त्रिपुरा में आपात स्थिति में एम्बुलेंस के लिए ग्रीन कॉरिडोर बनाए जाएंगे: मुख्यमंत्री साहा
अगरतला, 21 सितंबर (आईएएनएस)। त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक साहा ने सोमवार को कहा कि आपात स्थिति में मरीजों को ले जाने वाली एम्बुलेंस की त्वरित आवाजाही को सुगम बनाने और यातायात जाम में देरी से बचने के लिए राज्य में विशेष ग्रीन कॉरिडोर बनाए जाएंगे।
मुख्यमंत्री ने अगरतला के सरकारी मेडिकल कॉलेज और जीबीपी अस्पताल के सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक में गहन चिकित्सा इकाई (आईसीयू) और केंद्रीय रोगाणु आपूर्ति विभाग (सीएसडी) इकाइयों का उद्घाटन किया। इस दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि उन्होंने मरीजों को ले जाने वाली एम्बुलेंस की आवाजाही के संबंध में कई बैठकें की हैं और समर्पित ग्रीन कॉरिडोर बनाने के लिए आवश्यक उपाय किए जाएंगे।
उन्होंने कहा कि हम एक ग्रीन कॉरिडोर बनाएंगे ताकि मरीज यातायात जाम में न फंसें। उन्होंने आगे कहा कि राज्य सरकार त्रिपुरा के लोगों को बेहतर चिकित्सा सेवाएं सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदारी से काम कर रही है।
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय का प्रभार भी संभाल रहे साहा ने बताया कि वर्तमान में राज्य के सभी प्रमुख रेफरल अस्पतालों की इकाइयों को अत्याधुनिक चिकित्सा सुविधाओं से जोड़ा जा रहा है। उन्होंने जानकारी देते हुए कहा कि राज्य सरकार का लक्ष्य है कि बेहतर इलाज के लिए राज्य के किसी भी व्यक्ति को राज्य से बाहर न जाना पड़े।
मुख्यमंत्री के अनुसार, वर्तमान में राज्य से रेफरल मरीजों की संख्या में काफी कमी आई है। उन्होंने कहा कि राज्य सरकार का लक्ष्य इस संख्या को शून्य तक लाना है। राज्य सरकार के लक्ष्यों में से एक बेहतर बुनियादी ढांचा तैयार करके, त्वरित चिकित्सा सेवाएं प्रदान करके और राज्य के अस्पतालों को स्वच्छ रखकर बेहतर चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराना है।
सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक के आईसीयू में पुरुष और महिला मरीजों के लिए नौ-नौ बेड हैं।
मुख्यमंत्री ने कहा कि स्वास्थ्य बुनियादी ढांचे में सुधार के साथ-साथ डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों को चरणबद्ध तरीके से उन्नत प्रशिक्षण दिया जा रहा है ताकि वे अत्याधुनिक चिकित्सा इकाइयों को कुशलतापूर्वक संचालित कर सकें।
साहा ने कहा कि वर्तमान में, सभी अस्पतालों में डिजिटल सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए पहल की गई है। कई अस्पतालों में डिजिटल सेवाएं पहले से ही प्रदान की जा रही हैं। अगरतला सरकारी मेडिकल कॉलेज और जीबीपी अस्पताल में 13.5 करोड़ रुपए की कुल लागत से नए आईसीयू और सीएसएसडी (सुपर स्पेशलिटी क्लिनिक) के शुभारंभ के साथ, राज्य के लोगों को त्वरित और निरंतर उन्नत चिकित्सा सेवाएं प्रदान करना संभव होगा और मरीजों की स्वास्थ्य सुरक्षा भी सुनिश्चित की जाएगी, वर्तमान में, उन्नत चिकित्सा सेवाएं प्रदान करने के लिए नौ सुपर स्पेशलिटी ब्लॉक कार्यरत हैं।
--आईएएनएस
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Explainer: सऊदी अरब पर हूती हमलों से बढ़ी चिंता, तेल की है बेहिसाब दौलत और आधुनिक हथियार; फिर भी बिल्कुल लाचार
Houthi Attacks Saudi Arabia: तेल के बड़े भंडार और भारी आर्थिक ताकत के कारण सऊदी अरब लंबे समय से पश्चिम एशिया की सबसे प्रभावशाली ताकतों में शामिल रहा है. देश ने अपनी आर्थिक क्षमता के साथ-साथ रक्षा क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर निवेश किया है. अमेरिका से अरबों डॉलर के हथियार और मिसाइल डिफेंस सिस्टम खरीदे गए हैं. इसके बावजूद यमन के हूती विद्रोहियों के हमलों ने सऊदी अरब की सुरक्षा व्यवस्था के सामने कई सवाल खड़े किए हैं.
हूती विद्रोही लंबे समय से सऊदी अरब को निशाना बनाते रहे हैं. ड्रोन और मिसाइलों के इस्तेमाल ने यह दिखाया है कि कम लागत वाले हथियार भी बेहद महंगे एयर डिफेंस सिस्टम के सामने चुनौती पैदा कर सकते हैं. यही वजह है कि सऊदी अरब और उसके सहयोगियों के लिए हूती खतरा केवल यमन तक सीमित मामला नहीं रह गया है.
रियाद और तेल प्रतिष्ठानों पर हमले की क्या कहानी है?
हूती विद्रोहियों ने कई मौकों पर सऊदी अरब के शहरों और तेल प्रतिष्ठानों को ड्रोन तथा मिसाइलों से निशाना बनाया है. ऐसे हमलों में रियाद और देश के दूसरे रणनीतिक इलाकों को भी निशाना बनाया गया है.
हूती संगठन के सैन्य प्रवक्ता याह्या सारी ने कई हमलों की जिम्मेदारी लेते हुए इन्हें यमन में सऊदी नेतृत्व वाले सैन्य अभियान की प्रतिक्रिया बताया है. हूती पक्ष अक्सर दावा करता रहा है कि उसके हमलों का उद्देश्य सऊदी अरब की सैन्य और आर्थिक क्षमता को नुकसान पहुंचाना है.
हालांकि, किसी भी हमले के बाद हूती संगठन के दावों और नुकसान के स्वतंत्र आकलन को अलग-अलग देखना जरूरी है. किसी एक पक्ष के बयान को पूरी घटना का अंतिम प्रमाण नहीं माना जा सकता.
हूती इतने खतरनाक कैसे बने?
हूती आंदोलन यमन का एक सशस्त्र और राजनीतिक संगठन है. पिछले वर्षों में उसने ड्रोन, क्रूज मिसाइल और बैलिस्टिक मिसाइलों की क्षमता विकसित की है. ईरान से उसके संबंधों और हथियारों की आपूर्ति को लेकर अमेरिका तथा दूसरे देशों ने कई बार चिंता जताई है, जबकि ईरान हूतियों को हथियार देने के आरोपों से इनकार करता रहा है.
हूती हमलों की खासियत कम लागत वाले ड्रोन और अपेक्षाकृत सस्ते हथियारों का इस्तेमाल है. बड़ी संख्या में ड्रोन या मिसाइल एक साथ भेजे जाने पर किसी देश के एयर डिफेंस सिस्टम के सामने चुनौती बढ़ सकती है.
इस संघर्ष में तीन बातें खास तौर पर महत्वपूर्ण हैं:
- ड्रोन और मिसाइल तकनीक की बढ़ती उपलब्धता.
- तेल और सैन्य प्रतिष्ठानों जैसे संवेदनशील ठिकानों को निशाना बनाने की क्षमता.
- महंगे एयर डिफेंस सिस्टम के सामने कम लागत वाले हथियारों का इस्तेमाल.
क्या सऊदी अरब के पास आधुनिक सुरक्षा व्यवस्था नहीं है?
सऊदी अरब के पास अमेरिका से खरीदे गए पैट्रियट जैसे एयर डिफेंस सिस्टम समेत कई आधुनिक सैन्य प्रणालियां हैं. लेकिन किसी भी एयर डिफेंस सिस्टम की क्षमता असीमित नहीं होती. अलग-अलग दिशा से आने वाले ड्रोन और मिसाइल, उनकी संख्या, उड़ान की ऊंचाई और हमले की रणनीति किसी भी रक्षा प्रणाली के लिए चुनौती बन सकती है.
यही कारण है कि सऊदी अरब ने हाल के वर्षों में अपनी एयर डिफेंस क्षमता को मजबूत करने और अलग-अलग स्तरों वाली सुरक्षा व्यवस्था विकसित करने पर जोर दिया है.
पाकिस्तान और तुर्किये से मदद का सवाल
सऊदी अरब के पाकिस्तान और तुर्किये के साथ लंबे समय से रक्षा और रणनीतिक संबंध रहे हैं. हालांकि, किसी सैन्य संघर्ष में किसी देश की सीधी भागीदारी कई राजनीतिक और कूटनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है.
सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग का इतिहास पुराना है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हर क्षेत्रीय संघर्ष में पाकिस्तान सीधे सैन्य हस्तक्षेप करेगा. इसी तरह तुर्किये भी क्षेत्रीय संघर्षों में अपने रणनीतिक हितों और कूटनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखता है.
इसलिए यह कहना कि दोनों देशों ने किसी खास हमले के समय सऊदी अरब को "मदद से साफ मना कर दिया", तभी उचित होगा जब इसकी आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध हो.
अमेरिका का रुख क्यों महत्वपूर्ण है?
सऊदी अरब और अमेरिका के बीच दशकों से मजबूत सुरक्षा और आर्थिक संबंध हैं. अमेरिका सऊदी अरब को हथियार और सैन्य तकनीक उपलब्ध कराता रहा है. लेकिन अमेरिका की पश्चिम एशिया नीति में समय के साथ बदलाव आया है और वह सीधे बड़े क्षेत्रीय युद्धों में शामिल होने को लेकर अधिक सतर्क रहा है.
सऊदी अरब के लिए चुनौती यह है कि महंगे हथियार खरीदना और किसी संभावित हमले के खिलाफ पूरी तरह सुरक्षित होना दो अलग बातें हैं. आधुनिक युद्ध में ड्रोन, साइबर हमले, मिसाइल और इलेक्ट्रॉनिक युद्ध जैसी तकनीकों ने सुरक्षा की तस्वीर बदल दी है.
क्या सऊदी अरब अकेला पड़ गया है?
सऊदी अरब को क्षेत्रीय स्तर पर कई सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है. यमन का संघर्ष, ईरान के साथ तनाव, लाल सागर में अस्थिरता और क्षेत्रीय शक्तियों के बदलते समीकरण उसकी सुरक्षा नीति को प्रभावित करते हैं.
लेकिन इसे सीधे तौर पर "सऊदी अरब पूरी तरह अकेला पड़ गया" कहना एक राजनीतिक निष्कर्ष होगा. सऊदी अरब के अमेरिका समेत कई देशों के साथ सुरक्षा, आर्थिक और कूटनीतिक संबंध हैं. साथ ही खाड़ी देशों के बीच भी अलग-अलग स्तर पर सहयोग मौजूद है.
सऊदी अरब के लिए असली चुनौती क्या है?
हूती हमलों ने यह सवाल जरूर खड़ा किया है कि आधुनिक युद्ध में केवल बड़ी सेना, महंगे लड़ाकू विमान और अत्याधुनिक मिसाइल सिस्टम पर्याप्त हैं या नहीं. ड्रोन और मिसाइलों जैसी अपेक्षाकृत सस्ती तकनीक ने छोटे और गैर-राज्य सशस्त्र समूहों को भी बड़ी आर्थिक और रणनीतिक संपत्तियों को निशाना बनाने की क्षमता दी है.
सऊदी अरब के लिए चुनौती सिर्फ तेल प्रतिष्ठानों की सुरक्षा नहीं है. उसे अपने शहरों, एयरपोर्ट, बंदरगाह, ऊर्जा ढांचे और महत्वपूर्ण सैन्य ठिकानों को एक साथ सुरक्षित रखना है. साथ ही उसे क्षेत्रीय तनाव को बढ़ने से रोकने के लिए कूटनीतिक रास्तों पर भी काम करना होगा.
इस पूरे घटनाक्रम से एक बात साफ होती है कि पश्चिम एशिया में शक्ति का मतलब अब सिर्फ पैसा और अत्याधुनिक हथियार नहीं रह गया है. ड्रोन, मिसाइल तकनीक, खुफिया जानकारी, एयर डिफेंस और कूटनीति—इन सभी का संतुलन किसी देश की सुरक्षा तय करने में अहम भूमिका निभाता है.
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