IDSFFK 2024 में किसी फिल्म पर रोक नहीं, 291 को छूट मिली: I&B Ministry
केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने सोमवार को कहा कि केरलम अंतरराष्ट्रीय वृत्तचित्र और लघु फिल्म महोत्सव (आईडीएसएफएफके) में किसी भी फिल्म के प्रदर्शन की अनुमति से इनकार नहीं किया गया है। मंत्रालय ने स्पष्ट किया कि कई फिल्में विचाराधीन हैं और विभिन्न अधिकारियों द्वारा उनकी समीक्षा की प्रतीक्षा की जा रही है। केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय का यह स्पष्टीकरण कांग्रेस सांसद शशि थरूर द्वारा 18वें आईडीएसएफएफके में 31 फिल्मों को कथित तौर पर अनुमति देने से इनकार किए जाने को ‘‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला’’ बताए जाने और केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री अश्विनी वैष्णव से हस्तक्षेप का आग्रह करने के बाद आया है।
मंत्रालय ने सोशल मीडिया मंच ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘18वें केरलम अंतरराष्ट्रीय वृत्तचित्र और लघु फिल्म महोत्सव में प्रदर्शन के लिए किसी भी फिल्म की अनुमति से इनकार नहीं किया गया है। छह फिल्मों से विस्तृत सारांश उपलब्ध कराने का अनुरोध किया गया है। फिल्मों के विषय के आधार पर, कुछ को समीक्षा के लिए विभिन्न क्षेत्रीय अधिकारियों के पास भेजा गया है।’’ केंद्र सरकार के सूत्रों ने कहा कि महोत्सव की आयोजक केरल राज्य चलचित्र अकादमी ने प्रमाणन आवश्यकताओं से छूट के लिए 347 फिल्में प्रस्तुत की थीं।
सूत्रों के अनुसार, इनमें से 291 फिल्मों के लिए छूट जारी कर दी गई है, जबकि 24 फिल्में पहले से ही प्रमाणित हैं और इसलिए उन्हें ऐसी छूट की आवश्यकता नहीं है। उन्होंने बताया कि अनापत्ति प्रमाण पत्र के लिए 20 फिल्मों को विदेश मंत्रालय, एक को रक्षा मंत्रालय, चार को केंद्रीय गृह मंत्रालय और एक को स्पष्टीकरण के लिए केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) के पास भेजा गया है। अन्य छह फिल्मों के लिए विस्तृत सारांश मांगे गए हैं।
सरकार के सूत्रों द्वारा दिए गए ये आंकड़े उन 32 फिल्मों की स्थिति स्पष्ट करते हैं, जिन्हें या तो अन्य विभागों के पास भेजा गया है या जिनसे अतिरिक्त जानकारी मांगी गई है। केरलम के संस्कृति मंत्री पी सी विष्णुनाथ द्वारा यह कहे जाने के बाद विवाद खड़ा हो गया कि महोत्सव के लिए चुनी गई 31 फिल्मों को प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई है। हालांकि, विष्णुनाथ ने यह भी कहा था कि केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय ने यह सूचित नहीं किया है कि फिल्मों की अनुमति से इनकार किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि केंद्र ने अकादमी को अनुमति प्राप्त फिल्मों की सूची भेज दी थी, जबकि शेष 31 को अभी मंजूरी नहीं मिली। इसी विवाद पर तिरुवनंतपुरम से लोकसभा सदस्य थरूर ने कहा था कि वह ‘‘31 फिल्मों के लिए अनुमति से इनकार किए जाने की बात जानकर स्तब्ध’’ हैं। उन्होंने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘‘यह न केवल दुनिया के बेहतरीन सिनेमा को सम्मान देने की भारत की गौरवशाली परंपरा के साथ विश्वासघात है, बल्कि हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकतों में से एक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी हमला है।’’ आईडीएसएफएफके का 18वां संस्करण 25 से 30 सितंबर तक तिरुवनंतपुरम में आयोजित होने वाला है।
यह महोत्सव राज्य सरकार के सांस्कृतिक मामलों के विभाग के तहत एक स्वायत्त संस्थान केरल राज्य चलचित्र अकादमी द्वारा आयोजित किया जाता है।
Justice Yashwant Varma केस में FIR और CBI जांच की मांग खारिज, Delhi High Court ने बताया Witch Hunt
दिल्ली हाई कोर्ट ने सोमवार को एक याचिका पर सुनवाई करने से इनकार कर दिया। इस याचिका में दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस यशवंत वर्मा के सरकारी आवास से बड़ी मात्रा में नकदी मिलने और बाद में उसे हटाए जाने के मामले में FIR दर्ज करने और CBI या स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) से स्वतंत्र जांच कराने की मांग की गई थी। जस्टिस अमित बंसल ने याचिकाकर्ता, वकील घनश्याम उपाध्याय के अधिकार (locus) पर सवाल उठाया और कहा कि उनके पास दिल्ली पुलिस और उसके बाद सक्षम मजिस्ट्रेट के पास जाने का दूसरा रास्ता मौजूद है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने टिप्पणी की: "मैं इस पर सुनवाई नहीं कर रहा हूं। यह बिना किसी ठोस आधार के किसी को फंसाने की कोशिश (witch hunt) है। क्या आपके पास करने के लिए कोई बेहतर काम नहीं है? इसके बाद कोर्ट ने उपाध्याय को याचिका वापस लेने और कानून के मुताबिक सही उपाय अपनाने की इजाज़त दे दी।
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खुद पेश हुए उपाध्याय ने FIR दर्ज करने और मार्च 2025 में आग लगने के बाद जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास से करेंसी की कथित मौजूदगी, कस्टडी और गायब होने की CBI या SIT से स्वतंत्र जांच की मांग की थी। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि संज्ञेय अपराधों का खुलासा करने वाली सामग्री होने के बावजूद आपराधिक कानून के तहत कार्रवाई न करना मनमाना था और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन था। उन्होंने कहा कि इस मामले में उपलब्ध सामग्री FIR दर्ज करने और जांच शुरू करने के लिए ज़रूरी "महज़ शक की हद से कहीं ज़्यादा" थी। याचिका में यह भी कहा गया कि इन-हाउस कमेटी और कानूनी जांच कमेटी के निष्कर्षों को भले ही अपने आप में आपराधिक अपराध का सबूत नहीं माना जा सकता, लेकिन वे यह तय करने के लिए अहम सामग्री थे कि क्या संज्ञेय अपराधों का उचित संदेह था, जिसके लिए आपराधिक जांच मशीनरी को सक्रिय करने की ज़रूरत थी।
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याचिकाकर्ता ने करेंसी के कथित स्रोत, मालिकाना हक, कस्टडी और गायब होने की जांच की मांग की। इसके अलावा, उन्होंने आग लगने के बाद अहम सबूतों को ज़ब्त न करने और उन्हें सुरक्षित न रखने का मुद्दा भी उठाया। याचिका के अनुसार, 14-15 मार्च, 2025 की रात को नई दिल्ली में 30, तुगलक क्रिसेंट स्थित जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास के स्टोररूम/आउटहाउस में आग लग गई थी। आरोप है कि आग बुझाने और उसके बाद पुलिस की कार्रवाई के दौरान जली हुई और आंशिक रूप से जली हुई करेंसी देखी गई थी और उसकी तस्वीरें व वीडियो भी बनाए गए थे। सुनवाई के दौरान, केंद्र सरकार और CBI की ओर से पेश स्टैंडिंग काउंसिल प्रेमतोष कुमार मिश्रा ने याचिका का विरोध किया और कहा कि याचिकाकर्ता के पास इस मामले में कार्यवाही आगे बढ़ाने का कोई अधिकार (locus standi) नहीं है। उन्होंने यह भी बताया कि उपाध्याय पहले सुप्रीम कोर्ट जा चुके थे और उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी। मिश्रा ने कहा कि याचिकाकर्ता के पास अपनी शिकायत लेकर दिल्ली पुलिस और उसके बाद सक्षम मजिस्ट्रेट के पास जाने का विकल्प मौजूद था।
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