Explainer: TMC के नए गुटों के क्या-क्या होंगे नाम? ममता ने EC को सौंपे 3 पसंदीदा विकल्प और चुनाव चिन्ह, ऋतब्रत बनर्जी की क्या होगी पसंद
What New Name of TMC Factions: पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा उपचुनाव से पहले तृणमूल कांग्रेस के नाम और चुनाव चिह्न को लेकर विवाद बढ़ गया है. चुनाव आयोग के फैसले के बाद अब तृणमूल कांग्रेस और फूलों वाले चुनाव चिन्ह का प्रयोग दोनों गुट नहीं कर सकते हैं. ममता बनर्जी और ऋतब्रत बनर्जी को नया नाम और चुनाव चिन्ह चुनना होगा. दोनों गुटों के नए नाम क्या हो सकते हैं. आइए पिछले कुछ घटनाक्रमों से समझते हैं.
दरअसल, पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस (TMC) में शुरू हुआ अंदरूनी विवाद 3 जून 2026 को बड़े राजनीतिक संकट में बदल गया, जब 58 बागी विधायकों ने पार्टी के खिलाफ मोर्चा खोल दिया. बागी विधायकों ने विधानसभा अध्यक्ष को समर्थन पत्र सौंपकर ऋतब्रत बनर्जी को अपना नेता और विपक्ष का नेता चुना, जिसे स्पीकर ने स्वीकार कर लिया. बागी गुट ने दावा किया कि उसके पास पार्टी के 80 में से दो-तिहाई से ज्यादा विधायकों का समर्थन है.
इस घटनाक्रम को टीएमसी के 28 साल के इतिहास में पहली बड़ी औपचारिक टूट के तौर पर देखा गया. विवाद के पीछे पार्टी नेतृत्व से असंतोष, संगठन में फैसलों के केंद्रीकरण और अभिषेक बनर्जी के बढ़ते प्रभाव जैसे मुद्दे बताए गए. इससे पहले ऋतब्रत बनर्जी और संदीपन शाह को कथित फर्जी हस्ताक्षर विवाद के बाद पार्टी से निष्कासित किया गया था. चुनाव आयोग ने अंतरिम आदेश में ममता बनर्जी और दूसरे गुट, दोनों को फिलहाल टीएमसी के नाम और पारंपरिक चुनाव चिह्न के इस्तेमाल से रोक दिया है. आदेश मानते हुए ममता बनर्जी ने अपनी पसंद के 3 नए नाम और चुनाव चिन्ह चुनाव आयोग को सौंपे हैं.
क्या हो सकते हैं TMC के नए गुटों का नाम?
ममता ने जिन 3 नाम और चुनाव चिन्हों को चुनाव आयोग में जमा किया, उसकी जानकारी तो सामने नहीं आई है. पिछले कुछ घटनाक्रम से ममता की पार्टी के नए नाम का अंदाजा लगाया जा सकता है. अभी तक शिवसेना और एनसीपी पार्टी टूट की बड़ी घटनाएं सामने आई हैं. वहीं ऋतब्रत बनर्जी भी 3 विकल्पों को जमा करेंगे.
पिछले घटनाक्रम
महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी (राकांपा) में विभाजन के बाद चुनाव आयोग ने दोनों पार्टियों के बागी और मूल गुटों को अलग-अलग नए नाम और चुनाव चिह्न आवंटित किए.
1. शिवसेना में टूट के बाद आए नए नाम
एकनाथ शिंदे गुट: इस गुट को निर्वाचन आयोग ने असली शिवसेना मानते हुए ‘शिवसेना’ नाम और ‘धनुष्यबाण’ (Bow and Arrow) चुनाव चिह्न दिया. इससे पहले शुरुआती दौर में इस गुट का नाम ‘बालासाहेबंची शिवसेना’ (Balasahebanchi Shiv Sena) तय किया गया था.
उद्धव ठाकरे गुट: उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाले दल को नया नाम ‘शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे)’ [शिवसेना (UBT)] मिला तथा चुनाव चिह्न के रूप में ‘मशाल’ (Flaming Torch) आवंटित की गई.
2. NCP में टूट के बाद आए नए नाम
अजीत पवार गुट: निर्वाचन आयोग ने अजीत पवार के गुट को वास्तविक राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) माना, जिससे उन्हें पार्टी का मूल नाम ‘एनसीपी’ और ‘घड़ी’ चुनाव चिह्न मिला.
शरद पवार गुट: शरद पवार के नेतृत्व वाले समूह को नया नाम ‘राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी-शरदचंद्र पवार’ (Nationalist Congress Party-Sharadchandra Pawar) [NCP-SCP] दिया गया है.
अब TMC के नए गुटों के नाम
दरअसल, कोई भी राजनीतिक पार्टी अपने नाम और चुनाव चिन्ह को सालों की मेहनत से अपनी पहचान बनाती है. पार्टी टूट के बाद नाम और चुनाव चिन्ह पार्टी फंड से भी ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है. दो गुटों में चुनाव आयोग किसी एक पार्टी को असली पार्टी मानता और नाम-चुनाव चिन्ह उसी को सौंप देता है. जैसा कि शिवसेना और एनसीपी के केस में हुआ. हालांकि पहले चुनाव आयोग ने दोनों केसों में पार्टी के मूल नाम और चुनाव चिन्ह सीज कर दिए थे. बाद में किसी एक को मूल पार्टी मानकर असली नाम और चुनाव चिन्ह दिया था.
चुनाव चिन्ह और पार्टी नाम सीज होने के बाद दोनों गुटों को नए नाम और चुनाव चिन्ह के विकल्प पर जाना होगा. दोनों गुट असली नाम और चुनाव चिन्ह की पसंद के साथ अन्य विकल्प भी जमा करेंगे. असली पार्टी किसे माना जाएगा. ये फैसले चुनाव आयोग पर निर्भर करेगा.
टूट के बाद दोनों गुट अपने पिछले पैटर्न को देखते हुए ममता बनर्जी की पार्टी का नया नाम तृणमूल कांग्रेस-ममता बनर्जी हो सकता है. वहीं ऋतब्रत बनर्जी गुट का नाम तृणमूल कांग्रेस-ऋतब्रत बनर्जी देखने को मिल सकता है. हालांकि अंतिम पुष्टि चुनाव आयोग की मंजूरी के बाद ही सामने आएगी.
आधी रात में ममता ने सौंपा जवाब
समाचार एजेंसी PTI के मुताबिक, ममता बनर्जी ने चुनाव आयोग के अंतरिम आदेश पर गुरुवार रात अपना जवाब दाखिल कर दिया. सूत्रों के अनुसार, रात 11:36 बजे सौंपे गए जवाब में उन्होंने पार्टी के लिए तीन नए नाम और चुनाव चिह्न के विकल्प दिए. हालांकि, ममता बनर्जी ने आयोग के आदेश पर कड़ा विरोध जताते हुए ये विकल्प सौंपे.
मायावती ने UPI शुल्क पर उठाए सवाल, केंद्र से जनहित में फैसला लेने की अपील
यूपीआई लेनदेन पर संभावित शुल्क को लेकर देशभर में राजनीतिक माहौल गरमाया हुआ है और विपक्षी दल लगातार केंद्र सरकार की आलोचना कर रहे हैं. इसी कड़ी में बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती ने भी तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है. उन्होंने इस नई व्यवस्था को आम जनता की दोनों हाथों से होने वाली लूट करार दिया. मायावती का कहना है कि सरकार ने पहले डिजिटल भुगतान को जमकर बढ़ावा दिया और अब मुनाफाखोरी वाली पूंजीवादी सोच के तहत इस पर टैक्स थोपा जा रहा है.
आम आदमी की जेब पर पड़ेगा इसका सीधा असर
उन्होंने स्पष्ट किया कि इसे चाहे कोई भी नाम दिया जाए, लेकिन इसका सीधा असर आम आदमी की जेब पर पड़ेगा और उनका खर्च बढ़ना तय है. गरीबी, बेरोजगारी, अशिक्षा और भयंकर महंगाई से त्रस्त देश की जनता पर यह एक अतिरिक्त आर्थिक बोझ है. ऐसे में उन्होंने सरकार से अपील की है कि उसकी कार्ययोजना व्यावसायिक और लाभ कमाने वाली न होकर, पूरी तरह से जनहित और कल्याणकारी होनी चाहिए.
मायावती ने उठाया एससी की मुद्दा
सामाजिक न्याय के मुद्दे पर भी बसपा अध्यक्ष ने उत्तर प्रदेश सरकार के रवैये पर सवाल खड़े किए हैं. उन्होंने सहारनपुर, अंबेडकरनगर, कन्नौज और जालौन के मेडिकल कॉलेजों में अनुसूचित जाति (एससी) के आरक्षण का मामला उठाया. इन कॉलेजों का निर्माण विशेष रूप से एससी वर्ग के कल्याण के लिए बनाए गए 'स्पेशल कंपोनेंट प्लान' के धन से किया गया है. मायावती का मानना है कि राज्य सरकार को न्यायालय में मजबूती से यह पक्ष रखना चाहिए था कि इन संस्थानों में एससी वर्ग के लिए दी जाने वाली अतिरिक्त आरक्षण की व्यवस्था सामान्य पचास प्रतिशत की सीमा से बिल्कुल अलग है. उनका दावा है कि अगर सरकार सही तरीके से पैरवी करती, तो हाईकोर्ट इस सकारात्मक व्यवस्था पर पाबंदी नहीं लगाता. अब चूंकि अदालत की रोक के कारण मेडिकल दाखिले बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं, इसलिए उन्होंने यूपी सरकार को फौरन सुप्रीम कोर्ट में अपील कर छात्रों के लिए राहत मांगने की सलाह दी है.
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