Stocks To Buy: 18 सितंबर को तगड़ा रिटर्न दे सकते हैं ये 5 स्टॉक्स
Stocks To Buy: भारतीय शेयर बाजार के लिए शुक्रवार 18 सितंबर का दिन अच्छा दिन साबित हो सकता है. मार्केट एनालिस्ट और ब्रोकरेज फर्मों ने अलग-अलग सेक्टर से ऐसे खास स्टॉक चुने हैं जिनसे अच्छे रिटर्न की संभावना है. निवेशकों को कम रिस्क के साथ मुनाफा कमाने में मदद करने के लिए एंट्री प्राइस, टारगेट प्राइस और स्टॉप-लॉस लेवल के हिसाब से यहां हम कुछ शेयर्स बता रहे हैं. तो आइए आज के टॉप 5 स्टॉक पिक्स पर नजर डालते हैं.
1. ग्रेफाइट इंडिया लिमिटेड (मौजूदा कीमत: ₹813.20)
एंजेल वन के चीफ मैनेजर (टेक्निकल और डेरिवेटिव रिसर्च) ओशो कृष्ण इस स्टॉक को ₹810 पर खरीदने का सुझाव देते हैं. वे ₹846 का टारगेट प्राइस और ₹788 का स्टॉप-लॉस रखने की सलाह दे रहे हैं, जिससे मौजूदा कीमत से लगभग 4.03% का फायदा हो सकता है.
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2. ब्लू स्टार लिमिटेड (मौजूदा कीमत: ₹1,554)
PL कैपिटल की वाइस प्रेसिडेंट (टेक्निकल रिसर्च) वैशाली पारेख इस स्टॉक को ₹1,550 पर खरीदने की सलाह देती हैं. उन्होंने ₹1,600 का टारगेट प्राइस और ₹1,525 का स्टॉप-लॉस रखने का सुझाव दिया है, जिससे लगभग 2.96% का फायदा हो सकता है.
3. लॉरस लैब्स लिमिटेड (मौजूदा कीमत: ₹1,958)
वैशाली पारेख ने इस स्टॉक की भी सलाह दी है. उनके अनुसार, इसे ₹1,954 पर खरीदा जा सकता है, जिसका टारगेट प्राइस ₹2,030 और स्टॉप-लॉस ₹1,920 होगा. इसमें लगभग 3.68% की बढ़त देखी जा सकती है.
4. सिरमा SGS टेक्नोलॉजी लिमिटेड (मौजूदा कीमत: ₹1,616.10)
मार्केट एक्सपर्ट सचिन जनार्दन सर्वदे का सुझाव है कि इस स्टॉक को ₹1,600-₹1,618 की रेंज में खरीदा जा सकता है. उन्होंने ₹2,100 का टारगेट प्राइस और ₹1,389 का स्टॉप-लॉस तय किया है. इस स्टॉक में सबसे ज्यादा रिटर्न देने की क्षमता है, जो लगभग 29.94% तक पहुंच सकता है.
5. न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड (मौजूदा कीमत: ₹196.76)
सचिन जनार्दन सर्वदे ने न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड स्टॉक के लिए भी सलाह दी है. इसे ₹192 और ₹197 के बीच खरीदा जा सकता है. इसका टारगेट प्राइस ₹240 है और स्टॉप-लॉस ₹179 पर सेट किया जाना चाहिए. इस स्टॉक में लगभग 21.98% का अच्छा-खासा मुनाफा कमाने की संभावना भी है.
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Desclaimer: यह जानकारी अलग-अलग एनालिस्ट और ब्रोकरेज फर्मों की राय पर आधारित है. इसे निवेश की सलाह न माना जाए. शेयर बाजार में निवेश जोखिम भरा होता है, इसलिए निवेश करने से पहले अपने फाइनेंशियल एडवाइजर से सलाह जरूर लें.
Explainer: 80 साल से अटकी किशाऊ परियोजना का रास्ता साफ, हरियाणा को पानी और हिमाचल को ₹2000 करोड़ का फायदा
अंतरराज्यीय जल विवादों के इतिहास में एक नया और स्वर्णिम अध्याय जुड़ गया है. नई दिल्ली में आयोजित एक उच्चस्तरीय और अत्यंत महत्वपूर्ण बैठक में आठ दशकों से अटका किशाऊ बांध परियोजना विवाद आखिरकार पूरी तरह सुलझ गया है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल की अध्यक्षता में आयोजित इस बैठक में उत्तर भारत के छह प्रमुख राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने हिस्सा लिया और आपसी बातचीत के जरिए इस लंबे समय से लंबित मामले का सर्वसम्मति से समाधान निकाला.
इस ऐतिहासिक बैठक में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, राजस्थान के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू और हरियाणा के मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी उपस्थित रहे. सभी राज्यों ने अपने-अपने क्षेत्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए व्यापक राष्ट्रहित में इस समझौते पर सहमति जताई. यह फैसला अंतरराज्यीय सहयोग और संघवाद की एक मिसाल के रूप में देखा जा रहा है, जिससे उत्तर भारत के कई राज्यों को पीने का पानी, सिंचाई की सुविधा और बिजली उत्पादन में बड़ी राहत मिलेगी.
क्या है किशाऊ बहुउद्देशीय बांध परियोजना?
किशाऊ बांध परियोजना यमुना और उसकी सहायक नदियों के जल संसाधनों का उचित और न्यायसंगत वितरण करने के उद्देश्य से तैयार की गई एक अति-महत्वाकांक्षी राष्ट्रीय परियोजना है. इस बहुउद्देशीय योजना के तहत हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा के निकट बहने वाली टोंस नदी पर लगभग 233 मीटर ऊंचा विशाल कंक्रीट ग्रेविटी बांध बनाया जाएगा. इस विशाल बांध में लगभग 156 करोड़ घन मीटर पानी को सुरक्षित रूप से स्टोर करने की क्षमता होगी. परियोजना के क्रियान्वयन से केवल जल संचयन ही नहीं होगा, बल्कि करीब 97 हजार हेक्टेयर कृषि भूमि को नियमित सिंचाई का जल भी उपलब्ध कराया जा सकेगा. इसके साथ ही, यह परियोजना सालाना लगभग 148 करोड़ यूनिट स्वच्छ और नवीकरणीय पन-बिजली का उत्पादन करने में सक्षम होगी. केंद्र सरकार ने इस परियोजना के विशाल पैमाने और व्यापक सामाजिक-आर्थिक महत्व को देखते हुए वर्ष 2008 में ही इसे 'राष्ट्रीय परियोजना' का दर्जा प्रदान कर दिया था. हालांकि, राज्यों के बीच लागत के बंटवारे, पानी के हिस्से और विस्थापन जैसे मुद्दों पर पूर्ण सहमति न बन पाने के कारण यह महत्वाकांक्षी योजना कई वर्षों तक अटकी रही, लेकिन अब इस पर काम शुरू होने का मार्ग पूरी तरह प्रशस्त हो चुका है.
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परियोजना का 80 वर्षों का लंबा और चुनौतीपूर्ण सफर
किशाऊ बांध की कहानी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दौर से जुड़ी हुई है. इस परियोजना की शुरुआती परिकल्पना आजादी से काफी पहले वर्ष 1940 में की गई थी. इसके बाद सन् 1945 में तत्कालीन अविभाजित पंजाब सरकार ने टोंस नदी के आसपास के इलाकों में पहला विस्तृत तकनीकी सर्वे करवाया था. परंतु, उस दौर की राजनीतिक परिस्थितियों और बाद में देश के विभाजन के कारण यह योजना ठंडे बस्ते में चली गई. स्वतंत्रता के बाद भी जब-जब इस परियोजना की फाइलें दोबारा खोली गईं, तब-तब राज्यों का पुनर्गठन, नए प्रशासनिक क्षेत्रों का गठन और अंतरराज्यीय जल अधिकारों को लेकर मतभेद सामने आते रहे. कभी उत्तर प्रदेश और पंजाब के बीच, तो कभी बाद में बने उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और दिल्ली के बीच जल वितरण और लागत साझेदारी को लेकर नए विवाद पैदा होते रहे. इन अस्सी सालों के लंबे अंतराल में कई दौर की वार्ताएं आयोजित की गईं, लेकिन हर बार किसी न किसी बिंदु पर असहमति रह जाती थी. अब आठ दशकों के लंबे इंतजार के बाद सभी छह राज्यों ने परिपक्वता का परिचय देते हुए एक-एक मतभेद को दूर किया और परियोजना के निर्माण पर अपनी अंतिम मुहर लगाई.
हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान के लिए परियोजना का दूरगामी महत्व
किशाऊ बांध परियोजना से हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान जैसे मैदानी राज्यों की जल सुरक्षा को एक नई दिशा मिलेगी. हरियाणा राज्य लंबे समय से ऊपरी यमुना क्षेत्र में जल भंडारण क्षमता बढ़ाने की मांग उठाता आ रहा है. यमुना नदी के कुल जल संसाधनों में हरियाणा की हिस्सेदारी करीब 48 प्रतिशत है, इसलिए ऊपरी हिस्सों में भंडारण क्षमता बढ़ते ही इसका सीधा फायदा हरियाणा को मिलेगा. किशाऊ परियोजना के अलावा रेणुकाजी और लखवार परियोजनाओं पर भी पूर्व में बनी सहमति से यमुना में जल प्रवाह बढ़ेगा. इन तीनों परियोजनाओं के संयुक्त रूप से पूरा होने के बाद यमुना में कुल 2676 क्यूसेक अतिरिक्त पानी उपलब्ध होगा, जिसमें से अकेले हरियाणा को 1280 क्यूसेक पानी यानी करीब 1143 मिलियन क्यूबिक मीटर जल मिलेगा. यह जल हरियाणा के कृषि क्षेत्रों की सिंचाई और भूजल स्तर को सुधारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. वहीं दूसरी ओर, देश की राजधानी दिल्ली के लिए यह परियोजना एक जीवनदायिनी की तरह साबित होगी. किशाऊ बांध से छोड़े जाने वाले पानी को यमुना नदी के जरिए दिल्ली तक पहुंचाया जाएगा, जिससे राजधानी में गर्मियों के दौरान होने वाले भीषण पेयजल संकट को स्थायी रूप से दूर करने में बड़ी मदद मिलेगी. राजस्थान को भी अपने हिस्से का पानी मिलने से उसके शुष्क क्षेत्रों में सिंचाई और पेयजल आपूर्ति को मजबूती मिलेगी.
हिमाचल प्रदेश के लिए आर्थिक और ऊर्जा क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि
किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना में हिमाचल प्रदेश ने बिना कोई बड़ा आर्थिक बोझ उठाए अपने लिए एक अत्यंत लाभकारी व्यवस्था सुनिश्चित की है. मूल योजना के अनुसार, हिमाचल प्रदेश को अपने हिस्से की बिजली प्राप्त करने के लिए लगभग 2000 करोड़ रुपये का निवेश करना पड़ता, जिसमें से करीब 800 करोड़ रुपये का प्रत्यक्ष वित्तीय भार राज्य सरकार को स्वयं वहन करना था. लेकिन हिमाचल प्रदेश की वर्तमान सरकार ने राज्य के सीमित आर्थिक संसाधनों और परियोजना से प्रभावित होने वाले स्थानीय निवासियों के हितों को ध्यान में रखते हुए इस लागत को देने में असमर्थता जताई थी. केंद्रीय गृह मंत्री की अध्यक्षता में हुई उच्चस्तरीय बैठक में केंद्र सरकार ने हिमाचल की इस मांग को स्वीकार करते हुए एक विशेष व्यवस्था पर सहमति जताई. अब किशाऊ बांध परियोजना के निर्माण की कुल लागत का 90 प्रतिशत हिस्सा केंद्र सरकार वहन करेगी, जबकि हिमाचल के हिस्से की शेष लागत का भार लाभार्थी राज्य यानी दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान आपस में वहन करेंगे. इस समझौते के परिणामस्वरूप, हिमाचल प्रदेश को बिना कोई पूंजी निवेश किए हर साल करीब 1000 मिलियन यूनिट पन-बिजली प्राप्त होगी. वर्तमान बाजार दरों के हिसाब से इस बिजली का अनुमानित मूल्य 1200 करोड़ रुपये से भी अधिक है. इस प्रकार, यह समझौता हिमाचल प्रदेश के लिए बिना किसी वित्तीय देनदारी के वार्षिक राजस्व का एक बड़ा जरिया साबित होगा.
लागत साझेदारी, तकनीकी मॉडल और भावी दिशा
किशाऊ परियोजना केवल जल वितरण का माध्यम नहीं है, बल्कि यह केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय सहकारिता का एक बेहतरीन मॉडल भी पेश करती है. परियोजना के अंतर्गत बनने वाले बांध और जल संचयन संरचना की विशालता को देखते हुए केंद्र सरकार ने 90 प्रतिशत अनुदान देने का निर्णय लिया है, जो राष्ट्रीय परियोजनाओं के लिए तय मानकों के अनुरूप है. शेष 10 प्रतिशत खर्च को राज्यों के बीच उनकी जल और बिजली की खपत के आधार पर बांटा गया है. टोंस नदी पर बनने वाला 233 मीटर ऊंचा कंक्रीट ग्रेविटी बांध अभियांत्रिकी की दृष्टि से भी एक अनूठा ढांचा होगा. यह न केवल बाढ़ नियंत्रण में सहायक होगा, बल्कि नदी में लगातार जल प्रवाह बनाए रखने में भी मदद करेगा. जल संचयन और बिजली उत्पादन के इस समन्वित प्रयास से पर्यावरण संरक्षण और हरित ऊर्जा के उत्पादन को भी प्रोत्साहन मिलेगा. इस परियोजना से प्रभावित होने वाले परिवारों के पुनर्वास और पुनर्व्यवस्था के लिए भी एक विशेष पैकेज की रूपरेखा तैयार की गई है, ताकि किसी भी स्थानीय नागरिक के अधिकारों का हनन न हो. इस ऐतिहासिक समझौते ने यह साबित कर दिया है कि यदि संवाद और राजनीतिक इच्छाशक्ति हो, तो दशकों पुराने और जटिल अंतरराज्यीय विवादों को भी राष्ट्रहित में आसानी से सुलझाया जा सकता है.
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