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US Sanctions Bill Passed: अमेरिकी संसद से पास हुआ रूस-ईरान प्रतिबंध बिल, भारत और चीन पर 100% तक टैरिफ लगाने का रास्ता साफ
वैश्विक ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिहाज से एक बेहद अहम और बड़ा घटनाक्रम सामने आया है। अमेरिकी संसद के निचले सदन ने रूस और ईरान की अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाने के मकसद से एक नया प्रतिबंध विधेयक पारित किया है।
इस विधेयक की सबसे बड़ी बात यह है कि इसमें केवल रूस और ईरान ही नहीं, बल्कि उनसे भारी मात्रा में कच्चा तेल खरीदने वाले भारत और चीन जैसे तीसरे देशों पर भी 100 प्रतिशत तक का भारी-भरकम आयात शुल्क थोपने का प्रावधान रखा गया है। इस विधेयक के पास होने से अब भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक व रणनीतिक संबंधों पर पड़ने वाले असर को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
रूस-ईरान प्रतिबंध विधेयक पारित: अमेरिकी संसद से भारत और चीन को संदेश
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा ने रूस की युद्ध अर्थव्यवस्था और ईरान के रक्षा तंत्र पर शिकंजा कसने के लिए 61 पन्नों वाले 'लिंडसे ओ. ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026' को बहुमत से पास कर दिया है। सदन में हुई वोटिंग के दौरान बिल के पक्ष में 262 और विरोध में 159 मत पड़े। इस कानून का मुख्य लक्ष्य रूस के ऊर्जा निर्यात से होने वाली उस भारी-भरकम आय को रोकना है, जिसका इस्तेमाल वह यूक्रेन युद्ध के वित्तपोषण के लिए कर रहा है। इसके साथ ही, बिल के माध्यम से ईरान के हथियार उद्योग और रूसी अरबपतियों की संपत्तियों पर भी व्यापक प्रतिबंध लगाने का रास्ता साफ कर दिया गया है।
रूस से तेल आयात पर 100% टैरिफ का प्रावधान: भारत की चिंताएं क्यों बढ़ीं?
इस नए कानून में एक विशेष प्रावधान शामिल किया गया है जो रूस से सर्वाधिक कच्चा तेल और प्राकृतिक गैस खरीदने वाले दुनिया के शीर्ष पांच देशों पर सीधा असर डालता है। इस सूची में भारत और चीन सबसे ऊपर हैं, जिनके साथ स्लोवाकिया, हंगरी और अजरबैजान भी शामिल हैं।
कानून के मुताबिक, यदि ये देश रूस से अपने ऊर्जा आयात में कटौती नहीं करते हैं, तो अमेरिकी राष्ट्रपति को अधिकार होगा कि वे इन देशों से अमेरिका आने वाले सामानों पर 100 प्रतिशत तक का भारी आयात शुल्क लगा सकें। विश्लेषकों का मानना है कि यदि भारत पर यह टैरिफ लागू होता है, तो भारतीय निर्यात क्षेत्र को भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है।
राष्ट्रपति के पास रहेगा छूट का अधिकार: तुरंत लागू नहीं होंगे टैरिफ
विधेयक के पारित होने का मतलब यह नहीं है कि भारत या अन्य देशों पर तुरंत प्रभाव से 100 प्रतिशत टैरिफ लागू हो जाएगा। इस कानून के तहत अंतिम फैसला लेने की पूरी शक्ति अमेरिकी राष्ट्रपति के पास सुरक्षित रखी गई है।
राष्ट्रपति के पास यह अधिकार है कि वे अमेरिकी राष्ट्रीय हित, वैश्विक तेल बाजार में स्थिरता या द्विपक्षीय वार्ताओं की प्रगति को देखते हुए किसी भी देश को इस टैरिफ से पूर्ण या आंशिक छूट दे सकते हैं। इसके अतिरिक्त, यदि कोई देश अपनी कुल प्राकृतिक गैस खपत का 15 प्रतिशत से कम हिस्सा रूस से लेता है और धीरे-धीरे इस निर्भरता को खत्म करने की दिशा में कदम बढ़ाता है, तो उसे भी राहत मिल सकती है।
भारतीय-अमेरिकी सांसदों का रुख: राजा कृष्णमूर्ति ने पार्टी लाइन से हटकर किया समर्थन
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में इस विधेयक पर हुई वोटिंग के दौरान भारतीय-अमेरिकी सांसदों का रुख भी चर्चा का विषय बना रहा। सदन में मौजूद छह भारतीय-अमेरिकी डेमोक्रेटिक सांसदों में से राजा कृष्णमूर्ति एकमात्र ऐसे सांसद रहे जिन्होंने अपनी पार्टी की लाइन से अलग हटकर इस सख्त प्रतिबंध विधेयक के पक्ष में मतदान किया।
दूसरी ओर, अन्य प्रमुख भारतीय-अमेरिकी सांसदों- रो खन्ना, प्रमिला जयपाल, अमी बेरा, श्री थानेदार और सुहास सुब्रमण्यम ने अपनी पार्टी के रुख का पालन करते हुए इस विधेयक का विरोध किया या मतदान की प्रक्रिया से दूर रहे।
रणनीतिक और आर्थिक असर: भारत-अमेरिका संबंधों के लिए नई परीक्षा
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकारों का कहना है कि यह विधेयक आने वाले दिनों में भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक संबंधों के लिए एक नई परीक्षा साबित हो सकता है। भारत शुरू से ही यह रुख अपनाता रहा है कि अपनी विशाल आबादी की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए सस्ता तेल खरीदना उसका संप्रभु और राष्ट्रीय हित का निर्णय है।
यदि वाशिंगटन भारत पर आर्थिक दबाव या टैरिफ लगाने की दिशा में आगे बढ़ता है, तो इससे पिछले दो दशकों में बने द्विपक्षीय व्यापारिक और सुरक्षा संबंधों में तनाव आ सकता है।
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