DUSU Result पर Amit Shah ने ABVP को दी बधाई, BJP का Rahul Gandhi पर तंज, कहा- छात्रों ने दिया बड़ा Zero
शनिवार को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह समेत बीजेपी के कई नेताओं ने अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP) को बधाई दी। ABVP ने दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन (DUSU) चुनाव में चार में से तीन मुख्य पदों पर जीत हासिल की है। X पर एक पोस्ट में शाह ने कहा कि दिल्ली यूनिवर्सिटी स्टूडेंट्स यूनियन चुनाव में ABVP की शानदार जीत पर परिषद के सभी समर्पित कार्यकर्ताओं को हार्दिक बधाई। उन्होंने आगे कहा कि यह जीत काउंसिल की 'राष्ट्र प्रथम' की विचारधारा और छात्र कल्याण के प्रति उसकी प्रतिबद्धता में युवाओं के अटूट भरोसे को दर्शाती है। मुझे पूरा भरोसा है कि काउंसिल के कार्यकर्ता इस जीत से नई ऊर्जा पाकर और स्वामी विवेकानंद जी के आदर्शों का पालन करते हुए, छात्रों के हितों और राष्ट्र-निर्माण के काम को लगातार आगे बढ़ाते रहेंगे।
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बीजेपी के राष्ट्रीय मीडिया सह-संयोजक सिद्धार्थ यादव ने भी परिषद और दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रों को बधाई देते हुए कहा कि सबसे पहले, भारतीय जनता पार्टी की ओर से मैं परिषद परिवार को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं देता हूं। साथ ही, मैं दिल्ली यूनिवर्सिटी के उन लाखों छात्रों को भी बधाई देता हूं जिन्होंने DUSU चुनावों में स्पष्ट जनादेश दिया है। उन्होंने आगे कहा कि इस जनादेश से यह बिल्कुल साफ़ हो गया है कि दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्र और देश के युवा भारी बहुमत के साथ राष्ट्रवादी विचारों के पक्ष में खड़े हैं। वे परिषद की सेवा की भावना के साथ हैं और नकारात्मकता की राजनीति को नकारते हैं।
यादव ने ABVP की तीन जीतों का भी ज़िक्र करते हुए कहा कि नतीजों में एक बहुत खास बात हुई है: दिल्ली यूनिवर्सिटी के छात्रों ने राहुल गांधी, कांग्रेस पार्टी और उनके छात्र संगठन NSUI को पूरी तरह से नकार दिया है। उन्हें 'बड़ा ज़ीरो' दिया है। ABVP के यश डबास ने प्रेसिडेंट का पद जीता, जबकि रिया छावड़ी और लक्ष्यराज सिंह ने क्रमशः सेक्रेटरी और जॉइंट सेक्रेटरी के पद जीते। वाइस-प्रेसिडेंट का पद निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शोकीन ने जीता।
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केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने भी नतीजों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि इन नतीजों से पता चलता है कि कांग्रेस और विपक्षी पार्टियां जिसे "छात्रों की गूंज" कहती हैं, वह असल में "झूठ की गूंज" थी। रिजिजू ने कहा कि देश भर के छात्र दिल्ली यूनिवर्सिटी में पढ़ते हैं। DUSU को देश भर के छात्रों की आवाज़ माना जाता है। दिल्ली यूनिवर्सिटी में ABVP की ज़बरदस्त जीत यह दिखाती है कि कांग्रेस और विपक्षी पार्टियां जिसे 'छात्रों की गूंज' कहती हैं, वह असल में 'झूठ की गूंज' है।
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उत्तर प्रदेश के विधायक राजेश्वर सिंह ने मांग की है कि जिस तरह ब्रिटिश काल के तीन आपराधिक कानूनों की जगह भारतीय कानून लाए गए, उसी तरह नागरिक दायित्व से जुड़ी लापरवाही के पीड़ितों को मुआवज़ा देने के लिए औपनिवेशिक काल के अपकृत्य कानून (लॉ ऑफ टॉर्ट्स) की जगह नया कानून बनाया जाए। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के विधायक और उच्चतम न्यायालय के अधिवक्ता राजेश्वर सिंह ने शनिवार को केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को पत्र लिखकर उनसे व्यापक ‘भारतीय सिविल रॉन्ग्स एंड कंपनसेशन कोड’ शुरू करने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि भारतीय विधि आयोग से सिफारिशें प्राप्त करने के बाद इसे कानून का रूप दिया जा सकता है।
उन्होंने पत्र में कहा है, ‘‘एक विकसित राष्ट्र को केवल दोषी को दंडित ही नहीं करना चाहिए, बल्कि पीड़ित व्यक्ति के जीवन को भी फिर से संवारना चाहिए।’’ लखनऊ की सरोजिनी नगर विधानसभा सीट से विधायक ने पत्र में लिखा है, ‘‘गलत कामों के लिए सजा देने वाले कानून को आधुनिक बनाने के बाद, मेरा मानना है कि अब उन नतीजों की भरपाई करने वाले कानून को भी आधुनिक बनाने का समय आ गया है। इसे कानूनविदों के बीच अपकृत्य कानून के नाम से जाना जाता है।’’ भारत ने 2024 में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की जगह भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस), दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) और भारतीय साक्ष्य कानून की जगह भारतीय साक्ष्य अधिनियम (बीएसए) लागू किया। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के पूर्व अधिकारी सिंह ने मेघवाल से इस मामले को समयबद्ध रिपोर्ट के लिए विधि आयोग के पास भेजने का आग्रह किया।
उन्होंने इसके बाद विशेषज्ञ समिति द्वारा इसका विश्लेषण और सभी हितधारकों के साथ देशव्यापी परामर्श कराने का भी अनुरोध किया। उन्होंने कहा, ‘‘भारत ने गलत कामों के लिए सजा देने वाले कानून को आधुनिक बनाया है। अब उन गलत कामों के परिणामों की भरपाई करने वाले कानून को भी आधुनिक बनाने का समय आ गया है।
जहां नुकसान हुआ है, वहां न्याय का अर्थ केवल फैसला सुनाना नहीं होना चाहिए, बल्कि उसकी भरपाई करना भी होना चाहिए।’’ सिंह ने तर्क दिया कि भारत में नागरिक दायित्व से जुड़े अलग-अलग कानून तो हैं, लेकिन कोई समग्र कानून नहीं है। उन्होंने कहा कि 1988 का मोटर वाहन अधिनियम, 2019 का उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम और 1991 का लोक दायित्व बीमा अधिनियम जैसे कई अलग-अलग कानून हैं, लेकिन मौत से जुड़े दावों, डेटा उल्लंघन, साइबर धोखाधड़ी और बड़े हादसों के बढ़ते मामलों में जिस व्यापक और समग्र कानून की जरूरत है, उसका अभाव है। उन्होंने कहा कि यही वह ‘‘समग्र कानून’’ है, जिसकी कमी महसूस होती है।
सिंह ने लिखा है कि खुले नाले में गिरकर जान गंवाने वाले व्यक्ति की पत्नी, लापरवाहीपूर्ण इलाज से नुकसान उठाने वाले मरीज, कारखाने के अपशिष्ट से फसल नुकसान का सामना करने वाले किसान, बैंक की सुरक्षा में चूक के कारण ठगी का शिकार हुए पेंशनभोगी, ऑनलाइन ‘डीपफेक’ प्रसारित होने से प्रभावित हुई युवती या पुलिस की ज्यादती से नुकसान उठाने वाले व्यक्ति के परिवार को पांच स्पष्ट सवालों के जवाब चाहिए। उन्होंने लिखा कि ये पांच सवाल हैं—दावा किसके खिलाफ किया जाए, किस मंच पर किया जाए, कितने समय के भीतर किया जाए, कितनी राशि के लिए किया जाए और मामले के फैसले तक अंतरिम सहायता के तौर पर क्या उपलब्ध है। सिंह ने लिखा, ‘‘नागरिकों के लिए नागरिक क्षति संहिता (सिविल रॉन्ग्स कोड) केवल एक उपाय नहीं है, बल्कि यह प्रशासनिक सुधार का भी एक प्रभावी साधन है।
जब किसी विभाग को पता होता है कि लापरवाही की एक कीमत चुकानी होगी, तो वह उसे रोकने के लिए कदम उठाना शुरू कर देता है। यह संहिता जवाबदेही को भी मजबूत करेगी।
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