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पैक्स सिलिका क्या है? इसमें भारत को शामिल करने से अमेरिका को क्या लाभ मिलेगा?

पैक्स सिलिका (Pax Silica) अमेरिका की अगुवाई वाली एक रणनीतिक तकनीकी पहल है, जो सिलिकॉन-आधारित सप्लाई चेन को मजबूत करने पर केंद्रित है। यह एआई (AI), सेमीकंडक्टर और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग जैसे क्षेत्रों में वैश्विक निर्भरता कम करने का प्रयास करती है। यह नवीनतम अंतर्राष्ट्रीय पहल क्रिटिकल मिनरल्स, ऊर्जा संसाधनों, चिप निर्माण, एआई (AI) इंफ्रास्ट्रक्चर और लॉजिस्टिक्स की सुरक्षित सप्लाई चेन बनाती है। इसलिए अमेरिकी विदेश विभाग इसे "पॉजिटिव-सम" साझेदारी मानता है, जो चीन जैसी निर्भरताओं से बचाव करती है। इससे विश्वसनीय देशों में नवाचार और निवेश बढ़ता है।

इस प्रकार पैक्स सिलिका का मुख्य उद्देश्य इस क्षेत्र में चीन के प्रभुत्व को कम करना और विश्वसनीय देशों के बीच सुरक्षित तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र बनाना है।

चूंकि भारत के लिए इसका रणनीतिक महत्व है, इसलिए भारत को हाल ही में इसमें पूर्ण सदस्यता का न्योता मिला है, जो ग्लोबल चिप हब बनने का अवसर देगा। इससे जहां अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया जैसी कंपनियों से भारी निवेश, तकनीकी हस्तांतरण और रोजगार सृजन होगा। वहीं रक्षा, अंतरिक्ष और सैन्य सुरक्षा में भी मजबूती मिलेगी। इसका प्रमुख उद्देश्य है कि यह वैश्विक पहल महत्वपूर्ण खनिजों, ऊर्जा स्रोतों, सेमीकंडक्टर, उन्नत विनिर्माण, एआई (AI) अवसंरचना और लॉजिस्टिक्स क्षेत्रों में दबावपूर्ण निर्भरताओं को घटाती है। उच्च-तकनीकी संयुक्त उद्यमों और रणनीतिक सह-निवेश को बढ़ावा देकर नवाचार को प्रोत्साहित करती है। संवेदनशील प्रौद्योगिकियों को चिंताजनक देशों से बचाने का लक्ष्य रखती है।

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जहां तक इसकी संरचना की बात है तो अमेरिका इसके संस्थापक सदस्य के रूप में नेतृत्व करता है, जिसमें जापान, दक्षिण कोरिया, सिंगापुर, नीदरलैंड्स, यूनाइटेड किंगडम, इज़राइल, यूएई और ऑस्ट्रेलिया जैसे समान विचारधारा वाले देश शामिल हैं। यह गठबंधन-आधारित मॉडल पर काम करती है, जो साझा निवेश और सहयोग पर जोर देती है। भारत को हाल ही में पूर्ण सदस्यता का निमंत्रण मिला है। जनवरी 2026 में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने भारत को इसमें शामिल करने की घोषणा की। जबकि इससे पहले टैरिफ विवाद से भारत बाहर था, लेकिन अब यह साझेदारी भारत-अमेरिका संबंधों को नई ऊंचाई देगी।

पैक्स सिलिका में अमेरिका नेतृत्व करता है और इसमें जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान जैसे प्रमुख देश शामिल हैं। यह पहल विश्वसनीय साझेदार देशों को जोड़ती है ताकि सिलिकॉन सप्लाई चेन मजबूत हो। इसके मुख्य सदस्य देश निम्नलिखित हैं:- संस्थापक सदस्य: अमेरिका (नेतृत्वकर्ता), जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान। अन्य प्रमुख सदस्य: नीदरलैंड्स, यूनाइटेड किंगडम, इज़राइल, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया। मसलन, ये देश उच्च-तकनीकी विनिर्माण और AI क्षेत्रों में मजबूत क्षमता रखते हैं। इससे भारत को सेमीकंडक्टर और AI सप्लाई चेन में प्रमुख स्थान मिलेगा।

# भारत के पैक्स सिलिका में शामिल होने से चीन पर पड़ेगा नकारात्मक प्रभाव
भारत के पैक्स सिलिका में शामिल होने से चीन पर मुख्य रूप से नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा, क्योंकि यह पहल विशेषकर सिलिकॉन, सेमीकंडक्टर और एआई (AI) सप्लाई चेन में उसके एकाधिकार को चुनौती देगी। रूस पर अप्रत्यक्ष प्रभाव हो सकता है, लेकिन सीधा उल्लेख कम है। यह वैश्विक तकनीकी निर्भरता को पुनर्गठित करेगा। इसका चीन पर प्रभाव पड़ेगा क्योंकि चीन वर्तमान में महत्वपूर्ण खनिजों, ऊर्जा स्रोतों, चिप निर्माण और AI इंफ्रास्ट्रक्चर पर हावी है। लिहाजा पैक्स सिलिका के माध्यम से भारत का प्रवेश उसके प्रभुत्व को कम करेगा, दबावयुक्त निर्भरता घटाएगा और वैकल्पिक सप्लाई चेन बनाएगा। इससे चीन के निर्यात बाजार और तकनीकी वर्चस्व पर दबाव बढ़ेगा।

जहां तक रूस पर प्रभाव की बात है तो रूस पर इसके प्रत्यक्ष प्रभाव का स्पष्ट उल्लेख नहीं मिला, लेकिन ट्रंप प्रशासन के रूसी तेल खरीद पर 500% टैरिफ जैसे कदमों से व्यापक आर्थिक दबाव जुड़ सकता है। दरअसल पैक्स सिलिका ऊर्जा स्रोतों की सुरक्षित चेन पर फोकस करता है, जो रूस के पारंपरिक ऊर्जा निर्यात को अप्रत्यक्ष चुनौती दे सकता है। इसका सामरिक निहितार्थ यह होगा कि भारत के बढ़े कदम से अमेरिका-भारत साझेदारी मजबूत होगी।इसको मजबूत कर भू-राजनीतिक संतुलन बदलेगा, जहां चीन-रूस गठजोड़ कमजोर पड़ सकता है। जबकि भारत को निवेश और तकनीक मिलने से उसकी वैश्विक स्थिति मजबूत होगी।

# भारत के पैक्स सिलिका में शामिल होने से चीन पर बढ़ेगा आर्थिक दबाव 
भारत के पैक्स सिलिका में शामिल होने से चीन पर आर्थिक दबाव बढ़ेगा क्योंकि नई पहल मुख्य रूप से सेमीकंडक्टर, AI और महत्वपूर्ण खनिजों की सप्लाई चेन में उसके वर्तमान प्रभुत्व को कम करके बढ़ेगा। यह वैकल्पिक उत्पादन केंद्र स्थापित कर चीन के निर्यात बाजार को सीधे चुनौती देगा। रणनीतिक रूप से यह अमेरिका-नीत गठबंधन को मजबूत करेगा। जहां तक सप्लाई चेन पर प्रभाव की बात है तो चीन सिलिकॉन, चिप निर्माण और AI हार्डवेयर में 70-90% वैश्विक आपूर्ति नियंत्रित करता है। लिहाजा इसमें भारत का प्रवेश निवेश आकर्षित कर उत्पादन क्षमता बढ़ाएगा, जिससे चीन के बाजार हिस्से में 10-20% गिरावट आ सकती है। इससे उसके निर्यात राजस्व में अरबों डॉलर का नुकसान होगा। इससे निर्यात और बाजार हानि भी होगी क्योंकि भारत जैसे नए केंद्रों से जापान, कोरिया और यूरोपीय कंपनियां खरीदारी स्थानांतरित करेंगी। चीन के सस्ते उत्पादों पर निर्भरता घटेगी, जिससे उसके व्यापार अधिशेष पर दबाव पड़ेगा। लंबे समय में AI और टेक निर्यात 15-25% कम हो सकते हैं। जहां तक भू-आर्थिक परिणाम की बात है तो भारत का यह कदम चीन को तकनीकी आत्मनिर्भरता के लिए मजबूर करेगा, लेकिन तत्काल पूंजी और बाजार हानि से उसकी विकास दर 0.5-1% धीमी हो सकती है। भारत-अमेरिका साझेदारी से वैश्विक टेक व्यापार का पुनर्वितरण होगा।

इस प्रकार देखा जाए तो भारत को अपने पाले में मिलाने के लिए और रूस-चीन से उसकी रणनीतिक दूरी बढ़ाने के लिए दुनिया का थानेदार अमेरिका बेकरार है, क्योंकि गुटनिरपेक्ष भारत जिधर होगा उस वैश्विक गठबंधन का अंतर्राष्ट्रीय वजन स्वतः बढ़ जाएगा। ऐसा इसलिए कि भारत दुनिया की सबसे आबादी वाला गणतांत्रिक देश है। यहां के लोगों में बल और बुद्धिमत्ता कूट कूट कर भरी है। आर्थिक और सैन्य दृष्टि से भी भारत निरंतर प्रगति कर रहा है। 

यही वजह है कि अमेरिका ब्रेक के बाद एक से बढ़कर एक वैश्विक गुटीय ऑफर दे रहा है। यह बात अलग है कि रूस से भारत के घनिष्ट रिश्ते में खटास पैदा करने के लिए वह टैरिफ इजाफे का भी दांव चल चुका है और आगे ज्यादा करने की धमकी भी दे रहा है। वहीं द्विपक्षीय व्यापार वार्ता को भी बेवजह लंबा खींच रहा है। ऐसे में अमेरिका अब भारत का भरोसेमंद मित्र नहीं हो सकता है। लेकिन रूसी-चीनी दोस्ती के दृष्टिगत अमेरिका से खुलेआम शत्रुता भी नहीं की जा सकती। इसलिए चीन की तरह ही अमेरिका से भी शो शो का रिश्ता रखना लाजिमी है।

अनुभव बताता है कि अमेरिका भारत से अपनी मनवाने पर तुला हुआ है, लेकिन भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता के दृष्टिकोण पर अडिग है जिससे अमेरिका की हर कोशिश कमतर प्रतीत होती है। ऐसा इसलिए कि भारत अपने भरोसेमंद अंतर्राष्ट्रीय मंच मित्र रूस को न तो छोड़ना चाहता है और न ही अपने रणनीतिक दुश्मन चीन-पाकिस्तान से बेवजह पंगा लेना चाहता है, क्योंकि भारत निज विकास के द्वारा अपनी जनता के जीवन स्तर में बढ़ोतरी को प्राथमिकता देता है। यही कारण है कि अब अमेरिका ने भारत को पैक्स सिलिका समूह में शामिल करने का लॉलीपॉप थमाया है, ताकि भारत को पटाकर रणनीतिक लाभ हासिल किया जा सके। 

- कमलेश पांडेय
वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक

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