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150 रुपये के अनुदान से शुरू हुआ था DUSU, आठ दशक में बना देश की छात्र राजनीति का बड़ा केंद्र

महज 150 रुपये के अनुदान से शुरू हुआ दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) लगभग आठ दशक बाद देश की छात्र राजनीति के सबसे चर्चित केंद्रों में से एक बन चुका है और इसके गठन का इतिहास उसके लंबे सफर की झलक पेश करता है। डूसू चुनाव के लिए मतगणना शनिवार को जारी है। डूसू का सफर देश की आजादी से कुछ ही दिन पहले छह अगस्त 1947 से उस समय शुरू हुआ था जब विश्वविद्यालय के कुलपति ने कार्यकारी परिषद को बताया था कि विद्यार्थियों का एक प्रतिनिधि निकाय विश्वविद्यालय छात्र संघ की स्थापना करना चाहता है।

परिषद ने इस प्रस्ताव पर सैद्धांतिक रूप से सहमति जताते हुए कहा था कि एक समिति इसके लिए आवश्यक संविधान और प्रक्रिया का मसौदा तैयार करेगी। इसके साथ ही छात्र संघ का औपचारिक रूप से गठन होने के बाद शुरुआती खर्च के लिए 150 रुपये का छोटा-सा अनुदान देने का प्रस्ताव रखा गया। यह प्रस्ताव 15 अगस्त 1947 की मध्यरात्रि से कुछ समय पहले रखा गया था।

यहीं से उस संस्थागत यात्रा की शुरुआत हुई जिसने आगे चलकर डूसू को दिल्ली विश्वविद्यालय के अधिकतर महाविद्यालयों और संकायों के विद्यार्थियों का प्रतिनिधि निकाय तथा राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित करने वाली छात्र राजनीति का एक प्रमुख मंच बना दिया। शुरुआती वर्षों में छात्र संघ के कामकाज और वित्तीय स्थिति को लेकर अनिश्चितता बनी रही। विश्वविद्यालय की कार्यकारी समिति ने 27 मार्च, 1953 को छात्र संघ के अनुदान संबंधी एक आवेदन पर विचार किया था।

समिति ने कहा था कि उस वर्ष पहले ही 500 रुपये प्राप्त कर चुके छात्र संघ को आत्मनिर्भर बनने का प्रयास करना चाहिए। छात्र संघ पर 14 मार्च, 1954 तक वित्तीय दबाव और स्पष्ट हो गया था। उसकी आय केवल 815 रुपये थी जबकि खर्च 1,995 रुपये हो चुका था।

इसी बैठक में कुलपति ने इस बात पर गौर किया कि डूसू के लिए एक संविधान तैयार किया गया है और पहली बार चुनाव भी कराए गए हैं। उन्होंने अगले शैक्षणिक सत्र तक छात्र संघ का संचालन करने के लिए एक कार्यवाहक समिति गठित करने का प्रस्ताव रखा। साथ ही, अगस्त 1954 तक नए खर्च पर सीमा लगाने और पहले से हो चुके खर्च का भुगतान करने के लिए अधिकतम 1,100 रुपये का अनुदान देने का प्रस्ताव भी रखा गया, बशर्ते छात्र संघ के कोषाध्यक्ष बिलों को मंजूरी दें।

शुरुआती दस्तावेजों से पता चलता है कि छात्र संघ को वित्तीय जवाबदेही से लेकर प्रशासनिक निगरानी तक एक संस्थागत स्वरूप देने के प्रयास किए गए। लगभग दो दशक बाद डूसू की संवैधानिक संरचना पर फिर से विचार किया गया। कार्यकारी परिषद ने दो अगस्त, 1973 को छात्र संघ के ‘‘मौजूदा संविधान को निरस्त करने और अंतरिम संविधान लागू करने’’ के प्रस्ताव पर विचार किया।

अंतरिम संविधान में वित्तीय नियंत्रण के प्रावधान किए गए। शुरुआत में 100 रुपये से अधिक के खर्च के लिए छात्र संघ की कार्यकारी समिति की मंजूरी जरूरी थी। इसमें एक विस्तृत प्रशासनिक ढांचा भी तय किया गया।

कुलपति को डूसू का संरक्षक बनाया गया, जिसकी जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना था कि छात्र संघ संविधान के अनुरूप काम करे। छात्र संघ के ढांचे में एक शिक्षक सलाहकार का पद भी था, जिसकी नियुक्ति संरक्षक शिक्षकों में से करता था। कोषाध्यक्ष की नियुक्ति भी संरक्षक द्वारा की जाती थी।

संविधान में चार निर्वाचित पदाधिकारियों-अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और सहायक सचिव-का प्रावधान किया गया था। इनका चुनाव डूसू के सदस्य साधारण बहुमत से सीधे करते थे। अध्यक्ष छात्र संघ का मुख्य कार्यकारी पदाधिकारी होता था जबकि उसकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष उसके दायित्वों का निर्वहन करता था।

सचिव को अध्यक्ष के परामर्श से और संविधान के अनुरूप छात्र संघ से जुड़े सभी मामलों में काम करना होता था। कई दशकों तक डूसू का सदस्यता शुल्क काफी कम रहा। विद्यार्थियों से वर्ष 2012-13 तक सदस्यता शुल्क के रूप में पांच रुपये लिए जाते थे।

विश्वविद्यालय के अधिकारियों के अनुसार, 2013-14 में इसे बढ़ाकर 20 रुपये किया गया और बाद में 21 जून 2024 को इसे बढ़ाकर 40 रुपये कर दिया गया। कार्यकारी परिषद के समक्ष पहला प्रस्ताव रखे जाने के करीब आठ दशक बाद डूसू अब देश के सबसे प्रमुख छात्र प्रतिनिधि निकायों में शामिल हो चुका है। इसके चुनावों ने ऐसे कई नेता दिए हैं जिन्होंने आगे चलकर सार्वजनिक जीवन में महत्वपूर्ण भूमिकाएं निभाई हैं।

इस साल 18 सितंबर को हुआ चुनाव डूसू के इसी इतिहास की ताजा कड़ी है। आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार, मतगणना शनिवार सुबह आठ बजे ‘नॉर्थ कैंपस’ स्थित विश्वविद्यालय खेल स्टेडियम के बहुउद्देश्यीय हॉल में शुरू हुई। केंद्रीय पैनल के चार पदों के लिए चुनाव मैदान में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप), कांग्रेस से संबद्ध भारतीय राष्ट्रीय छात्र संगठन (एनएसयूआई) और अखिल भारतीय छात्र संगठन (आइसा)-स्टूडेंट फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) का वाम गठबंधन प्रमुख दावेदार हैं।

चुनाव प्रचार में विद्यार्थियों की सुरक्षा, आवास और परिसर की सुविधाएं प्रमुख मुद्दे रहे। दक्षिण दिल्ली के सत्य निकेतन में पांच मंजिला इमारत ढहने की घटना के बाद सुरक्षा का मुद्दा विशेष रूप से चर्चा में रहा। इस इमारत में छात्रों के लिए ‘पेइंग गेस्ट’ (पीजी) आवास का संचालन किया जाता था।

इस हादसे में विद्यार्थियों समेत सात लोगों की मौत हो गई थी। अभाविप ने अध्यक्ष पद के लिए यश डबास, उपाध्यक्ष पद के लिए ईशु मौर्य, सचिव पद के लिए रिया छावड़ी और संयुक्त सचिव पद के लिए लक्ष्य राज सिंह को उम्मीदवार बनाया है। एनएसयूआई ने अध्यक्ष पद के लिए विजय शंकर मीणा, उपाध्यक्ष पद के लिए वीर चतरथ, सचिव पद के लिए नम्रता चौधरी और संयुक्त सचिव पद के लिए गोपाल चौधरी को उम्मीदवार बनाया है।

आइसा-एसएफआई गठबंधन ने अध्यक्ष पद के लिए अनन्या रतूड़ी, उपाध्यक्ष पद के लिए अक्षत शिखर, सचिव पद के लिए स्टैनजिन डेस्क्योंग और संयुक्त सचिव पद के लिए बी. पारिजात को उम्मीदवार बनाया है। एक छोटे-से अनुदान और कार्यवाहक समिति से शुरू हुआ डूसू का सफर आज राष्ट्रीय स्तर पर ध्यान खींचने वाले चुनाव तक पहुंच चुका है। यह यात्रा दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्र राजनीति और प्रतिनिधित्व के बदलते स्वरूप को भी दर्शाती है।

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