हैदरी। कहानी: चार किस्से, चार अलग अंदाज फिल्म की पहली कहानी विक्रमादित्य मोटवानी की है। इसमें कोंकणा सेन शर्मा और राधिका आप्टे दो करीबी दोस्त हैं, जो अपनी-अपनी शादीशुदा जिंदगी से पूरी तरह खुश नहीं हैं। इंटरनेट पर कुछ देखने के बाद दोनों के दिमाग में एक ऐसा आइडिया आता है, जो दोस्ती और शादी दोनों की परीक्षा ले सकता है। यहां विजय वर्मा और अभिषेक बनर्जी अपने-अपने अंदाज में कहानी में कॉमेडी का तड़का लगाते हैं। कोंकणा और राधिका की दोस्ती वाला हिस्सा खास तौर पर अच्छा है। कहानी बहुत गहरी नहीं जाती, लेकिन हल्के-फुल्के अंदाज में काफी कुछ कह जाती है। दूसरी कहानी किरण राव की है और यहीं फिल्म थोड़ा अलग रास्ता पकड़ती है। गुरफतेह पीरजादा डबल रोल में हैं और सना थंपी के साथ उनकी कहानी शुरुआत में एक सामान्य आकर्षण की तरह लगती है, लेकिन धीरे-धीरे मामला रिश्ते से निकलकर अपराध और धोखे तक पहुंच जाता है। इस हिस्से का ट्विस्ट कहानी को संभालता है, हालांकि बीच में ऐसा भी लगता है कि कहानी जरूरत से ज्यादा चीजें एक साथ करने की कोशिश कर रही है। तीसरी कहानी शकुन बत्रा की है और शायद फिल्म का सबसे मजबूत हिस्सा भी यही है। राधिका मदान और अली फजल एक ऐसे कपल के किरदार में हैं जो तलाक लेने की तैयारी कर रहा है। दोनों के बीच गुस्सा है, शिकायतें हैं और बहुत सारी अनकही बातें हैं। लेकिन अजीब बात ये है कि जब भी दोनों मिलते हैं, उनके बीच वही पुरानी नजदीकी लौट आती है। यानी रिश्ता खत्म करने का फैसला तो हो चुका है, लेकिन दिल और आदतें अभी भी पुरानी जगह पर खड़ी हैं। शकुन बत्रा इसी उलझन को पकड़ते हैं। कहानी सिर्फ आकर्षण की नहीं रहती, बल्कि इस सवाल तक पहुंचती है कि क्या दो लोग एक-दूसरे से प्यार किए बिना भी एक-दूसरे के इतने करीब रह सकते हैं कि अलग होना मुश्किल हो जाए? और फिर आती है विशाल भारद्वाज की कहानी, जो फिल्म का सबसे अलग और सबसे मजेदार हिस्सा है। अदिति राव हैदरी और सिद्धार्थ एक पति-पत्नी के किरदार में हैं। कहानी पुराने दौर के हैदराबाद में सेट है, जहां अदिति का किरदार धीरे-धीरे रोमांटिक और कामुक साहित्य की दुनिया में दिलचस्पी लेने लगता है। यहीं से उसकी कल्पना और असली जिंदगी के बीच की सीमा थोड़ी धुंधली होने लगती है। सिद्धार्थ का किरदार भी इस पूरे खेल में काफी दिलचस्प है और गजराज राव अपने खास अंदाज में कहानी में खूब रंग भरते हैं। विशाल भारद्वाज ने इस हिस्से को इतना हल्का, शरारती और मजेदार रखा है कि कहानी कहीं भी भद्दी नहीं लगती। एक्टिंग: अदिति राव हैदरी ने बाजी मार ली चारों कहानियों में कलाकारों ने अच्छा काम किया है, लेकिन सबसे ज्यादा ध्यान खींचती हैं अदिति राव हैदरी। उनका किरदार मासूम भी है, जिज्ञासु भी और अंदर से काफी शरारती भी। अदिति ने इन तीनों रंगों को बहुत खूबसूरती से पकड़ा है। खासकर उनके चेहरे के एक्सप्रेशन और घबराहट वाले सीन कहानी को और मजेदार बना देते हैं। सिद्धार्थ उनके साथ अच्छी केमिस्ट्री शेयर करते हैं और पहली बार में जितने सीधे-सादे लगते हैं, किरदार आगे बढ़ने के साथ उतने ही दिलचस्प होते जाते हैं। राधिका मदान और अली फजल भी तीसरी कहानी में शानदार हैं। दोनों के बीच गुस्सा, प्यार, खीझ और पुरानी नजदीकी—सब कुछ स्क्रीन पर साफ नजर आता है। कोंकणा सेन शर्मा और राधिका आप्टे की दोस्ती फिल्म की पहली कहानी की जान है। दोनों की टाइमिंग अच्छी है और उनकी बातचीत में एक स्वाभाविकता दिखती है। विजय वर्मा और अभिषेक बनर्जी अपने छोटे-छोटे पलों में हंसी निकालने में कामयाब रहते हैं। डायरेक्शन और स्टोरीटेलिंग चारों निर्देशकों की अपनी अलग पहचान यहां साफ दिखाई देती है। विक्रमादित्य मोटवानी की कहानी तेज और हल्की है, लेकिन इसका आइडिया जितना मजेदार है, कहानी उतनी गहराई तक नहीं जाती। किरण राव ने मुंबई को खूबसूरती से इस्तेमाल किया है। उनकी कहानी में विजुअल स्टाइल अलग दिखती है, लेकिन ट्विस्ट के चक्कर में कहानी थोड़ी उलझ जाती है। शकुन बत्रा रिश्तों की पेचीदगियों को समझने में सबसे मजबूत नजर आते हैं। उनका हिस्सा सबसे ज्यादा भावनात्मक वजन लेकर आता है। और विशाल भारद्वाज तो यहां पूरी तरह अपने रंग में हैं। पुराने हैदराबाद का माहौल, संवाद, किरदार और हल्की शरारत—सब मिलकर इस कहानी को बाकी तीनों से अलग बना देते हैं। म्यूजिक और टेक्निकल पहलू कैसा है फिल्म का म्यूजिक कहानी के मूड को सपोर्ट करता है। खासकर ‘घट पट’ ध्यान खींचता है और कुछ हिस्सों की ऊर्जा बढ़ाता है। विजुअल ट्रीटमेंट भी फिल्म की बड़ी ताकत है। चारों कहानियों की अपनी अलग दुनिया है और कैमरा उस दुनिया को बनाने में अच्छी भूमिका निभाता है। विशाल भारद्वाज वाला हिस्सा खास तौर पर अपने रंग, लोकेशन और पीरियड फील की वजह से अलग नजर आता है। कहां रह जाती है पीछे? सबसे बड़ी दिक्कत यही है कि चारों कहानियों का स्तर एक जैसा नहीं है। पहली कहानी का आइडिया मजेदार है, लेकिन उसका असर उतना देर तक नहीं रहता। दूसरी कहानी में ट्विस्ट तो है, मगर कहानी कई मोड़ों पर जरूरत से ज्यादा उलझती हुई लगती है। तीसरी कहानी मजबूत है, लेकिन कुछ जगहों पर रिश्तों को समझाने की कोशिश थोड़ी ज्यादा हो जाती है। चौथी कहानी सबसे मजेदार है, लेकिन उसका पेस थोड़ा और तेज होता तो असर और बढ़ सकता था। यानी फिल्म में मसाला भरपूर है, लेकिन हर डिश का स्वाद एक जैसा नहीं है। फिल्म को लेकर फाइनल वर्डिक्ट ‘लस्ट स्टोरीज 3’ परफेक्ट फिल्म नहीं है, लेकिन यह ऐसी एंथोलॉजी है जिसमें कम से कम दो कहानियां आपको बांधकर रखती हैं और बाकी दो आपको पूरी फिल्म से जोड़कर रखती हैं। फिल्म की सबसे बड़ी खूबी है कि यह रिश्तों और इच्छाओं की बात करती है, लेकिन हर बात को भारी-भरकम बनाने की कोशिश नहीं करती। कहीं हंसाती है, कहीं सोचने पर मजबूर करती है और कहीं बस कहानी के साथ बह जाने देती है। अगर आपको रिलेशनशिप ड्रामा, थोड़ी कॉमेडी, थोड़ी शरारत और चार अलग-अलग अंदाज की कहानियां पसंद हैं, तो ‘लस्ट स्टोरीज 3’ वीकेंड पर एक अच्छी वन-टाइम वॉच है।
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