यूरोप से 40 हजार सैनिक घटा सकता है अमेरिका:ट्रम्प बोले थे- यूरोप अपनी सुरक्षा के लिए हम पर निर्भरता घटाए
अमेरिका यूरोप में तैनात अपने 25 हजार से 40 हजार सैनिक कम कर सकता है। फिलहाल यूरोप में करीब 80 हजार अमेरिकी सैनिक मौजूद हैं। पेंटागन ने अभी इस पर कोई अंतिम फैसला नहीं लिया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प लंबे समय से NATO देशों से अपनी सुरक्षा पर ज्यादा खर्च करने की मांग करते रहे हैं। उनका कहना है कि यूरोप को अपनी रक्षा के लिए अमेरिका पर कम निर्भर होना चाहिए। पेंटागन ने जून में यूरोप में अमेरिकी सैनिकों, सैन्य ठिकानों और हथियारों की तैनाती की समीक्षा शुरू की थी। अगर अमेरिकी सैनिकों की तैनाती कम की जाती है तो यूरोप का सुरक्षा खर्च बढ़ सकता है। जर्मनी, इटली और स्पेन जैसे देशों पर ज्यादा असर पड़ेगा अगर अमेरिका सैनिक कम करता है तो इसका जर्मनी, इटली और स्पेन जैसे देशों पर सबसे ज्यादा असर पड़ेगा। यूरोप में अमेरिकी सैनिकों की सबसे बड़ी तैनाती जर्मनी में है, जहां करीब 36,400 सैनिक मौजूद हैं। इसके बाद इटली में लगभग 12,700 और स्पेन में करीब 3,800 अमेरिकी सैनिक तैनात हैं। इन देशों में अमेरिका के महत्वपूर्ण एयरबेस, नौसैनिक ठिकाने और सैन्य मुख्यालय हैं, जिनसे यूरोप, मध्य-पूर्व और अफ्रीका में कई सैन्य अभियान चलाए जाते हैं। यूरोप में अमेरिका के इतने सैनिक क्यों हैं? दूसरे विश्व युद्ध के बाद अमेरिका ने यूरोप में बड़ी सैन्य मौजूदगी बनाई थी। आज भी अमेरिकी सैनिक कई अहम भूमिकाएं निभाते हैं। यूरोप में अमेरिकी सेना कैसे काम करती है? यूरोप में अमेरिकी सैन्य गतिविधियों का संचालन यूएस यूरोपियन कमांड (USEUCOM) करता है। इसके तहत सेना, नौसेना, वायुसेना, मरीन फोर्स, स्पेशल ऑपरेशन फोर्स और स्पेस फोर्स जैसी इकाइयां काम करती हैं। इनके मुख्यालय मुख्य रूप से जर्मनी और इटली में हैं। ईरान को लेकर अमेरिका और यूरोप में मतभेद यूरोप में अमेरिकी सैनिकों की संख्या कम करने पर विचार सिर्फ रूस की वजह से नहीं हो रहा है। इसकी एक वजह अमेरिका और कुछ यूरोपीय देशों के बीच बढ़ते मतभेद हैं। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, ईरान से जुड़े तनाव के दौरान कुछ यूरोपीय देशों ने अमेरिका को अपने हवाई क्षेत्र और सैन्य ठिकानों का पूरा इस्तेमाल नहीं करने दिया था। अमेरिका का मानना है कि अगर यूरोपीय देश अपनी रक्षा पर ज्यादा पैसा खर्च करेंगे, तो अमेरिका अपने सैनिकों और संसाधनों को दूसरी जरूरी जगहों पर लगा सकेगा। अमेरिका पीछे हटा तो यूरोप क्या करेगा? यूरोप की चिंता इसलिए भी है क्योंकि अमेरिकी सेना सिर्फ सैनिक उपलब्ध नहीं कराती। लंबी दूरी की मिसाइल क्षमता, खुफिया निगरानी, एयर डिफेंस, हवा में ईंधन भरने वाले विमान और दूसरी सैन्य क्षमताओं में भी अमेरिका की बड़ी भूमिका है। अगर अमेरिकी सैनिकों की संख्या बड़े स्तर पर घटती है तो यूरोपीय देशों को अपनी सैन्य क्षमता बढ़ानी पड़ेगी। अंतिम सिफारिश मिलने के बाद ट्रम्प लेंगें फैसला समीक्षा की शुरुआती रिपोर्ट जनरल एलेक्सस ग्रिंकेविच रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ को सौंपेंगे, जबकि अंतिम सिफारिश नवंबर की शुरुआत तक आने की उम्मीद है। इसके बाद ही राष्ट्रपति ट्रम्प कोई फैसला लेंगे। ------------------------------ ये खबर भी पढ़ें… सऊदी को F-35 फाइटर जेट देगा अमेरिका: ट्रम्प की ₹2.3 लाख करोड़ की डील को मंजूरी अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने सऊदी अरब को 48 F-35 फाइटर जेट बेचने की मंजूरी दे दी है। पूरी खबर यहां पढ़ें…
राहुल गांधी बोले- वोट चोरी के बाद अब पार्टी चोरी:ये सिर्फ ममता बनर्जी की लड़ाई नहीं; EC ने TMC के नाम-सिंबल पर रोक लगाई
कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने तृणमूल कांग्रेस (TMC) के चुनाव चिह्न और नाम के इस्तेमाल पर रोक लगाने के चुनाव आयोग के आदेश की आलोचना की। उन्होंने कहा कि ये लड़ाई सिर्फ ममता बनर्जी की नहीं है। वोट चोरी और सरकार चोरी के बाद अब पार्टी चोरी हो रही है। राहुल गांधी ने शुक्रवार को X पर लिखा- पहले शिवसेना, फिर NCP और अब तृणमूल कांग्रेस। हर बार एक ही पैटर्न- BJP और चुनाव आयोग मिलकर एक पार्टी को तोड़ते हैं। फिर उसका चुनाव चिन्ह छीन लिया जाता है। उन्होंने लिखा- जब पूरी की पूरी पार्टी चोरी हो सकती है, तो करोड़ों भारतीयों के वोट चोरी होना भी हैरानी की बात नहीं। वोट चोरी। सरकार चोरी। अब पार्टी चोरी - ये हमारे लोकतांत्रिक पतन के प्रतीक बन गए हैं। आयोग ने दोनों गुटों से मांगे नए नाम और चुनाव चिह्न दरअसल, आयोग ने गुरुवार को दिल्ली में दोनों गुटों के प्रतिनिधियों को बैठक के लिए बुलाई थी। पार्टी में दो गुट हैं। एक का नेतृत्व ममता बनर्जी और दूसरे का अरूप रॉय कर रहे हैं। आयोग ने कहा कि दोनों गुट खुद को असली पार्टी बता रहे हैं। इसलिए इलेक्शन सिम्बल्स ऑर्डर, 1968 के नियमों के तहत इस विवाद पर फैसला लिया जाएगा। फिलहाल सिंबल और नाम के इस्तेमाल पर रोक का आदेश जारी किया गया है और TMC के दोनों गुटों से शुक्रवार तक पसंद के नए नाम और चुनाव चिह्न देने को कहा है। ये आदेश मौजूदा उपचुनावों और अंतिम फैसले तक लागू रहेगा। 6 अक्टूबर को उपचुनाव, नए सिंबल पर लड़ेंगे उम्मीदवार पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम और रेजीनगर विधानसभा सीटों पर 6 अक्टूबर को उपचुनाव हैं। दोनों गुटों ने एक ही चिह्न पर उम्मीदवार उतारे थे। ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले बागी TMC धड़े से मोहम्मद एतेशामुल हक नंदीग्राम और सफीउद्दीन शेख रेजीनगर से चुनाव लड़ेंगे। वहीं, पूर्व सीएम ममता बनर्जी की TMC ने रविवार को नंदीग्राम से संचिता प्रधान (डे) और रेजीनगर से रबीउल आलम चौधरी को उम्मीदवार घोषित किया था।
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