सलमान खान फैन के लिए अपने ड्राइवर से भिड़े, Fan के पैर पर कार का पहिया चढ़ने पर भाईजान का हुआ पारा हाई
Salman Khan Angry on Driver: बॉलीवुड सुपरस्टार सलमान खान (Salman Khan) गुरुवार को मुंबई में बीजेपी नेता और महाराष्ट्र सरकार में मंत्री आशीष शेलार के घर और गणपति पंडाल में बप्पा के दर्शन करने पहुंचे थे. इसी दौरान का सलमान का सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है. जिसको लेकर दावा किया जा रहा है कि भाईजान के कार ड्राइवर ने फैन के पैर पर कार का पहिया चढ़ा दिया. जिसके बाद सलमान अपने ड्राइवर पर भड़के हुए नजर आए.
सलमान ने फैन से मिलाया हाथ
दरअसल, जब सलमान खान गणपति उत्सव में शामिल होने के बाद जब बाहर निकल रहे थे तो उस समय फैंस और पैपराजी की भारी बड़ी भीड़ जमा हो गई, उस दौरान यह हादसा हुआ था. बताया जा रहा है कि भीड़ में खड़े एक बच्चे को गलती से बॉडीगार्ड ने धक्का मार दिया. सलमान ने बच्चे को देखा तो उसके पास जाकर प्यार से हाथ मिलाया. इतना ही नहीं सलमान भारी भीड़ के बीच लोगों से रास्ता साफ करने का इशारा करते नजर आए, ताकि वे वहां से निकल सकें.
This is the real and complete video, you MF just post a 8 second video and troll him.
— Filmy_Duniya (@SalmanKingfv) September 18, 2026
This video make me proud as a Fan of Salman Bhai.
Salman Khan angry at his driver after fan's foot comes under the car. https://t.co/OtLO21T4Xa pic.twitter.com/fbbo4wKTwF
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ममता बनर्जी की सियासत में 5 महीने में इतना बड़ा बदलाव कैसे आया? TMC से चुनाव चिन्ह तक, समझिए पूरा संकट
Explainer: तारीख थी 5 मई 2026 और जगह थी कोलकाता का कालीघाट. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आ चुके थे. तृणमूल कांग्रेस सत्ता से बाहर हो चुकी थी, लेकिन ममता बनर्जी के तेवर बदले नहीं थे. पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने खुद को ‘स्ट्रीट फाइटर’ बताते हुए कहा था कि चुनाव में हार-जीत उनके लिए मायने नहीं रखती. उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से भी कहा था कि वह हारी नहीं हैं और तृणमूल के 80 विधायक चुनकर आए हैं.
चुनाव आयोग के आधिकारिक नतीजों के मुताबिक, 294 सदस्यीय पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस ने 80 सीटें जीती थीं, जबकि बीजेपी को 207 सीटें मिली थीं. ममता बनर्जी खुद भी भवानीपुर सीट पर चुनाव हार गई थीं.
लेकिन करीब चार महीने बाद तृणमूल कांग्रेस के सामने संकट सिर्फ सत्ता गंवाने तक सीमित नहीं रहा. पार्टी के भीतर नेतृत्व, संगठन, नाम, चुनाव चिन्ह और संपत्ति को लेकर विवाद चुनाव आयोग तक पहुंच गया. 17 सितंबर को आयोग ने अंतरिम आदेश जारी कर तृणमूल कांग्रेस के नाम और उसके पारंपरिक ‘जोड़ाफूल’ चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल पर रोक लगा दी. दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को अलग नाम और चुनाव चिन्ह के साथ आगामी उपचुनाव लड़ने को कहा गया.
1. 80 विधायकों वाली पार्टी में फूट कैसे पड़ी?
विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर मतभेद खुलकर सामने आए. ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने करीब 60 विधायकों के समर्थन का दावा किया और खुद को ‘असली’ तृणमूल कांग्रेस बताया.
इस गुट ने पार्टी के नाम, चुनाव चिन्ह और वित्तीय संसाधनों पर भी दावा किया. सितंबर में चुनाव आयोग के सामने हुई सुनवाई में भी करीब 60 विधायकों वाले इस गुट का दावा प्रमुख मुद्दा रहा.
जून में बागी गुट ने ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष के पद से हटाने और अरूप राय को समानांतर संगठन का अध्यक्ष बनाने का दावा भी किया था. हालांकि, यह उस गुट का संगठनात्मक दावा था और पार्टी की वैधता का अंतिम फैसला चुनाव आयोग के सामने लंबित रहा.
यही विवाद आगे चलकर चुनाव आयोग के सामने पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह की लड़ाई में बदल गया.
2. 28 साल पुराना ‘जोड़ाफूल’ चुनाव चिन्ह फ्रीज
1998 में कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस बनाई थी. पार्टी की पहचान उसके ‘जोड़ाफूल’ यानी घास पर दो फूल वाले चुनाव चिन्ह से बनी.
लेकिन 17 सितंबर 2026 को चुनाव आयोग ने अंतरिम आदेश के तहत दोनों गुटों को मूल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और आरक्षित चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल से रोक दिया. आयोग ने दोनों पक्षों को नए नाम और उपलब्ध चुनाव चिन्हों में से विकल्प देने को कहा.
18 सितंबर को ममता खेमे को अस्थायी तौर पर ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और फुटबॉल खिलाड़ी का चुनाव चिन्ह दिया गया. वहीं प्रतिद्वंद्वी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और अलग चुनाव चिन्ह दिया गया. यह व्यवस्था आगामी उपचुनावों के संदर्भ में है; मूल पार्टी नाम और चुनाव चिन्ह पर अंतिम फैसला अलग प्रक्रिया में होना है.
3. पार्टी के 440 करोड़ रुपये पर ED की कार्रवाई
तृणमूल कांग्रेस के सामने दूसरा बड़ा संकट पार्टी के बैंक खातों को लेकर है.
जुलाई 2026 में प्रवर्तन निदेशालय ने पार्टी से जुड़े तीन बैंक खातों में मौजूद करीब 440.42 करोड़ रुपये को फ्रीज किया था. ED की जांच कथित मनी लॉन्ड्रिंग और पार्टी फंड के इस्तेमाल से विमान और हेलिकॉप्टर खरीदने से जुड़े लेनदेन पर केंद्रित है.
ED के मुताबिक, अप्रैल 2023 से जून 2026 के बीच करीब 160 करोड़ रुपये पार्टी खातों से Carewell Aviation India और उससे जुड़ी इकाइयों को ट्रांसफर किए गए थे. एजेंसी ने इन लेनदेन को अपनी जांच का हिस्सा बनाया है.
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये जांच एजेंसी के आरोप और जांच के निष्कर्ष हैं, अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं. ममता खेमे ने ED की कार्रवाई को चुनौती दी है और इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है.
4. असली चुनौती सिर्फ विधायकों की संख्या नहीं
चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस की समस्या केवल यह नहीं है कि उसके कितने विधायक उसके साथ हैं. असली सवाल पार्टी के संगठनात्मक नियंत्रण का है.
ममता खेमे और ऋतब्रत खेमे, दोनों खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बताते रहे हैं. एक तरफ ममता बनर्जी का वर्षों पुराना राजनीतिक नेतृत्व और पार्टी पर प्रभाव है, तो दूसरी तरफ बागी गुट निर्वाचित विधायकों के समर्थन और पार्टी के संगठनात्मक ढांचे के आधार पर अपना दावा पेश कर रहा है.
इसी वजह से मामला अब चुनाव आयोग तक पहुंच चुका है. आयोग को पार्टी के नाम, चुनाव चिन्ह और संगठनात्मक दावों पर आगे फैसला करना है.
5. पुराने भरोसेमंद नेताओं की भूमिका भी चर्चा में
तृणमूल कांग्रेस के मौजूदा संकट को समझने के लिए पार्टी के पुराने संगठनात्मक ढांचे को देखना भी जरूरी है.
समय के साथ पार्टी के कई पुराने और प्रभावशाली नेताओं की भूमिका बदल गई. कुछ नेता पार्टी से दूर हुए, कुछ कानूनी मामलों में घिरे और कुछ का निधन हो गया. इससे ममता बनर्जी के आसपास लंबे समय तक मौजूद पुराने संगठनात्मक नेटवर्क में भी बदलाव आया.
दूसरी ओर, अभिषेक बनर्जी की बढ़ती भूमिका भी पार्टी के भीतर बहस का विषय बनी. चुनावी हार के बाद नेतृत्व और संगठन की दिशा को लेकर अलग-अलग नेताओं की राय सामने आने लगी. हालांकि, इन मतभेदों के कारणों को लेकर अलग-अलग गुटों के अलग-अलग दावे हैं.
6. सत्ता से बाहर होना बना बड़ा मोड़
तृणमूल कांग्रेस के लिए 2026 का विधानसभा चुनाव एक निर्णायक राजनीतिक बदलाव लेकर आया. 2011 से पश्चिम बंगाल में सरकार चला रही पार्टी सत्ता से बाहर हो गई और विधानसभा में उसकी संख्या 80 तक सिमट गई.
सत्ता जाने के बाद पार्टी के भीतर कई ऐसे नेताओं के सामने भी नई राजनीतिक परिस्थितियां आईं, जिन पर विभिन्न मामलों में जांच या कानूनी कार्रवाई चल रही है. यही वजह है कि सत्ता से बाहर होने को पार्टी के भीतर पैदा हुए दबावों की एक महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि के तौर पर देखा जा रहा है.
हालांकि, किसी नेता के खिलाफ जांच या मामला दर्ज होना अपने आप में दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है.
7. अब ममता के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
ममता बनर्जी के सामने अब तीन स्तरों पर चुनौती है. पहली चुनौती संगठन पर नियंत्रण की है. दूसरी चुनौती पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह की है. तीसरी चुनौती बचे हुए विधायकों और नेताओं को एकजुट रखने की है.
17 सितंबर के चुनाव आयोग के आदेश ने इस संघर्ष को और औपचारिक बना दिया है. आगामी उपचुनावों में दोनों गुटों को अलग नाम और चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में उतरना होगा.
यानी मई में जिस लड़ाई को ममता बनर्जी ने सड़क पर उतरकर जारी रखने की बात कही थी, वह अब सड़क से निकलकर चुनाव आयोग, संगठन और अदालतों तक पहुंच चुकी है.
अब क्या होगा आगे?
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि चुनाव आयोग पार्टी के मूल नाम और ‘जोड़ाफूल’ चुनाव चिन्ह पर अंतिम रूप से क्या फैसला करता है. इसके साथ यह भी देखना होगा कि दोनों गुटों में से किसके साथ कितने निर्वाचित प्रतिनिधि और संगठनात्मक पदाधिकारी बने रहते हैं.
इस पूरी लड़ाई का असर सिर्फ एक चुनाव चिन्ह पर नहीं पड़ेगा. तृणमूल कांग्रेस की 1998 से बनी राजनीतिक पहचान, उसके संगठनात्मक ढांचे और ममता बनर्जी के नेतृत्व की आगे की भूमिका भी इसी विवाद से जुड़ी हुई है.
मई में ममता बनर्जी के पास 80 विधायकों वाली पार्टी थी. सितंबर तक मामला पार्टी के नाम और प्रतीक की लड़ाई तक पहुंच चुका है. इसलिए बंगाल की राजनीति में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि तृणमूल कांग्रेस चुनाव हारी या जीती, बल्कि यह है कि तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक और संगठनात्मक विरासत पर अंतिम नियंत्रण किसके पास रहेगा.
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