अमेरिका पर भड़का उत्तर कोरिया, किम जोंग ने 3 घंटे में दागीं 2 मिसाइलें, ट्रंप के जाल में नहीं फंसे
North Korea News: उत्तर कोरिया ने रविवार को करीब तीन घंटे में दो मिसाइल लॉन्च कर कोरियाई प्रायद्वीप को हिला डाला. पहली मिसाइल वॉनसान से दागी गई और करीब 450 किलोमीटर तक गई. दक्षिण कोरिया ने इसे कम दूरी की बैलिस्टिक मिसाइल बताया, जिसके ह्वासोंग-11 श्रृंखला का हिस्सा होने का अनुमान है.
लहर-लहर:समाज में रहने की पहली शर्त ईमानदारी, सड़क पर सही चलना भी इसकी मिसाल
दुनिया में दो तरह के जानवर हैं- एक जो अकेले रहते हैं जैसे तेंदुआ है, जगुआर है। दूसरे कुछ जानवर हैं, जो समूह में रहते हैं। वो अकेले नहीं रह सकते; उनको समूह में ही रहना है। इंसान भी वैसा जानवर है, जिसे समूह में ही रहना है। अब इतने लोग साथ में रहेंगे कैसे? तो ये बात माननी पड़ेगी हमको कि हम एक-दूसरे को धोखा नहीं देंगे, हम एक-दूसरे को ऐसी बात नहीं कहेंगे, जो सच्ची नहीं है। हम एक-दूसरे से वादा करेंगे तो निभाएंगे। अगर वो कोई हमारा भला करेगा तो उसका धन्यवाद भी करेंगे और हो सका तो हम भी उसका कुछ भला करेंगे। ईमानदारी क्या है? आप जब सड़क पर कार चलाते हैं तो हिंदुस्तान में यह कानून है कि आप लेफ्ट में ड्राइव करेंगे। कार को लेफ्ट में ड्राइव करना ईमानदारी है। कानून है कि सिग्नल लाल होगा तो आपको रुकना है तो सिग्नल लाल पर रुकना ईमानदारी है। अब अगर आपने यह ईमानदारी नहीं की तो आपकी गाड़ी को चोट लग जाएगी या आप किसी और को चोट लगा देंगे या ट्रैफिक जाम हो जाएगा। आज समाज में ये जो ट्रैफिक जाम दिखते हैं ये बेईमानी की वजह से हैं और हर आदमी को उससे नुकसान होता है। तो ईमानदारी आराम से जीने की, शांति और सुकून से जीने की पहली शर्त है। मैं उर्दू में लिखता हूं। स्क्रिप्ट में संवाद उर्दू लिपि में लिखे जाते थे, जबकि बाकी विवरण अंग्रेजी में होता था, जिसे हम बोलकर लिखवाते थे। मुझे और सलीम साहब को टाइप करना नहीं आता था। एक सरदार जी हमारे लिए टाइप कर देते थे, लेकिन यूनिट के लोगों जैसे रमेश सिप्पी साहब और अन्य सदस्यों को स्क्रिप्ट हिंदी में चाहिए होती थी। रमेश सिप्पी साहब के एक सहायक थे खालिद साहब। मैंने उन्हें यह जिम्मेदारी दे दी थी कि उर्दू लिपि में लिखे संवादों को देवनागरी में लिखकर प्रोड्यूसर और डायरेक्टर तक पहुंचा दें। खालिद साहब बहुत शरीफ, शांत और संकोची व्यक्ति थे। समय बीतने पर वे बूढ़े होकर रिटायर हो गए। उन्हें सिप्पी फिल्म्स से वेतन मिलना भी बंद हो गया था। इसलिए मैं उन्हें हर महीने कुछ पैसे भेजने लगा। बाद में उनकी मृत्यु का पता चला। मुझे मालूम था कि उनकी पत्नी और बच्चे हैं, इसलिए मैं वही रकम उनकी पत्नी को भेजने लगा। उनका बेटा हर महीने पैसे लेने आता और अपनी मां को दे देता था। इस बात की पुष्टि हमारे शुभचिंतक हारून साहब से होती रहती थी, जो उस परिवार के संपर्क में थे। तो एक दिन वह बेटा आया जो 30 साल से ऊपर का ही रहा होगा। उसने कहा, साहब, अगले महीने से पैसे भेजना बंद कर दीजिए। मेरी वालिदा का इंतकाल हो गया है। अब आपका पैसा लेना गलत होगा। अच्छा, वह बेटा न बहुत अमीर था, न किसी बड़ी नौकरी या बड़े बिजनेस में था। उसकी ईमानदारी देखकर मुझे खुशी भी हुई, हैरत भी और इत्मीनान भी हुआ। मैं उस आदमी से बहुत ही मुतास्सिर हुआ। तो ऐसा नहीं है कि दुनिया में शराफत नहीं है, नेकी और ईमानदारी नहीं बची है। इंसानों के सुरक्षित रहने के लिए ईमानदारी एक जरूरत है। और सबसे पहली जो ईमानदारी आपको दिखाई देती है वो मां में दिखाई देती है। बच्चे की तरफ मां के जो भी कर्तव्य हैं वो निभाती है। कोई मां पागल होगी तो बात अलग है, वरना वो बच्चे से बेईमानी नहीं करती है। समाज में जब आप पैदा होते हैं, तो सबसे पहला इंसान जिससे आपका परिचय होता है और जिसके कारण आप इस दुनिया में आते हैं, वह आपकी मां है। और वह मां आपके प्रति ईमानदार है। यानी आपको अपनी मां से पहला सबक ईमानदारी का ही मिलता है। अब आपने बाद में बेईमानी के सबक कहां से सीखे, यह आपको खुद सोचना चाहिए। (संपादन और समन्वय- अरविंद मण्डलोई)
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