ममता बनर्जी की सियासत में 5 महीने में इतना बड़ा बदलाव कैसे आया? TMC से चुनाव चिन्ह तक, समझिए पूरा संकट
Explainer: तारीख थी 5 मई 2026 और जगह थी कोलकाता का कालीघाट. पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के नतीजे सामने आ चुके थे. तृणमूल कांग्रेस सत्ता से बाहर हो चुकी थी, लेकिन ममता बनर्जी के तेवर बदले नहीं थे. पत्रकारों से बातचीत में उन्होंने खुद को ‘स्ट्रीट फाइटर’ बताते हुए कहा था कि चुनाव में हार-जीत उनके लिए मायने नहीं रखती. उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से भी कहा था कि वह हारी नहीं हैं और तृणमूल के 80 विधायक चुनकर आए हैं.
चुनाव आयोग के आधिकारिक नतीजों के मुताबिक, 294 सदस्यीय पश्चिम बंगाल विधानसभा में तृणमूल कांग्रेस ने 80 सीटें जीती थीं, जबकि बीजेपी को 207 सीटें मिली थीं. ममता बनर्जी खुद भी भवानीपुर सीट पर चुनाव हार गई थीं.
लेकिन करीब चार महीने बाद तृणमूल कांग्रेस के सामने संकट सिर्फ सत्ता गंवाने तक सीमित नहीं रहा. पार्टी के भीतर नेतृत्व, संगठन, नाम, चुनाव चिन्ह और संपत्ति को लेकर विवाद चुनाव आयोग तक पहुंच गया. 17 सितंबर को आयोग ने अंतरिम आदेश जारी कर तृणमूल कांग्रेस के नाम और उसके पारंपरिक ‘जोड़ाफूल’ चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल पर रोक लगा दी. दोनों प्रतिद्वंद्वी गुटों को अलग नाम और चुनाव चिन्ह के साथ आगामी उपचुनाव लड़ने को कहा गया.
1. 80 विधायकों वाली पार्टी में फूट कैसे पड़ी?
विधानसभा चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर नेतृत्व को लेकर मतभेद खुलकर सामने आए. ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी गुट ने करीब 60 विधायकों के समर्थन का दावा किया और खुद को ‘असली’ तृणमूल कांग्रेस बताया.
इस गुट ने पार्टी के नाम, चुनाव चिन्ह और वित्तीय संसाधनों पर भी दावा किया. सितंबर में चुनाव आयोग के सामने हुई सुनवाई में भी करीब 60 विधायकों वाले इस गुट का दावा प्रमुख मुद्दा रहा.
जून में बागी गुट ने ममता बनर्जी को पार्टी अध्यक्ष के पद से हटाने और अरूप राय को समानांतर संगठन का अध्यक्ष बनाने का दावा भी किया था. हालांकि, यह उस गुट का संगठनात्मक दावा था और पार्टी की वैधता का अंतिम फैसला चुनाव आयोग के सामने लंबित रहा.
यही विवाद आगे चलकर चुनाव आयोग के सामने पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह की लड़ाई में बदल गया.
2. 28 साल पुराना ‘जोड़ाफूल’ चुनाव चिन्ह फ्रीज
1998 में कांग्रेस से अलग होकर ममता बनर्जी ने ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस बनाई थी. पार्टी की पहचान उसके ‘जोड़ाफूल’ यानी घास पर दो फूल वाले चुनाव चिन्ह से बनी.
लेकिन 17 सितंबर 2026 को चुनाव आयोग ने अंतरिम आदेश के तहत दोनों गुटों को मूल ‘ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और आरक्षित चुनाव चिन्ह के इस्तेमाल से रोक दिया. आयोग ने दोनों पक्षों को नए नाम और उपलब्ध चुनाव चिन्हों में से विकल्प देने को कहा.
18 सितंबर को ममता खेमे को अस्थायी तौर पर ‘ममता ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस’ नाम और फुटबॉल खिलाड़ी का चुनाव चिन्ह दिया गया. वहीं प्रतिद्वंद्वी गुट को ‘डेमोक्रेटिक तृणमूल कांग्रेस’ नाम और अलग चुनाव चिन्ह दिया गया. यह व्यवस्था आगामी उपचुनावों के संदर्भ में है; मूल पार्टी नाम और चुनाव चिन्ह पर अंतिम फैसला अलग प्रक्रिया में होना है.
3. पार्टी के 440 करोड़ रुपये पर ED की कार्रवाई
तृणमूल कांग्रेस के सामने दूसरा बड़ा संकट पार्टी के बैंक खातों को लेकर है.
जुलाई 2026 में प्रवर्तन निदेशालय ने पार्टी से जुड़े तीन बैंक खातों में मौजूद करीब 440.42 करोड़ रुपये को फ्रीज किया था. ED की जांच कथित मनी लॉन्ड्रिंग और पार्टी फंड के इस्तेमाल से विमान और हेलिकॉप्टर खरीदने से जुड़े लेनदेन पर केंद्रित है.
ED के मुताबिक, अप्रैल 2023 से जून 2026 के बीच करीब 160 करोड़ रुपये पार्टी खातों से Carewell Aviation India और उससे जुड़ी इकाइयों को ट्रांसफर किए गए थे. एजेंसी ने इन लेनदेन को अपनी जांच का हिस्सा बनाया है.
हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये जांच एजेंसी के आरोप और जांच के निष्कर्ष हैं, अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं. ममता खेमे ने ED की कार्रवाई को चुनौती दी है और इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया है.
4. असली चुनौती सिर्फ विधायकों की संख्या नहीं
चुनाव के बाद तृणमूल कांग्रेस की समस्या केवल यह नहीं है कि उसके कितने विधायक उसके साथ हैं. असली सवाल पार्टी के संगठनात्मक नियंत्रण का है.
ममता खेमे और ऋतब्रत खेमे, दोनों खुद को असली तृणमूल कांग्रेस बताते रहे हैं. एक तरफ ममता बनर्जी का वर्षों पुराना राजनीतिक नेतृत्व और पार्टी पर प्रभाव है, तो दूसरी तरफ बागी गुट निर्वाचित विधायकों के समर्थन और पार्टी के संगठनात्मक ढांचे के आधार पर अपना दावा पेश कर रहा है.
इसी वजह से मामला अब चुनाव आयोग तक पहुंच चुका है. आयोग को पार्टी के नाम, चुनाव चिन्ह और संगठनात्मक दावों पर आगे फैसला करना है.
5. पुराने भरोसेमंद नेताओं की भूमिका भी चर्चा में
तृणमूल कांग्रेस के मौजूदा संकट को समझने के लिए पार्टी के पुराने संगठनात्मक ढांचे को देखना भी जरूरी है.
समय के साथ पार्टी के कई पुराने और प्रभावशाली नेताओं की भूमिका बदल गई. कुछ नेता पार्टी से दूर हुए, कुछ कानूनी मामलों में घिरे और कुछ का निधन हो गया. इससे ममता बनर्जी के आसपास लंबे समय तक मौजूद पुराने संगठनात्मक नेटवर्क में भी बदलाव आया.
दूसरी ओर, अभिषेक बनर्जी की बढ़ती भूमिका भी पार्टी के भीतर बहस का विषय बनी. चुनावी हार के बाद नेतृत्व और संगठन की दिशा को लेकर अलग-अलग नेताओं की राय सामने आने लगी. हालांकि, इन मतभेदों के कारणों को लेकर अलग-अलग गुटों के अलग-अलग दावे हैं.
6. सत्ता से बाहर होना बना बड़ा मोड़
तृणमूल कांग्रेस के लिए 2026 का विधानसभा चुनाव एक निर्णायक राजनीतिक बदलाव लेकर आया. 2011 से पश्चिम बंगाल में सरकार चला रही पार्टी सत्ता से बाहर हो गई और विधानसभा में उसकी संख्या 80 तक सिमट गई.
सत्ता जाने के बाद पार्टी के भीतर कई ऐसे नेताओं के सामने भी नई राजनीतिक परिस्थितियां आईं, जिन पर विभिन्न मामलों में जांच या कानूनी कार्रवाई चल रही है. यही वजह है कि सत्ता से बाहर होने को पार्टी के भीतर पैदा हुए दबावों की एक महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि के तौर पर देखा जा रहा है.
हालांकि, किसी नेता के खिलाफ जांच या मामला दर्ज होना अपने आप में दोष सिद्ध होने का प्रमाण नहीं है.
7. अब ममता के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
ममता बनर्जी के सामने अब तीन स्तरों पर चुनौती है. पहली चुनौती संगठन पर नियंत्रण की है. दूसरी चुनौती पार्टी के नाम और चुनाव चिन्ह की है. तीसरी चुनौती बचे हुए विधायकों और नेताओं को एकजुट रखने की है.
17 सितंबर के चुनाव आयोग के आदेश ने इस संघर्ष को और औपचारिक बना दिया है. आगामी उपचुनावों में दोनों गुटों को अलग नाम और चुनाव चिन्ह के साथ मैदान में उतरना होगा.
यानी मई में जिस लड़ाई को ममता बनर्जी ने सड़क पर उतरकर जारी रखने की बात कही थी, वह अब सड़क से निकलकर चुनाव आयोग, संगठन और अदालतों तक पहुंच चुकी है.
अब क्या होगा आगे?
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि चुनाव आयोग पार्टी के मूल नाम और ‘जोड़ाफूल’ चुनाव चिन्ह पर अंतिम रूप से क्या फैसला करता है. इसके साथ यह भी देखना होगा कि दोनों गुटों में से किसके साथ कितने निर्वाचित प्रतिनिधि और संगठनात्मक पदाधिकारी बने रहते हैं.
इस पूरी लड़ाई का असर सिर्फ एक चुनाव चिन्ह पर नहीं पड़ेगा. तृणमूल कांग्रेस की 1998 से बनी राजनीतिक पहचान, उसके संगठनात्मक ढांचे और ममता बनर्जी के नेतृत्व की आगे की भूमिका भी इसी विवाद से जुड़ी हुई है.
मई में ममता बनर्जी के पास 80 विधायकों वाली पार्टी थी. सितंबर तक मामला पार्टी के नाम और प्रतीक की लड़ाई तक पहुंच चुका है. इसलिए बंगाल की राजनीति में फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि तृणमूल कांग्रेस चुनाव हारी या जीती, बल्कि यह है कि तृणमूल कांग्रेस की राजनीतिक और संगठनात्मक विरासत पर अंतिम नियंत्रण किसके पास रहेगा.
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पीयूष गोयल ने व्यापार समझौते को अंतिम रूप देने के लिए कनाडा के मंत्री मनिंदर सिद्धू से की मुलाकात
नई दिल्ली, 18 सितंबर (आईएएनएस)। केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने शुक्रवार को कहा कि उन्होंने कनाडा के अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंत्री मनिंदर सिद्धू के साथ भारत-कनाडा व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौते (सीईपीए) को आगे बढ़ाने के संबंध में एक सार्थक बैठक की।
गोयल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर कहा कि दोनों पक्षों ने अपने नेतृत्व की उस प्रतिबद्धता को दोहराया है जिसके तहत सीईपीए वार्ताओं को तेजी से पूरा कर जल्द से जल्द समझौते को अंतिम रूप देने का लक्ष्य रखा गया है। उन्होंने कहा कि इससे वस्तुओं, सेवाओं और निवेश सहित कई क्षेत्रों में नए अवसर खुलेंगे।
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि उन्हें विश्वास है कि भारत-कनाडा सीईपीए का शीघ्र निष्कर्ष दोनों देशों के साझा लक्ष्य को साकार करने में मदद करेगा। इससे द्विपक्षीय व्यापार में उल्लेखनीय वृद्धि होगी और भारत-कनाडा आर्थिक साझेदारी को आपसी लाभ के लिए और मजबूत किया जा सकेगा।
इस सप्ताह भारत और कनाडा ने प्रस्तावित सीईपीए के लिए नई दिल्ली में चौथे दौर की वार्ता शुरू की। दोनों देशों का लक्ष्य इस वर्ष के अंत तक समझौते को अंतिम रूप देना है।
पांच दिनों तक चली इन वार्ताओं में वस्तुओं का व्यापार, सेवाएं, मूल नियम (रूल्स ऑफ ओरिजिन) और तकनीकी व्यापार बाधाएं जैसे मुद्दे प्रमुख रूप से शामिल रहे। इससे पहले तीसरा दौर जुलाई में कनाडा की राजधानी ओटावा में आयोजित किया गया था।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने इसी वर्ष मार्च में नई दिल्ली में हुई बैठक के दौरान सीईपीए वार्ताओं को वर्ष के अंत तक पूरा करने का लक्ष्य तय किया था। दोनों नेताओं ने ऊर्जा और महत्वपूर्ण खनिज (क्रिटिकल मिनरल्स) क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति जताई थी।
वित्त वर्ष 2024-25 में भारत और कनाडा के बीच द्विपक्षीय वस्तु व्यापार 8.66 अरब डॉलर रहा, जबकि कनाडा को भारत का निर्यात 4.22 अरब डॉलर तक पहुंचा।
कनाडा को भारत के प्रमुख निर्यात उत्पादों में दवा उत्पाद, मशीनरी एवं यांत्रिक उपकरणों के पुर्जे, लोहे और इस्पात से बने उत्पाद, इलेक्ट्रॉनिक सामान, कार्बनिक रसायन, आभूषण, रत्न एवं कीमती पत्थर, परिधान एवं वस्त्र, समुद्री उत्पाद, इंजीनियरिंग उत्पाद और ऑटो पार्ट्स शामिल हैं।
वहीं कनाडा से भारत के प्रमुख आयातों में दालें, उर्वरक, खनिज ईंधन, लकड़ी का पल्प, रत्न एवं कीमती पत्थर, विमान के पुर्जे, मशीनरी के हिस्से तथा लोहा और एल्युमीनियम स्क्रैप शामिल हैं।
सेवा क्षेत्र में भारत का आईटी उद्योग कनाडा को सेवाओं के निर्यात में सबसे बड़ा योगदानकर्ता बना हुआ है। सीईपीए के लागू होने से दोनों देशों के बीच व्यापार, निवेश और आर्थिक सहयोग को और अधिक गति मिलने की उम्मीद है।
--आईएएनएस
डीबीपी
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