मकर संक्रांति पर्व को उत्तरायण के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन सूर्य उत्तर की ओर बढ़ने लगता है जो ठंड के घटने का प्रतीक है। धार्मिक मान्यता के अनुसार सूर्य अपने पुत्र शनि के घर जाते हैं जो मकर राशि के शासक थे। पिता और पुत्र आम तौर पर अच्छी तरह नहीं मिल पाते इसलिए भगवान सूर्य महीने के इस दिन को अपने पुत्र से मिलने का एक मौका बनाते हैं। जाड़े के मौसम के समापन और फसलों की कटाई की शुरुआत का प्रतीक समझे जाने वाले मकर संक्रांति पर्व को देश भर में धूमधाम से मनाया जाता है और इस अवसर पर लाखों लोग देश भर में पवित्र नदियों में स्नान कर पूजा अर्चना करते हैं। देश के विभिन्न भागों में तो लोग इस दिन कड़ाके की ठंड के बावजूद रात के अंधेरे में ही नदियों में स्नान शुरू कर देते हैं। इस पावन अवसर पर श्रद्धालु इलाहाबाद के त्रिवेणी संगम, वाराणसी में गंगाघाट, हरियाणा में कुरुक्षेत्र, राजस्थान में पुष्कर और महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी में स्नान करते हैं।
मकर संक्रांति पर्व देश के विभिन्न भागों में अलग अलग नामों से भी मनाया जाता है। जहां उत्तर और मध्य भारत में इसे मकर संक्रांति कहते हैं वहीं आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और केरल में इस पर्व को सिर्फ संक्रांति कहते हैं तो तमिलनाडु में इस पर्व को पोंगल कहा जाता है। इस दिन गरीबों और जरूरतमंदों को दान देना पुण्यकारी माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन खिचड़ी का दान देना विशेष रूप से फलदायी होता है। देश के विभिन्न मंदिरों को इस दिन विशेष रूप से सजाया जाता है और इसी दिन से शुभ कार्यों पर लगा प्रतिबंध भी खत्म हो जाता है।
इस दिन लोग पीले वस्त्र पहनकर मंदिरों में जाते हैं और पूजा अर्चना करते हैं। इस पर्व पर इलाहाबाद में लगने वाला माघ मेला और कोलकाता में गंगासागर के तट पर लगने वाला मेला काफी प्रसिद्ध है। अयोध्या में भी इस पर्व की खूब धूम रहती है। यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पवित्र सरयू में डुबकी लगाकर राम मंदिर में रामलला, हनुमानगढ़ी में हनुमानलला तथा कनक भवन में मां जानकी की पूजा अर्चना करते हैं। हरिद्वार में भी इस दौरान मेला लगता है जिसमें श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता है। इस पर्व पर तीर्थराज प्रयाग एवं गंगासागर में स्नान को महास्नान की संज्ञा दी गई है।
इस पर्व की छटा देश के विभिन्न हिस्सों में अलग अलग रूप में देखने को मिलती है। जहां समूचे उत्तर प्रदेश में इस पर्व को खिचड़ी के नाम से जाना जाता है तथा इस दिन खिचड़ी सेवन एवं खिचड़ी दान का अत्यधिक महत्व होता है वहीं महाराष्ट्र में इस दिन सभी विवाहित महिलाएं अपनी पहली संक्रांति पर कपास, तेल, नमक आदि वस्तुएं अन्य सुहागिन महिलाओं को दान करती हैं। तमिलनाडु में इस त्योहार को पोंगल के रूप में चार दिन तक मनाया जाता है। पहले दिन कूड़ा करकट जलाया जाता है, दूसरे दिन लक्ष्मी जी की पूजा की जाती है और तीसरे दिन पशु धन की पूजा की जाती है। पोंगल मनाने के लिए स्नान करके खुले आंगन में मिट्टी के बर्तन में खीर बनाई जाती है, जिसे पोंगल कहते हैं। इसके बाद सूर्य देव को नैवैद्य चढ़ाकर खीर को प्रसाद के रूप में सभी ग्रहण करते हैं। असम में मकर संक्रांति को माघ−बिहू अथवा भोगाली−बिहू के नाम से मनाया जाता है तो राजस्थान में इस पर्व पर सुहागन महिलाएं अपनी सास को वायना देकर आशीर्वाद प्राप्त करती हैं।
मान्यता है कि महाभारत काल में भीष्म पितामह ने अपनी देह त्यागने के लिए मकर संक्रांति का ही चयन किया था। मकर संक्रांति के दिन ही गंगाजी भागीरथ के पीछे−पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होकर सागर में जा मिली थीं।
- शुभा दुबे
Continue reading on the app
पोंगल तमिल समुदाय का सबसे बड़ा और पावन पर्व है। इस साल 14 जनवरी से 17 जनवरी 2026 तक पोंगल पर्व को बड़े उल्लास और परंपरागत रीति-रिवाजों के साथ मनाया जा रहा है। पंचांग के मुताबिक पोंगल पर्व तमिल माह 'थाई' की पहली तिथि से शुरू होता है। इसको नई शुरूआत, खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक भी माना जाता है। पोंगल सिर्फ एक पर्व नहीं बल्कि यह सूर्य देव, इंद्र देव, पशुधन और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व है। यही कारण है कि पोंगल पर्व चार दिनों तक चलता है और हर दिन का अपना अलग धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व होता है।
पहला दिन - भोगी पोंगल
बता दें कि इस पर्व की शुरूआत भोगी पोंगल से होती है, जोकि देवराज इंद्र को समर्पित होता है। इस दिन लोग अपने घरों की साफ-सफाई करते हैं। वहीं पुराने और बेकार सामान को आग को डालकर जला देते हैं। यह परंपरा नकारात्मकता के अंत और नई शुरूआत का प्रतीक मानी जाती है।
दूसरा दिन- सूर्य पोंगल
पोंगल पर्व का दूसरा दिन यानी की सूर्य पोंगल सबसे महत्वपूर्ण होता है। इस दिन आंगन में नए मिट्टी के बर्तन में दूध, नए चावल और गुड़ डालकर पोंगल बनाया जाता है। वहीं जब दूध उबलकर बाहर आता है, तो लोग खुशी से 'पोंगल ओ पोंगल' का जयघोष करते हैं और इस दिन सूर्य देव की पूजा उपासना की जाती है।
तीसरा दिन- मट्टू पोंगल
इस पर्व के तीसरे दिन मट्टू पोंगल खेती में सहायक मवेशियों को समर्पित होता है। इस दिन गायों और बैलों को स्नान करवाकर सजाया जाता है और उनकी पूजा की जाती है। मट्टू पोंगल के दिन तमिलनाडु के फेमस पारंपरिक खेल जल्लीकट्टू का आयोजन भी किया जाता है।
चौथा दिन- कानून पोंगल
पोंगल पर्व के आखिरी दिन को कानून पोंगल कहा जाता है। इस दिन घर-परिवार के सभी सदस्य एक साथ समय बिताते हैं। वहीं महिलाएं भाइयों और परिवार की सुख-समृद्धि और शांति की कामना करती हैं। इस दिन एक-दूसरे के घर जाकर मिठाइयां बांटी जाती हैं।
महत्व
पोंगल पर्व प्रकृति, फसल और जीवन के प्रति आभार व्यक्त करने का उत्सव है। तमिल कहावत के अनुसार, 'थाई पिरंधाल वजी पिरक्कुम' यानी थाई महीने की शुरूआत के साथ ही जीवन में नए रास्ते और अवसर खुलते हैं।
Continue reading on the app