Explainer: 80 साल से अटकी किशाऊ परियोजना का रास्ता साफ, हरियाणा को पानी और हिमाचल को ₹2000 करोड़ का फायदा
अंतरराज्यीय जल विवादों के इतिहास में एक नया और स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है. नई दिल्ली में आयोजित एक उच्चस्तरीय और अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक में आठ दशकों से अटका किशाऊ बांध परियोजना विवाद आखिरकार पूरी तरह सुलझ गया है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल की अध्यक्षता में आयोजित इस बैठक में उत्तर भारत के छह प्रमुख राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने हिस्सा लिया और आपसी बातचीत के जरिए इस लंबे समय से लंबित मामले का सर्वसम्मति से समाधान निकाला.
इस ऐतिहासिक बैठक में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू और हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी उपस्थित रहे. सभी राज्यों ने अपने-अपने क्षेत्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए व्यापक राष्ट्रहित में इस समझौते पर सहमति जताई. यह फैसला अंतरराज्यीय सहयोग और संघवाद की एक मिसाल के रूप में देखा जा रहा है, जिससे उत्तर भारत के कई राज्यों को पीने का पानी, सिंचाई की सुविधा और बिजली उत्पादन में बड़ी राहत मिलेगी.
क्या है किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना?
किशाऊ बांध परियोजना यमुना और उसकी सहायक नदियों के जल संसाधनों का उचित और न्यायसंगत वितरण करने के उद्देश्य से तैयार की गई एक अति-महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय परियोजना है. इस बहुउद्देशीय योजना के तहत हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा के निकट बहने वाली टोंस नदी पर लगभग 233 मीटर ऊंचा विशाल कंक्रीट ग्रेविटी बांध बनाया जाएगा. इस विशाल बांध में लगभग 156 करोड़ घन मीटर पानी को सुरक्षित रूप से स्टोर करने की क्षमता होगी. परियोजना के क्रियान्वयन से केवल जल संचयन ही नहीं होगा, बल्कि करीब 97 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि को नियमित सिंचाई का जल भी उपलब्ध कराया जा सकेगा. इसके साथ ही, यह परियोजना सालाना लगभग 148 करोड़ यूनिट स्वच्छ और नवीकरणीय पन-बिजली का उत्पादन करने में सक्षम होगी. केंद्र सरकार ने इस परियोजना के विशाल पैमाने और व्यापक सामाजिक-आर्थिक महत्व को देखते हुए वर्ष 2008 में ही इसे 'राष्ट्रीय परियोजना' का दर्जा प्रदान कर दिया था. हालांकि, राज्यों के बीच लागत के बंटवारे, पानी के हिस्से और विस्थापन जैसे मुद्दों पर पूर्ण सहमति न बन पाने के कारण यह महत्वाकांक्षी योजना कई वर्षों तक अटकी रही, लेकिन अब इस पर काम शुरू होने का मार्ग पूरी तरह प्रशस्त हो चुका है.
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परियोजना का 80 वर्षों का लंबा और चुनौतीपूर्ण सफर
किशाऊ बांध की कहानी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौर से जुड़ी हुई है. इस परियोजना की शुरुआती परिकल्पना आजादी से काफी पहले वर्ष 1940 में की गई थी. इसके बाद सन् 1945 में तत्कालीन अविभाजित पंजाब सरकार ने टोंस नदी के आसपास के इलाकों में पहला विस्तृत तकनीकी सर्वे करवाया था. परंतु, उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों और बाद में देश के विभाजन के कारण यह योजना ठंडे बस्ते में चली गई. स्वतंत्रता के बाद भी जब-जब इस परियोजना की फाइलें दोबारा खोली गईं, तब-तब राज्यों का पुनर्गठन, नए प्रशासनिक क्षेत्रों का गठन और अंतरराज्यीय जल अधिकारों को लेकर मतभेद सामने आते रहे. कभी उत्तर प्रदेश और पंजाब के बीच, तो कभी बाद में बने उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली के बीच जल वितरण और लागत साझेदारी को लेकर नए विवाद पैदा होते रहे. इन अस्सी सालों के लंबे अंतराल में कई दौर की वार्ताएं आयोजित की गईं, लेकिन हर बार किसी न किसी बिंदु पर असहमति रह जाती थी. अब आठ दशकों के लंबे इंतजार के बाद सभी छह राज्यों ने परिपक्वता का परिचय देते हुए एक-एक मतभेद को दूर किया और परियोजना के निर्माण पर अपनी अंतिम मुहर लगाई.
हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के लिए परियोजना का दूरगामी महत्व
किशाऊ बांध परियोजना से हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान जैसे मैदानी राज्यों की जल सुरक्षा को एक नई दिशा मिलेगी. हरियाणा राज्य लंबे समय से ऊपरी यमुना क्षेत्र में जल भंडारण क्षमता बढ़ाने की मांग उठाता आ रहा है. यमुना नदी के कुल जल संसाधनों में हरियाणा की हिस्सेदारी करीब 48 प्रतिशत है, इसलिए ऊपरी हिस्सों में भंडारण क्षमता बढ़ते ही इसका सीधा फायदा हरियाणा को मिलेगा. किशाऊ परियोजना के अलावा रेणुकाजी और लखवार परियोजनाओं पर भी पूर्व में बनी सहमति से यमुना में जल प्रवाह बढ़ेगा. इन तीनों परियोजनाओं के संयुक्त रूप से पूरा होने के बाद यमुना में कुल 2676 क्यूसेक अतिरिक्त पानी उपलब्ध होगा, जिसमें से अकेले हरियाणा को 1280 क्यूसेक पानी यानी करीब 1143 मिलियन क्यूबिक मीटर जल मिलेगा. यह जल हरियाणा के कृषि क्षेत्रों की सिंचाई और भूजल स्तर को सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. वहीं दूसरी ओर, देश की राजधानी दिल्ली के लिए यह परियोजना एक जीवनदायिनी की तरह साबित होगी. किशाऊ बांध से छोड़े जाने वाले पानी को यमुना नदी के जरिए दिल्ली तक पहुंचाया जाएगा, जिससे राजधानी में गर्मियों के दौरान होने वाले भीषण पेयजल संकट को स्थायी रूप से दूर करने में बड़ी मदद मिलेगी. राजस्थान को भी अपने हिस्से का पानी मिलने से उसके शुष्क क्षेत्रों में सिंचाई और पेयजल आपूर्ति को मजबूती मिलेगी.
हिमाचल प्रदेश के लिए आर्थिक और ऊर्जा क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि
किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना में हिमाचल प्रदेश ने बिना कोई बड़ा आर्थिक बोझ उठाए अपने लिए एक अत्यंत लाभकारी व्यवस्था सुनिश्चित की है. मूल योजना के अनुसार, हिमाचल प्रदेश को अपने हिस्से की बिजली प्राप्त करने के लिए लगभग 2000 करोड़ रुपये का निवेश करना पड़ता, जिसमें से करीब 800 करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष वित्तीय भार राज्य सरकार को स्वयं वहन करना था. लेकिन हिमाचल प्रदेश की वर्तमान सरकार ने राज्य के सीमित आर्थिक संसाधनों और परियोजना से प्रभावित होने वाले स्थानीय निवासियों के हितों को ध्यान में रखते हुए इस लागत को देने में असमर्थता जताई थी. केंद्रीय गृह मंत्री की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक में केंद्र सरकार ने हिमाचल की इस मांग को स्वीकार करते हुए एक विशेष व्यवस्था पर सहमति जताई. अब किशाऊ बांध परियोजना के निर्माण की कुल लागत का 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार वहन करेगी, जबकि हिमाचल के हिस्से की शेष लागत का भार लाभार्थी राज्य यानी दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान आपस में वहन करेंगे. इस समझौते के परिणामस्वरूप, हिमाचल प्रदेश को बिना कोई पूंजी निवेश किए हर साल करीब 1000 मिलियन यूनिट पन-बिजली प्राप्त होगी. वर्तमान बाजार दरों के हिसाब से इस बिजली का अनुमानित मूल्य 1200 करोड़ रुपये से भी अधिक है. इस प्रकार, यह समझौता हिमाचल प्रदेश के लिए बिना किसी वित्तीय देनदारी के वार्षिक राजस्व का एक बड़ा जरिया साबित होगा.
लागत साझेदारी, तकनीकी मॉडल और भावी दिशा
किशाऊ परियोजना केवल जल वितरण का माध्यम नहीं है, बल्कि यह केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय सहकारिता का एक बेहतरीन मॉडल भी पेश करती है. परियोजना के अंतर्गत बनने वाले बांध और जल संचयन संरचना की विशालता को देखते हुए केंद्र सरकार ने 90 प्रतिशत अनुदान देने का निर्णय लिया है, जो राष्ट्रीय परियोजनाओं के लिए तय मानकों के अनुरूप है. शेष 10 प्रतिशत खर्च को राज्यों के बीच उनकी जल और बिजली की खपत के आधार पर बांटा गया है. टोंस नदी पर बनने वाला 233 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी बांध अभियांत्रिकी की दृष्टि से भी एक अनूठा ढांचा होगा. यह न केवल बाढ़ नियंत्रण में सहायक होगा, बल्कि नदी में लगातार जल प्रवाह बनाए रखने में भी मदद करेगा. जल संचयन और बिजली उत्पादन के इस समन्वित प्रयास से पर्यावरण संरक्षण और हरित ऊर्जा के उत्पादन को भी प्रोत्साहन मिलेगा. इस परियोजना से प्रभावित होने वाले परिवारों के पुनर्वास और पुनर्व्यवस्था के लिए भी एक विशेष पैकेज की रूपरेखा तैयार की गई है, ताकि किसी भी स्थानीय नागरिक के अधिकारों का हनन न हो. इस ऐतिहासिक समझौते ने यह साबित कर दिया है कि यदि संवाद और राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो दशकों पुराने और जटिल अंतरराज्यीय विवादों को भी राष्ट्रहित में आसानी से सुलझाया जा सकता है.
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पाकिस्तान में लगा लॉकडाउन? लोगों के विदेश जाने पर भी रोक, जानें क्यों आम जिंदगी की रफ्तार पर लगा ब्रेक
Explainer: पाकिस्तान में बढ़ती ईंधन कीमतों और ऊर्जा संकट का असर अब सिर्फ पेट्रोल पंप और सरकारी खजाने तक सीमित नहीं रह गया है. इसका असर बाजारों, शॉपिंग मॉल, रेस्टोरेंट और यहां तक कि शादी समारोहों पर भी दिखाई देने लगा है. पाकिस्तान की संघीय सरकार ने ईंधन बचाने और सरकारी खर्च कम करने के लिए नए किफायती उपाय लागू किए हैं.
नई व्यवस्था के तहत दुकानें, बाजार और शॉपिंग मॉल रात 9 बजे तक बंद करने होंगे. मैरिज हॉल, मैरक्वी और अन्य समारोह स्थल रात 10 बजे तक बंद होंगे, जबकि रेस्टोरेंट, कैफे और फूड आउटलेट को रात 11 बजे तक काम करने की अनुमति है. शादी और अन्य समारोहों में सिर्फ एक डिश परोसने का नियम भी जारी रखा गया है.
सवाल है कि आखिर पाकिस्तान को इतनी सख्ती क्यों करनी पड़ी और तेल की कीमत बढ़ने का बाजार बंद होने से क्या संबंध है?
तेल संकट से क्यों बढ़ी पाकिस्तान की मुश्किल?
पाकिस्तान अपनी ऊर्जा जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है. ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों की कीमत बढ़ने का सीधा असर उसके आयात बिल पर पड़ता है.
मध्य पूर्व में जारी संघर्ष और तनाव ने वैश्विक ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता बढ़ाई है. खासतौर पर हॉर्मुज स्ट्रेट जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों को लेकर चिंता बढ़ने से तेल की आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बना है.
ऐसी स्थिति में पाकिस्तान जैसे आयात-निर्भर देश के सामने दोहरी चुनौती आती है. एक तरफ महंगा ईंधन खरीदने के लिए ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है, वहीं दूसरी तरफ घरेलू बाजार में पेट्रोल-डीजल की कीमत बढ़ने से महंगाई का दबाव बढ़ता है.
17 सितंबर 2026 को पाकिस्तान में पेट्रोल की कीमत 391.22 पाकिस्तानी रुपये प्रति लीटर और हाई-स्पीड डीजल की कीमत 421.45 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई.
बाजार रात 9 बजे क्यों बंद होंगे?
सरकार का तर्क है कि बाजार और व्यावसायिक प्रतिष्ठान देर रात तक खुले रहने पर बिजली और ईंधन की खपत बढ़ती है. दुकानें, मॉल और बाजार बंद होने के समय को सीमित करने से कमर्शियल बिजली की मांग को नियंत्रित करने और अप्रत्यक्ष रूप से ईंधन की खपत कम करने में मदद मिल सकती है.
नए आदेश के अनुसार दुकानें, बाजार, शॉपिंग मॉल, बाजारों के अलावा डिपार्टमेंटल, जनरल और किरयाना स्टोर रात 9 बजे तक बंद होंगे.
हालांकि जरूरी सेवाओं को इस नियम से बाहर रखा गया है. अस्पताल, क्लीनिक, मेडिकल लैब, फार्मेसी और मेडिकल सप्लाई स्टोर जैसे प्रतिष्ठानों को समय की पाबंदी से छूट दी गई है.
रेस्टोरेंट और कैफे को 11 बजे तक छूट
सरकार ने सभी कारोबारों को एक ही समय पर बंद करने का फैसला नहीं किया है. रेस्टोरेंट, कैफे, फूड आउटलेट और ईटरी रात 11 बजे तक खुले रह सकते हैं.
टेकअवे और होम डिलीवरी सेवाओं को भी इस समय सीमा से छूट दी गई है. इसका मतलब है कि ग्राहक ऑनलाइन या फोन के जरिए खाना मंगा सकते हैं, भले ही रेस्टोरेंट की सामान्य बैठकर खाने वाली सेवा निर्धारित समय के बाद बंद हो जाए.
यह व्यवस्था इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि रेस्तरां और खाद्य कारोबारों की गतिविधियां आमतौर पर शाम और रात में ज्यादा होती हैं.
शादियों में सिर्फ एक डिश क्यों?
पाकिस्तान सरकार का एक और चर्चित फैसला शादी समारोहों से जुड़ा है. मैरिज हॉल, मैरक्वी और दूसरे व्यावसायिक समारोह स्थलों को रात 10 बजे तक बंद करना होगा. इसके अलावा शादी और दूसरे समारोहों में केवल एक डिश परोसने का नियम जारी रखा गया है.
इसके पीछे सिर्फ खाना बचाना ही उद्देश्य नहीं है. बड़े शादी समारोहों में खाना पकाने, गर्म रखने, रोशनी, एयर कंडीशनिंग, जनरेटर और परिवहन जैसी गतिविधियों में काफी ऊर्जा और ईंधन खर्च हो सकता है. सिंगल-डिश नीति के जरिए सरकार समारोहों में होने वाले खर्च और संसाधनों की खपत को सीमित करना चाहती है.
सरकार ने अपने खर्च पर भी लगाई कैंची
सरकार ने यह संदेश देने की कोशिश की है कि बचत के उपाय सिर्फ आम नागरिकों और कारोबारियों पर लागू नहीं होंगे. सरकारी मशीनरी को भी खर्च कम करने के निर्देश दिए गए हैं.
नए उपायों के तहत सरकारी वाहनों के लिए ईंधन आवंटन में तीन महीने के लिए 50 प्रतिशत कटौती की गई है. हालांकि सेना, कानून-व्यवस्था, एंबुलेंस, फायर ब्रिगेड और जरूरी सेवाओं से जुड़ी ऑपरेशनल गाड़ियों को छूट दी गई है. इसके अलावा नए सरकारी वाहनों की खरीद पर रोक लगाई गई है. आईटी से संबंधित खरीद को इससे बाहर रखा गया है.
अधिकारियों की विदेश यात्राओं पर भी रोक
सरकार ने तीन महीने के लिए सरकारी अधिकारियों और संबंधित प्रतिनिधियों की विदेश यात्राओं पर भी रोक लगाने का फैसला किया है. जरूरी मामलों में यात्रा की अनुमति दी जा सकती है, लेकिन ऐसे मामलों में भी इकॉनमी क्लास से यात्रा का निर्देश दिया गया है.
सरकार ने आधिकारिक बैठकों में वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग को प्राथमिकता देने और सरकारी खर्च से होने वाले अनावश्यक सेमिनार, प्रशिक्षण और कॉन्फ्रेंस पर रोक लगाने के निर्देश भी दिए हैं. यानी लक्ष्य सिर्फ पेट्रोल बचाना नहीं, बल्कि सरकार के नियमित खर्च को भी कम करना है.
बजट में भी कटौती
केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के Non-ERE Budget में 5 प्रतिशत कटौती का फैसला किया है. यह कटौती मासिक आधार पर की जाएगी.
विदेशी मिशनों पर भी यह उपाय लागू होगा, हालांकि किराया, शिक्षा शुल्क और मेडिकल व्यवस्था जैसे कुछ खर्चों को जारी रखने की अनुमति है. इसका उद्देश्य सरकारी खर्च को नियंत्रित करना और महंगे ईंधन के दौर में वित्तीय दबाव को कम करना है.
जरूरी सेवाओं को क्यों रखा गया बाहर?
सरकार ने यह भी ध्यान रखा है कि ईंधन और ऊर्जा बचाने की कोशिश में जरूरी सेवाएं प्रभावित न हों. अस्पताल, क्लीनिक, मेडिकल लैब, फार्मेसी, बेकरी, तंदूर, दूध-दही की दुकानें, पेट्रोल पंप, सीएनजी स्टेशन और इलेक्ट्रिक वाहन चार्जिंग स्टेशन को समय सीमा से बाहर रखा गया है. जिम, स्पोर्ट्स सुविधाएं, आईटी कंपनियां और कॉल सेंटर भी इस प्रतिबंध से बाहर हैं.
इससे सरकार का उद्देश्य यह दिखाई देता है कि ऊर्जा बचत के बावजूद स्वास्थ्य, खाद्य आपूर्ति, परिवहन ईंधन और डिजिटल सेवाओं जैसी आवश्यक गतिविधियां चलती रहें.
क्या यह पहली बार हुआ है?
नहीं. पाकिस्तान में ऊर्जा और ईंधन संकट के दौरान व्यावसायिक समय सीमित करने के उपाय पहले भी किए जा चुके हैं. 2026 में इस्लामाबाद प्रशासन ने अलग-अलग चरणों में बाजार और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के बंद होने के समय में बदलाव किया था.
अप्रैल में कुछ बाजारों को रात 8 बजे तक बंद करने का आदेश दिया गया था, जबकि बाद में गर्मियों और लंबे दिन को देखते हुए समय में बदलाव किए गए. जून में बाजारों के लिए रात 9 बजे और रेस्टोरेंट के लिए रात 11 बजे तक की व्यवस्था लागू की गई थी.
अब सितंबर में मध्य पूर्व में बढ़े तनाव और अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतों के दबाव के बीच संघीय सरकार ने फिर से किफायती उपायों को मजबूत किया है.
आम लोगों पर क्या असर पड़ेगा?
इन फैसलों का सबसे सीधा असर कारोबार के समय और लोगों की रोजमर्रा की जीवनशैली पर पड़ सकता है. शाम के बाद खरीदारी करने वाले लोगों को अब जल्दी बाजार पहुंचना होगा. दुकानदारों को अपना कारोबार निर्धारित समय के भीतर समेटना होगा.
रेस्टोरेंट और कैफे को 11 बजे तक की अनुमति होने के कारण खाद्य कारोबारों पर बाजारों की तुलना में थोड़ी अधिक समय सीमा रहेगी.
शादी समारोहों के मामले में बदलाव ज्यादा सामाजिक असर वाला है. सिंगल-डिश नियम बड़े समारोहों में भोजन की विविधता और खर्च को सीमित करेगा.
क्या सिर्फ तेल बचाना ही मकसद है?
पूरी तस्वीर देखें तो सरकार के कदम तीन लक्ष्यों से जुड़े दिखाई देते हैं—ईंधन की खपत कम करना, विदेशी मुद्रा पर दबाव घटाना और सरकारी खर्च को नियंत्रित करना.
तेल महंगा होने पर पाकिस्तान को आयात के लिए ज्यादा रकम खर्च करनी पड़ती है. यदि घरेलू स्तर पर ईंधन और ऊर्जा की खपत कम होती है तो आयातित ऊर्जा की मांग को कुछ हद तक नियंत्रित किया जा सकता है.
इसीलिए बाजार जल्दी बंद करने से लेकर सरकारी वाहनों के ईंधन कोटे में कटौती और विदेश यात्राओं पर रोक तक कई उपाय एक साथ लागू किए गए हैं.
इस्लामाबाद के अलावा भी बढ़ सकती है मुश्किलें
शहबाज सरकार ने प्रांतों और क्षेत्रीय सरकारों से भी इसी तरह के ईंधन संरक्षण और किफायत के उपायों पर विचार करने को कहा है.
इसका मतलब है कि यदि अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में दबाव लंबे समय तक बना रहता है तो पाकिस्तान में ऐसे कदम केवल इस्लामाबाद तक सीमित नहीं रह सकते.
फिलहाल पाकिस्तान सरकार का संदेश स्पष्ट है महंगे तेल और ऊर्जा संकट के दौर में खपत घटाओ, सरकारी खर्च कम करो और विदेशी मुद्रा की बचत करो. यही वजह है कि तेल की बढ़ती कीमतों का असर अब पेट्रोल पंप से निकलकर बाजारों के शटर और शादी के मेन्यू तक पहुंच गया है.
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