Radha Ashtami Vrat Katha: राधा अष्टमी पर जरूर पढ़ें श्रीराधा रानी की ये व्रत कथा, बरसेगी श्रीजी की कृपा
Radha Ashtami Vrat Katha: राधाष्टमी का पावन पर्व आज मनाया जाता है. इस दिन श्री राधा रानी के प्रकटोत्सव मनाया जाता है. भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि पर पड़ने वाला यह पर्व ब्रज समेत देशभर में श्रद्धा के साथ मनाया जाता है. इस दिन राधा रानी और कृष्ण जी की पूजा करने का खास महत्व होता है. राधाष्टमी के दिन व्रत कथा का पाठ करना या सुनने से भक्तों को राधा रानी की कृपा मिलती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस कथा का पाठ करने से मन में भक्ति भाव बढ़ता है.
राधाष्टमी व्रत कथा
धार्मिक ग्रंथों के अनुसार, राधा रानी मूल रूप से गोलोक धाम में श्रीकृष्ण की प्रिय शक्ति और महालक्ष्मी का स्वरूप मानी जाती हैं. एक बार गोलोक में श्रीदामा और राधा रानी के बीच किसी बात के लिए विवाद हो गया. इसके बाद श्रीदामा ने राधा जी को पृथ्वी पर जन्म लेने का श्राप दिया और राधा जी ने भी प्रतिउत्तर में श्रीदामा को शंखचूड़ राक्षस बनने का श्राप दे दिया.
ये भी पढ़ें- Radha Ashtami 2026: अलौकिक सौंदर्य, दिव्य रूप और लंबे केश... राधा अष्टमी पर जानिए कैसा था राधा-रानी का स्वरूप
जब भगवान विष्णु ने द्वापर युग में श्रीकृष्ण के रूप में अवतार लिया, तब महालक्ष्मी ने भी पृथ्वी लोक पर राधा रानी के रूप में प्रकट होने का निर्णय लिया. धरती पर ब्रज के राजा वृषभानु एक बार यज्ञ के लिए भूमि साफ कर रहे थे. तभी उन्हें यमुना नदी के किनारे एक स्वर्ण कमल के फूल पर एक अत्यंत सुंदर दिव्य कन्या प्रकट हुई मिली. राजा वृषभानु उस कन्या को अपने घर ले आए और अपनी पुत्री मानकर उनका पालन-पोषण करने लगे. माता कीर्ति ने जब उस कन्या को देखा, तो वे अत्यंत प्रसन्न हुईं. कथा में यह भी वर्णित है कि जन्म के समय श्री राधा रानी की आंखें बंद थीं. जब भगवान श्रीकृष्ण बाल रूप में उनके पालने के पास पहुंचे और उन्होंने राधा रानी के चरण स्पर्श किए तो श्रीजी ने अपनी आंखें खोलीं और सर्वप्रथम अपने आराध्य श्रीकृष्ण के दर्शन किए थे.
राधा स्वरूप का वर्णन
देवी राधा श्वेत वर्ण वाली हैं और उनके रूप-सौन्दर्य के समक्ष कोटि-कोटि सूर्यों की आभा भी निम्न प्रतीत होती है. श्री जी को द्विभुजा रूप में कमल लिये हुये स्वर्ण सिंहासन पर विराजमान दर्शाया जाता है. उनका एक हाथ वरदमुद्रा तथा दूसरा अभय मुद्रा में स्थित रहता है.
देवी राधा के मंत्रों का जाप करें
सामान्य मंत्र- श्री राधायै स्वाहा
बीज मन्त्र- ऊं ह्रीं श्रीराधिकायै नमः
श्री राधा गायत्री मन्त्र- ऊं वृषभानुजाय विद्महे कृष्णप्रियाय धीमहि।
तन्नो राधा प्रचोदयात्॥
भगवान नारायण द्वारा श्रीराधा रानी की स्तुति
नमस्ते परमेशानि रासमण्डलवासिनी।
रासेश्वरि नमस्तेऽस्तु कृष्ण प्राणाधिकप्रिये॥
ये भी पढ़ें- Radha Ashtami 2026: श्रीराधा रानी को खूब पसंद है अरबी की सब्जी, राधा-अष्टमी पर जरूर लगाएं भोग
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए प्रदान की गई है. News Nation इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
Bhadrapad Second Pradosh Vrat 2026: भाद्रपद मास का दूसरा प्रदोष व्रत कब है? जानें सही तारीख, शुभ मुहूर्त और पूजन विधि
Bhadrapad Second Pradosh Vrat 2026: सनातन धर्म में भाद्रपद मास की खासियत बहुत अधिक होती है. इस महीने में प्रदोष व्रत किया जाता है. प्रदोष व्रत भगावन शिव को समर्पित होता है. इस खास तिथि पर शिव जी की पूजा-अर्चना की जाती है. धार्मिक मान्यता है कि प्रदोष काल में शिव जी की पूजा करने से भक्तों को उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है. भाद्रपद महीने में भी 2 प्रदोष व्रत पड़ते हैं. पहला प्रदोष व्रत कृष्ण पक्ष में रखा गया था जबकि दूसरा प्रदोष व्रत शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि पर रखा जाने वाला है. इस बार भाद्रपद मास का दूसरा प्रदोष व्रत गुरुवार के दिन पड़ रहा है. आइए जानते हैं इस व्रत की सही तिथि, पूजा का शुभ समय और भगवान शिव की पूजा करने की विधि.
कब है भाद्रपद मास का दूसरा प्रदोष व्रत?
द्रिक पंचांग के अनुसार, भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि 23 सितंबर 2026 की रात 10:50 से शुरू होगी. त्रयोदशी तिथि का समापन 24 सितंबर 2026 की रात 11:18 पर होगा. इस प्रदोष व्रत में भगवान शिव की पूजा करने के लिए प्रदोष काल का समय सबसे शुभ माना जाता है. प्रदोष काल इस बार 24 सितंबर को है. इसलिए, 24 सितंबर को ही प्रदोष व्रत रखा जाएगा. इस दिन गुरुवार है. इसलिए, इसे गुरु प्रदोष व्रत कहा जाता है.
ये भी पढ़ें- Radha Ashtami 2026: अलौकिक सौंदर्य, दिव्य रूप और लंबे केश... राधा अष्टमी पर जानिए कैसा था राधा-रानी का स्वरूप
गुरु प्रदोष व्रत का शुभ मुहूर्त
प्रदोष व्रत में शाम के समय भगवान शिव की पूजा की जाती है. इस दिन पूजा करने से प्रदोष का समय शुभ होता है. इसलिए, इस दिन को प्रदोष पूजा का समय शाम 6 बजकर 16 मिनट से शुरू होगा और रात 8:39 मिनट तक रहेगा.
गुरु प्रदोष व्रत पूजन विधि
प्रदोष व्रत रखने वाले लोगों को सुबह उठकर सबसे पहले भगवान शिव का ध्यान कर व्रत का संकल्प लेना चाहिए. इस दिन आपको दिनभर श्रद्धा के साथ व्रत रखना होता है. प्रदोष के दिन शाम के समय यानी की प्रदोष काल में पूजा की तैयारी करनी चाहिए. सबसे पहले भगवान शिव जी का जल से अभिषेक करना चाहिए. इसके बाद दूध, दही, घी, शहद और गंगाजल आदि से अभिषेक कर सकते हैं. इसके बाद शिवलिंग पर बेलपत्र, धतूरा और फूल अर्पित करें. इसके बाद भगवान शिव को चंदन, अक्षत और नैवेद्य चढ़ाएं. माता पार्वती और भगवान गणेश की पूजा कर सकते हैं. आखिर में भगवान शिव की आरती करें और शिव जी के मंत्रों का जाप करना चाहिए.
प्रदोष व्रत में किन बातों का ख्याल रखें?
गुरु प्रदोष व्रत में पूजा के दौरान साफ-सफाई और सात्विकता का ख्याल रखें. इसके बाद शिवलिंग पर पूजा सामग्रियां अर्पित करें और सभी नियमों का पालन करें. शिवलिंग पर बेलपत्र का चिकना भाग रखने की परंपरा है. इस व्रत का निर्जला या फलाहार, दोनों तरीकों से रखा जा सकता है. इस दिन भगवान शिव की पूजा करने से विशेष फलों की प्राप्ति होती है.
शिव जी के इन 5 मंत्रों का जाप करें
शिव जी का सरल मंत्र- ऊं नमः शिवाय
महामृत्युंजय मंत्र- ऊं त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥
शिव गायत्री मंत्र- ऊं तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि।
तन्नो रुद्रः प्रचोदयात्॥
रुद्र मंत्र- ऊं नमो भगवते रुद्राय॥
शिव ध्यान मंत्र- करचरण कृतं वाक्कायजं कर्मजं वा।
श्रवणनयनजं वा मानसं वापराधम्।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्व।
जय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो॥
ये भी पढ़ें- Radha Ashtami 2026: आज राधाष्टमी की पूजा में जरूर पढ़ें श्रीराधा आरती, यहां पढ़ें लिरिक्स
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी ज्योतिष शास्त्र पर आधारित है और केवल सूचना के लिए प्रदान की गई है. News Nation इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
होम
जॉब
पॉलिटिक्स
बिजनेस
ऑटोमोबाइल
गैजेट
लाइफस्टाइल
फोटो गैलरी
Others 
News Nation










