न्यूजीलैंड के सेब पर इम्पोर्ट-ड्यूटी 25% करने पर भड़के बागवान:CM से की मुलाकात, भारत-न्यूजीलैंड FTA रद्द करने, PM से अपना वादा निभाने की मांग
भारत और न्यूजीलैंड के बीच हुए फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) से हिमाचल के बागवानों में केंद्र की मोदी सरकार के खिलाफ आक्रोश है। प्रदेश के सेब बागवान आज (मंगलवार को) हिमाचल के सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू से मिलने शिमला पहुंचे। इस दौरान बागवानों ने न्यूजीलैंड के सेब पर केंद्र द्वारा घटाई गई इम्पोर्ट ड्यूटी का विरोध किया। बागवानों ने इस मसले को केंद्र सरकार के समक्ष उठाने की मांग की और इम्पोर्ट ड्यूटी 100 प्रतिशत करने का PM मोदी का वादा पूरा करने की मांग की। बागवानों ने बताया कि यदि इम्पोर्ट ड्यूटी नहीं बढ़ाई तो हिमाचल का सेब उद्योग तबाह हो जाएगा। सीएम के साथ बागवानों की मीटिंग के बाद मंत्री जगत सिंह नेगी ने कहा- बागवानों की डिमांड को केंद्र सरकार के समक्ष उठाया जाएगा। यदि फिर भी इम्पोर्ट ड्यूटी नहीं बढ़ाई गई तो बागवानों को मजबूरन आंदोलन करना पड़ेगा। दरअसल, PM बनने से पहले साल 2014 में नरेंद्र मोदी ने हमीरपुर के सुजानपुर में सेब पर इम्पोर्ट ड्यूटी 100 प्रतिशत करने का वादा किया था। इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाई तो नहीं गई, लेकिन कम जरूर की जा रही है। पहले वाशिंगटन एप्पल पर 75 से 50 फीसदी की गई। अब न्यूजीलैंड के सेब पर इम्पोर्ट ड्यूटी 50% से घटाकर 25% कर दी है। इससे देश में सस्ते आयातित सेब की बाढ़ आने का बागवानों को डर सता रहा है। 5500 करोड़ के सेब उद्योग पर पड़ेगी मार इसका सीधा असर हिमाचल प्रदेश के करीब 5500 करोड़ रुपए के सेब उद्योग और तीन लाख से अधिक बागवान परिवारों की आजीविका पर पड़ेगा। इससे बागवान चिंतित है। सेब उत्पादक संघ के अध्यक्ष सोहन ठाकुर कहा कि, देश की एपल इंडस्ट्री को बचाने के लिए इम्पोर्ट ड्यूटी 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 फीसदी करनी चाहिए थी, ताकि वे सस्ते आयातित सेब से प्रतिस्पर्धा कर सकें। मगर भारत सरकार उल्टा शुल्क कम कर रही है। उन्होंने बताया कि न्यूजीलैंड की आड़ में दूसरे देश भी सेब पर इम्पोर्ट ड्यूटी घटाने का दबाव बनाएंगे। इससे हिमाचल के साथ साथ जम्मू कश्मीर और उत्तराखंड का सेब उद्योग भी बर्बाद हो जाएगा। हिमाचल के बागवानों पर पड़ेगी ज्यादा मार: दीपक स्टोन फ्रूट एसोसिएशन के अध्यक्ष और सेब बागवान दीपक सिंघा ने बताया कि, भारत-न्यूजीलैंड के बीच हुए करार के बाद देश में सेब का आयात बढ़ेगा। इसका सीधा असर कीमत पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि, यह कहना गलत है कि अप्रैल से अगस्त के बीच हिमाचल का सेब बाजार में नहीं आता। जबकि हिमाचल का सेब जून में मार्केट में आ जाता है और अगस्त में सेब सीजन पीक पर होता है। इस फैसले की सबसे ज्यादा मार हिमाचल के सेब बागवानों पर पड़ने वाली है। बागवानों के विरोध की एक ओर वजह हिमाचल में अभी प्रति हैक्टेयर 7 से 8 मीट्रिक टन सेब की पैदावार होती है, जबकि न्यूजीलैंड में प्रति हैक्टेयर 60 से 70 मीट्रिक टन सेब पैदा हो गया है। इस वजह से हिमाचल में प्रति किलो सेब तैयार करने पर लगभग 27 रुपए की लागत आती है। इससे हिमाचल के सेब बागवानों को तभी फायदा हो पाता है जब यहां के बागवानों का सेब कम से कम 50 से 60 रुपए बिके। ऐसे में यदि भारत सरकार अधिक पैदावार वाले देशों के सेब इम्पोर्ट पर ड्यूटी कम कर देता है तो हिमाचल का सेब मार्केट में कम्पीट नहीं कर पाएगा। इससे हिमाचल, जम्मू कश्मीर और उत्तराखंड का सेब उद्योग तबाह हो जाएगा।
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