Explainer: हरी पिचें, स्विंग होती गेंदें..., जानें वो 10 अचूक मंत्र, जिससे न्यूजीलैंड में इतिहास रच सकती है टीम इंडिया
IND vs NZ: भारतीय टीम अगले महीने अक्टूबर में न्यूजीलैंड का दौरा करेगी, जहां पहले दोनों टीमों के बीच टी-20 और वनडे मैचों की सीरीज खेली जाएगी. इसके बाद भारत और न्यूजीलैंड के बीच 2 मैचों की टेस्ट सीरीज खेली जाएगी. यह टेस्ट सीरीज टीम इंडिया के लिए बेहद ही अहम है, क्योंकि इस सीरीज में एक भी मैच की हार भारत को वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप के फाइनल से पूरी तरह से बाहर कर सकती है. ऐसे में टीम इंडिया हर हाल में इस सीरीज के दोनों मैच जीतना चाहेगी, लेकिन न्यूजीलैंड को उसी के घर में टेस्ट सीरीज में हराना भारतीय टीम के लिए आसान नहीं होने वाला है. न्यूजीलैंड में टेस्ट सीरीज जीतना किसी भी एशियाई टीम के लिए हमेशा से क्रिकेट की सबसे कठिन चुनौतियों में से एक रहा है. ऐसे में न्यूजीलैंड दौरे पर अगर भारत को टेस्ट सीरीज में ऐतिहासिक जीत दर्ज करनी है, तो उसे अपनी रणनीति, तकनीक और मानसिकता में बड़े बदलाव करने होंगे. चलिए इस आर्टिकल में जानते हैं कि टीम इंडिया कैसे न्यूजीलैंड की परिस्थितियों पर फतह पा सकती है.
न्यूजीलैंड की हरी-भरी पिचें, तेज हवाएं और स्विंग होती गेंदें भारतीय बल्लेबाजों की कड़ी परीक्षा लेती हैं. भारतीय टीम ने इतिहास में सिर्फ कुछ ही बार न्यूजीलैंड की धरती पर टेस्ट सीरीज जीती है, जिसमें आखिरी जीत साल 2009 में महेंद्र सिंह धोनी की कप्तानी में मिली थी. इसके बाद से टीम इंडिया ने कीवी टीम के घर में लगातार टेस्ट सीरीज में संघर्ष किया है. ऐसे में भारत को अगर इस बार सीरीज अपने नाम करनी है, तो उसे काफी मेहनत करनी होगी.
ओपनिंग जोड़ी की भूमिका, शुरुआती 15 ओवरों का संकट टालना
न्यूजीलैंड में टेस्ट मैच जीतने की सबसे पहली और बड़ी शर्त एक मजबूत ओपनिंग साझेदारी है, क्योंकि वहां शुरुआती 15 ओवरों का संकट टालना सबसे जरूरी होता है. वहां नई कूकाबुरा गेंद शुरुआती 10 से 15 ओवरों में हवा और पिच पर बहुत ज्यादा स्विंग और सीम होती है, जिससे बचने के लिए भारतीय ओपनर्स को ऑफ-स्टंप के बाहर की गेंदों को लगातार छोड़ने का अनुशासन दिखाना होगा. साथ ही, बल्लेबाजों को बहुत जल्दी फ्रंट-फुट पर आने से बचना होगा, क्योंकि वहां गेंद उम्मीद से ज्यादा और देर से स्विंग होती है. इसलिए शुरुआत में क्रीज पर टिकना ही जीत की चाबी है.
देर से और शरीर के पास खेलना
भारत जैसी पिचों पर बल्लेबाजों की आदत गेंद पर पूरी ताकत से बल्ला चलाने की होती है, लेकिन न्यूजीलैंड में यह तरीका बिल्कुल काम नहीं आता. वहां की पिचों पर सफल होने के लिए भारतीय बल्लेबाजों को ढीले हाथों से खेलना होगा. इसका फायदा यह होगा कि अगर गेंद बल्ले का किनारा भी लेगी, तो स्लिप फील्डर्स तक पहुंचने से पहले ही नीचे गिर जाएगी. सीधा सा नियम है कि गेंद को जितना शरीर के करीब आने देंगे और जितना देर से खेलेंगे, आउट होने का खतरा उतना ही कम होगा.
सीम और स्विंग गेंदबाजों का सही चयन
न्यूजीलैंड की पिचों पर सिर्फ तेज रफ्तार से काम नहीं चलता, बल्कि सही जगह पर टप्पा खिलाकर गेंद को हवा में स्विंग और पिच पर सीम कराना ज्यादा जरूरी होता है. इसलिए भारत को सिर्फ बहुत तेज फेंकने वाले गेंदबाजों के भरोसे रहने के बजाय ऐसे स्विंग गेंदबाजों को टीम में मौका देना होगा जो गेंद को दोनों तरफ मूवमेंट करा सकें. साथ ही, टीम में ऐसा ऑलराउंडर होना चाहिए जो बल्लेबाजी के साथ-साथ गेंदबाजी में भी उतना ही खतरनाक हो, क्योंकि न्यूजीलैंड की पिचों पर मैच जीतने के लिए अमूमन चार मुख्य तेज गेंदबाजों की जरूरत पड़ती है.
ट्रेंट ब्रिज जैसी पिचों पर टप्पा पकड़ना
अक्सर भारतीय गेंदबाज विदेशों में ज्यादा उछाल देखकर शॉर्ट-पिच गेंदें फेंकने की गलती कर बैठते हैं, लेकिन न्यूजीलैंड में यह रणनीति पूरी तरह फेल हो सकती है. वहां विकेट लेने का असली मंत्र गेंद को फुल लेंथ पर डालना है, ताकि बल्लेबाज आगे बढ़कर खेलने पर मजबूर हो. गेंद जितनी आगे गिरेगी, उसे हवा में स्विंग होने का उतना ही ज्यादा मौका मिलेगा. चूंकि न्यूजीलैंड के बल्लेबाज अपने घर में खेलने के उस्ताद होते हैं, इसलिए भारतीय गेंदबाजों को लगातार एक ही सटीक जगह पर गेंद डालकर उनके सब्र का इम्तिहान लेना होगा.
स्पिनर्स का चतुर इस्तेमाल और 'कंटेनिंग' रोल
न्यूजीलैंड की पिचों पर मैच के शुरुआती तीन दिनों में स्पिन गेंदबाजों को टर्न या पिच से कोई मदद नहीं मिलती. ऐसे में स्पिनर का काम विकेट चटकाना नहीं, बल्कि एक छोर को संभालकर रनों की रफ्तार पर ब्रेक लगाना होता है. जब स्पिनर एक तरफ से रन रोककर दबाव बनाएगा, तभी दूसरे छोर से तेज गेंदबाज खुलकर अटैक कर पाएंगे. इसके अलावा, वहां तेज हवाएं चलती हैं, इसलिए स्पिनर्स को हवा का फायदा उठाने के लिए अपनी गेंद की रफ्तार और फ्लाइट का बहुत समझदारी से इस्तेमाल करना होगा.
बल्लेबाजी में निचला क्रम का योगदान
भारत और न्यूजीलैंड की मजबूत टीमों के बीच जीत-हार का असली अंतर अक्सर दोनों टीमों के निचले क्रम के बल्लेबाज (नंबर 8 से 11) तय करते हैं. न्यूजीलैंड के टिम साउदी या काइल जैमीसन जैसे पुछल्ले गेंदबाज भी क्रीज पर आकर उपयोगी रन बटोर लेते हैं. भारतीय टीम को अगर मैच जीतना है, तो हमारे नंबर 8 से नंबर 11 तक के बल्लेबाजों को भी क्रीज पर टिकने का जज्बा दिखाना होगा. अगर हमारा निचला क्रम मिलकर बोर्ड पर 40 से 50 अतिरिक्त रन भी जोड़ देता है, तो वह पूरे मैच का पासा पलट सकता है.
मौसम और हवा के साथ तालमेल
न्यूजीलैंड के वेलिंगटन या क्राइस्टचर्च जैसे मैदानों पर बहुत तेज हवाएं चलती हैं, जो सीधे खेल का रुख बदल देती हैं. ऐसे में कप्तान और गेंदबाजों को बहुत दिमाग लगाना पड़ता है कि कौन सा गेंदबाज हवा की दिशा में फेंककर अपनी रफ्तार बढ़ाएगा और कौन हवा के सामने गेंद डालकर स्विंग हासिल करेगा. इस तेज हवा के कारण हवा में गई ऊंचे कैच पकड़ना भी एक बुरे सपने जैसा हो जाता है क्योंकि गेंद हवा में अपनी दिशा बदल लेती है. इस चुनौती से निपटने के लिए भारतीय टीम को प्रैक्टिस सेशन में हवा के रुख को समझकर कैचिंग का खास अभ्यास करना होगा.
DRS का सटीक उपयोग
न्यूजीलैंड की पिचों पर अत्यधिक उछाल के कारण गेंद अक्सर विकेटों के ऊपर से निकल जाती है, या फिर बहुत ज्यादा अंदर आती है. ऐसे में DRS का इस्तेमाल बहुत सोच-समझकर करना होगा. रीव्यू बेकार न जाए, इसके लिए विकेटकीपर और कप्तान का तालमेल मैदान पर एकदम अचूक होना चाहिए, क्योंकि कीपर को गेंद की सही ऊंचाई और लाइन का सबसे बेहतर अंदाजा होता है.
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भारतीय रेलवे ने इलेक्ट्रिक ट्रैक्शन सिस्टम के उन्नयन और चार लेन वाले रोड ओवरब्रिज के निर्माण को दी मंजूरी
नई दिल्ली, 19 सितंबर (आईएएनएस)। सरकार ने शनिवार को कहा कि भारतीय रेलवे ने रेल बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) को मजबूत करने और परिचालन दक्षता बढ़ाने के लिए दो महत्वपूर्ण परियोजनाओं को मंजूरी दी है। इनमें दक्षिण तटीय रेलवे के सावल्यापुरम-गुंटूर सेक्शन में विद्युत ट्रैक्शन प्रणाली के उन्नयन और पश्चिम रेलवे के उधना-उकाई सोंगढ़ सेक्शन पर चार लेन वाले रोड ओवर ब्रिज (आरओबी) का निर्माण शामिल है।
सरकार द्वारा जारी आधिकारिक बयान के अनुसार, भारतीय रेल ने साउथ कोस्ट रेलवे के 73 रूट किलोमीटर लंबे सावल्यापुरम-गुंटूर सेक्शन में विद्युत ट्रैक्शन प्रणाली के उन्नयन के लिए 142 करोड़ रुपए की परियोजना को मंजूरी दी है। यह परियोजना 146 ट्रैक किलोमीटर क्षेत्र को कवर करेगी।
बयान के अनुसार, उन्नत ट्रैक्शन प्रणाली इस मार्ग पर बिजली आपूर्ति ढांचे को मजबूत करेगी और बढ़ती रेल यातायात जरूरतों को अधिक प्रभावी ढंग से पूरा करने में मदद करेगी। इससे इलेक्ट्रिक ट्रेनों के संचालन की क्षमता बढ़ेगी और रेलवे परिचालन अधिक सुचारू बनेगा।
सरकार ने कहा कि यह परियोजना इस महत्वपूर्ण हाई यूटिलाइजेशन नेटवर्क (एचयूएन) रूट की क्षमता और विश्वसनीयता को भी मजबूत करेगी। इसके परिणामस्वरूप ट्रेनों की आवाजाही अधिक सुगम होगी और क्षेत्रीय रेल नेटवर्क को अतिरिक्त मजबूती मिलेगी।
इस बीच, भारतीय रेलवे ने पश्चिम रेलवे के उधना-उकाई सोंगढ़ सेक्शन पर चार लेन वाले रोड ओवर ब्रिज (आरओबी) के निर्माण को भी मंजूरी दे दी है, जिसकी कुल लागत 133.23 करोड़ रुपए होगी और इसे राज्य सरकार के साथ लागत साझा आधार पर विकसित किया जाएगा।
इस परियोजना में रेलवे का हिस्सा 66.61 करोड़ रुपए और राज्य सरकार का हिस्सा भी लगभग 66.61 करोड़ रुपए होगा।
रेल मंत्रालय के अनुसार, चार लेन वाले इस आरओबी के निर्माण से सड़क यातायात की आवाजाही अधिक सुगम होगी और रेलवे परिचालन में सड़क यातायात से होने वाले व्यवधान कम होंगे।
ग्रेड-सेपरेटेड इंफ्रास्ट्रक्चर के रूप में विकसित होने वाला यह पुल ट्रेनों के अधिक सुरक्षित और निर्बाध संचालन को सुनिश्चित करेगा, जिससे यात्रियों को बेहतर परिचालन दक्षता और अधिक विश्वसनीय रेल सेवाओं का लाभ मिलेगा।
बयान के अनुसार, जिस स्थान पर आरओबी का निर्माण होना है वहां 62 प्रतिशत का स्क्यू एंगल है, जिससे डिजाइन और निर्माण कार्य अधिक जटिल हो जाता है।
परियोजना में वायाडक्ट हिस्से की कुल लंबाई 311.58 मीटर होगी, जिस पर लगभग 19.98 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। वहीं रेलवे एप्रोच (आरई) हिस्से की लंबाई 524.32 मीटर होगी, जिसकी अनुमानित लागत 10.25 करोड़ रुपए है।
--आईएएनएस
डीबीपी
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